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शनिवार, 18 जुलाई 2026
वरिष्ठ विमर्श की तस्वीरें
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तस्वीरें
नवगीत पर एकाग्र फेसबुक पर चर्चित समूह वागर्थ समूह का संयुक्त सहयोगी उपक्रम ब्लॉग वागर्थ
यशवंत गोरे जी का एक व्यंग्य प्रस्तुति वागर्थ
साहित्य का अलंकरण नहीं , अलगकरण समारोह -एक रिपोर्ट
जिस प्रकार शासकीय कर्मचारियों के लिए सरकार द्वारा डीए के एरियर की घोषणा होते ही उसका लाभ पाने वाले कर्मचारियों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है वैसे ही साहित्य के पुरस्कारों की घोषणा होते ही साहित्यकारों में प्रसन्नता छा जाती हैं। क्योकि साहित्यिक पुरस्कार भी डीए की तरह एरियर में ही दिए जाते है। घोषणा के साथ यह भी एक पुछल्ला रहता है कि डीए एरियर में मिलने वाली राशी आधी पीएफ में जमा होगी तो कुछ कर्मचारीयों में निराशा के भाव आ जाते है, वैसे ही जिन साहित्कारों के नाम पुरस्कारों की सूचि में नहीं होते निराश हो जाते है। सरकार के खजाने में मंत्रियों और अफसरों के लिए लग्जरी गाड़ियों , बंगलों की सजावट के लिए बजट में तो कोई कमी नहीं होती है परन्तु कर्मचारियों के डीए के भुगतान के लिए और साहित्य के पुरस्कारों की राशि के लिए बजट का बहाना बताकर टाल दिया जाता हैं। इसलिए डीए की तरह पुरस्कार भी दो -तीन साल के एरियर में दिए जाते है।
पुरस्कारों की घोषणा होते ही चयनित साहित्यकारों को सोशल मिडिया पर बधाइयों की बाढ़ सी आ जाती है। जिसका नाम चयनित सूची में नहीं होता वे " बन्दर बाँट " "अँधा बाटे रेवड़ी" जैसे कमेंट कर अपनी भड़ास निकाल लेते है। पुरस्कारों की दुनिया में हमेशा रचनाकार गरीबी रेखा से निचे ही रहता है। क्योंकि पुरस्कार मिलते ही दूसरे ज्यादा पुरस्कृत द्वारा खींची गई लाइन के नीचे आ जाता हैं।
पुरस्कारों की घोषणा और अलंकरण समारोह के बीच की अवधि चयनित साहित्यकारों की मन स्थिति वैसी ही होती है जैसे शादी तय होने के बाद सगाई और शादी की अवधि में एक होने वाले दूल्हे और उसकी मंगेतर की होती है। अलंकरण समारोह की तिथि की घोषणा होते ही अलंकरण प्राप्त करने वाले साहित्यकार फिर एक बार अपने आभासी मित्रों को सोशल मीडिया पर सूचना डालकर फिर से बधाई की अपेक्षा करने लगते है।
घोषित तिथि पर नगर का "कवीन्द्र भवन " का "कागध्वनि " सभागार खचाखच ऐसे लोगों से भर जाता है , जिन्हे अलंकरण दिया जाना है, जिन्हे पहले मिल चुका है और जिन्हे भविष्य में मिलने की आशा है । अगली पंक्ति में ऐसे वरिष्ठ साहित्यकार जिनके प्रोफ़ाइल में पुरस्कारों/ सम्मानों की सूचि लम्बी है, बैठाये जाते है। उसके बाद गले में नीली पट्टी में टंगे परिचय पत्र के साथ घूमने वाले पुरस्कृत होने वाले साहित्यकारों को जगह दी जाती है। ऐसे साहित्यकारों की बड़ी संख्या दिखाई देती है , जिन्हे अगले सालों में पुरस्कार मिलने की उम्मीद है। कुछ साहित्यकार अपने साथ एक साथी को लेकर अवश्य लाता हैं , वह कोई परिजन या साहित्यिक मित्र भी हो सकता है , जो पुरस्कार ग्रहण करते समय अपने मोबाइल पर फोटो अवश्य लें , क्योंकि तुरंत सोशल मीडिया पर जो डालना होता है।
समारोह तय समय पर शुरू कैसे होता क्योंकि पुरस्कार संस्कृति विभाग के संस्कारित मंत्री द्वारा दिए जाने थे। संस्कार देने वाले संगठन से आये मंत्रियों के संस्कारों में कुछ कमी रह ही जाती हैं, इस कारण वे समय पर नहीं आ पाते। इस बीच समय का सदुपयोग करते हुए , पुरस्कृत होने वाले साहित्यकार और जो भविष्य में अपेक्षा रखते है संस्था प्रमुख और अन्य साहित्यकारों के साथ सेल्फी/ फोटो खिंचवाने लगते है । मंच से घोषणा की गई कि मंत्री जी शीघ्र ही हमारे बीच होंगे तब तक संस्था के प्रमुख पुरस्कारों की पृष्ठभूमि और संस्था की उपलब्धियों के बारे में अपना वक्तव्य देंगे। संस्था प्रमुख को अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने के लिए पर्याप्त समय मिल गया था। संस्था प्रमुख बीच -बीच में यह घोषणा जरूर कर रहे थे कि मंत्री जी शीघ्र ही हमारे बीच होंगे। तभी पीछे से उदघोषक ने धीरे से कुछ कान में आकर कहा , उन्हें लगा शायद समय ज्यादा लेने के कारण बैठने के लिए इशारा कह रहे हैं, परन्तु मामला यह था कि मंत्री के नहीं आने की सूचना आ चुकी थी। संस्था प्रमुख ने क्षमा मांगते हुए घोषणा की कि मंत्री जी को किसी आकस्मिक बैठक में जाना पड़ा है अतः मंत्री जी नहीं आ पा रहे है। पुरस्कार वितरण के लिए सामने बैठे एक वरिष्ठ साहित्यकार से निवेदन कर मंच पर आने का आग्रह किया। आजकल साहित्यकारों में ऐसे साहित्यकार बहुत मिल जायेंगे जो वरिष्ठ पहले हुए और साहित्यकार बाद में। इसलिए यह चयन करना कठिन होता है कि वे वरिष्ठ अपने सृजन के कारण है या उम्र के कारण।
आखिरकार अलंकरण समारोह पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुआ। क्योंकि कार्यक्रम में पूर्व में पुरस्कृत , आज के कार्यक्रम में अलंकृत एवं जिनका चयन नहीं हुआ उनकी सबकी गरिमा का पूरा का ख्याल रखा गया था। पूर्व में पुरस्कृत , आज के समारोह में पुरस्कृत , जो पुरस्कृत नहीं हो पाए , जिनकी कोई पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई , जिन्हे अलंकरण प्राप्त हुआ उन्हें बधाई देने वाले , सब अलग -अलग स्पष्ट नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था यह अलंकरण समारोह न होकर साहित्यकारों का अलगकरण समारोह हो।
साहित्यकारों की कई श्रेणियां होती है। डॉक्टरों की तरह रचनाकारों में भी विशेषज्ञ होते है कवि , गीतकार , ग़ज़लकार , कोई दोहे लिखने के विशेषज्ञ होते है , निबंधकार , व्यंग्यकार , (इस विधा में लिखने वालों साहित्यकार कुछ ज्यादा ही पाए जाते है)। हर रचनाकार इस विधा में हाथ आजमाना की कोशिश कर रहा है। कुछ रचनाकार नगर की हर साहित्यिक संस्था से जुड़ने की लिए हर विधा में कुछ - न - कुछ लिखने लगते है। नगर की हर साहित्यिक के कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज करते है। हर साहित्यिक संस्था में पद पाने की कोशिश भी करते लगते हैं। यदि किसी संस्था में पद नहीं मिलता है , तो अपनी एक अलग साहित्यिक संस्था खड़ी कर लेते है। अपनी संस्था बनाने के लिए करना क्या होता है , एक केवल बैनर ही तो बनाना होता है। दो चार महीने में अपने कुछ साहित्यिक मित्रों को बुलाकर एकाध कार्यक्रम कर लो सोशल मीडिया में अपलोड कर लो , छोटे - बड़े अख़बारों में अपनी फोटो के साथ खबर छपवा दो , मौका मिले तो सरकार के संस्कृति विभाग से थोड़ा बहुत अनुदान झटक लो। कार्यक्रमों की अध्यक्षता , मुख्य अतिथि , सारस्वत अतिथि , विशेष अतिथि के लिए योग्यता प्राप्त हो ही जाती है। कुछ रचनाकार दो-चार सम्मान मिलने के बाद अपने नाम के आगे डाक्टर भी लिखने लगते है।
साहित्यकारों की उत्पत्ति भी कई प्रकार से होती है कुछ को विरासत में ही मिलती है। ऐसे साहित्यकारों को अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए ज्यादा संघर्ष और इंतजार नहीं करना पड़ता। अपने पूर्वर्जो की रचनाओं को अपने नाम से छपवाने पर भी कोई रचना चोरी का दाग नहीं लगता। जिस प्रकार राजनीति में पारिवारिक पार्टियों के लिए बिना कोई संघर्ष किये सब कुछ मिल जाता है। ऐसे साहित्यकार भाग्यशाली होते है। कुछ अधिकारी नौकरी में रहते अपने पदों पर रहने के कारण साहित्यकार बन जाते है। इस श्रेणी में वे लोग आते है जो विभागों में जनसम्पर्क अधिकारी ,राजभाषा अधिकारी या ऐसे पदों पर रहे हो जहाँ साहित्यकारों से पाला पड़ता रहा हो या उनके बॉस साहित्यकार रहे हो। पत्रकारिता करते -करते सृजन करने वाले भी साहित्कार कहलाने लगते है। साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन करते हुए लम्बे अनुभव के कारण ऐसे संचालक भी कुछ दिनों बाद साहित्यकार की श्रेणी में आ जाते है। 2020 के बाद एक नए प्रकार के साहित्यकारों की उत्पत्ति हुई है। जो लोग कोरोना के वायरस से बच गए , परन्तु उनके शरीर में जो सृजन धर्मी का वायरस था अचानक क्रियाशील हो गया और सृजन में लिप्त हो गए। साहित्यकार बन गए , पुस्तकें प्रकाशित होने लगी। साहित्यिक संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियों की बाढ़ सी आने लगी। प्रकाशकों की दुकान चल पड़ी , नए- नए प्रकाशक बाजार में आ गए। गोष्ठियों , साहित्यिक कार्यक्रमों से ज्यादा पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम ज्यादा होने लगे। पुस्तक मेलों में पुस्तकें सजने लगी है।
अलंकरण समारोह समाप्त होने के बाद जिन्हें पुरस्कार मिले थे, वे प्रसन्नता के साथ "कवीन्द्र भवन " के सामने एवं अन्य पुरस्कृत साहित्यकारों के साथ अलंकरण सहित फोटो खिचवाने एवं एक दूसरे को बधाई देने वालों की बड़ी चहल पहल थी। जिनका चयन पुरस्कारों के लिए नहीं हुआ उनके चेहरों पर निराशा स्पष्ट झलक रही थी। वे संस्था प्रमुख को घेरे खड़े थे , अपनी मुलाकातों और रचनाओं की जानकारी देते हुए उनके साथ फोटो खिचवानें के लिए उत्सुक लग रहे थे।
कुछ "मीडिया फ्रेंडली " साहित्यकार नगर के प्रमुख अख़बारों जैसे "सुबह शाम " " पुरानी दुनिया " दैनिक रेल का सफर " काली भूमि " सुबह का अँधेरा " " दैनिक ऑस्कर " जैसे अख़बारों में मुख्य अतिथि से अलंकरण प्राप्त करते हुए फोटो के साथ खबर छपवाने के लिए मोबाईल पर ही प्रेस नोट बनाने में व्यस्त हो गए। उनके लिए दैनिक ऑस्कर में फोटो छपना किसी ऑस्कर पुरस्कार से कम नहीं है। कुछ साहित्यकार कंधे पर एक झोला जिसमें अपनी प्रकाशित पुस्तकें , जिनका चयन पुरस्कार के लिए नहीं हुआ , घूमते हुए बाटतें, फोटो खिंचवाते दिखें , जो सोशल मीडिया पर डालकर उसे प्रसारित करें , ताकि अगली बार पुरस्कार के लिए चयनित हो सके।
इस प्रकार अगले दो- चार साल के इंतजार के साथ यह अलगकरण समारोह माफ़ करना अलंकरण समारोह संपन्न हुआ।
यशवंत गोरे
व्यंग्यकार यशवंत गोरे जी के साथ ब्लॉगर मनोज जैन और साथ में बैठे हैं आदरणीय बी एल गोहिया जी सेल्फी गोरे जी के कैमरे से
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व्यंग्य
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रविवार, 5 जुलाई 2026
हरिनारायण सिंह हरि के दस प्रतिनिधि नवगीत
हरिनारायण सिंह हरि के दस प्रतिनिधि नवगीत
[ एक ]
सच्चा कौन,कौन है झूठा
पता नहीं लगता
प्रजातंत्र का तंत्र अनूठा
पता नहीं लगता
राजतंत्र के बीत गये दिन
सेवक के आये
बंदर के कर मिला तराजू
बिल्ली मुँह बाये
किसने कैसे कब क्या लूटा
पता नहीं लगता
पगडंडी अब राजमार्ग बन
इतराती फिरती
नदियाँ नाले में व्याकुल हो
रक्षा को गिरती
किसका भाग्य कहाँ जा फूटा
पता नहीं लगता
गाली दे-दे बढ़ा रहे वे
कुनबे को आगे
संकोची मन रहे हाथ मल
भाग्य नहीं जागे
किस पर कौन कहाँ पर टूटा
पता नहीं लगता
•
[ तीन ]
बच्चे हो!
तुम नहीं जानते
दुनियादारी
सिस्टम से लड़ने चलते हो
भरत तिवारी!
भ्रम रक्खा है पाल
कि हम आजाद हो गये
सत्ता से अब सुलभ
सभी संवाद हो गये
बाहों में श्रम
आँखों में खिलती फुलवारी
भरत तिवारी !
पावन कब उद्देश्य रहे
कब नैतिक राहें
सत्ता के मन कहाँ रहीं
जन की परवाहें
मद में वे तो चूर
बने हाकिम सरकारी
भरत तिवारी!
हस्र वही होगा
होते जो अबतक आया
संविधान-कानून
सभी उनकी है माया
पता नहीं किसकी कब
आ जायेगी बारी
भरत तिवारी!
•
[ चार ]
धनानंद मदहोश तख्त पर, अब चाणक्य जगो
मगध रसातल ओर अग्रसर,अब चाणक्य जगो
छल-छद्मों का जोर-जबर है, हुआ कठिन जीना
कमर प्रजा की टूट रही है , नृप ताने सीना
दबा हुआ है विद्रोही स्वर , अब चाणक्य जगो
नहीं रहा दायित्व-बोध, खुदगर्ज हुआ राजा
भीतर क्रंदन ऊपर से बज रहा शांति-बाजा
ताँक-झाँक कर रहा सिकंदर,अब चाणक्य जगो
चन्द्रगुप्त को खोज निकालो, कहाँ छिपा वह है
कबतक नहीं शिखा बाँधोगे, पीड़ा दुस्सह है
मन के अंदर तपन भयंकर, अब चाणक्य जगो
•
[ पाँच ]
दिनभर समय कटेगा कैसे? बोलो अरे समय!
जड़ अवसाद हटेगा कैसे? बोलो अरे समय!
एकाकीपन काट रहा है ,वय को कुतर-कुतर
ऊँचा मन अब सोच रहा है नीचे उतर-उतर
दृग के सन्मुख अँधियारे की परतें घनी हुईं
कुहरा घना छँटेगा कैसे? बोलो अरे समय!
लाठी का जब काम हुआ तब लाठी चली गयी
अरमानों की दुनिया अक्सर यों ही छली गयी
जर्जर नइया,विकट तरंगें,नाविक विवश खड़ा
साहस सिर्फ डँटेगा कैसे ? बोलो अरे समय!
यह विकास-पथ, दौड़ रहे इसपर मूँदे आँखें
संपाती औंधे मुँह लुढ़का, झुलस गयी पाँखें
दंश समय का बहुत असह है,पीड़ा हुई घनी
बढ़ता दर्द घटेगा कैसे ? बोलो अरे समय !
•
[ छह ]
एक पिता के चार पुत्र हैं
चारों चार शहर में
पिता गाँव में रहता है
लेकिन मन चार शहर में
यही आज की सच्चाई है
यही वंश का बढ़ना
यही वृक्ष-फैलाव गगन तक
यही तुंग पर चढ़ना
गाँव बेचकर शहर आ गये
घर-परिवार शहर में
बीस कोस का वृत्त घुमाकर
जिसको जान रहा था
गली , मुहल्ला, गाँव ,डगर
हर घर पहचान रहा था
वही भीड़ में अनजाना-सा
अब झख मार शहर में
एक शहर में कभी
कभी वे दूजे में आ जाते
और तीसरे-चौथे घुमकर
अपना समय बिताते
मन तो लगा गाँव में रहता
तन लाचार शहर में
ग्रुऽप वीडिओकाॅलिंग करके
यदा-कदा बतिआते
भरापुरा परिवार हमारा
ऊपर से इतराते
छुटे लँगोटिया यार
बने अब शहरी यार शहर में
•
[ सात ]
भीड़ बहुत है अफरातफरी,
कठिन राह है
सबसे आगे बढ़ जाने की
मलिन चाह है
नील गगन में बादल
छाना चाह रहे हैं
कौए छल के बल पर
गाना चाह रहे हैं
गोरैया पिट रही,
चील की वाह-वाह है
वट-पीपल ओझल आँखों से,
तने बबूलें
चलो आज हम भी इनका
ज्योनार कबूलें
अनय-विनय का फर्क मिटा
उफ्! बहुत धाह है
दस कविताएँ लिखकर
मंचासीन फकीरा
दृश्य देखकर यह,
दिखता गमगीन कबीरा
चलो यहाँ से सच-सच कहना
अब गुनाह है
•
[ सात ]
कउए अक्सर
हंस-अंश को खा जाते हैं
जो जुगाड़ में माहिर
वे नर छा जाते है
शुक-कोयल
मीठी बोली के रहे भरोसे
चापलूस कउए को
भोजन मिले परोसे
ऊपर वाले को
ऐसे ही भा जाते हैं
बैर-बबूल चढ़े ऊपर,
बट-पीपल नीचे
लोकतंत्र में गुणी पेड़ को
क्योंकर सींचे
गिनती के बल पर
जब सत्ता पा जाते हैं
मौन रहो, देखो तिकड़म
कितने दिन चलते
अधिक समय तक
बिना तेल के दीपक जलते ?
लेकिन ये तो बार-बार
भरमा जाते हैं
•
[ आठ ]
बजे मदारी की डुगडुग्गी
उछल रहा है बंदर
कठपुतली सम नाच रहा वह
सूत्रधार है अंदर
एक इशारे पर चढ़ता है
तापमान ऊपर को
सिंहासन पर बैठा देता
झटके में शूकर को
धनानंद के बदले केवल
राजा बना सिकंदर
रामभरोसे खेल रहा है
परिवर्तन का खेला
जितने छाँटे गये गगन से
तारे, उनका मेला
गोटी अबकी लाल करेगा
बेटा यही धुरंधर
चढ़कर रहना थिर नभ ऊपर
कोई इससे सीखे
उठा-पटक के अपनाने होते
हैं सुघर सलीके
बिलावजह के उठा रहे हो
मित्रो! आज बवंडर !
•
[ नौ ]
मेघ! गगन चढ़ इठलाते हो
इतराते हो !
जनम-जनम का नेह धरा से
झुठलाते हो!
धूल फाँकती गोरइया
मनुहार कर रही
धूप धरा से दुश्मन-सा
व्यवहार कर रही
उतर भूमि पर इनको
क्यों ना समझाते हो!
छाया भी अब हुई अगन-सी
पेड़ों वाली
ताल-तलैया जीवन-रस अब
खोनेवाली
रूठ गयीं ये इन्हें न काहे
दुलराते हो!
आओ, उतरो मेघ!
नेह की बरसा लेकर
रूठ गये मुझसे
वैरी के उकसाने पर
भूखी-प्यासी प्रेयसी से
क्यों कतराते हो
•
[ दस ]
क्यों अँधेरी घाटियों में घूमते हो मन !
तम प्रभाती गा रहा तुम ऊँघते हो मन!
नहीं केवल खार, जीवन में बहुत उज्ज्वल
कंटकों को देख मन! क्यों रो रहे विह्वल
तृप्ति तज परिताप को क्यों चूमते हो मन!
गर नहीं वनवास होता, राम कब होते
राज्य को कंधे चढ़ाकर, जिंदगी ढोते
भूल राघव को दशानन पूजते हो मन !
मन! उबर अवसाद से, पथ गंध का धर लो
जिंदगी के पल बचे जो, रंग से भर लो
पा सकोगे वह जिसे तुम ढूँढ़ते हो मन!
•
हरिनारायण सिंह 'हरि' : संक्षिप्त परिचय
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
• मूल नाम- हरिनारायण सिंह
• जन्म- 2 जनवरी,1958 ई
• शिक्षा- एम. ए (राजनीति विज्ञान)
• केएसएस काॅलेज,मोहिउद्दीन (समस्तीपुर) के राजनीति विभागाध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त।
•लेखन- हिन्दी व बज्जिका में।
• प्रकाशन- तीन प्रबंधकाव्य, पाँच कविता-संग्रह, 6 गीत-नवगीत संग्रह, एक गजल-संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित। एक कविता संकलन और एक लघुकथा संकलन का सम्पादन। कई पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का संपादन ।
प्रसारण- आकाशवाणी के पटना व दरभंगा तथा दूरदर्शन के पटना व मुजफ्फरपुर केन्द्र से प्रसारण।
• मूल्यांकन-पुस्तक- डाॅ नीरज कुमार सिन्हा द्वारा संपादित मूल्यांकन-पुस्तक 'हरिनारायण सिंह हरि का गीत-काव्य' प्रकाशित।
•पता- हरिद्वार भवन,राजपुर-जौनापुर
पो-जौनापुर,
भाया-मोहिउद्दीन नगर
जिला-समस्तीपुर-848501
मोबाइल नंबर-9771984355
•ई-मेल - hindustanmohanpur@gmail.com
प्रस्तुति
वागर्थ
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हरिनारायण सिंह हरि
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शिवकुमार अर्चन
शिवकुमार अर्चन जी की पुण्य तिथि पर विशेष आलेख प्रस्तुति
मनोज जैन
हिन्दी कविता की समृद्ध परम्परा में ऐसे कवि विरले ही मिलते हैं, जिन्होंने मंच की लोकप्रियता और साहित्य की गंभीरता दोनों को समान सहजता से साधा हो। कवि शिवकुमार अर्चन ऐसे ही विरल रचनाकार हैं, जिनकी कविता में लोकजीवन की संवेदना, सामाजिक सरोकार, आध्यात्मिक चेतना, प्रतिरोध का स्वर और मानवीय करुणा एक साथ स्पंदित होती है। वे उन कवियों में हैं जिन्होंने कविता को केवल शब्दों का विन्यास नहीं माना, बल्कि जीवनानुभवों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा और जिया।
अर्चन जी का रचनाकर्म किसी एक विधा, विचारधारा अथवा शिल्प तक सीमित नहीं है। गीत और ग़ज़ल उनके प्रिय माध्यम अवश्य रहे, किन्तु उनके लिए कविता का मूल उद्देश्य मनुष्य के सुख-दुःख, संघर्ष, विसंगतियों और आत्मिक अनुभवों को सम्प्रेषित करना था। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ शास्त्रीय आग्रहों से अधिक जीवन-सत्य की पक्षधर दिखाई देती हैं। उनकी कविता में जहाँ एक ओर लोकजीवन की मिट्टी की सोंधी गंध है, वहीं दूसरी ओर समय की विडम्बनाओं के विरुद्ध सजग प्रतिरोध भी है। उनके यहाँ प्रकृति भी है, प्रेम भी है, अध्यात्म भी है और आम आदमी की पीड़ा भी।
प्रस्तुत आलेख में शिवकुमार अर्चन के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन उनके प्रकाशित काव्य-संग्रहों, आत्मकथ्य, रचना-दृष्टि तथा उनके प्रतिनिधि गीतों और ग़ज़लों के आलोक में करने का विनम्र प्रयास किया गया है।
यह आलेख किसी औपचारिक जीवनी अथवा आलोचनात्मक शोध का दावा नहीं करता, बल्कि एक निकटस्थ साहित्यिक सहयात्री की दृष्टि से उनके रचनात्मक अवदान को समझने और रेखांकित करने का प्रयास है।
मेरा विश्वास है कि शिवकुमार अर्चन की कविता का मूल स्वर उसकी सहज सम्प्रेषणीयता, गहन संवेदना, वैचारिक प्रतिबद्धता और मानवीय ऊष्मा में निहित है। यही गुण उन्हें अपने समय के महत्त्वपूर्ण गीतकारों और ग़ज़लकारों की अग्रिम पंक्ति में प्रतिष्ठित करते हैं। प्रस्तुत आलेख उसी विश्वास की एक विनम्र अभिव्यक्ति है।
कविता की सहज सम्प्रेषणीयता और उत्कृष्टता के कवि : शिवकुमार अर्चन
मनोज जैन 'मधुर'
_____________________
सम्प्रेषणीय कविता और प्रभावी प्रस्तुति के बल पर पिछले पाँच दशकों तक कवि-सम्मेलनों में निरन्तर सक्रिय रहे कविवर शिवकुमार अर्चन की पहचान भले ही एक लोकप्रिय मंचीय कवि के रूप में रही हो, किन्तु उनका रचनात्मक व्यक्तित्व केवल मंच तक सीमित नहीं था। वस्तुतः वे गंभीर चिंतन, सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदना और आध्यात्मिक दृष्टि से सम्पन्न ऐसे कवि थे, जिन्होंने गीत और ग़ज़ल दोनों विधाओं को अपनी मौलिक अनुभूतियों से समृद्ध किया।
अर्चन जी की रचनाओं में जीवन के विविध रंग एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। कहीं आम आदमी की पीड़ा है, कहीं सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर है; कहीं प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य है, तो कहीं आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा का सूक्ष्म अनुभव। यही बहुआयामी रचनात्मकता उन्हें अपने समकालीन कवियों से विशिष्ट बनाती है।
उनके अब तक प्रकाशित चार काव्य-संग्रह "उत्तर की तलाश में", "ग़ज़ल क्या कहे कोई", "मेरे भीतर कोई गाता है" तथा "साधो दरस परस सब छूटे" उनकी सृजन-यात्रा के क्रमिक विकास के साक्षी हैं। इन चारों कृतियों को पढ़ने के बाद यह अनुभव होता है कि अर्चन जी ने कभी भी केवल कविता लिखने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने समय और समाज की धड़कनों को शब्द देने का सतत प्रयत्न किया।
सन 2022 में प्रकाशित "मेरे भीतर कोई गाता है" में कवि ने आत्मीय मित्रों और परिजनों से संवाद-विहीन हो जाने की पीड़ा को अत्यन्त मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। आधुनिक जीवन की बढ़ती एकाकी चेतना इस संग्रह का प्रमुख स्वर है। इस भावभूमि को व्यक्त करता उनका यह नवगीत द्रष्टव्य है
"मुँह बाए उँगली चटकाते,
बीत गया एक और दिन।
आँखों से छँटे नहीं स्वप्न के कुहासे,
साँसों में धुले नहीं धूप के बताशे।
भीतर ही भीतर धुँधवाते,
बीत गया एक और दिन।
मित्रों का, परिजनों का फोन नहीं आया,
कमरे में डटा रहा चुप्पी का साया।
खुद अपने ऊपर झुँझलाते,
बीत गया एक और दिन।
शायद यह कठिन समय किसी तरह बहले,
खीसे में प्यास लिए सड़कों पर टहले।
इधर-उधर आँखें मटकाते,
बीत गया एक और दिन।"
इस गीत में आधुनिक मनुष्य का अकेलापन केवल एक व्यक्ति का निजी अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि वह हमारे समय की सामूहिक त्रासदी का रूप ग्रहण कर लेता है। बहुत कम शब्दों में कवि ने संवादहीनता की उस पीड़ा को व्यक्त किया है, जिससे आज का संवेदनशील मनुष्य प्रतिदिन गुजर रहा है।
अर्चन जी की रचना-प्रक्रिया में वस्तु-जगत की सघन उपस्थिति, आम आदमी की पीड़ा, जनमानस के संघर्ष और जीवन की जद्दोजहद समान रूप से उपस्थित हैं। उनके यहाँ तरल संवेदना, अनूठी कल्पनाशीलता, रचनात्मक तल्लीनता तथा जीवन को देखने-परखने के अनेक दृष्टिकोण मिलते हैं। यही कारण है कि उनकी गीतनुमा और ग़ज़लनुमा रचनाएँ पाठक को बार-बार नए अर्थ देती हैं।
गीत और ग़ज़ल के क्षेत्र में अर्चन जी कभी विशुद्धतावादी नहीं रहे। यदि वे केवल शास्त्रीय आग्रहों के बन्धन में बँधे रहते, तो सम्भवतः हिन्दी साहित्य को उनकी यह समृद्ध रचनात्मक सम्पदा प्राप्त न होती। किसी भी रचना का मूल्यांकन केवल छन्दशास्त्र के पैमानों पर नहीं किया जा सकता। उरूज़ अथवा पारम्परिक छन्दों के कुछ कट्टर अध्येता प्रायः छन्दशास्त्र का फीता लेकर कमियाँ खोजने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि कथ्य के निर्मल आनन्द और संवेदना की ऊष्मा तक पहुँच ही नहीं पाते।
अर्चन जी स्वयं इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे कि उनकी गीत और ग़ज़ल-रचनाएँ शास्त्रीय मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करतीं। यही कारण था कि वे मंच से अपनी रचनाओं को पहले ही "गीतनुमा" अथवा "ग़ज़लनुमा" कहकर प्रस्तुत करते थे। यह उनकी विनम्रता भी थी और आलोचना के प्रति उनका सहज उत्तर भी। वैसे आज के साहित्यिक परिवेश में इस प्रकार की जड़ताएँ बहुत कम रह गई हैं।
अपनी रचना-दृष्टि का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उद्घाटन अर्चन जी "उत्तर की तलाश में" के पुरोवाक में करते हैं। वे लिखते हैं कि कोई भी कविता स्वतः नहीं बन जाती। उसके पीछे जीवन के संघर्ष, एक दर्शन, एक विचार-प्रणाली, जीवन का ताप और सुलगते हुए एहसास सक्रिय रहते हैं।
इसी क्रम में वे लिखते हैं—
"पाखण्ड, विसंगति, असत्य, अन्याय और व्याप्त अँधेरे के खिलाफ़ जंग में ग़ज़ल ने मेरी रहनुमाई की। ग़ज़ल मेरे लिए आम आदमी तक पहुँचने का जरिया रही है। इन ग़ज़लों में पिरोए एहसास मेरे अपने हैं और उनकी आँच भी।"
यह कथन अर्चन जी की सम्पूर्ण रचना-दृष्टि का उद्घोष है।
"उत्तर की तलाश में" के पुरोवाक में ही व्यक्त उनका एक और कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मेरे मत में प्रत्येक रचनाकार को इसे वेद की ऋचाओं की भाँति कण्ठस्थ कर लेना चाहिए—
"मैं समय से बड़ा न्यायाधीश और लोक से बड़ा आलोचक न किसी को मानता हूँ, न जानता हूँ।"
अर्चन जी के नवीन काव्य-संग्रह "साधो दरस परस सब छूटे" की भूमिका में प्रख्यात आलोचक डॉ. धनञ्जय वर्मा ने उनकी भाषा की सहजता पर अत्यन्त सार्थक टिप्पणी की है। वे लिखते हैं-
"हम-आप अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जैसे बोलते और लिखते हैं, उसी सादी ज़बान में ये कविताएँ लिखी और कही गई हैं। यह सादगी 'सरल' या 'आसान' नहीं, बल्कि अकृत्रिम है। दरअसल यह सहजता का परिणाम है। अनुभव और अनुभूति जितनी तुर्श-ओ-तल्ख होगी, अभिव्यक्ति उतनी ही सहज होगी।"
इस टिप्पणी का आशय केवल इतना है कि एक बड़ा कवि विचार के स्तर पर कितना ही गम्भीर और शास्त्रीय क्यों न हो, अभिव्यक्ति के स्तर पर उसे सदैव सरल, सहज, उत्तरदायी और सम्प्रेषणीय होना चाहिए।
अब "साधो दरस परस सब छूटे" में संकलित एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गीत की चर्चा अपेक्षित है। इस गीत में प्रयुक्त 'अनहद' शब्द पाठक और श्रोता-दोनों का ध्यान सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। सम्पूर्ण गीत ध्यान की सर्वोच्च भाव-दशा का साक्षात्कार कराता है। इसी भाव-दशा में उतरकर साधक स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करता है। कवि ने सिद्धावस्था की अनुभूति के साथ सोऽहम् की आराधना और शिवत्व की मंगल-अर्चना का अत्यन्त प्रभावी चित्र उपस्थित किया है।
द्रष्टव्य है गीत का यह अंश-
"अनहद के मतलब समझाता है।
ये गीत नहीं मेरा,
आवाज़ नहीं मेरी।
ये शब्द नहीं मेरे,
ये कहन नहीं मेरी।
जाने उनसे कैसा नाता है,
मेरे भीतर कोई गाता है।"
गीत का अगला अंश कवि की आध्यात्मिक अनुभूति को और अधिक गहन बनाता है।
"मिल जाए मुझको, आँखों में उसे भर लूँ।
गुलमोहर बनूँगा मैं, आ तुझे ज़रा छू लूँ।
सरफूँदें मेरी सुलझाता है,
मेरे भीतर कोई गाता है।"
जिस साधक को अनहद नाद का श्रवण होने लगे, जो बिना किसी औपचारिक गुरु को स्वीकार किए साधना की सिद्धावस्था की ओर अग्रसर हो, वह यदि अपनी अन्तःप्रज्ञा के आलोक में भविष्य का भी साक्षात्कार कर ले, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यह गीत बाह्य जगत से अधिक अंतर्जगत की यात्रा का गीत है। यहाँ कवि का 'मैं' व्यक्तिगत न रहकर सार्वभौमिक चेतना का रूप ग्रहण कर लेता है।
"साधो दरस परस सब छूटे" शीर्षक गीत में अर्चन जी ने अपने समूचे जीवनानुभव को अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त किया है। यह गीत जीवन के बदलते मूल्यों, टूटते संवादों और समय की निर्मम विडम्बनाओं का दस्तावेज़ बन जाता है।
द्रष्टव्य है-
"साधो! दरस परस सब छूटे।
सूख गई पन्नों की स्याही,
संवादों के रस छूटे।
साधो! दरस परस सब छूटे।
मृत अतीत की नई व्याख्या
पढ़ना-सुनना है।
शेष विकल्प नहीं अब कोई,
फिर भी चुनना है।
रातें और संध्याएँ छूटीं,
अब कुनकुने दिवस छूटे।
साधो! दरस परस सब छूटे।
नहीं निरापद हैं यात्राएँ,
उठते नहीं कदम।
रोज-रोज सपनों का मरना
देख रहे हैं हम।
हाथों से उड़ गए कबूतर,
कौन बताए , कब छूटे?
साधो! दरस परस सब छूटे।
आदमकद हो गए आइने,
चेहरे बौने हैं।
नोन, राई, अक्षत, सिंदूर के
जादू-टोने हैं।
लहलहाई अपयश की फसलें,
जनम-जनम के यश छूटे।
साधो! दरस परस सब छूटे।"
यह गीत केवल समय की त्रासदी का आख्यान नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों का गम्भीर दार्शनिक विश्लेषण भी है। संवादहीनता, स्मृतियों का क्षरण, असुरक्षित जीवन, बौने होते व्यक्तित्व और अपयश की बढ़ती फसल-ये सब मिलकर हमारे समय की एक प्रामाणिक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
दार्शनिक अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति ही किसी कवि को कालजयी बनाती है। अर्चन जी ने अपने आत्मकथ्य में जो छोटे-छोटे वक्तव्य दिए हैं, उनका अर्थ-विस्तार अत्यन्त व्यापक है। वे केवल शारीरिक कद-काठी से ही बड़े नहीं थे, बल्कि अपने वैचारिक कद के कारण भी हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं।
अर्चन जी की पहचान केवल आध्यात्मिक अथवा आत्मपरक गीतों तक सीमित नहीं है। साहित्य-जगत ने उन्हें उनके प्रतिरोध-बोध, सामाजिक चेतना और समय के प्रति सजग दृष्टि के कारण भी याद रखा है। उनके गीतों में व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त स्वर सुनाई देता है। वे मंचीय लोकप्रियता और साहित्यिक गंभीरता-दोनों के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित करने वाले विरल कवि थे। 'क्लास' और 'मास'-दोनों वर्गों में समान रूप से सम्मानित होना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
उनकी एक अत्यन्त चर्चित मंचीय रचना के कुछ अंश इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं-
"ऐसी हवा चली, मत पूछो,
चन्दन-वन अंगार हो गए।
नन्हे-मुन्ने सपने हमारे,
तलवारों की धार हो गए।
क्या गाऊँ ऐसे में,
जब सब दर्द उगाते हैं,
मेरे गीत अधर तक
आने में शरमाते हैं।
जीवन होम हो गया सारा,
ऐसी जली पेट की ज्वाला।
सूरज लाने वालों ने ही
तम से समझौता कर डाला।
क्या गाऊँ,जब कुएँ स्वयं
पानी पी जाते हैं,
मेरे गीत अधर तक आने,
में शरमाते हैं।"
यहाँ कवि का आक्रोश केवल व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उन मूल्यों के विरुद्ध भी है, जिन्होंने मनुष्य के सपनों और विश्वासों को छलनी कर दिया है। प्रतिरोध का यह स्वर किसी नारेबाज़ी से नहीं, बल्कि गहरी मानवीय संवेदना से उपजता है। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।
अर्चन जी के भीतर एक अत्यन्त कुशल शब्द-चित्रकार भी निवास करता था। उन्होंने प्रकृति के सौन्दर्य को भी उतनी ही आत्मीयता से चित्रित किया, जितनी संवेदनशीलता से जनजीवन की पीड़ा को। उनका मन लोकजीवन के रंगों से रँगा हुआ था। वे प्रकृति के माध्यम से भी जीवन-दर्शन रचते हैं और लोकानुभव के माध्यम से भी।
उनके एक गीत का यह अंश द्रष्टव्य है-
"थके-थके संध्या के पाँव रे,
आजा माझी अपने गाँव रे।
फैला पर लौट घर पंछी,
ले-लेकर चोंच पर उजाले।
मेरे घर-आँगन पर बैठा
सूनापन गलबहियाँ डाले।
मूक हुई नयनों की नाव रे।"
इस गीत में संध्या, पंछी, उजाला, सूनापन और नाव-ये सभी बिम्ब मिलकर विरह, प्रतीक्षा और आत्मीयता का अत्यन्त प्रभावी वातावरण निर्मित करते हैं। अर्चन जी की विशेषता यही है कि वे बहुत कम शब्दों में गहन संवेदना का सृजन कर देते हैं। वे स्वयं भले कम बोलते रहे हों, किन्तु उनके गीत जीवन भर बोलते रहेंगे।
चार काव्य-संग्रहों में प्रकाशित अर्चन जी का रचना-संसार किसी भी संवेदनशील पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त उनके व्यक्तित्व के अनेक ऐसे आयाम हैं, जो उन्हें एक विशिष्ट साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
अर्चन जी अत्यन्त अध्ययनशील और मननशील व्यक्ति थे। वे अपने समकालीन रचनाकारों को पूरे मनोयोग से पढ़ते, सुनते और उन पर गंभीरतापूर्वक लिखते भी थे। उनका रचनात्मक सरोकार केवल गीत और ग़ज़ल तक सीमित नहीं था। कथा, उपन्यास, नई कविता, आलोचना और साहित्य की अन्य विधाओं पर भी उनकी समान रूप से सजग दृष्टि थी। यही कारण है कि वे अपने समय के एक समर्थ समीक्षक के रूप में भी सम्मानित थे। भोपाल में आयोजित होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों, विमर्शों और संगोष्ठियों में उनकी उपस्थिति प्रायः अनिवार्य मानी जाती थी। वे जहाँ भी जाते, अपनी गंभीर टिप्पणियों और संतुलित दृष्टि से विमर्श को समृद्ध करते थे।
अर्चन जी का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान उनके सम्पादन-कर्म के रूप में भी स्मरणीय है। उन्होंने भोपाल के सात चर्चित गीतकारों , हुकुमपाल सिंह 'विकल', जंगबहादुर श्रीवास्तव, बंधु, दिवाकर वर्मा, मयंक श्रीवास्तव, शिवकुमार अर्चन, दिनेश प्रभात तथा मनोज जैन ,के दस-दस गीतों का चयन कर "सप्तराग" शीर्षक से एक महत्त्वपूर्ण गीत-संकलन तैयार किया। वर्ष 2012 में प्रथम पहल प्रकाशन, भोपाल से प्रकाशित यह संकलन न केवल चर्चित हुआ, बल्कि समकालीन गीत-साहित्य का एक दस्तावेज़ भी सिद्ध हुआ।
यद्यपि अर्चन जी को मैंने भोपाल की अनेक साहित्यिक गोष्ठियों में बार-बार सुना था, किन्तु 1 जून, 2017 को दतिया में आयोजित एक विशेष काव्य-आयोजन में उन्हें देर रात तक बड़े मंच पर सुनने का जो अवसर मिला, वह आज भी स्मृतियों में अक्षुण्ण है। कवि स्व.मैथिलीशरण तिवारी जी की पुण्यतिथि पर आयोजित इस समारोह में वरिष्ठ कवि एवं संयोजक शैलेन्द्र बुधौलिया के आमंत्रण पर मैं भी एक आमंत्रित कवि के रूप में उपस्थित था।
उस आयोजन में अर्चन जी को निकट से सुनने और देखने का अवसर मिला। उनकी प्रस्तुति में शब्द, स्वर और संवेदना का ऐसा अद्भुत सामंजस्य था कि श्रोता देर रात तक मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। उस दिन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने की मेरी यात्रा ने एक नया आयाम ग्रहण किया।
बाद के वर्षों में अर्चन जी को और निकट से समझने में 'राग भोपाली' पत्रिका के उस विशेषांक ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो पूर्णतः उन पर केन्द्रित था। उस विशेषांक ने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व, वैचारिक प्रतिबद्धता और साहित्यिक अवदान को समग्रता में देखने की दृष्टि प्रदान की।
आज जब अर्चन जी हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी स्मृतियाँ, उनकी रचनाएँ और उनकी आत्मीय आवाज़ ही उनकी जीवित उपस्थिति का अहसास कराती हैं। सच ही कहा गया है ,मनुष्य चला जाता है, पर उसकी सृजनात्मक ऊर्जा समय के पार भी जीवित रहती है। अर्चन जी भी अपनी रचनाओं के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के बीच बने रहेंगे।
उनकी ही एक ग़ज़ल के ये शेर मानो उनके रचनात्मक जीवन का शाश्वत सत्य बन गए हैं ,
"बस्तियाँ रह जाएँगी,
न हस्तियाँ रह जाएँगी।
इन दरख्तों पर हरी कुछ,
पत्तियाँ रह जाएँगी।
तुम भले न याद रक्खो
मेरी ग़ज़लें, मेरे गीत,
पर मेरी आवाज़ की ,
परछाइयाँ रह जाएँगी।"
निश्चय ही, अर्चन जी के कंठ में लोकधुनों की सहज मिठास थी। उनकी गायकी का अंदाज़ बिल्कुल अलग था। वे जब मंच पर गीत गाते थे, तो शब्द केवल सुने नहीं जाते थे, बल्कि श्रोताओं के भीतर उतरते चले जाते थे। उनकी जादुई आवाज़ में ऐसी आत्मीयता थी कि श्रोता अनायास ही उनसे जुड़ जाते थे। यही कारण था कि वे मंचीय काव्य-पाठ के अत्यन्त लोकप्रिय और सम्मानित हस्ताक्षरों में गिने जाते थे।
आज भी अनेक साहित्यिक गोष्ठियों की स्मृतियों में उनका स्वर उसी ताजगी के साथ गूँजता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि दूर कहीं से उनकी वही परिचित आवाज़ फिर सुनाई दे रही है। मन बरबस ठिठक जाता है और स्मृतियों के आकाश में अर्चन जी अपने किसी प्रिय गीत के साथ पुनः उपस्थित हो उठते हैं।
समग्रतः कहा जा सकता है कि शिवकुमार अर्चन का रचनाकर्म सहज सम्प्रेषणीयता, मानवीय संवेदना, वैचारिक सजगता और सामाजिक प्रतिबद्धता का सशक्त दस्तावेज़ है। उन्होंने गीत और ग़ज़ल को केवल छन्द अथवा शिल्प की परिधि में सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें अपने समय के मनुष्य की पीड़ा, संघर्ष, प्रतिरोध, आत्मिक अनुभव और जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पढ़ते समय पाठक केवल शब्दों से नहीं, बल्कि एक जीवंत मनुष्य और उसके समय से संवाद करता है।
अर्चन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे विचार की ऊँचाइयों पर पहुँचकर भी अभिव्यक्ति को कभी दुरूह नहीं होने देते। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहजता है, अनुभूति की प्रामाणिकता है और सम्प्रेषण की अद्भुत शक्ति है। उन्होंने सिद्ध किया कि कविता की वास्तविक कसौटी केवल शास्त्रीय अनुशासन नहीं, बल्कि उसकी संवेदनात्मक प्रामाणिकता और पाठक के हृदय तक पहुँचने की क्षमता है। इसी कारण उनकी रचनाएँ मंच पर भी समान रूप से लोकप्रिय रहीं और गंभीर साहित्यिक विमर्श में भी सम्मान के साथ पढ़ी और उद्धृत की जाती रहेंगी।
एक रचनाकार के रूप में शिवकुमार अर्चन का मूल्यांकन केवल उनके प्रकाशित काव्य-संग्रहों के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका सम्पूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व ,एक कवि, ग़ज़लकार, समीक्षक, सम्पादक, मंचीय प्रस्तोता और साहित्य-प्रेमी मनुष्य के रूप में ,हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने अपने जीवन और साहित्य के माध्यम से यह स्थापित किया कि सच्चा रचनाकार समय के पीछे नहीं चलता, बल्कि अपने समय की चेतना को शब्द देता है।
आज अर्चन जी हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनकी रचनाएँ, उनकी विचार-दृष्टि, उनका आत्मीय व्यक्तित्व और उनकी सम्मोहक काव्य-ध्वनि हिन्दी साहित्य की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगी। उनकी कविता आने वाली पीढ़ियों को भी यह विश्वास दिलाती रहेगी कि शब्द यदि जीवन से जन्म लेते हैं, तो वे समय की सीमाओं का अतिक्रमण कर अमर हो जाते हैं। यही किसी भी बड़े रचनाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है और यही शिवकुमार अर्चन के साहित्य का स्थायी महत्त्व भी है।
मनोज जैन
106 विट्ठलनगर
गुफा मंदिर रोड
लालघाटी भोपाल
462030
Labels:
शिवकुमार अर्चन
नवगीत पर एकाग्र फेसबुक पर चर्चित समूह वागर्थ समूह का संयुक्त सहयोगी उपक्रम ब्लॉग वागर्थ
शनिवार, 4 जुलाई 2026
मनोज साहू निडर की रचनाएं प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग
वागर्थ में आज
__________
मनोज साहू 'निडर'
प्रस्तावना टीप
___________
मनोज साहू 'निडर' की रचनाएँ अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय यथार्थ की तीक्ष्ण पड़ताल करती हैं। उनकी ग़ज़लों में व्यवस्था की विसंगतियों, लोकतांत्रिक विडंबनाओं, नैतिक मूल्यों के क्षरण तथा आम आदमी की पीड़ा पर पैनी दृष्टि दिखाई देती है, वहीं 'अम्मा' और 'रोशनी की बात कर' जैसी रचनाएँ संवेदना, पारिवारिक आत्मीयता और जीवन-मूल्यों की उजली आभा भी रचती हैं। व्यंग्य, प्रतीक और सहज भाषा का सशक्त संयोजन उनकी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाता है। समकालीन सरोकारों से गहरे जुड़ा मनोज साहू निडर का सृजन पाठक को मंथन के लिए प्रेरित करता है।
सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और सृजनात्मक प्रतिबद्धता का यह संतुलन मनोज साहू 'निडर' को समकालीन हिं दी साहित्य में एक विशिष्ट स्वर के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
मनोज जैन 'मधुर'
संस्थापक-संचालक,
समूह वागर्थ
1.
मेहरबानी देखिए
_____________
कौन है राजा यहाॅं पर, कौन रानी देखिए।
वक्त के सैलाब में, हर शय है फ़ानी देखिए।
छीनकर रंगत ये सारी, बाग बगिया पेड़ से
सज रही अब पत्थरों से, राजधानी देखिए।
कागज़ी पतवार थामे, ज़िद ये दरिया पार की
डगमगाती नाव की, जोश ए जवानी देखिए।
राह पर मजमे लगाकर, क़ैद करके सीन को
वेदना पर कैमरे की, मेहरबानी देखिए।
पोत ली कालिख स्वयं पर, मौज मस्ती शौक में
चार पैसों की खनक में, गुम जवानी देखिए।
चाॅंद को दागी बताकर, तीरगी की आड़ में
स्यार दल की जुगल बंदी, हम जुबानी देखिए।
मालियों की बेरुखी का है गुलिस्ताॅं पर असर
कैकटस के बाजुओं में रातरानी देखिए।
2.
बात नदियों से चली थी
_________________
बात नदियों से चली थी, नालियों तक आ गई।
ये सियासत रहबरी से, गालियों तक आ गई।
इंतिहा सी हो गई है, अब तो बस कीजै हुजूर
क्यों जड़ों की बदजुबानी, डालियों तक आ गई।
आपसे शिकवे शिकायत, इल्तिज़ा भी क्या करें
आपकी दरियादिली भी, प्यालियों तक आ गई।
थी कभी गुलशन में रंगत, हर कली महफूज थी
आज फितरत वहशियाना, मालियों तक आ गई।
पायलें कंगन ज़मीनें, क़र्ज़ में होती दफ़न
हाय अब ये बेबशी भी, बालियों तक आ गई।
ध्यान, दर्शन, आस्था से, वास्ता कुछ है नहीं
अब बुतों की बंदगी भी, तालियों तक आ गई।
अब भरोसा क्या करें, मासूम से इस गांव पर
परवरिश मां बाप की भी, पारियों तक आ गई।
3.
कौन जाने कौन किसको
__________________
कौन जाने कौन किसको, खल रहा है आजकल।
आदमी ही आदमी को, छल रहा है आजकल।
जुगनुओं की फौज काबिज, हर बड़ी दूकान पर
गांव में सूरज समोसे, तल रहा है आजकल।
नींद जो टूटी तो सारे, स्वप्न घायल हो गए
आंख के पानी में कुछ तो, जल रहा है आजकल।
सुन रही दीवार देखो, मूक बहरों की व्यथा
ऐसा ही दौर ए सियासत, चल रहा है आजकल।
एक चिंगारी पड़ी क्या, चैनों अमन के गांव में
दोस्ती का हर फ़साना, जल रहा है आजकल।
देख नागाओं के जलवे, मौज मस्ती फक्कड़ी
हर कोई तन पर भभूती, मल रहा है आजकल।
4.
हम देंगे
______
माला मेडल शाल चाहिए? हम देंगे।
बस अंटी में माल लाइए, हम देंगे।
कच्ची पक्की खिचड़ी खाना छोड़ो भी
मखनी वाली दाल खाइए? हम देंगे।
दाद, तालियां, और कविता छह घंटे
सुनने वाले कान चाहिए? हम देंगे।
काव्य मनीषी,भाषा भूषण, जो चाहो
बोलो क्या वरदान चाहिए? हम देंगे।
शोध ग्रंथ भी रेडीमेड मंगा देंगे,
फिर मानद सम्मान पाइए, हम देंगे।
कवि नहीं हो, न ही कविता से नाता
मंचों पर स्थान, आइए, हम देंगे।
5.
हॅंस रही है मूर्तियाॅं
______________
याचनायें बढ़ गई इंसान की।
लो दुकानें खुल गई भगवान की।
आस्थाओं का तमाशा देखकर
हॅंस रही हैं मूर्तियाॅं पाषाण की।
वक्त के सैलाब में ढहने लगा
थी बहुत गहरी जड़ें ईमान की।
एक संकरी सी गली थी, प्रेम की
कब घुसी ज़ातें यहां हैवान की।
लालसा हावी हुई बैराग्य पर
स्वर्ण मृग पर रीझ बैठी जान-की।
इस दिए में तेल भी, बाती भी है
जंग होगी अब दिया तूफान की।
इस कहानी में कोई राजा नहीं
बस कबायद है ये, खींचातान की।
6.
विकास... दिख रहा है!
__________________
विकास की नज़रें, विकास का नज़ारा।
विकास ने विकास को, विकास में उतारा।
विकास का हाथी, विकास का घोड़ा
विकास की पीठें, विकास का कोड़ा।
विकास की नदियाॅं, विकास का है नाला
विकास ही गड़बड़, विकास का घोटाला।
विकास की डाली, विकास का झूला
विकास की रोटी से, विकास ही फूला।
विकास की पोथी, विकास का पन्ना
विकसित कब होंगे, हल्कू औ धन्ना?
जनता भी फूल सी, फूली इतराती है
विकास के गीतों पर, ताली बजाती है।
7.
कागज पर
_________
खेत और खलिहान मिले हैं कागज पर।
मुर्दों को भी प्राण मिले हैं कागज पर।
बिजली पानी और सड़क की मांगों को
लाखों के भुगतान मिले हैं कागज पर।
बरसों पहले श्राद्ध किया था बेटों ने
उनके भी मतदान मिले हैं कागज पर।
होरी हरिया घीसा और गुलबिया को
बंगले आलीशान मिले हैं कागज पर।
दंगा दहशत वालों की अब खैर नहीं
गुंडों को फरमान मिले हैं कागज पर।
जन के धन से खूब नवाजा अपनों को
ऐसे भी कुछ दान मिले हैं कागज पर।
8.
अम्मा
_______
जेठ भतीजे काका ताऊ, कितने भाई भाई में।
रिश्तों में पैबंद जड़े हैं, अम्मा की तुरपाई में।
पकवानों की बात करें या, पापड़ बड़ी मुरब्बे की
अम्मा के हाथों सा जादू, कहां किसी हलवाई में।
हंसी हंसी तो कभी डांट में, सीख हमेशा दे जाती
थोड़ी मिश्री थोड़ी मिर्ची, अम्मा की गु्स्साई में।
ठोकर खाकर जब भी रोये, दवा नहीं पुचकार मिली
ऐसा लगता फ़र्क न कोई, अम्मा और दवाई में।
असमंजस के बादल हों या कोई हताशा मजबूरी
हर मुश्किल में राह मिली है अम्मा की अगुवाई में।
9.
लोकतंत्र है!
_________
ठोंको-पीटो, नोंचो-खाओ, लोकतंत्र है।
नंगे होकर नाचो गाओ, लोकतंत्र है।
देशभक्ति की छाप लगाकर माथे पर
हर मौके पर इसे भुनाओ, लोकतंत्र है।
घूस माॅंगते तुम्हें पकड़ ले कोई तो
रिश्वत देकर जान छुड़ाओ, लोकतंत्र है।
झूठ सजाकर ऊँचे मंचों पर रख दो
सच्चाई को धूल चटाओ, लोकतंत्र है।
अपना मत, मत 'दान' समझना भूले से
इसे बेचकर पी, खा जाओ, लोकतंत्र है।
संविधान जब हावी हो मनमर्जी पर
संसद में कानून बनाओ, लोकतंत्र है।
10.
रोशनी की बात कर
_______________
धूप तितली फूल पानी, चांदनी की बात कर।
छोड़ ये बारूद अब तो, जिंदगी की बात कर।
शोर से जब थक गया हो, मन तेरा सुनते हुए
बांस की उस छेद वाली, बाँसुरी की बात कर।
लादकर बेताल कांधे, क्यों भटकता दर ब दर
दिल में सोये आदमी से, आदमी की बात कर।
ये घुटन क्यों हो रही, दीवारों-दर के दरमियाॅं
पूछ सारी खिड़कियों से, रोशनी की बात कर।
फेंक दे चेहरे से चेहरा, सामने आ, ऐ 'निडर'
झाँक मन के आईने में, सादगी की बात कर।
11.
ये कैसी खुद्दारी !
____________
चोर-चोर में यारी पक्की।
झूठों की सरदारी पक्की।
जिसके सिर इल्ज़ाम बड़े हों
उनकी दावेदारी पक्की।
गीदड़ के संग शेर जो बैठें
फितरत में मक्कारी पक्की।
कोई बने सरकार हमें क्या
अपनी हिस्सेदारी पक्की।
बहती गंगा हाथ धोये जो
उसकी गठरी भारी पक्की।
मौका मिलते ही बदलेंगे
जिनकी नातेदारी पक्की।
दान हड़प कर चंपत होना
कैसी ये खुद्दारी पक्की।
परिचय -
मनोज साहू 'निडर'
जन्म - 3 जुलाई 1971
पता- 'समर्पण' बालाजी कालोनी, माखन नगर, जिला नर्मदापुरम (मध्यप्रदेश)
पिन -461661
मोबाइल नं - 9993963425
ईमेल - manoj.nidar@gmail.com
संप्रति - मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग में कार्यरत।
बाल साहित्य पर सात किताबें प्रकाशित।
कादम्बिनी, वागर्थ, अट्टहास, दैनिक भास्कर, नवभारत, नईदुनिया समेत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साझा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन।
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग
डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया
गीत
तुमसे खुशियाँ कह दूँगा सब,
दर्द नहीं मैं कह पाऊँगा
हृदय तुम्हारा व्यथित हुआ तो,
कभी नहीं यह सह पाऊँगा।।
तुम्हीं दृष्टि का सम्मोहन हो,
अनुरागी प्रेमाकुल मन हो।
प्रणय-गंध से सुरभित है जो,
उर का मधुमासी उपवन हो।
बिना तुम्हारे प्राण-प्रिये मैं,
प्राण हीन क्या रह पाऊँगा ।।
तुम्हीं चेतना और ज्ञान हो,
मुग्ध हृदय का मधुर गान हो।
मन के प्रिय एकांत क्षणों में,
मदिर कल्पना विनय ध्यान हो।
रह लूंगा मैं सजल नयन में,
नहीं अश्रु में बह पाऊँगा ।।
तुम आभासित हो कण-कण में,
प्रियता के चिर आकर्षण में।
अभिसारी अनुभूत तृप्ति-सी,
बाहुपाश के मधु-अर्पण में।
अपनी प्रेम कहानी को मैं,
क्या सुधियों में गह पाऊँगा।।
तुमसे खुशियाँ कह दूँगा सब,
दर्द नहीं मैं कह पाऊँगा।
हृदय तुम्हारा व्यथित हुआ तो,
कभी नहीं यह सह पाऊँगा।
दो
गुलमोहर जैसे गालों पर,
अधरों के भौरों के चुंबन ।
देहयष्टि की लतिकाओं पर,
झूम रहे नयनों के खंजन।।
प्रियता की वासंती खुशबू,
साँस-साँस में बसी तुम्हारी।
मगर मिलन की अभिलाषा पर,
लाज हुई चुपके से भारी।
खंडित करते हुए मौन व्रत,
बोल गए अनुरागी कंगन।।
तुम विभावरी के आँगन में,
दूध नहाई हुई जुन्हाई।
कभी स्वर्णरेखा के तट पर,
रुचिर भोर की हो पहुनाई।
कभी दूर दिखती तुम ऐसी,
धरा-गगन का ज्यों आलिंगन।।
तुमने प्रेम लिखा गीतों में,
मैने हर पल प्रेम जिया है।
प्रेम मुझे पूजा-अर्चन-सा
पुण्य तुम्हारे नाम किया है।।
मन के द्वारे दीप सगुन का,
झंझावत का सहता कंपन ।।
गुलमोहर जैसे गालों पर,
अधरों के भौरों के चुंबन ।
देहयष्टि की लतिकाओं पर,
झूम रहे नयनों के खंजन।।
तीन
मेरे मन के भोजपत्र पर,
अनुबंधों की तुम पाती हो।
साँसों की सरगम पर प्रतिपल,
गीत प्रणय के तुम गाती हो।।
मेरे सब अवगुण विस्मृत कर,
तुमने सदा मुझे अपनाया।
निर्मल नेह तुम्हारा पावन,
जीवन मेरा सुभग बनाया।
त्याग, तपस्या, करुणा के तट,
तुम जलती संझा-बाती हो।।
मेरे उर में आग प्रेम की,
तुम शीतल मलयागिरि चंदन।
तुम हो किसी देवकन्या -सी,
मैं हूँ साधारण - सा - वंदन।
तुम खुद अपने मन से पूछो,
मुझे प्राण जैसी भाती हो।।
वचन, कर्म, मन से जीवन में,
कभी तुम्हें अर्पित हो पाउँ।
जीवन धन्य-धन्य हो जाए,
मैं तुममें मुखरित हो जाऊँ।
मेरी सभी प्रार्थनाओं के,
विश्वासों की तुम थाती हो।।
अपनेपन का सघन मेह तुम,
बूँद-बूँद से प्यार छलकता।
मैं हूँ प्यासा जन्म-जन्म का,
मरुथल मेरे अधर झलकता।
अर्थहीन मैं, तुम समर्थ हो,
बनकर तुम संबल आती हो।।
मेरे मन के भोजपत्र पर,
अनुबंधों की तुम पाती हो।
साँसों की सरगम पर प्रतिपल,
गीत प्रणय के तुम गाती हो।।
चार
नेह बरसता रहे निरंतर,
खिली रहे जीवन फुलवारी।
साँस - साँस में रहे महकती,
कस्तूरी - सी गंध तुम्हारी।।
विद्यापति की सुघड़- नायिका-
देहयष्टि में दिखे तुम्हारी।
कभी महादेवी की करुणा,
कभी सूर-तुलसी - शुभकारी ।
रमी श्याम में तुम मीरा-सी ,
तुम कनु-प्रिया दिव्य-ब्रज-नारी।।
कोमलकांत छंद से मुख पर,
चपल-व्यंजना जैसी चितवन।
संयम छोड़ रीझ जाता है,
लज्जाशील कलाओं पर मन।
मादकता के महायज्ञ में,
समिधा जैसी प्रीति हमारी।।
रूप-राशि की सरिता के तट,
प्रणय-साधना हृदय कर रहा।
तृषा-कंठगत है चातक के,
युगों-युगों से मेघ झर रहा।
सगुन-पत्रिका में मिलने की,
लग्न ढूँढता प्रेम-पुजारी ।।
नेह बरसता रहे निरंतर,
खिली रहे जीवन फुलवारी।
साँस-साँस में रहे महकती,
कस्तूरी-सी गंध तुम्हारी।।
पाँच
माँगता उर तृप्ति का कीलाल रस-कण,फूल-सी मुस्कान अधरों पर सजाओ।
नेह की कवितावली का मान रखने,
एक रिश्ता ही बचा उसको निभाओ।
बैठकर सुधियों के सूने खंडहर में,
मौन की भाषा सजग सुनते रहे हम।
चेतना विश्वास की घायल हुई पर,
छंद में मन की व्यथा बुनते रहे हम।
कामना की वल्लरी मुरझा न जाए,
गीत कोई प्रीति का नव गुनगुनाओ।।
एक नीरवता लिए अंतस विकल हो,
साँस में गूँजे प्रणय की रागिनी जब।
गंध महके फिर हवाओं में मिलन की,
क्यों विहँसती है विरह की यामिनी तब।
छुप रहा अभिसार हतभागी तिमिर में,
द्वार मन के आस का दीपक जलाओ।।
आ गई है पीर उर के राजपथ तक,
साधना में लीन पर संवेदनाएँ।
कोर नयनों की समेटे हैं जलधि को,
नित्य अवगाहन करें श्यामल-घटाएँ।
कंठगत हैं प्राण चातक के तृषा से,
स्वाति के पीयूषधर्मी मेह लाओ।।
माँगता उर तृप्ति का कीलाल रस-कण,फूल-सी मुस्कान अधरों पर सजाओ।
नेह की कवितावली का मान रखने,
एक रिश्ता ही बचा उसको निभाओ।।
छह
अधर पर आग लिख देना
नयन में नीर लिख देना,
अधर पर आग लिख देना।
कलम से इस हथेली पर,
समर्पण-त्याग लिख देना।।
तुम्हारी प्रीति का हमने,
नया मंदिर बनाया है।
दरश की आस का दीपक,
सगुन के क्षण जलाया है।
सफल हो साधना मन की,
मधुर अनुराग लिख देना।।
प्रणय की देहरी पर है,
सिमटती देह चंदन-सी।
नहीं मन मानता कोई,
विवशता आज बंधन की।
मिलन के नाम मधुमासी,
महकता बाग लिख देना।।
हृदय का चाँद तुम ले लो,
खुशी की चाँदनी ले लो।
कसकती साँस की वीणा,
मचलती रागिनी ले लो।
हमें विश्वास के उर से,
निकलता राग लिख देना।।
नयन में नीर लिख देना,
अधर पर आग लिख देना।
कलम से इस हथेली पर,
समर्पण-त्याग लिख देना।।
डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया
परिचय
नाम --डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया
आत्मज-स्व,श्रीमती गंगा देवी ,
स्व श्री रघुनन्दन लाल जी सीरोठिया
जन्मतिथि --28/09/1950
जन्मस्थान-ग्राम बलेह,जिला सागर (म्,प्र)
शिक्षा--एम .बी .बी .एस.
(शासकीय मेडिकल कालेज जबलपुर)
एम.ए.(हिंदी)डॉ हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर
आपके 27 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
डॉ सीरोठिया के एक साथ 09 काव्य संग्रहों का विमोचन हुआ जो हिंदी साहित्य में एक कीर्तिमान है
डॉ सीरोठिया को पूरे देश में लगभग 300 साहित्यिक सम्मान प्राप्त हो चुके है
जिनमें वर्ष 2025 का सरस्वती वाचनालय एवं पुस्तकालय सागर का एक लाख रुपए का साहित्य सरस्वती सम्मान उल्लेखनीय है।
कादंबरी जबलपुर का सर्वोच्च संस्कृति भूषण सम्मान 11000 रुपए,
संस्कृति विभाग मध्यप्रदेश शासन का 25000 का पद्माकर अलंकरण सम्मान,
तमिलनाडु साहित्य अकादमी चेन्नई का 21000 का साहित्य सेवी सम्मान।
इसके अतिरिक्त देश के चार राज्यपालों एवं 2 मुख्यमंत्रियों द्वारा आपको साहित्य सेवा के लिए सम्मानित किया जा चुका है।
अप्रैल 2025 में
डॉ सीरोठिया के एक साथ 09 काव्य संग्रहों का विमोचन होने का अनुपम कीर्तिमान है
पद्मश्री पी सी धवन स्मृति सर्वश्रेष्ठ हिंदी कवि सम्मान चेन्नई 2002
भारतीय भाषा संरक्षा सम्मान साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा राजस्थान 2003 मान नीय श्री भगवती प्रसाद देवपुरा जी द्वारा
*क्योंकि यह है हास्यकवि मुकाबला विजेता सम्मान ज़ी स्माइल टी ,वी चेनल मुम्बई2005*
*विशिष्ट साहित्य साधना*
*सम्मान अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन भोपाल 2005 महामहिम राज्यपाल श्री बलराम जाखड़ जी द्वारा*
*सारस्वत सम्मान हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग इलाहाबाद 2006*
मूलाराम जी जोशी द्वारा
*राज्य स्वास्थ्य पुरुस्कार* *सम्मान2007* *भोपाल*
*मान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी द्वारा*
*उत्कृष्ट शासकीय सेवा सम्मान मान प्रभारी मंत्री द्वारा 2010*
*तुलसी सम्मान ,2011 तुलसी साहित्य अकादमी भोपाल*
*भारत गौरव सम्मान2012 तक्षशिला विश्वविद्यालय भागलपुर बिहार*
*डॉ आर.ए.भागवत समाजसेवी चिकित्सक सम्मान20013 इंदौर मान मार्कण्डेय काटजू न्यायमूर्ति सुप्रीम कोर्ट* द्वारा
*स्व विजयशंकर उपाध्याय स्मृति अखिल भारतीय कादम्बरी दोहा सम्मान जबलपुर 2013
*अखिल भारतीय भारतेंदु हरिश्चंद्र गीत सम्मान 2014 कोटा (राजस्थान)*
*साहित्य सेवी सम्मान चेन्नई 2014 महामहिम राज्यपाल पांडुचेरीश्री विनय कटियार जी द्वारा तमिलनाडु साहित्य अकादमी चेन्नई*
*स्व दीनानाथ कौल "नादिम" स्मृति शारदा सम्मान श्रीनगर (जम्मू कश्मीर) महामहिम राज्यपाल श्री एन एन वोहरा द्वारा 2015*
*साहित्य सेवी सम्मान 2015*, *तमिलनाडु साहित्य अकादमी चेन्नई महामहिम राज्यपाल पश्चिम बंगाल डॉ केशरीनाथ त्रिपाठी जी द्वारा*
*आई एम ए*
*लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड*
आई. एम. ए.म्,प्र शाखा
*2016 इंदौर*
हरिओम शरण चौबे गीतकार सम्मान 2018 मध्य प्रदेश लेखक संघ का सम्मान भोपाल
साहित्य सुधाकर गीतकार सम्मान 2019 शील साहित्य परिषद एवं सजल सर्जना समिति जांजगीर (छ, ग)
काव्य कोविद साहित्य श्री गीतकार सम्मान 2019 काव्य धारा हैदराबाद
सजल सेवा रत्न साहित्य सम्मान 2019 मथुरा सजल सर्जना समिति मथुरा (उ प्र)
राष्ट्रीय साहित्य अकादमी पोर्टब्लेयर(अंडमान निकोबार) द्वारा श्रेष्ठ गीतकार सम्मान नव 2019
भोलानाथ गहमरी गीत गौरव सम्मान
वर्ष 2019 गहमर गाजीपुर (उ प्र)
साहित्य श्री सम्मान
युगधारा फाउंडेशन वर्ष 2019 लखनऊ(उ,प्र)
हिंदी साहित्य सेवा रत्न
सम्मान 2020 वातायन साहित्य परिषद उमरिया म,प्र
अंबिका प्रसाद दिव्य स्मृति राष्ट्रीय सम्मान वर्ष 2020
गीत संग्रह सुधियों का आँचल के लिए
मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग
द्वारा
महाकवि पद्माकर अलंकरण सम्मान 2021 विधायक सागर शैलेन्द्र जैन एवं श्री विकास दवे निर्देशक संस्कृति परिषद मध्यप्रदेश शासन भोपाल
इस अवसर पर आपको
गीत ऋषि अलंकरण से विभूषित किया गया ।
साहित्य सेवी सम्मान 2022
वाणी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था मुज्जफरनगर (उ.प्र.)
समग्र लेखन पर स्व पांडुरंग पिंजरकर स्मृति संस्कृति
भूषण सम्मान 2022 कादम्बरी का अलंकरण जबलपुर
स्व.हरिवल्लभ सिलाकारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मृति साहित्य सृजन सम्मान 2023 जय जनतंत्र समाचार पत्र द्वारा पूर्व सांसद श्री लक्ष्मीनारायण यादव द्वारा सागर
अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान 2025 अभिनव कला परिषद भोपाल पूर्व सांसद श्री रघुनंदन शर्मा एवं पूर्व विधायक रामेश्वर शर्मा द्वारा
राष्ट्रीय साहित्य सरस्वती सम्मान (एक लाख रूपये) 2025 श्री सरस्वती वाचनालाय एवं पुस्तकालय सागर, पूर्व सांसद श्री लक्ष्मीनारायण यादव एवं कुलपति रानी अवंति बाई लोधी वि. वि. सागर डॉ विनोद मिश्रा द्वारा
इसके अतिरिक्त शताधिक अन्य सम्मान
संप्रति
पूर्व निर्विरोध प्रदेश अध्यक्ष म.प्र.आई. एम.ए. 2006-2007
राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य ,नेशनल आई. एम. ए. नई दिल्ली के 21 वर्षों से सदस्य हैं।
जिला स्वास्थ्य अधिकारी सागर (से,नि.)
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डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया
नवगीत पर एकाग्र फेसबुक पर चर्चित समूह वागर्थ समूह का संयुक्त सहयोगी उपक्रम ब्लॉग वागर्थ
वरेण्य कवि मयंक श्रीवास्तव जी के दस नवगीत और एक टिप्पणी प्रस्तुति समूह ~।।वागर्थ।।~
~ ।।वागर्थ ।। ~
वागर्थ में आज प्रस्तुत हैं आदरणीय मयंक श्रीवास्तव जी के प्रतिनिधि नवगीत
मैंने "साप्ताहिक हिंदुस्तान "और
"धर्मयुग "के समय को तो नहीं देखा परन्तु साप्ताहिक पत्र "प्रेममेन " के अंक के आरम्भ फिर चरम और बाद में इसके समापन के सभी अंकों का साक्षी जरूर रहा हूँ।
गीत नवगीत विषयक रोचक और अभिनव सामग्री के चलते आज "प्रेसमेन " के अंक साहित्य प्रेमियों ने सहेज कर रखे हैं। उन दिनों शैक्षणिक पृष्ठभूमि के सामान्य से पत्र "प्रेसमेन " की तुलना साहित्यिक खेमों में "धर्मयुग "और "साप्ताहिक हिंदुस्तान " से की जाती थी। निःसन्देह इस पत्र ने गीत /नवगीत विषयक विपुल सामग्री देकर नए कीर्तिमान रचे और अनेक चेहरों को मंच प्रदान किया था। देखा जाय तो किसी भी साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं का सम्पादकीय धर्म यही होता है जो इस पत्र ने बखूबी निभाया। इस पत्र के साहित्यिक सम्पादक कोई और नहीं राजधानी भोपाल के ख्यात कवि मयंक श्रीवास्तव जी थे। "वागर्थ "में उनके नवगीतों को जोड़ते समय मुझे उनके मित्र महेंद्र गगन जी की एक टिप्पणी जो उन्होनें मयंक जी पर केंद्रित विशेषांक के समय अपने एक लेख "दिलासों की दवा से बदलते नही " से साभार प्रस्तुत करना प्रासंगिक लगी , जिसे भोपाल की प्रतिनिधि साहित्यिक मासिक पत्रिका "रागभोपाली " से लिया है।
महेंद्र गगन अपने लेख में मयंक जी के व्यक्तित्व कृतित्व का पूरा खाका खींचते हैं।
पढ़ते हैं उन्ही के शब्दों में ,
"मैं जब भी मयंक श्रीवास्तव के बारे में सोचता हूं मेरे कानों में , मयंक जी की कड़क खबरदार आवाज गूंजने लगती है। वे अपने गीतों में कभी गांव याद करते हैं तो कभी समाज की विद्रूपता पर चोट करते हैं। वे पूरे विश्वास से कहते हैं कि ,
"तुम हमको चट्टानों वाला /भाग भले दे दो / लेकिन जल की धार हमारे / दर से निकलेगी "। यह विश्वास कवि में अनेक विषमताओं / व्यथाओं से गुजरने के बाद आया है। शारीरिक तौर पर भी मयंक जी ने बहुत कष्ट झेले हैं मगर वे उनसे भी पूरी दृढ़ता से निपटते रहे हैं। वे कहते हैं।
"मैं रोज डूबता उतराता / इस सागर / की गहराई में / मैं हुआ पराजित जीता भी / जीवन की बड़ी लड़ाई में "/ कभी उनका कवि मन कहता है
''बहुत दिनों से कैद स्वयं में हूँ / अब मुझको बाहर हो जाने दो / बहुत जी लिया बूँद-बूँद होकर / अब मुझको सागर हो जाने दो "/ मयंक जी के गीतों में जख्मी अहसास हैं , खटासों की मौलिक कथा है ,समय की गर्म सलाखों का एहसास है। दिलासों की दवा से ये बदलते नहीं हैं , उल्टे उनके पाखण्ड पर प्रश्न उठाते हैं। बेमौसम बरसते बादलों को खूब पहचान हैं यही कारण है कि मयंक जी, किसी के बहकावे में नहीं आते। वे वर्तमान के छल को पहचानते हैं , उसे गाते हैं ,भले ही वे कितने छले जाएं पर मयंक जी ने कभी कोई समझौता नहीं किया । अपने जीवन मूल्यों पर अडिग रहे । ऐसा करना हर किसी के बस की बात नहीं । यही मयंक जी की विशेषता है। "
सामग्री सहयोग के लिए समूह वागर्थ वरेण्य कवि मयंक जी का आभार व्यक्त कर उन्हें इस अवसर पर बधाइयाँ प्रेषित करता है ।
प्रस्तुति
मनोज जैन मधुर
~।। वागर्थ ।। ~
संपादन मण्डल
______________________
(१)
आग लगती जा रही है
----------------------------
आग लगती जा रही है
अन्न-पानी में
और जलसे हो रहे हैं
राजधानी में
रैलियाँ पाबंदियों को
जन्म देती हैं,
यातनाएँ आदमी को
बाँध लेती हैं,
हो रहे रोड़े बड़े
पैदा रवानी में
खेत में लाशें पड़ी हैं
बन्द है थाना,
भव्य भवनों ने नहीं
यह दर्द पहचाना,
क्यों बुढ़ापा याद आता
है जवानी में
लोग जो भी इस
ज़माने में बड़े होंगे,
हाँ हुजूरी की नुमाइश
में खड़े होंगे,
सुख दिखाया जा रहा
केवल कहानी में
(२)
एक अरसे बाद
------------------
एक अरसे बाद
फिर सहमा हुआ घर है
आदमी गूँगा न बन जाये
यही डर है
याद फिर भूली हुई
आयी कहानी है,
एक आदमखोर
मौसम पर जवानी है,
हाथ जिसका आदमी के
खून से तर है
सोच पर प्रतिबंध का
पहरा कड़ा होगा,
अब बड़े नाख़ून वाला
ही बड़ा होगा,
वक्त ने फिर से किया
व्यवहार बर्बर है।
पूजना होगा
सभाओं में लुटेरों को
मानना होगा हमें
सूरज अँधेरों को,
प्राणहंता आ गया
तूफान सर पर है।
कोंपलें तालीम लेकर
जब बड़ी होंगीं,
पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ
ठंडी पड़ी होंगी,
वर्णमाला का दुखी
हर एक अक्षर है
(३)
नदी
-----
आह भरती है नदी
टेर उठती है नदी
और मौसम है कि उसके
दर्द को सुनता नहीं
रेत बालू से अदावत
मान बैठे हैं किनारे
जिंदगी कब तक बिताएँ
शंख -सीपी के सहारे
दर्द को सहती नदी
चीखकर कहती नदी
क्या समुन्दर में नया
तूफान अब उठता नहीं ?
मन मरुस्थल में दफ़न है
देह पर जंगल उगे हैं
तन बदन पर किश्तियों के
खून के धब्बे लगे हैं
आज क्यों चुप है सदी
प्रश्न करती है नदी
क्या नदी का दुःख
सदी की आँख में चुभता नहीं ?
घाट के पत्थर उठाकर
फेंक आयी हैं हवाएँ
गोंद में निर्जीव लेटी
पेड़ -पौधों की लताएँ
वक्त से पिटती नदी
प्राण खुद तजती नदी
क्योकि आँचल से समूचा
जिस्म अब ढँकता नहीं ?
(४)
पता नहीं है
--------------
पता नहीं है, लोगों को
क्यों अचरज होता है
जब भी कोई गीत प्यार का
मैं गा देता हूँ
प्यार कूल है प्यार शूल है
प्यार फूल भी है
प्यार दर्द है प्यार दवा है
प्यार भूल भी है
मेरे लिए प्यार की इतनी
भागीदारी है
इसको लेकर अपनी रीती
नैया खेता हूँ
प्यार एक सीढ़ी है
इस पर चढ़ना ही होता
प्यार एक पुस्तक है
इसको पढ़ना ही होता
धरती का कण-कण जब मुझसे
रूठा लगता है
गा कर गीत प्यार के ही
मन समझा लेता हूँ
प्यार दया है प्यार धर्म है
प्यार फ़र्ज भी है
प्यार एक जीवन की लय है
प्यार मर्ज़ भी है
जब भी किया प्यार पर मैंने
न्योछावर खुद को
मुझे लगा है सब हारे
मैं एक विजेता हूँ
(५)
मेरे गाँव घिरे ये बादल
---------------------------
मेरे गाँव घिरे ये बादल
जाने कहाँ-कहाँ बरसेंगे
अल्हड़पन लेकर पछुआ का
घिर आयीं निर्दयी घटाएँ
दूर -दूर तक फ़ैल गयीं हैं
घाटी की सुरमई जटाएँ
ऐसे मदमाते मौसम में
जाने कौन -कौन तरसेंगे
मछुआरिन की मस्ती लेकर
मेघों की चल पड़ी कतारें
कहीं बरसने की तैयारी
कहीं -कहीं गिर पड़ी फुहारें
कितने का तो दर्द हरेंगे
कितनों को पीड़ा परसेंगे
मेरे गाँव अभागिन संध्या
रोज-रोज रह जाती प्यासी
जिसके लिए जलाए दीपक
उसका ही उपहार उदासी
जाने किसका हृदय दुखेगा
जाने कौन-कौन हरषेगें
(६)
हुई मुनादी
---------------
सागर से पर्वत तक
ऐसी हुई मुनादी है
अपना राजा यश गाथा
सुनने का आदी है
मजमेदार वज़ीरों की
लग रही नुमाइश है
अपनी धरती पर इसकी
अच्छी पैदाइश है
हमको दम्भ देखना है
किसका फौलादी है ?
आँखों में अनलिखे पृष्ठ
को पढ़ते रहना है
नित्य प्रतीक्षा की घड़ियों से
लड़ते रहना है
झुककर खड़ा दलालों
के आगे फरियादी है।
अर्थ खोजना नहीं
महज शब्दों को सुनना है
फर्ज़ हमारा झूठे साँचे
सपने बुनना है
सपने दिखलाने
की संख्या
और बढ़ा दी है।
(७)
बिन्दी हमें कहाँ रखना है
-------------------------------
बिन्दी हमें कहाँ रखना है
इसका ध्यान नहीं
अपनी खींची
हुई लकीरों
की पहचान नहीं
न तो अर्थ ने और न
शब्दों ने ही समझाया
भाव सिन्धु की लहरों ने
जो भी बोला गाया
किसी ठौर
पर भी राहत
दे सकी थकान नहीं
अर्ध-विरामों और
विरामों ने भी बहुत छला
झूठ बोलकर रुक जाने की
सीखी नहीं कला
शायद इसीलिए
अपनी
रुक सकी उड़ान नहीं
नए सोच के संदर्भों में
ऐसी चाल चली
जिस धारा में बहे हमें
वह लगने लगी भली
तेज दौड़कर
भी बागी
हो सकी रुझान नहीं।
(८)
नुकीला पत्थर लगता है
------------------------------
हाथों में हर समय नुकीला
पत्थर लगता है
हमें आदमी
की छाया से
भी डर लगता है
ऊब गया है मन
अलगावों की पीड़ा सहते
कुटिल इरादों को
मुट्ठी में बंद किए रहते
जीवन जंगल के भीतर का
तलघर लगता है
संबंधों का मोल भाव है
खींचा तानी है
पहले वाला कहाँ रहा
आँखों में पानी है
रिश्तो वाला सेतु
पुराना जर्जर लगता है
लोग लगे हैं सोने
चाकू रखकर सिरहाने
कविता लिखने वाला
दुनियादारी क्या जाने
हैं ऐसे हालात
कि जीना दूभर लगता है।
(९ )
ऐसी राजधानी दे
______________
दे सके तो एक ऐसी
राजधानी दे
भोर दे हँसती हुई
रातें सुहानी दे।
स्वप्न के अनुबंध पर
जो दस्तखत कर दे
वक्त से हारे हुए
इंसान को स्वर दे
दुख -पलों को भेदकर
खुशियाँ सयानी दे ।
जो करे चिन्ता सदा
छोटी इकाई की
जिन्दगी के गाँव की
फटती बिवाई की
हर सड़क हमको
सुरक्षित जिन्दगानी दे ।
अर्थ को लेकर हवा कुछ
इस तरह डोले
रात को मजदूर भी
सुख चैन से सो ले
जो हमें भरपेट रोटी
स्वच्छ पानी दे।
(१०)
यहाँ हजारों बार
--------------------
इसकी चर्चा नहीं तुम्हारी
नयी कहानी में
यहाँ हजारों बार लुटी है
नदी जवानी में
चिड़िया बता रही है अपना
दुख रोते -रोते
करते हैं उत्पात शहर के
पढ़े हुए तोते
पगडण्डी मिट गई सड़क की.
आनाकानी में
चिमनी के बेरहम धुएँ का
इतना अंकुश है
जंगल बनते हुए गाँव से
मौसम भी खुश है
लोक धुनें कह रहीं
नहीं सुख रहा किसानी में
जब अपने ऊपर मँडराती
चील दिखाई दी
बूढ़ी इमली की अपराजित
चीख सुनाई दी
कोयल लगी हुई है
गिद्धों की मेहमानी में ।
मयंक श्रीवास्तव
परिचय -
------------
मयंक श्रीवास्तव
जन्म- ११ अप्रैल १९४२ को उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद के ऊँदनी गाँव में।
कार्यक्षेत्र-
माध्यमिक शिक्षा सेवा मंडल मध्य प्रदेश में लम्बे समय तक सहायक सचिव के महत्त्वपूर्ण पद पर रहने
के बाद स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति। मयंक जी के गीत डॉ० शम्भुनाथ सिंह जी द्वारा सम्पादित नवगीत
अर्धशती में सम्मिलित हैं।
प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ-
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नवगीत संग्रह
1.सूरज दीप धरे
2.सहमा हुआ घर
3.इस शहर में आजकल
4.उँगलियाँ उठतीं रहें
5.ठहरा हुआ समय
6.समय के पृष्ठ पर ।
7.मयंक श्रीवास्तव के प्रतिनिधि नवगीत "जो सूरज हमने ढूंढा है"
8.ग़ज़ल संग्रह- रामवती
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मयंक श्रीवास्तव
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