मंगलवार, 8 अगस्त 2023

डॉ कैलाश सुमन की कविताएँ

डॉ कैलाश सुमन की कविताएँ

एक

तब बंदर को हुआ जुखाम

हद से ज्यादा खाये आम।
तब बंदर को हुआ जुखाम।।

ठंडा गरम साथ में खाता।
ऊपर से पानी पी जाता।।

खूब नहाता सुबहोशाम।
तब बंदर को हुआ जुखाम।।

छींक छींक कर सर चकराया।
टूटा बदन ताप भी आया।।

नाक हो गई उसकी जाम।
तब बंदर को हुआ जुखाम।।

बंदर ने भालू बुलबाया।
भालू ने काढ़ा पिलबाया।। 

मला माथ पर झंडू बाम।
तब छू मंतर हुआ जुखाम।।

दो

कुंभकार की व्यथा कथा

दिनभर माटी में रहता है,
माटी से बतियाता।
कुंदन जैसा तपा तपा कर,
सुंदर कुंभ बनाता।।

कभी बनाता टेसू झेंझी
डबुआ दीप सरैया।
कभी भव्य प्रतिमा देवी की,
राधा संग कन्हैया।।

भिन्न भिन्न आकृतियाँ देता,
सुंदर उन्हें सजाता।
गोल गोल धरती के जैसी,
गुल्लक सुघड़ बनाता।।

भोर भये से सांझ ढले तक,
दिन भर चाक चलाता।
इतनी मेहनत करने पर भी,
पेट नहीं भर पाता।।

विधुत और मोम के दीपक,
छीन रहे हैं रोटी।
थरमाकौल छीनता उसके,
तन पर बची लंगोटी।।

बिचे खेत खलिहान बिच गये,
गदहा और मढैया।
कुंभकार का चैन छिन गया,
दिन में दिखीं तरैया।।

मत भूलो मिट्टी को बच्चों,
इसका त्याग न करना।
मिट्टी से ही जन्म मिला है,
मिट्टी में ही मरना

तीन


जंगल की दीवाली

जंगल के कोने कोने की,
सबने करी सफाई।
सभी जानवर खुश थे सुनकर,
दीपमालिका आई।।

लीप रही बिल्ली जंगल को,
चिड़िया चौक पुराये।
सरपट भाग भागकर हिरनी,
वंदनवार सजाये।।

लाया शहद बहुत सा भालू,
हाथी गन्ने लाया।
बंदर लाया केक शहर से,
सबको खूब खिलाया।।

लक्ष्मी मां की करी आरती,
मोदक भोग लगाये।
दे मैया आशीष, वनों में,
सुख समृद्धि आये।।

खूब चलाई आतिशबाजी,
होता धूम धडाका।
तभी कहीं से सिंह शिशु पर,
आकर गिरा पटाखा।।

पडा़ रंग में भंग जल गया,
शेर शिशु बेचारा।
नहीं समय पर मिली चिकित्सा,
असमय स्वर्ग सिधारा।।

दूर रहो आतिशबाजी से,
नहीं पास में आओ।
सिर्फ फुलझड़ी और चिटपिटी,
जी भर आप चलाओ।।

 चार

बिल्ली, 
में आऊँ, में आऊँ कहकर, 
में आवाज लगाती। 
दूध,  मलाई, रबडी़, चूहे, 
ढूँढ ढूँढ कर खाती।। 

दी मेने तालीम शेर को, 
सब कुछ उसे पढ़ाया। 
किंतु पेड़ पर चढ़ना बच्चों, 
कभी नहीं सिखलाया।। 

कभी राम का नाम न लेती, 
सौ सौ चूहे खाती। 
पापों का प्रायश्चित करने, 
हज करने को जाती।।

दिखने में बेशक छोटी हूँ, 
नही उड़ाना खिल्ली। 
लगूँ शेर की माँसी बच्चों, 
नाम मेरा है बिल्ली।।

पाँच

पंसारी 
एक हरद की गाँठ मिल गई, 
धनिया, मिर्च, सुपारी।
इन चीजों को पाकर चूहा, 
बन बैठा पंसारी।। 

मद में चूर हुआ पाखंडी, 
सबको आँख दिखायें। 
सिर्फ तनिक सा धन पाकर के, 
वो भारी इतरायें।। 

चोर घुसे चूहे के घर में, 
लूटी हरद सुपारी। 
चूहे राजा पंसारी से, 
पल में हुये भिखारी।। 

अहंकार मत करो कभी भी, 
सहज सरल बन जाओ। 
मीठी वाणी बोल जगत में, 
बच्चों नाम कमाओ।।


छह


सूरज चाचा


उठ भुनसारे सूरज चाचा,
मेरी छत पर आते।
बिना भेद के सब बच्चों को,
जमकर धूप खिलाते।।

में भी उन्हें खिलाने माँ से,
हलवा पूड़ी लाता।
लेकिन उनके मुख तक मेरा,
हाथ पहुँच ना पाता।।

मेरा भाव देखकर चाचा,
मन ही मन मुस्काते।
अगले दिन खाने की कहकर,
बादल में छुप जाते।।

डॉ कैलाश गुप्ता सुमन
मुरैना मध्यप्रदेश

सोमवार, 7 अगस्त 2023

कवि सौरभ पाण्डेय जी की बाल-रचनाएँ प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग

सौरभ पाण्डेय जी की
बाल-रचनाएँ
प्रस्तुति
वागर्थ
ब्लॉग और फेसबुक समूह


    कवि : सौरभ पाण्डेय

एक
ठंढा-ठंढा बहता पानी 

चलो नहायें उछल-कूद के 
ठंढा-ठंढा बहता पानी 

गर्मी के मौसम में आखिर 
चलती गर्मी की मनमानी 
चापाकल का या नदिया का 
या फिर तालाबों का पानी 
राहत देगा अगर नहायें 
क्यों करनी फिर आनाकानी 
चलो नहायें उछल-कूद के 
ठंढा-ठंढा बहता पानी 

कुदरत के वरदान सरीखे 
सतत धार में बहने वाले 
झरनों का व्यवहार समझते 
जंगल-पर्वत रहने वाले  
हम शिक्षित हैं, हम शहरी हैं  
कुदरत की क्यों बात न मानी ? 
चलो नहायें उछल-कूद के 
ठंढा-ठंढा बहता पानी 

स्वच्छ रहे पर्यावरण यह 
तभी अर्थ है इस जीवन का 
घर-बाहर जब गन्दा-मैला 
क्या हित सधता है तन-मन का ?
’जल ही जीवन है’ सब कहते 
बात न कहनी, है अपनानी. 
चलो नहायें उछल-कूद के 
ठंढा-ठंढा बहता पानी 


दो
गर्मी-छुट्टी 
हम हैं क्या ?.. आज़ाद पखेरू ! 
जबसे गर्मी-छुट्टी आई ! 

नहीं सुबह की कोई खटपट 
विद्यालय जाने की झटपट 
सारा दिन बस धमा चौकड़ी 
चिन्ता अब ना, कोई झंझट 
तिस पर रह-रह माँ की घुड़की -
’क्यों बाहर हो, करूँ पिटाई..?’
हम हैं क्या ? आज़ाद पखेरू.. ! 
जबसे गर्मी-छुट्टी आई ! 

होमवर्क भी कितना सारा 
अपनी मम्मी एक सहारा 
प्रोजेक्टों का बोझ न कम है 
याद करें तो चढ़ता पारा 
साथ खेल के गर्मी-छुट्टी 
कितनी--कितनी आफत लाई 
हम हैं क्या ? आज़ाद पखेरू.. ! 
जबसे गर्मी-छुट्टी आई ! 

बहे पसीना जून महीना 
निकले सूरज ताने सीना 
डर से उसके सड़कें सूनी 
अंधड़ लू के, मुश्किल जीना  
शरबत आइसक्रीम वनीला 
चुस्की राहत बरफ-मलाई !
हम हैं क्या ? आज़ाद पखेरू..
जबसे गर्मी-छुट्टी आई ! 

तीन

मेरे साथ कई लफ़ड़े हैं  

मेरे साथ कई लफ़ड़े हैं  
किसकी-किसकी बात करूँ मैं, 
सबके सब बेहद तगड़े हैं 

एक भोर से लगे पड़े हैं 
घर में सारे लोग बड़े हैं
चैन नहीं पलभर को घर में
मानों आफ़त लिये खड़े हैं
हाथ बटाया खुद से जब भी, 
’काम बढ़ाया’ थाप पड़े 

घर-पिछवाड़े में कमरा है
बिजली बिन अंधा-बहरा है 
इकदिन घुस बैठा तो जाना
ऐंवीं-तैंवीं खूब भरा है
पर बिगड़ी वो सूरत, देखा
बालों में जाले-मकड़े हैं 

फूल मुझे अच्छे लगते हैं  
परियों के सपने जगते हैं
रंग-बिरंगे सारे सुन्दर 
गुच्छे-गुच्छे वे उगते हैं 
उन फूलों से बैग भरा तो 
सबके सब मुझको रगड़े हैं

चार
बालगीत-कथा: चिड़िया और बन्दर
 
बच्चो आओ, तुम्हें बतायें 
क्या सीखी चिड़िया बन्दर से ! 

किसी पेड़ पर चिड़िया का था 
एक घोंसला छोटा-सुन्दर 
चीं-चीं करते बच्चे उसके 
साफ-सफाई बहुत वहाँ पर    
दूर कहीं से बन्दर आया 
देख चकित था इतने भर से ! 
बच्चो आओ, तुम्हें बतायें 
क्या सीखी चिड़िया बन्दर से ! 

चिड़िया बोली, ’आओ भाई’  
लगी पूछने पता-ठिकाना 
बेघर बन्दर जल-भुन बैठा 
समझा, चिड़िया मारे ताना -
’चिड़िया को औकात बताऊँ 
ज़हर भरी है यह अंदर से..’
बच्चो आओ, तुम्हें बतायें 
क्या सीखी चिड़िया बन्दर से ! 
 
बादल आये तभी घनेरे 
लगा बरसने झमझम पानी 
बच्चों के संग छिपी घोंसले 
दुबक गयी फिर चिड़िया रानी 
लेकिन बन्दर रहा भीगता 
उबल रहा था वह भीतर से 
बच्चो आओ, तुम्हें बतायें 
क्या सीखी चिड़िया बन्दर से ! 

देखा आव न ताव झपट कर 
बन्दर जा पहुँचा उस डाली 
एक झटक में नोंच घोंसला 
उसने खुन्नस खूब निकाली
तिनका-तिनका बिखर गया था  
उजड़ गया था साया सर से 
बच्चो आओ, तुम्हें बतायें 
क्या सीखी चिड़िया बन्दर से ! 

सही कहा है कभी मूर्ख से 
बिना ज़रूरत बात न करना 
करो मित्रता, सोच-समझ कर 
करे डाह जो हाथ न धरना  
समझ गयी ये चिड़िया भी सब 
बेघर आज हुई जब घर से 
बच्चो आओ, तुम्हें बतायें 
क्या सीखी चिड़िया बन्दर से ! 


सौरभ पाण्डेय, 
भोपाल (मप्र) 
सम्पर्क : 9919889911
प्रस्तुति

शनिवार, 5 अगस्त 2023

धरम की ध्वजा ले खड़े चौधरी जी
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          उठो रे सुज्ञानी जीव, जिनगुण गाओ रे! निशि तो नसाई गई भानु को उद्योत भयो ध्यान को लगाओ प्यारे नींद को भगाओ रे 
             उठो रे सुज्ञानी जीव !
        आदरणीय प्रमोद भाईसाहब से सबसे पहले परिचय का आधार, जहाँ तक मुझे स्मरण है, यही पँक्तियाँ बनी थी। जैन नगर में स्थित नन्दीश्वर जिनालय के किसी आयोजन में भाईसाहब यह पद डूब कर पढ़ रहे थे। पद शैली की अदायगी में एक किस्म का आकर्षण था जिसे सभागार में विराजमान हर एक भावक मन महसूस कर सकता था।
         आरम्भिक परिचय से उनके सरल-तरल मन और भक्ति-भाव की आस्तिकता के आस्वाद को आसानी से पहचाना जा सकता था। भाईसाहब का व्यक्तित्व और कृतित्व बहुआयामी है। उनके कृतित्व का आँकलन उनके द्वारा पोषित, संचालित और निर्देशित संस्थानों से होता जो उनके संरक्षण में निरन्तर फल और फूल रही हैं।
राजधानी भोपाल से पहले ऐतिहासिक नगरी चन्देरी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। फिर बात चाहे,औषधालय की हो या पाठशाला की या फिर शैक्षणिक संस्थान की। उन्होंने जो काम अपने हाथ में लिया उसे प्राणपण से पूरा किया।
          आज तीर्थ धाम नन्दीश्वर जी की धमक पूरे भारत में महसूस की जा सकती है। अपने आप में अनूठा और अद्वितीय तीर्थ। यह सब प्रमोद भाईसाहब की निष्ठा और लगन का सुपरिणाम है।
      प्रमोद जी, समाजसेवियों में अनूठे और विरल हैं जो, समाज को एकसूत्र में पिरोंने की सोच रखते हैं और तदनुरूप योजनाओं का क्रियान्वयन भी करते हैं।
धर्मआयतनों का संरक्षण हो या कोई अन्य धार्मिक अनुष्ठान भाईसाहब की भूमिका सदैव अग्रणी होती है।
              आज हमारी समाज के गौरव और समाज के रत्न आदरणीय प्रमोद भाई साहब जी का जन्मदिन है। इस अवसर पर प्रसंगवश मुझे तुलसी का एक दोहा याद आ रहा है, जो मैं पूरी समाज की तरफ से, आदरणीय भाईसाहब को पूरी निष्ठा के साथ समर्पित करना चाहता हूँ।
तुलसी कहते है कि-
                      "मुखिया मुख सो चाहिये, खान पान को एक। पाले पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।
                    यह हम सबका सौभाग्य है कि हम लोग भी तुलसी के दोहे में वर्णित ऐसे ही मुखिया के संरक्षण में, विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर उनके अनुभव संसार से बहुत कुछ सीख रहे हैं।
               प्रमोद भाईसाहब शतायु हों! स्वस्थ्य रहें! और हम सबको अपने स्नेह और आशीर्वाद से अभिसिंचित करते रहें। भाईसाहब के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व से बहुत कुछ ग्रहण किया जा सकता है। आप उन्हें कभी भी, कहीं भी,  किसी भी, समय धार्मिक अनुष्ठान या धर्मायतन की चर्चार्थ आमन्त्रण दें,!
        भाई साहब धरम की ध्वजा लेकर अग्र पंक्ति में खड़े दिखाई देंगे।

मनोज जैन "मधुर"
_____________
106, विट्ठलनगर
गुफामन्दिर रोड
लालघाटी भोपाल
462030

         





उठो रे सुज्ञानी जीव,जिनगुण गाओ रे
निशि तो नसाई गई भानु को उद्योत भयो
ध्यान को लगाओ प्यारे नींद को भगाओ रे उठो रे सुज्ञानी जीव
भववन चौरासी बीच,भ्रमे तो फिरत नीच
मोहजाल फन्द परयो,जन्म-मृत्यु पायो रे उठो रे सुज्ञानी जीव
आरज पृथ्वी में आय, उत्तम जन्म पाये
श्रावक कुल को लहाये,
मुक्ति क्यों न जाओ रे॥ 
उठो रे सुज्ञानी
विषयनि राचि-राचि, बहुविधि पाप साचि-२
नरकनि जायके, अनेक दुःख पायो रे ॥ उठो रे सुज्ञानी. ॥४॥
पर को मिलाप त्यागि, आतम के जाप लागि-२
सुबुद्धि बताये गुरु, ज्ञान क्यों न लाओ रे॥ उठो रे सुज्ञानी. …॥५॥