मंगलवार, 8 सितंबर 2026

धीरज श्रीवास्तव जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ



धीरज श्रीवास्तव के प्रस्तुत नवगीत आभिजात्य काव्य-शिल्प की परिधि से बाहर निकलकर सीधे समाज के अंतिम जन के जीवंत यथार्थ, दैनंदिन संघर्ष और मर्मस्पर्शी लाचारी से हमारा साक्षात् कराते हैं। 'सँवरकी' का टूटता स्वाभिमान, 'रामपाल' की बिसूरती विपन्नता और 'रिक्शे वालों' का कठोर श्रम केवल व्यथा की गाथाएँ नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता पर तीखे प्रश्नचिह्न हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन की टीस को उघाड़ता बँटवारे का दर्द हो या जिजीविषा और बेकारी के बीच झूलते जीवन के चित्र, कवि ने लोक-भाषा के सहज और जीवंत बिंबों के माध्यम से इन्हें अत्यंत प्रामाणिकता के साथ उकेरा है। सामाजिक सरोकारों की इस बहुरंगी पृष्ठभूमि के बीच विरह और प्रणय का एकांत नवगीत को एक सुकोमल, आत्मीय धरातल प्रदान करता है। बिना किसी आडंबर या कोरी भावुकता के, समय के पैरों में पड़े छालों की गवाही देते ये नवगीत अपनी गहरी प्रतिबद्धता और सजल संवेदना के बल पर पाठक के चेतना-प्रवाह में एक स्थायी कसक छोड़ जाने में पूरी तरह सफल सिद्ध होते हैं।


(1)


सँवरकी

आज अचानक हमें अचम्भित,

सुबह-सुबह कर गयी सँवरकी।

कफ़ ने जकड़ी ऐसे छाती,

खाँस-खाँस मर गयी सँवरकी।


जूठन धो-धोकर,खुद्दारी,

बच्चे दो-दो पाल रही थी।

विवश जरूरत जान बूझकर,

बीमारी को टाल रही थी।

कल ही की तो बात शाम को

ठीक-ठाक घर गयी सँवरकी।


लाचारी पी-पीकर काढ़ा

ढाँढस रही बँधाती मन को।

आशंकित थी, दीमक बनकर,

टीबी चाट रही है तन को। 

संघर्षों से हाथ छुड़ाकर

भव सागर तर गयी सँवरकी।


करवानी थी जाँच खून की,

मदद पाँच सौ माँग रही थी।

हमको लगा गरीबी शायद,

रच फिर कोई स्वाँग रही थी,

फूट-फूट कर रोई पीछे,

सम्मुख हँसकर गयी सँवरकी।


देती रही दुहाई सेवा,

कुटिल स्वार्थ ने व्यथा न जानी।

करती रही याचना झोली

अडिग रहा बटुआ अभिमानी।

वैभव के पनघट से लेकर,

खाली गागर गयी सँवरकी।


खड़ी हुई लज्जित निष्ठुरता,

शव के आगे शीश झुकाये।

पूछ रहा सामर्थ्य स्वयं से,

अब वह किससे खेद जताये।

जाते-जाते, पढ़ा प्रेम के,

ढाई आखर गयी सँवरकी।


-- धीरज श्रीवास्तव


(2)


कल्लू काका


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


घर में भूजी भाँग न बाकी 

भूखा पेट बहुत हठधर्मी।

आलस पड़ा भरे खर्राटे

गर्दन तक ओढ़े बेशर्मी।

सैर स्वप्न में करें इरादे 

लन्दन पेरिस दुबई ढाका।


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


उछल उछल लँगड़ी आशाएं

दिखा रहीं फोकट में सर्कस।

बीड़ी,जर्दा,चिलम,चुनौटी

अद्वी,पौव्वा करें चकल्लस।

पंचायत की धूर्त सियासत

लगा रही बिंदास ठहाका।


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


नाकामी गढ़ रही बहाने

कुटिल कर्ज की भौंह तनी है।

ब्याज उसे कैसे दे मोहलत

रूठी जिससे आमदनी है।

खर्च डालता मूँछ ऐंठकर,

मिट्टी की गुल्लक पर डाका।


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


-- धीरज श्रीवास्तव


(3)


फूट -फूटकर अम्मा रोयीं


आँगन में दीवार पड़ गयी सन्नाटा है द्वारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।


साँझ लगाती मरहम कैसे

भला भूख के कूल्हे पर !

दुख की चढ़ी पतीली हो जब

आशाओं के चूल्हे पर !


हमने ढलते आँसू देखे तुलसी के चौबारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।


तनिक दया भी नहीं दिखायी

सुख जैसे मेहमानों ने !

हृदय दुखाया पल पल जी भर

चाची के भी तानों ने !


एक एककर हवन हो गयीं सब खुशियाँ अंगारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।


भाग्य गया वनवास भोगने

हँसी उड़ायी लोगो ने !

नाव हमेशा रही भँवर में

फँसा दिया संयोगो ने !


देख देख बस हँसे जमाना बैठा सिर्फ किनारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।



-- धीरज श्रीवास्तव



(4)


रिक्शे वाले


फटे पाँव हाथों में छाले।

मगर मस्त हैं रिक्शे वाले।


रोज थिरकतीं मदहोशी में,

सांझ ढले आशाएं भोली।

स्वप्न अधूरे ठर्रा पीकर,

नमक चाट कर करें ठिठोली।

फुटपाथों पर नग्न गरीबी

पड़ी अगौंछा मुँह पर डाले।


सेंक रही है बैठ विवशता

ईंटों के चूल्हे पर रोटी।

प्यासा गला ढूंढता फिरता

सड़क किनारे नल की टोटी।

भूख निगलती प्याज तोड़कर

हरी मिर्च के साथ निवाले।


अक्सर करते जाम सड़क को,

रैली ,धरने बैनर झंडे।

खिसियाई खाकी बरसाती,

रिक्शे के कूल्हों पर डंडे।

भद्दी भद्दी गाली खाकर,

अपमानों के पीते प्याले।


ठंड गिराती आसमान से,

साथ ओस के भाई-चारा।

एक फटे कम्बल में करते,

राधे-जुम्मन साथ गुजारा।

भिड़ें अजानें शंखों के सँग ,

या मस्ज़िद से लड़ें शिवाले।


--धीरज श्रीवास्तव


(5)


रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील


रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।

उसकी खुशियाँ उसके सपने वक्त गया सब लील।


बिन पानी के मछली जैसे

तड़प रहा वह आज

बिटिया अपनी ब्याहे कैसे

और बचाये लाज


संघर्षों में सूख चली है आँखों की भी झील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


शहर दिखाये ले जाकर जब

दो हजार हों पास

संगी साथी कौन दे रहा

नहीं किसी से आस

ठोक रही बीमारी माँ की छाती में बस कील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


कर्म भाग्य का नहीं संतुलन

बनी गरीबी गाज

देखे जो लाचारी इसकी

ताक लगाये बाज


व्यंग्य कसे मुस्काये अक्सर खाँस-खाँस कर चील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


फिर भी हिम्मत क्यों हारे वो

जीना है हर हाल।

पटरी पर ला देगा गाड़ी

आते-आते साल।


रोज-रोज आशाएँ दौड़ें जाने कितने मील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


--  धीरज श्रीवास्तव


(6)


चूमे प्रेम निशानी मन


तड़पे,सिसके,छुए निहारे

चूमे प्रेम निशानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी,अभिमानी मन।


किया हवा ने छल बादल से,

चली छुड़ाकर हाथ अचानक।

ठहर गया बढ़ सका न आगे, 

रहा अधूरा प्रेम कथानक।

बुने उसी को साँझ सकारे,

पल पल गढ़े कहानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी, अभिमानी मन।


पलकों की चौखट पर बैठे

स्वप्न अपाहिज डाले आसन ।

लौटेगी बैसाखी लेकर , 

नींद नहीं देती आश्वासन।

उम्मीदों पर रात गुजारे

पड़े पड़े सैलानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी,अभिमानी मन।


इठलाती चंचल लहरों पर,

डाल रहा सन्नाटा डोरे।

नाम रेत पर लिखें उंगलियां

विरह वेदना सीप बटोरे।

रोज उलचता बैठ किनारे,

नम आँखों का पानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी, अभिमानी मन


बिखर गया था जहाँ प्रणय का,

रिश्ता नाज़ुक धागों वाला।

गूँथे जहाँ मौन आकुलता,

अनुबन्धों की टूटी माला।

खड़ा वहीं से तुम्हें पुकारे,

करने को अगवानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी,अभिमानी मन।


--  धीरज श्रीवास्तव


परिचय

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संक्षिप्त -परिचय


नाम-   धीरज श्रीवास्तव                                             

पिता-  स्व. रमाशंकर लाल श्रीवास्तव                                  

माता- स्व. श्रीमती शान्ती                                     

जन्मतिथि- 01-09-1974

वर्तमान पता- ए- 259, संचार विहार मनकापुर जनपद--गोण्डा (उ.प्र.)  पिन - 271308


स्थायी पता- ग्राम व पोस्ट - चिताही, जनपद- सिद्धार्थ नगर (उ.प्र.)


संपादन- मीठी सी तल्खियाँ (काव्य संग्रह), नेह के महावर (गीत संग्रह) 


प्रकाशन-  मेरे गाँव की चिनमुनकी (गीत संग्रह) 'धीरज श्रीवास्तव के गीत( डॉ.सुभाष चंद्र द्वारा संपादित) सहित अनेक साझा संग्रह एवं राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय पत्र -पत्रिकाओं, व ई पत्रिकाओं में रचनाओं का निरन्तर प्रकाशन।


संप्रति --- संस्थापक सचिव, साहित्य प्रोत्साहन संस्थान, एवं "साहित्य रागिनी" वेब पत्रिका।  मोबाइल नंबर- 8858001681

ईमेल- dheerajsrivastava228@gmail.com

आत्मकथ्य - मेरे लिए गीत केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने समय और समाज के प्रति संवेदनशील संवाद हैं। यदि मेरे शब्द किसी चेहरे की पीड़ा को आवाज और किसी मन में उम्मीद की रोशनी दे सकें, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगा।


सोमवार, 7 सितंबर 2026

डॉ मधु शुक्ला जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ

डॉ मधु शुक्ला जी के गीतों के बहाने एक प्रस्तुति टीप


   प्रस्तुति
 मनोज जैन 
   संपादक 
~।।वागर्थ।।~ 

शान्तिसुमन की परम्परा को पुष्पित पल्लवित करती मधु शुक्ला जी
__________________________

​डॉ. मधु शुक्ला के गीत भारतीय नवगीत परंपरा की उस समृद्ध धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें प्रकृति का सौंदर्य, संवेदना की सघनता और मानवीय संबंधों की तड़प आपस में एकाकार हो उठती है। डॉ. शान्तिसुमन की गीत-परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनकी रचनाधर्मिता में मिट्टी की सोंधी गंध, प्रकृति के मानवीय भाव और क्लासिकी काव्य-संस्कार (यक्ष-यक्षिणी, कबीर, मीरा के संदर्भ) सहज ही उतर आते हैं। इन गीतों में एक ओर जहाँ वर्षा और बादल के माध्यम से हृदय के उल्लास तथा प्रेम की विकलता को स्वर मिला है, वहीं दूसरी ओर बदलते समय की त्रासदी, टूटते अनुबंधों और उजड़ते ग्रामीण परिवेश की पीड़ा भी पूरी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुई है। देवदार के शांत-साधक स्वरूप से लेकर माटी के प्रति अनन्य अनुराग तक, मधु जी की भाषा अत्यंत प्रांजल, लयात्मक और दृश्यबंधों (बिंबों) से परिपूर्ण है। यह संकलन प्रकृति-प्रेम, स्मृतियों और जीवन-दर्शन का एक ऐसा समेकित संसार रचता है, जो पाठक के मन को गहराई से छू लेता है।

 (1)      
                              
(स्वप्न धानी लिख गया )

झील के किस्से,
समन्दर की कहानी लिख गया।   
एक बादल फिर
नदी की जिन्दगानी लिख गया ।  

उँगलियों से बूँद की  ,
पानी में इक   हलचल लिखी 
मौन लहरों के सुरों में,
थिरकती कलकल लिखी 
लिख गया कुछ बिजलियाँ 
कुछ आग-पानी लिख गया ।

तप्त धरती के ह्रदय के 
भाव अँकुराने लगे 
थरथराते पात तन के 
अर्थ गहराने लगे 
जर्द आँखों में धरा की
स्वप्न धानी लिख गया ।

खोलकर खिड़की
फुहारों का झकोरा आ गया  
पत्र सोंधी गंध वाले 
द्वार पर सरका गया 
भीगते मन में कई 
सुधियाँ सुहानी लिख गया ।

डोर  ले विश्वास की
मन का  पपीहा उड़ चला 
ढाई आखर के सबद
गाता कबीरा मुड़ चला 
संग मेरे नाम के
मीरा दिवानी लिख गया ।

लिख गया युग के अधूरे
प्रेम की दारुण  कथा 
यक्षिणी की पीर, 
शापित यक्ष के मन की व्यथा
फिर कथानक में नये 
बाते पुरानी लिख गया ।
एक बादल फिर नदी की 
जिंदगानी लिख गया। 
    ----‐-------

( 2)

(आओ इक पाती )

खोई- खोई सुबह लिखें 
अलसाई शाम लिखें 
आओ इक पाती रूठे 
मौसम के नाम लिखें।  

लिखे मेघ जो भेजे तुमने , 
आकर लौट गये 
प्यासे मन को  तनिक और 
तड़पाकर लौट गये 
कुछ छल गया अषाढ़ 
छल रहा कुछ  सावन-भादों 
साँस तोड़ती फसलों का 
आखिरी सलाम लिखें। 

तुम क्या रूठे, जीवन की 
सब खुशियाँ रूठ गईं 
शुभ सकुनो वाली कलशी 
हाथों से छूट गई 
सूख गयी पल में बगिया 
हरियाये सपनों की 
चुका रहे भूलों का अपनी 
क्या-क्या दाम लिखें। 

पाँव जमाकर आ बैठी है 
धूप मुंडेरों पर 
ढूँढ़े रैन बसेरा पंछी 
सूखे पेड़ो पर 
मौन हुआ संगीत तटों का
उजड़ गये मेले 
रेत-रेत होती नदिया के 
दर्द तमाम लिखें। 

कुशल क्षेम की चिट्ठी आये 
वर्षों बीत गये 
सोधी मिट्टी वाले सारे 
रिश्ते रीत गये 
राह देखते धुँधलायी 
आँखें  सीवानों की 
लौटेंगे मन के गोकुल में 
कब घनश्याम लिखें ।
आओ इक पाती रूठे 
मौसम के नाम लिखें। 
  --------‐---------

(3)

हम हो गए किनारे, सूखी हुई नदी के। 

बहती थी बीच अपने 
भावों की मौन सरिता 
लिखती थीं रोज लहरें 
पानी में प्रेम कविता 

बहकी हवाएँ ऐसी बिखरे वो छन्द सारे ,
टूटे पड़े हैं तट पर अनुबन्ध सतपदी के। 

रुख वक्त का अचानक 
कितना बदल गया है 
मुझे छोड़ कर भँवर में 
आगे निकल गया है। 

लेकर जिन्हें चले थे पलको की पालकी में 
काँटों से चुभ रहे वो सपने नयी सदी के। 

सांसो की बस्तियों में 
उड़ती है चील ऐसे।  
चुभ जाये चलते-चलते 
पावों में कील जैसे।  

घिरते ही जा रहे हैं ख़ामोशियों के साये  
सहमा हुआ समय है आँगन में त्रासदी के।      

ये दर्द कैसा मन को रह-रह
रुला रहा है 
मेरा नाम ले के जैसे कोई 
बुला रहा है।
देता नहीं दिखाई अपना ही 
अक्स अब तो,
दरका है ऐसे दर्पण,ज्यों स्वप्न द्रौपदी के। 

(4)

देवदार के वृक्ष

संत सरीखे खड़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष 
पर्वत-पर्वत,शिखर-शिखर पर 
घाटी-घाटी में बूटे जैसे जड़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

मौन पर्वतों के मन के 
कोमल उद्गारो से 
सजे हुए स्वागत में हर-पल
वंदनवारों से 
अटखेली कर रहे मेघ के 
भीगे फाहो से 
नभ के आँगन बड़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

देखा और पढ़ा था जिनको 
सिर्फ किताबों में 
आज देख प्रत्यक्ष खो गये 
जैसे  ख्वाबों में 
मंत्र मुग्ध हो गया हृदय,
निःशब्द हुई वाणी 
तस्वीरों से मढ़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

ध्यान मग्न हो खड़े हुए हैं 
निरत साधना में 
पत्र,फूल,फल,गंध चढ़ाते 
नित उपासना में 
अनुगुंजित है घाटी जिनके 
मंत्रोच्चारो से 
देवों के ज्यों गढ़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

उभर रहे आकार कई रह-रह 
आभासो के 
पलट रहीं हैं पृष्ठ,कथायें 
फिर इतिहासो के 
कालिदास के विकल यक्ष की 
प्रेम भरी पाती 
आखर-आखर पढ़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 
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 (5)

[जब कभी बादल]

अनगिनत सपने 
उमीदों के सजाता है ।
जब कभी बादल 
नदी के गीत गाता है ।

जाग उठती हलचलें 
सोई  उमंगों में 
गीत कल-कल के
थिरक उठते तरंगों में 
फूटते झरने खुशी के,
मौन शिखरों से
हुलसती धरती गगन 
तब मुस्कुराता है ।

देख अद्भुत दृश्य 
बादल और बिजली के 
गूँज उठते सुर मधुर 
मल्हार कजरी के 
पैग भरती है गगन तक 
राधिका मन की 
प्रीति का घनश्याम
तब मुरली बजाता है ।

इन्द्रधनु सा कौन 
सुधियों में उभरता है 
डोर बूँदों की पकड़
मन में उतरता है 
भेज कर संदेश मीठे 
मेघ के हाथों 
पर्वतों के पार से
मुझको बुलाता है। 
जब कभी बादल
नदी के गीत गाता है।

    (6)

[ सौंधी पातिया ]

भेज  सोंधी पातिया 
भीगी हवाओं से 
गाँव की पगडण्डियाँ 
मुझको बुलाती हैं I 

द्वार का वो नीम चौरा 
वो लिपा आँगन  
धूल- मिट्टी में चहकता 
फूल सा बचपन 
वो खुला आकाश, 
धरती का वो अपनापन
था वही गोकुल हमारा, 
वही वृंदावन, 
छोड़ आये थे कभी
जिस देहरी को हम 
वो अभी तक याद के 
दीपक जलाती है. 

फूलते जब कास वन 
लेते विदा बादल  
ओढ़कर आती शरद ऋतु 
रेशमी आँचल 
सिलसिले होते शुरू 
उत्सव- उछाहो के 
लौटती फिर गाँव- गलियों में 
नयी हलचल 
दमक उठती   देह 
टूटी  छत-दीवारों की 
शुभ चित्र अंकित भीतिया 
फिर जगमागाती हैं I  

धूप वाले दिन, 
वो ठंडी छाँव वाले दिन 
आस्था-  विश्वास , 
भक्ति - भाव वाले दिन 
उतरते वो पंछियो  के 
दल किनारों पर, 
तिर रही फिर से नदी में 
नाव वाले दिन I
लिपट कर इन  लहलहाते  
धान खेतों से  
ये हवाएँ  जिंदगी का 
गीत गाती  हैं I 

दूर तक फैला हुआ 
संसार माटी का 
ये जग नहीं कुछ और बस 
विस्तार माटी का 
पर्वत- शिखर, ये घाटिया 
ये खेत, ये झरने 
हर रूप में ढलता हुआ 
आकार माटी का 
उम्र भर मन भूल पाता 
है नहीं जिसको   
वो नेह का रिश्ता अमिट 
माटी बनाती है I
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संक्षिप्त परिचय          
डॉ मधु शुक्ला 
जन्मस्थान- लालगंज, 
रायबरेली (उ. प्र. )
शिक्षा -एम.ए.(हिन्दी एवं संस्कृत) 
पी एच डी 
लेखन की विधा - गीत, ग़ज़ल, कहानी समीक्षायें एवं साहित्यिक आलेख ।
दो गीत पुस्तकें प्रकाशित-- "आहटें बदले समय की" एवं "कुछ मन के कुछ मौसम के "
 "आहटें बदले समय की " पुस्तक पर म. प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा दुष्यन्त सम्मान।

पूर्व - व्याख्याता (संस्कृत) 

साहित्यिक पत्रिका "पहला अंतरा" में सह सम्पादक ।
सम्पर्क ------6-साई हिल्स, कोलार रोड, 
भोपाल -462042 म. प्र. 
मोबाइल ---09893104204 
Email -----madhushukla111@gmail.com