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मंगलवार, 30 जून 2026

संस्मरण आलेख

आज हिंदी के जन कवि नागार्जुन का जन्मदिन है. ( ज्येष्ठ पूर्णिमा ) उनकी स्मृति में यह आलेख प्रस्तुत है 

 जनकवि नागार्जुन का आभामण्डल 
   स्वप्निल श्रीवास्तव 

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 हिन्दी में राष्ट्रकवि भी  हुए है लेकिन नागार्जुन की ख्याति जनकवि के रूप में बनी रही | उन्हें किसी संस्था –प्रतिष्ठान ने इस पद से उन्हें विभूषित नही किया था | जनता के कवि का ताज जनता ने उन्हें पहनाया था |  हिन्दी में जो  भी राष्ट्रकवि हुये है वे सत्ता के करीब थे | इस श्रेणी में मैथिली शरण गुप्त और रामधारी सिंह का नाम लिया जाता है | इन दोनों कवियों के काव्य विवेक पर किसी तरह संदेह नही है , उन्होंने हिन्दी कविता में अपूर्व योगदान दिया | कौन मैथिली शरण गुप्त की कृति साकेत और भरत भारती को भूल सकता है ? दिनकर ने ओजपूर्ण कवितायें लिखी है ,उनकी कविताओं को सम्मान के साथ याद किया जाता है | दिनकर राष्ट्रवादी कवि थे ,उनकी प्रमुख पुस्तक ,कुरुक्षेत्र ,रश्मिरथी और उर्वशी थी ,इसके अतिरिक्त उन्होंने गद्य में संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक लिखी है | वे मूलत : वीर रस के कवि थे | इन दोनों कवियों के काव्य भूमि सांस्कृतिक थी  ,इसलिये वे देश में बहुत लोकप्रिय हुये | वे बड़े पदों पर आसीन रहे , उन्हें सरकार ने पद्मभूषण से विभूषित किया |उन्हें जीवन में किसी तरह के अभाव का सामना नही करना पड़ा | इन दोनों राष्ट्रकवियों की कविता में जीवन और समाज के तत्व थे लेकिन वे व्यवस्था के आलोचक नही थे |

 नागार्जुन की प्रकृति ठीक इससे उलट थी.जीवन भर उन्होंने सत्ता का विरोध किया |  उनको  जो हासिल होना चाहिए ,उससे भी वे वंचित रहे था वह भी नही मिला | उन्हें हिन्दी में नही मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ पर साहित्य अकादमी मिला | उनके समकालीन शमशेर और त्रिलोचन ,केदारनाथ अग्रवाल को इस सम्मान से नवाजा गया था , लेकिन जनता ने उन्हें जनकवि की उपाधि से अलंकृत किया और अपने समय के कवियों से ज्यादा लोकप्रिय हुये | उनकी कविताएं जनता कि जुबान पर हैं | जन कवि के लिये जिस यातना का वरण करना पड़ता है ,वह उन्होंने जीवन भर किया ,अभाव का जीवन जीते हुये अपने कवि कर्म के प्रति समर्पित रहे | वे जनता के बीच रहे और उनकी भाषा में लिखते रहे | उन्होंने जो कुछ लिखा और कहा , वह निडर होकर कहा | वे खुद कहते हैं –
  जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊ 
  जनकवि हूँ साफ कहूँगा क्या हकलाऊ 
  उनके काव्य लोक से गुजर जाइये उसमें किसी तरह की हकलाहट नही मिलेगी ,सब कुछ उन्होंने साफ गोई के साथ लिखा है और अपने स्टैंड पर कायम रहे | जो भी सता आयी उसकी आलोचना की , वे उनके व्यंग – बाण के निशाने पर रहे |     

   वे कैसे वैद्य नाथ मिश्र से यात्री और यात्री से नागार्जुन बने | इसकी कथा रोचक होने के साथ दारुण है | नागार्जुन 11 जून 1911 को पैदा हुये , उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माँ का नाम उमादेवी था | उनके जन्म के पहले तीन भाई असमय काल –कवलित हो चुके थे |  यह परिवार के लिये चिंताजनक स्थिति थी |उनके लिये वैद्यनाथ धाम ( देवघर ) में उनके लिये मनौती मानी गयी और उनका जन्म हुआ ,उनके बचपन का नाम ठक्कन था | उनका पैतृक  गाँव तरैनी था उस समय के दरभंगा जनपद का भाग था लेकिन जन्मस्थान सतलखा था जो उनका ननिहाल था | यहाँ यह याद किया जाना चाहिये कि राहुल जी का जन्म उनके पैतृक गाव कनैला में नही उनके ननिहाल पंदहा आजमगढ़ मे हुआ था | उन दिनों यह परंपरा थी कि संतान का जन्म ननिहाल में हो | कभी कभी साम्यता अचरज में डाल देती है | ये  दोनों लेखक बौद्ध धर्म के समर्थक थे अत: कालांतर में अपना मूल नाम त्याग कर क्रमश : राहुल और नागार्जुन हुये  | राजकुमार गौतम का जन्म उनके ननिहाल देवदह मे होना था लेकिन उनका जनस्थान लुम्बिनी बना |  क्या पता था कि आगे चलकर ये दोनों कवि बौद्ध धर्म के पथिक बनेगे | मनुष्य अपने जन्म के बाद जगह जगह भटकता है , कोई रोजी की खोज में कोई अपनी महत्वाकांक्षाओ की पूर्ति के लिए अनेकों युगत करता है |

 नागार्जुन का जीवन आसान नही था , उनके पिता उत्तराधिकार में तीन कट्ठा जमीन छोड़ कर गये थे | इस  विरासत से जीवन नही चल सकता था इसलियें  उन्हें अपने जीवन यापन के लिये संघर्ष करना पड़ा | यहीं संघर्ष उनकी मूल पूंजी थी ,जिससे उनकी रचनात्मकता  को शब्द मिल रहे थे | अगर वे सम्पन्न परिवार में पैदा हुये होते तो उनके जीवन की दिशा अलग होती तब संभवत : वे बड़े कवि नही बन पाते | उन्हें संस्कृत विद्यालय में संस्कृत की प्रारम्भिक शिक्षा मिली लेकिन उनके जीवन में बदलाव तब आया जब वे लंका पहुंचे और वहाँ बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और बौद्ध धर्म को स्वीकार किया | उनका नामकरण संस्कार हुआ और उन्हें नागार्जुन नाम दिया गया | इसके पूर्व में भी नागार्जुन हुये हैं जो बौद्ध दर्शन के दार्शनिक थे ,उन्होंने शून्यवाद की स्थापना की | जिसका मुख्य आशय यह था कि कोई भी बस्तु स्वतंत्र नही होती ,उसका निर्धारण वस्तुओं के आपसी संबंधों से  होता है ,उन्होनें मध्यमार्ग पर बल दिया | 

  यात्री नाम से नागार्जुन नाम की यात्रा तक उनकी जीवन यात्रा विभिन्न पड़ावों से होकर गयी | इस तरह हिन्दी कविता में नागार्जुन का नाम स्थापित हो गया | नागार्जुन का लेखन केवल लिखने तक सीमित नही था ,उसके कई आयाम थे | उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था , वे किसान आंदोलन में शामिल हुये | उन्हें जेल की सजा मिली | जीवन की इन घटनाओं नें उनके लेखन को सजग और समृद्ध किया | इस तरह वे क्रांतिधर्मी कवि के रूप में ख्यात हुये | वे निरंतर जन आंदोलनों में भाग लेते रहे और जनता के साथ जुड़े रहे |  आजादी के बाद बहुत से लेखकों ने सत्ता के पास अपनी जगह बना ली थी लेकिन वे सत्ता के विरुद्ध रहे ,उन्हे इसका खामियाजा उठाना पड़ा था | उनका परिवार क्षत –विक्षत होता गया ,उन्होनें परिवार की परिवार की प्रवाह नही की | वे घुमंतू कवि बने रहे ,उन्होंने राहुल के साथ तिब्बत की यात्रा की और देश के सुदूर क्षेत्रों में विचरण करते रहे | उनका सतत जनता से जुड़े रहे | उनका रहन –सहन मामूली था , वे देखने में जनता के प्रतिनिधि लगते थे | अपने जीवन के अंतिम दिनों तक उनकी यह भूमिका बनी रही | आपात कल में जे पी आंदोलन में उनकी भागीदारी थी , वे बिहार के चौराहों और नुक्कड़ों पर कविता पाठ करते रहे | लेकिन जब उन्हें लगा कि यह सचमुच का जन आंदोलन नही है तो वे उससे अलग हो गये | वे अपने शर्तों और प्रतिबद्धता के साथ अपने लेखन कर्म का निर्वाह किया |

     ***
 लंबे संघर्ष के बाद आजादी मिली लेकिन आजादी के पहले धर्म के आधार पर देश का विभाजन हुआ ,हिंदुस्तान का एक हिस्सा पाकिस्तान बना | इस त्रासदी की तस्वीरे इतिहास और साहित्य में दर्ज हैं ,इस प्रकरण को बहुत दुख से साथ किया जाता रहा | हिन्दू मुसलमान को केंद्र में रख कर राजनीति की जाती रही ,इससे देश का काफी नुकसान हुआ | आज यह राजनीति काफी मुखर हो गयी है ,इस मुद्दे से देश के मुख्य मुद्दे बहस से बाहर होते रहे | 15 अगस्त 1947 देश की आजादी की तारीख थी | 26 जनवरी 1950 को देश का सविधान बना | यह अद्भुत संविधान था जिसमें हर नागरिक को बराबर का दर्जा दिया गया , उसमें धर्म के आधार पर कोई विभेद नही किया गया था | इसमें धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की गयी थी ,जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे , वे राजनेता के साथ प्रख्यात लेखक थे , उन्होंने भारत की खोज , विश्व इतिहास की झलक , पुत्री के नाम पिता का पत्र जैसी मशहूर किताबें लिखी | नेहरू ने देश में अनेक संस्थाएं और उद्योगों की स्थापना की थी ,इसके लिये उन्हें श्रेय दिया जाता रहा है | देश के विकास को लेकर उनकी गांधी जी से मतभेद थे | गांधी चाहते थे कि देश में कुटीर उद्योगों का भी विकास हो ताकि शहर और गाँव की साथ – साथ उन्नति हो सके | इसी बीच गांधी की हत्या कर दी गयी ,30 जनवरी 1948 इतिहास की रक्तरंजित तिथि थी | यह हत्या चरमवादी हिन्दू ने की थी |

  जैसे देश में सत्ता की स्थापना हुई ,देश के अनेक लेखकों और कवियों को इस सत्ता का सान्निध्य मिला लेकिन नागार्जुन सत्ता के दूसरी तरफ थे , उन्होंने अपनी कविता में सत्ता की आलोचना की < वे आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के विरुद्ध रहे और जब देश आजाद हुआ तो व्यवस्था के खिलाफ रहे | उनके इस रूप को देखना हो ,उनका कविता संग्रह –खिचड़ी विप्लव देखा हमने को पढा जा सकता है | नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के शासन काल में उन्होंने उनके विरुद्ध कविताएं लिखी | उनकी यह कविता देखे –
  आओ रानी कम ढोएगे पालकी 
 यही हुई है राय जवाहर लाल की 
रफ़ू करेगे फटे –पुराने जाल की 
यही हुई है राय जवाहर लाल की 
आओ रानी हम ढोएगे पालकी | 

  यह कविता उस समय लिखी गयी थी  जब इंग्लैंड की महारानी क्वीन एलिजाबेथ का हिंदुस्तान में आगमन हुआ था | धीरे - धीरे उनकी कविताओं का स्वर तल्ख होता गया  | उन्होंने देश के राजनीतिक हाल पर कविताएं लिखी है | जैसा हम जानते है कि आजादी के बाद देश की राजनीति बदलने लगी ,संवित सरकारों की शुरुवात हो गयी थी | राजनेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए दल बदलने लगे थे ,देश के प्रति उनकी निष्ठा संदिग्ध होने लगी थी  | राजनेताओं ने आजादी की जंग में जो मूल्य अर्जित किये थे , वे टूट रहे थे | गांधी का दर्शन अप्रसंगिक हो रहा था , 1969  में लिखी उनकी कविता का अंश देखे –

 बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर गांधी के 
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के |
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के 
दानी निकले ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के |
जल थल गगन विहारी निकले तीनों बंदर बापू के 
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के |
< सेठों के हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के 
 युग के प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के |

  यह लंबी कविता है जिसमें उन्होंने राजनीति के बदलाव की आलोचना की थी | समय के साथ जिस तरह से राजनीति की संस्कृति बदल रही थी ,उसे इस कविता में स्पष्ट दिखाई देता है | जैसे जैसे आजादी का पहिया बढ् रहा था ,उसके नीचे मूल्य रौदे जा रहे थे | नागार्जुन ने नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के कार्यकाल के राजनीतिक कदाचार का वर्णन उनकी कविता में मिलते हैं | आगे चल कर  चुनाव में टिकट बटवारे का खेल भी बदल गया था ,जो वास्तव में हकदार थे उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था | राजनीति में ऐसे लोग सम्मिलित हो रहे थे जिनका देश के प्रति कोई निष्ठा नही थी | राजनीति उनके लिये राष्ट्र की सेवा नही ,एक व्यवसाय बन रहा था | टिकट के बटवारे की प्राथमिकता बदल रही थी | यह स्थिति इंदिरा काल में ज्यादा मुखर रूप में सामने थी | उनकी कविता आये दिन बाहर के – में इस दृश्य को देखा जा सकता है –
 श्वेत श्याम रतनार अँखियाँ निहार के 
सिंडकेटी प्रभुओं की पद धूर झार के |
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के 
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के |
आये दिन बहार के !

  इस कविता को पढ़कर पाठक  जान सकते है कि यह कविता इंदिरा गांधी के शासन काल में लिखी गयी थी –जब कांग्रेस का इंडीकेट और सिंडीकेट में विभाजन हुआ था | नागार्जुन  प्रचलित लोक –रूप में कविताएं  लिख रहे थे ताकि वह पाठकों तक आसानी से पहुँच सके | नागार्जुन हिन्दी के अकेले कवि हैं जिन्होंने राजनीति को कविता का विषय बनाया है | अगर कोई नेहरू और इंदिरा गांधी के समय के राजनीतिक घटनाओं का विवरण चाहता हो तो नागार्जुन की कविताएं जरूर पढ़नी चाहिए | यह हिम्मत हिन्दी के कम  कवियों के पास है , लोग इस तरह की कविताओं लिखने से बचते है | नागार्जुन के बाद इस तरह की कविताएं लिखने की रवायत खत्म हो गयी है । कोई लिखने का खतरा नही उठाता  लेखक बच बच लिखते है ,मुझे धूमिल की कविता पटकथा के अंश याद आ गयी  उन्होंने लिखा है –
  एक पूंजी वादी दिमाग है / जो परिवर्तन तो चाहता है / मगर आहिस्ता – आहिस्ता / कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बची रहे / कुछ इस तरह की काँख भी ढँकी रहे  / और विरोध में उठे हुये हाथ की / मुट्ठी भी तनी रहे |
   यहाँ दाग देहलवी  के  शेर को याद करे जिसकी पंक्ति है ,खूब पर्दा है चिलमन से लगे बैठे हैं / साफ छुपते भी नही सामने आते भी नही | 
   नागार्जुन की कविता में कोई परदेदारी नही थी | उन्होंने आपातकाल के विरोध में कविताएं लिखी और इंदिरा गांधी को केंद्र में रखकर उन्होंने लिखा –
  क्या हुआ आपको ? /
 क्या हुआ आपको ? 
  सत्ता की मस्ती में 
 भूल गयी बाप को ?
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
बेटे को तार दिया बोर दिया बाप को 

   इस तरह उनके संग्रह  में अनेक कविताएं सहज मिल जाएगी | इस कविता के साथ मेरी भी स्मृति जुड़ी हुई है | वे कहने पर कविताएं नही  सुनाते थे , यह सब उनके मूड पर निर्भर करता था | हापुड़ प्रवास में उनके साथ हम लोग घूमने गये तो एक चौराहे पर रुक कर अपनी यह कविता नाच नाच कर सुनाने लगे | थोड़ी देर में उनके आसपास भीड़ इकट्ठा हो गयी | यह था उनकी कविता का प्रभाव , वह कहते थे कि कवियों को छंद  कविताएं जरूर लिखनी चाहिये | मुझे भी लगा कि जिस समाज में छंदहीन  कविताएं स्वीकृत नही है अत : कवि को छंद की ओर लौटना चाहिये | छटे –सातवे दशक में कवियों के गीत बहुत लोकप्रिय थे , वे कवि सम्मेलनों के मंचों पर खूब सुने जाते थे | उस समय बच्चन , शिवमंगल सिंह सुमन ,शंभु नाथ सिंह प्रमुख  कवि थे , वे मंचों पर नही हिन्दी की मुख्यधारा में भी शामिल थे | अब यह समीकरण टूट गया था ,साहित्य और कवि मंच अलग हो गया है | मंच व्यवसायिक हो गये है ,उनके भीतर से कवित्व गायब हो चुका है नागार्जुन की कविता कवियों के लिये पाठशाला है | उनके यहाँ कविता के अनेक रूप हैं |

  उदाहरण के लिये उनकी लंबी कविता नेवला है , यह कविता उन्होंने जेल में लिखी थी | नेवले का नाम मोतिया था ,इस कविता में उसके कौतुक का वर्णन करते हैं | दो भुने हुए भुटठे , नीम की दो टहनियाँ या सूअर , कटहल कविता का विषय हो सकती है | ऐसा तभी संभव होता है जब कवि अनुभव सम्पन्न हो | नागार्जुन घुमंतू कवि थे देश के विभिन्न इलाकों में घूमते रहते थे | जीवन की छोटी – छोटी घटनाओं पर उनकी नजर होती थी | नागार्जुन अभिजात के कवि नही थे , वे जनता और संघर्षरत मजदूरों के कवि थे | उनके पास उनके चित्रण के लिये समर्थ भाषा थी | उनकी कविता खुरदुरे  पैर और घिन नही आती है ? घिन तो नही आती ? कविता की इन पंक्तियों को पढे –
  पूरी स्पीड में है ट्राम / खाती है दचके पर दचका /सटता है बदन से बदन /पसीने  से लथपथ 
  छूती है निगाहों को /कत्थई दांतों की मोती मुस्कान /बेतरतीब मूँछों की थिरकन / सच सच बतलाओं 
  घिन तो नही आती ? जी तो नही चिढ़ता 
   यह कविता भद्र जनों पर व्यंग की कविता है | यह पंक्ति – घिन तो नही आती / जी तो नही चिढ़ता ,उपेक्षितों के प्रति उनकी उनकी प्रतिबद्धता को दिखाती है | उनकी आँख उन दृश्यों पर जाती है जो कवियों की दृष्टि से छूट जाती है | यहाँ उनकी लंबी कविता – हरिजन गाथा की चर्चा कर ली जाए जो उनकी जरूरी कविता है | बिहार के बेल्छी कांड में कई हरिजनों की हत्या हुई थी , यह कविता इस दुर्घटना पर आधारित है | कुछ पंक्तियाँ –
  ऐसा तो कभी नही हुआ था कि / एक नही , दो नहीं / तीन नहीं / तेरह के तेरह अभागे –
 अकिंचन मनुपुत्र / जिंदा झोक दिये गये हो / प्रचंड अग्नि के बिकरल लपटों में 
 साधन सम्पन्न ऊंची जातिवाले / सौ सौ मनपुत्रों द्वारा | 
   देश की आजादी के बाद  दलितों के साथ बहुत से अत्याचार हुये है , इसे शमन करने के बजाय उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है | इन दिनों यह प्रवृति बहुत तेज हो गयी है | किसी घटना को धर्म और जाति के आधार पर देखा जाता है ,उसे स्वतंत्र रूप से नही देखा जाता है | यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दलितों को जगह दी और उन्हें कथा –वस्तु बनाया | नागार्जुन की कविता की दुनिया में इस रूप को देख सकते हैं 
  नागार्जुन क्रातिकारी चेतना के कवि है ,उनकी यह अभिव्यक्ति उनकी कविताओं में देखी जा सकती है | क्रांति उनके लिये वायवी नही है , वे उसमें शामिल भी होते हैं  | जैसा पूर्व में बताया गया है कि वे स्वतंत्रता संग्राम में नही , जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में भी सम्मिलित हुये थे | जहां भी अनाचार होता है ,उसके विरुद्ध वे आवाज उठाते है | उनकी कविता भोजपुर  में उनकी आवाज को देखे –
  यही धुआँ मैं ढूंढ रहा था / यही आग मैं खोज रहा था /यही गंध थी मुझे चाहिये 
  बारूदी छर्रों की खुशबू ! / ठहरो ठहरो इन नथनों में भर लूँ / बारूदी छर्रों की खुशबू |  
    क्रांतिकारी कवि के भीतर भी कोमल भाव होते है , उनके भीतर प्रेम उपस्थित  रहता है | वे घर से हमेशा दूर रहे लेकिन घर उनके साथ चलता था < इस संबंध में उनकी दो कविताओं का संदर्भ दिया जा सकता है –पहली कविता का नाम है – सिंदूर तिलकित भाल ,इस कविता की कुछ मार्मिक पंक्तियाँ देखे -
  घोर निर्जन में परिस्थिति में दिया है डाल ! /याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल 
  कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिये नही समाज / कौन है वह एक जिसको नही पड़ता एक दूसरे से काज / 
 ,, तभी तो याद आती हो प्राण 
   हो गया हूँ मैं नही पाषाण | 
    क्या इस कविता को कवि की आत्मस्वीकृति मानी जाय ? देश और साहित्य की सेवा करते हुये जीवन में बहुत सी जगहें छूट जाती हैं इसे समाज नही जान पाता | इस बिडम्बना का सबसे पहले परिवार शिकार होता है | कठोर पहाड़ों से प्रपात झरते हैं | उनकी दूसरी कविता है कालिदास –
 कालिदास ,सच - सच बतलाना ! / इंदुमती के मृत्यु शोक से / अज रोया था या तुम रोये थे ?
 कालिदास , सच –सच बतलाना ,,,/ अमल –धवल गिरि के शिखरों पर / प्रियवर ,तुम कब सोये थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे ? कालिदास , सच – सच बतलाना ? 
  इस कविता को पढ़ते हुये लगता है कि नागार्जुन कालिदास की वेदना के साथ है | किसी अन्य पर कविताएँ लिखते हुए कवि स्वयं : को भी अभिव्यक्त करता है | कालिदास बादल को माध्यम बना कर अपनी दारुण प्रेम कथा को याद करते हैं | कवि के लिये प्रकृति में  तमाम उपदान हैं जिसका प्रयोग कवि अपनी कविता में करता है ,उसकी आभा हर जगह हर बस्तु में मौजूद है | यही कवि के अनुभव की व्यापकता है | उन्होंने अपने कवि मित्रों पर कविता लिखी है लेकिन राजकमल चौधरी पर लिखी उनकी कविता –अच्छा किया ,उठ गये हो दुष्ट , लंबी कविता है | यह कविता राजकमल के जीवन चरित्र को बताती है , वे मूल रूप से अराजक चरित्र के थे | उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं | उनका पुकारने का नाम फूल बाबू था |इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं –
  लेकिन तुम तो बीच में ही / दगा दे गये हो दुष्ट ! / अच्छा किया ,उठ गये हो दुष्ट ! 
  खूब रहा ,, ! / पा गये हो छुटकारा भवसागर के थपेड़ों से ! अपन तो भाई थेथर हैं 
 निर्लज्ज , बेहया , कठजीव / मरेगे नही जल्दी | 

  नागार्जुन की भाषा का क्षेत्र विस्तृत है , उनकी मूल भूमि मिथिला है | इसके अलावा वे संस्कृत और बांग्ला के भी जानकर है | उनकी भाषा कें अनेक भाषा के शब्द आते हैं | वह जनता की भाषा में लिखते है | उन्हें पढ़ते हुये कबीर की याद आती है ,कबीर की भाषा को खिचड़ी भाषा कहा जाता है | नामवर सिंह नें उन्हें आधुनिक कबीर कहा था | हजारी प्रसाद दिवेदी  ने कबीर को नये रूप में प्रस्तुत किया था ,उनका कथन है कि नागार्जुन भाषा के डिक्टेटर थे , वे जैसा चाहते थे भाषा से कहलवा देते थे “
  कहा जाए कि नागार्जुन ने  भाषा को सिद्ध कर लिया था | उनकी भाषा में व्यंग था , वे किसी को माफ नही करते थे | उन्हें पढ़ते हुये मुझे अक्सर हरिशंकर परसाई की याद आती है | जिस तरह परसाई जी अपने आप पर व्यंग करते थे ,उसी तरह नागार्जुन भी खुद पर व्यंग बाण चलाते थे | उनके निशाने पर सत्ता और सत्ताधीश अक्सर आते रहते थे | उनकी विचारधारा स्पष्ट थी , वे जनता के पक्षधर थे | कभी कभी लगता है कि उनकी कविता मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध की कविताओं का तर्जुमा है | मुक्तिबोध ने  जनता का पक्ष चुना था लेकिन वे जनता में लोकप्रिय कवि नही थे | नागार्जुन की कविता को जनता में स्वीकृति मिल चुकी है  |इसका मूल कारण यह है कि वे सतत जनता के बीच रहते थे ,उन्ही की भाषा में कविता लिखते हैं  | किसी कवि का महत्व इस बात में है कि वह वर्तमान समय में कितना प्रसंगिक है , इसी बात को ध्यान में रखकर उसका  मूल्यांकन होता है | इस पंक्ति में वे कबीर ,निराला ,मुक्तिबोध के साथ शामिल हैं |  उन्हें इसलिये याद किया जाता है कि उनके पास सत्ता के विरुद्ध लिखने का साहस था , वह आज के समय में किसी कवि के पास नही है | 

  नागार्जुन के जीवन का कथानक उपन्यास की तरह है ,उसमें कई मोड़ ,रहस्य रोमांच ,पल पल संघर्ष है | एक बार मैनें उनके बड़े बेटे शोभाकांत जी से कहा कि आपको गर्व होना चाहिये कि नागार्जुन जैसे बड़े कवि के बेटे है | इस बात के जबाब में उन्होंने कहा कि पूरे परिवार ने इसकी कीमत चुकायी है | मुझे याद आया कि बड़े लोगों के बेटों को जीवन में बहुत यंत्रणाएं सहनी पड़ती हैं | मुझे विश्व प्रसिद्ध लेखक हेमिग्वे के बेटे ग्रेगरी हेमिग्वे की अपने पिता पर लिखी किताब पापा की याद आ गयी जिसमें हेमिग्वे के जीवन के संघर्ष ,मानसिक उद्वेलन और परिवार के क्षत –विक्षत होने की कथा है | 
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गुरुवार, 25 जून 2026

रविंद्र श्रीवास्तव जी का एक संस्मरण



कबीर के पद हमने अपने गांव के जोगियों के
मुख से सुने थे । वे सारंगी और खझड़ी के साथ जिस तरह डूंब कर कबीर के पदों का गायन करते थे तो लगता था कि साक्षात कबीर उतर आए हो। 
 कबीर की तरह उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी थी , वे यदा कदा  गांजे का दम लगाया करते थे । ताड़ी आदि का सेवन करते थे । वे गेरूआ ड्रेस में रहते थे और अलग से दिखाई देते थे । उनके पास विचित्र किस्म के बैल होते थे ,किसी के पास पांचवा पैर होता तो किसी के पास दो दो पूंछ होती थी । उनकी पीठ पर कौड़ियों से सुसज्जित आवरण होता था ।
  उन्हें लोकजीवन से कंठ मिला था ,एकदम ठेठ और दिल से भीतर तक उनकी आवाज उतर आती थी । उनका गायन किसी श्रेष्ठ गायक से कम प्रभावशाली नही था । हम न मरिहैं मरिहैं संसारा या देख तमाशा लकड़ी का ,उनके प्रिय पद थे । बचपन में हमें कबीर की उलटवाँसी समझ में नही आती थी लेकिन जैसे जैसे बड़ा होता उनके अर्थ खुलते गए ,आज वे मेरे इष्ट कवि है  । कुमार गन्धर्व ने कबीर के पदों का अद्भुत गायन किया है उनके गायन में लोकतत्व और शास्त्रीयता थी ।
  कबीर के पदों का ज्यादा ज्ञान मुझे रामलखन साधू से मिला ,उनका गृहस्थ जीवन से मोहभंग हो गया था और वे साधुआ गए थे । बहुत दिन तक भटकने के बाद उन्होंने गांव के पास की बुद्धा नदी के पास अपनी कुटी बनाई । यह नदी निर्जनता में बहती थी ,पास में घना और डरावना जंगल था । लोग वहां दिन में जाने से डरते थे लेकिन साधु कबीर के पद के सहारे रात के भय को पराजित करते थे ।
  साधु की यह कुटी हम दोस्तो का ठिकाना बन गयी थी । हम उनका रामरस खाते पीते और कबीर का पद खझड़ी के साथ सुनते थे । वे प्रायः कबीर के पद करुण रस में गाते थे , गाते समय उनकी आंखें बंद हो जाती थी । कभी कभी अश्रुधार बहने लगती थी । उनका प्रिय भजन - माया महाठगिनी हम जानी -था
  वे बताते थे कि तिरिया भी एक माया है , वह हमें कई तरह की नाँच नचाती है । उसी के चलते ही साधु के रूप में उनका रूपांतरण हुआ था ,उन्हें भरी जवानी में सन्यास ग्रहण करना पड़ा । वे कबीर के बारे में अनेक प्रचलित कहानियां सुनाते थे -झीनी झीनी बीनी चदरिया का मतलब विस्तार से बताते थे । उन्होंने मेरी जीवन दृष्टि को बदलने का काम किया  ।
 जब देवरिया या गोरखपुर से गांव जाना होता था तो मगहर मेरे रास्ते मे पड़ता था ,वहां उतर कर करघे की आवाज सुनता था  । वहां से हम 
 अंगोछा या लुंगी खरीदते थे । कबीर ने हमें बुनने के साथ गाने का हुनर सिखाया है  । नौकरी में भदोही और मऊ जैसी जगहों पर पदास्थापित हुआ ,वहां बुनकरों के कारनामे देखे ।
   साधु की कुटी वीरान हो गयी है ,उनके बाद एक दो पीढ़ी उनकी परम्परा का निर्वाह कर सकी है । यह एक कठिन पथ है , सूरमा ही उस योग्य हैं । अब भी वहां जाता हूँ और वहां उनके होने के अहसास को अनुभव करता हूँ । गांव के जोगी बूढ़े हो गए है ,उनके कंठ थक गए है । उनके बेटों को जोगी बनना कुबूल नही था ,उनके लिए गीत से ज्यादा जरूरी चीज पूंजी थी ।
  कबीर को याद करने के पहले मैं रामलखन साधु को याद करना चाहूंगा , वे मेरे लिए पहले कबीर थे जिन्होंने मेरा कबीर से परिचय कराया ।
पहली बंदिगी साधु को फिर कबीर की स्मृति को
प्रणाम ।
   रिपोस्ट

बुधवार, 24 जून 2026

कवि त्रिलोचन : यादों के झरोखे से अनिल जनविजय प्रस्तुति : वागर्थ



कवि त्रिलोचन : यादों के झरोखे से
 अनिल जनविजय

वागर्थ समूह में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं हिन्दी साहित्य के वरिष्ठतम कवियों में से एक, त्रिलोचन  जी को समर्पित यह संस्मरणात्मक लेख, जिसे भावपूर्ण शैली में लिखा है प्रवासी हिन्दी साहित्यकार अनिल जनविजय ने।

                               यह संस्मरण एक कवि की स्मृति संघर्ष, ल्यआत्मीयता और सच्चे रचनाकार के जीवन-संघर्षों की मार्मिक झांकी है। भूख की पीड़ा, मित्रता की गर्माहट,साहित्यिक सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं के इन क्षणों को अनिल जी ने जिस आत्मीयता और गहराई से साझा किया है,वह हमारे समय के कवियों और पाठकों के लिए एक अमूल्य दस्तावेज है।
        त्रिलोचन जी की फक्कड़ी, बतरस की मिठास और कविताई की गरिमा सब कुछ इस रचना में जीवंत हो उठता है। यह आलेख हमें यह भी याद दिलाता है कि सच्चा कवि वही होता है जो जीवन की सच्चाइयों से गहराई से जुड़ा हो।
            वागर्थ समूह में यह प्रस्तुति साहित्य की आत्मा को स्पर्श करने का एक विनम्र प्रयास है। हम अनिल जनविजय जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं कि उन्होंने इन अनमोल स्मृतियों को साहित्य-समाज के साथ साझा किया।

प्रस्तुति टीप
 मनोज जैन 
संस्थापक, वागर्थ समूह

कवि त्रिलोचन : यादों के झरोखे से 
अनिल जनविजय

          आदरणीय त्रिलोचन जी का निधन हो गया, यह जानकर मैं बहुत उद्वेलित हुआ हूं. त्रिलोचन जी से कभी मेरी बहुत गहरी दोस्ती थी. तब मैं सिर्फ बीस-इक्कीस साल का था और त्रिलोचन जी साठ-इकसठ के. उनके साथ मेरी खूब घुटती थी. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ता था. और उन्हीं की तरह फक्कड़ था. उनसे मेरी मुलाकात बाबा नागार्जुन ने कराई थी. त्रिलोचन जी दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू-हिन्दी शब्दकोश की किसी परियोजना में काम कर रहे थे. बस, मैं रोज़ सवेरे उनके दफ्तर पहुंच जाता और देर शाम तक उन्हीं के साथ रहता. कितनी ही बार ऐसा हुआ कि मुझे चाय तक त्रिलोचन जी पिलाते थे क्योंकि उन दिनों मेरे पास चाय तक के पैसे नहीं होते थे. जब उनके पास भी पैसे नहीं होते थे, तो वे मुझे देख कर बड़े बेचैन हो जाते थे. उनकी वह बेचैनी मुझ से देखी नहीं जाती थी. लेकिन उनकी बातों का रस ही मेरा पेट भरने के लिए काफी होता था.

एक बार मैं दो दिन का भूखा था. पता नहीं कैसे यह बात त्रिलोचन जी भांप गए थे. उस दिन उन्होंने मुझे अपने साथ चलने और खाना खाने का निमंत्रण दिया. त्रिलोचन जी उन दिनों दिल्ली में मॉडल टाऊन में एक मकान के तिमंजिले पर किराए पर रहते थे. दो छोटे-छोटे कमरे थे, जिनमें से एक कमरा बहुत छोटा-सा था, जिसमें अम्मा (त्रिलोचन जी की पत्नी, जिन्हें मैं अम्मा कहकर ही पुकारता था) ने रसोई बना रखी थी. तो उस दिन हम दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय से पैदल चलकर जब त्रिलोचन जी के घर मॉडल टाऊन में पहुंचे तब-तक अंधेरा हो चुका था. समय होगा यही कोई आठ बजे का. अम्मा त्रिलोचन जी को देख कर कुछ बुड़बुड़ाने लगी थीं. त्रिलोचन जी ने पहले खुद अपने हाथ और मुंह धोया और फिर मुझ से हाथ-मुंह धोने को कहा. मैं हाथ-मुंह धो ही रहा था कि तब तक त्रिलोचन जी ने अम्मा को यह बता दिया —

‘अनिल भी आज हमारे साथ ही खाना खाएंगे’.

बस अम्मा का गुस्सा सातवें आसमान पर था. अम्मा जोर-जोर से त्रिलोचन जी को डांटने लगीं. पता यह लगा कि त्रिलोचन जी एक दिन पहले शाम को घर से यह कहकर निकले थे कि वे आटा लेने जा रहे हैं और उसके बाद फिर अगले दिन मेरे साथ ही घर में घुसे थे. वे भूल गए थे कि आटा भी लाना है. अम्मा दो दिन से भूखी थीं. और खुद त्रिलोचन जी भी. त्रिलोचन जी ने मुझे बताया कि बात यह नहीं है. उनका ख़याल था कि इतना आटा तो घर में था ही कि तीन चार दिन निकल जाए. इसलिए उन्होंने चिन्ता नहीं की. लेकिन अब क्या हो? न आटा ही घर में था और न ही जेब में कानी-कौड़ी. कुछ देर तक त्रिलोचन जी अम्मा से बहस करते रहे. फिर मुझे लेकर निकल पड़े. बोले — चलो, तुम्हें खाना खिलाकर लाता हूं. मैं मना करता रहा पर उन्होंने मेरी एक न सुनी. हम अजय सिंह के घर पहुंचे. रात के दस बज रहे थे. उन दिनों शमशेर जी अजय सिंह के साथ रहते थे. अजय सिंह भी वहीं माडल टाऊन में रहा करते थे. जब हम अजय जी के घर पहुंचे तो देखा कि उनके घर में सिर्फ एक ही कमरे की बत्ती जल रही है. त्रिलोचन जी ने डरते-डरते दरवाजा खटखटाया. एक बार कुंडी खड़खड़ाने पर ही तुरन्त ही दरवाजा खुल गया. दरवाजे पर अजय जी थे. त्रिलोचन जी को देखकर आश्चर्यचकित हुए और कहा—

‘अरे आप? इतनी देर से? क्या हो गया? सब ठीक तो है न?’

त्रिलोचन जी ने कहा- ‘हां, सब ठीक-ठाक है. शमशेर जी हैं क्या? जाग रहे हैं या सो रहे हैं? बस, उनसे मिलने का मन हुआ और हम चले आए. इनसे मिलिए. इन्हें जानते हैं? ये अनिल हैं. ये भी कविता लिखते हैं.’

अजय जी ने हमें अन्दर आने को कहा और शमशेर जी को बुलाने चले गए. शमशेर जी तब तक लेट चुके थे. लेकिन यह पता लगने पर कि त्रिलोचन जी मिलने आए हैं तुरन्त उठकर आए और पूछा —‘क्या बात है, सब ठीक तो है न’

त्रिलोचन जी ने कहा — ‘हां, सब ठीक है. ये अनिल हैं.कविता लिखते हैं. आप से मिलना चाहते थे, इसलिए आपसे मिलवाने के लिए ले आया. फिर कुछ देर इधर-उधर की बातें होती रहीं.

त्रिलोचन जी ने पूछा —  ‘खाना-वाना हो गया.’

अजय जी ने बताया — हां, सर्दियों के दिन हैं, इसलिए जल्दी ही खा लेते हैं. उसके बाद उन्होंने तुरन्त ही पूछा- और आप लोगों ने खाना खा लिया.

त्रिलोचन जी ने कहा — ‘हां, हमने भी जल्दी ही खा लिया था. इनका पता नहीं. इनसे पूछ लीजिए.’

मैंने भी यही बताया कि मैं खाना खा चुका हूं. हालांकि त्रिलोचन जी ने दो बार कहा मुझसे — ‘नहीं खाया हो तो खा लो.’

लेकिन मैंने दोनों बार यही कहा कि मैं खाना खा चुका हूं. थोड़ी देर और बैठ कर हम लोग वहां से निकल पड़े. बाहर निकलकर त्रिलोचन जी ने मुझ से कहा — ‘आप तो खा ही सकते थे.’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैंने कहा — ‘और आप भूखे रहते. घर पर अम्मा भी तो भूखी हैं’.

इस पर त्रिलोचन जी ने कहा — ‘तो क्या हुआ.’ और फिर मौन धारण कर लिया.’

रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे. त्रिलोचन जी के घर तक हम दोनों एकदम मौन लौटे. घर पहुंचे तो अम्मा जाग रही थीं.मुझे देखकर वे अपनी खाट से उठीं और रसोई में सोने के लिए चली गईं. रसोई में कोई चारपाई नहीं थी. उन्होंने जमीन पर ही अपनी दरी बिछा ली थी. यह देखकर मैं त्रिलोचन जी से कहता रहा कि मैं अपने घर चला जाऊंगा आप लोग सोइए. लेकिन त्रिलोचन जी ने मुझे नहीं लौटने दिया. कहा कि सवेरे चाय पी कर जाना. फिर मैंने कहा कि मैं जमीन पर दरी बिछा कर सो जाता हूं. चारपाई पर अम्मा सो जाएं. मेरी इस बात पर त्रिलोचन जी ने अपनी चारपाई अम्मा के लिए रसोई में बिछा दी. और अपनी दरी जमीन पर बिछा ली. फिर मेरे बार-बार कहने के बावजूद वे जमीन पर ही सोए. रात भर हम तीनों में से कोई नहीं सोया. कभी अम्मा उठतीं, कभी त्रिलोचन जी. मैं तो करवटें बदल ही रहा था. सुबह होते ही त्रिलोचन जी ने अम्मा से चाय बनाने को कहा. अम्मा ने बताया कि खांड नहीं है और दूध भी. लेकिन फिर भी अम्मा ने बिना चीनी और दूध की चाय मुझे पीने के लिए दी. मैंने वह चाय पी. सच मानिए उससे मीठी चाय मैंने आज तक नहीं पी है. उसमें स्नेह की जो मिठास घुली हुई थी, उस मिठास के लिए आज तक मन तरसता है. आज मैं पच्चीस बरस से मास्को में हूं. तब मैं मास्को भी त्रिलोचन जी की बात मानकर ही आया था. अगर तब यहां न आया होता तो न जाने आज कहां होता?

प्रेम, बतरस और कविताई

त्रिलोचन जी नहीं रहे. यह खबर इंटरनेट से ही मिली. मैं बेहद उद्विग्न और बेचैन हो गया. मुझे वे पुराने दिन याद आ रहे थे, जब मैं करीब-करीब रोज ही उनके पास जाकर बैठता था. बतरस का जो मजा त्रिलोचन जी के साथ आता था, वह बात मैंने किसी और कवि के साथ कभी महसूस नहीं की.

त्रिलोचन जी से बड़ा गप्पबाज भी नहीं देखा. गप्प को सच बना कर कहना और इतने यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत करना कि उसे लोग सच मान लें, त्रिलोचन को ही आता था. नामवर जी त्रिलोचन के गहरे मित्र थे. वे उनकी युवावस्था के मित्र थे, इसलिए उनकी ज्यादातर गप्पों के नायक भी वे ही होते थे. शुरू-शुरू में जब उनसे मुलाकात हुई थी तो मैं उनकी बातों को सच मानता था लेकिन बाद में पता लगा कि ये सब उनकी कपोल-कल्पनाएं थीं.बाद में मैं भी उन्हें ऐसी ही कहानियां और किस्से बना-बना कर सुनाने लगा. हिन्दी के चर्चित कवियों, लेखकों और आलोचकों को लेकर वे किस्से होते थे. जिनमें दस से पन्द्रह प्रतिशत यथार्थ का अंश रहता था, बाकी कल्पना की उड़ान. बस, इसी बात पर मेरी उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और हम दोस्त हो गए.

वे मुझ से पूरे चालीस साल बड़े थे. लेकिन उनका व्यवहार मुझ से हमेशा ऐसा रहा, मानों मैं ही उनसे बड़ा हूं. उन दिनों आदरणीय अशोक वाजपेयी मध्यप्रदेश सरकार में संस्कृति सचिव थे और यह समझिए कि भारत भर के कवियों, चित्रकारों, नाटककारों, नर्तकों, संगीतकारों सभी की मौज हो गई थी. जिन्हें भारत के सरकारी हल्कों में कोई टके को नहीं पूछता था, हिन्दी के उन लेखकों को, प्रतिष्ठित लेखकों को और कलाकारों को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा मान-सम्मान दिया जाने लगा. भोपाल में कलाओं के केन्द्र के रूप में अशोक वाजपेयी भारत-भवन का निर्माण करा रहे थे. तभी वाजपेयी जी ने एक आंदोलन-सा चलाया ‘कविता की वापसी’. मध्यप्रदेश का पूरा सरकारी संस्कृति विभाग कविता को वापिस लाने में जुट गया. वाजपेयी जी ने मध्यप्रदेश के हिन्दी के कवियों और हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों के कविता- संग्रहों की सौ-सौ प्रतियां खरीदने की घोषणा कर दी. बस, फिर क्या था. प्रकाशकों की बन आई. प्रकाशकों ने मध्यप्रदेश के कवियों को ढूंढ़ना शुरू किया और हर छोटे-बड़े कवि का कविता-संग्रह छप कर बाजार में आ गया. लेकिन ‘कविता की वापसी’ का फायदा यह हुआ कि हिन्दी के उन बड़े-बड़े कवियों के संग्रह भी छपे, जो मध्यप्रदेश सरकार द्वारा की जाने वाली उस खरीद में आ सकते थे. संभावना प्रकाशन, हापुड़ ने भी बहुत से कवियों को छापने की योजना बनाई. उन्हीं में बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन जी के कविता-संग्रह भी थे. मैं उन दिनों हिन्दी में एम.ए. कर रहा था और बेरोजगार था. संभावना प्रकाशन के मालिक और हिन्दी के बेहद अच्छे और प्रसिद्ध कहानीकार भाई अशोक अग्रवाल ने मेरी मदद करने के लिए पांच कविता-संग्रहों के प्रोडक्शन की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी. उनमें त्रिलोचन जी का कविता-संग्रह ‘ताप के ताये हुए दिन’ और बाबा नागार्जुन का कविता-संग्रह ‘खिचड़ी-विप्लव देखा हमने’ भी शामिल थे. त्रिलोचन जी का कविता संग्रह करीब तेईस साल बाद आ रहा था. इससे पहले 1957 में उनका ‘दिगंत’ छपा था. 1957 मेरा जन्म-वर्ष भी है. संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जिस दिन त्रिलोचन जी का कविता-संग्रह छप कर आया उस दिन मेरा जन्मदिन था. तो मैं बाइन्डर के यहां से ‘ताप के ताये हुए दिन’ की पहली प्रति लेकर त्रिलोचन जी के पास पहुंचा. किताब अभी गीली थी और उसकी बाइन्डिंग पूरी तरह से सूखी नहीं थी.

त्रिलोचन जी पुस्तक देखकर प्रसन्न हुए. उनके मुख पर मुस्कराहट छा गई. बड़ी देर तक वे अपने उस संग्रह को उलटते-पलटते रहे. फिर बोले — ‘पूरे तेईस साल बाद आई है किताब. मैंने कहा — ‘जी हां, मैं भी तेईस साल का हूं. आज ही मेरा जन्मदिन है. मेरे जन्मदिवस पर आपको मिला है यह उपहार.लेकिन आपका जन्मदिन भी तो आने वाला है जल्दी ही. यह समझिए कि आपके जन्मदिवस पर आपको यह उपहार मिला है. त्रिलोचन जी हंसे अपनी मोहक, लुभावनी हंसी. फिर बोले —‘चलिए, इस खुशी में आपको पान खिलाते हैं. एक पंथ दो काज हो जाएंगे. आपका जन्मदिन भी मना लेंगे और इस किताब के आगमन की खुशी भी मना लेंगे.’

हम लोग पान वाले के ठीये पर पहुंचे. पान खाया. उन्होंने कुछ देर पान वाले से गप्प लड़ाई. उसके भाई का, बच्चों का और घरैतन का हाल-चाल पूछा. उसके बाद हम लोगों ने वहीं पास के दूसरे ठीये पर जाकर चाय पी. चाय पीने के बाद हम दोनों उनके दफ्तर में वापिस लौट आए. शाम को मुझे किताबों का बंडल लेकर हापुड़ जाना था. मैं जरा जल्दी में था. मैंने त्रिलोचन जी से विदा मांगी. त्रिलोचन जी ने कहा — ‘एक मिनट रुकिए. उसके बाद उन्होंने ‘ताप के ताये हुए दिन’ की वह पहली प्रति उठाई और उस पर लिखा — ‘अनिल जनविजय को, जो कवि तो हैं ही, बतरस के अच्छे साथी भी हैं.’ त्रिलोचन जी का वह कविता-संग्रह इस समय भी जब मैं उन्हें स्मरण कर रहा हूं, मेरे सामने रखा हुआ है. उस संग्रह पर सबसे अंतिम पृष्ठ पर मेरी लिखावट में छह पंक्तियां लिखी हुई हैं. उन्हीं दिनों कभी लिखी थीं मैंने. वे काव्य-पंक्तियां इस प्रकार हैं :

हिन्दी के संपादक से मेरी बस यही लड़ाई
वो कहता है मुझ से, तुम कवि नहीं हो भाई
तुम्हारी कविता में कोई दम नहीं है
जनता की पीड़ा नहीं है, जन नहीं है
इसमें तो बिल्कुल भी अपनापन नहीं है
नागार्जुन तो है, पर त्रिलोचन नहीं है.

Anil Janvijay

शनिवार, 1 जून 2024

21 घण्टे की रोमांचक यात्रा की एक झलक : मनोज जैन

यात्रा संस्मरण
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                           मनोज जैन

21 घण्टे की रोमांचक यात्रा की एक झलक
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   निःसन्देह यात्राएँ हमारे अनुभव संसार में बहुत कुछ नया जोड़ती हैं। कभी-कभी यह नया जोड़ आपको 360 डिग्री के कोंण तक अचानक बदलने के लिए विवश कर देती है। ऐसा ही कुछ देखने और समझने, सुनने और गुनने का अवसर मिला जब हम लोग, अपने शहर के प्रख्यात लेप्रोस्कोपिक सर्जन और बीजेपी चिकित्सा प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक डॉ.अभिजीत देशमुख जी के साथ, एक छोटी सी यात्रा भोपाल से ग्वालियर जिसकी योजना, विशेषकर मेरी लिए तो  बिल्कुल ही औचक ही थी। यह यात्रा मेरे घर के ठीक दूसरे छोर यानी कटारा हिल्स से आरम्भ हो चुकी थी। मेरे पास जब कॉल आया तब मैं गहरी नींद में था। बतय
मैं मीठे स्वप्न में खोया हुआ था। काल पर दूसरी तरफ हमारे मित्र सुबोध श्रीवास्तव जी थे। मैंने सिर्फ इतना ही सुना,"गेट रेडी विदिन टेन मिनिटस, मैं पहुँच रहा हूँ, सर के साथ ग्वालियर चलना है!" ठीक 6 बजे डॉ.अभिजीत सर की गाड़ी ब्रेक के हल्के इशारे से ठहरती है, और हम लोग सर को जॉइन करते हैं। अभिजीत सर की गाड़ी 1080 ऑडी जिसे हम आपस में रथ कहते हैं। रथ के सारथी ने रथ को हवा में ऐसा दौड़ाया की कब ग्वालियर के पास उदय ढाबा आ गया, पता ही नहीं चला।
    अंदर और बाहर के टेम्प्रेचर का अहसास हमें अपनी गाड़ी और ढ़ाबे के AC हाल तक के पहुँच मार्ग मात्र 3 मिनिट के समय ने कराया। ग्वालियर-चम्बल इलाके की तपिश और उठते लू के थपेड़ों
ने हमारा भले ही जोरदार स्वागत किया हो, पर ढाबे में उप्लब्ध छाछ के स्पेशल गिलास (जो आकार में नॉर्मल गिलास से स तीनगुने होंगे रहे होंगे) ने हमें अन्दर तक शीतल कर दिया।
      डॉ.अभिजीत जी अपनी टीम का नेतृत्व करते हुये अपने गंतव्य तक ठीक निर्दिष्ट समय सीमा के पहले ही पहुँचे। बीजेपी चिकित्सा प्रकोष्ठ के संयोजक की टीम यहाँ पहुँचते पहुँचते एक बड़े काफ़िले में तब्दील हो गई।
          ग्वालियर, महल पहुँच कर, सर ने अपनी टीम के साथ माधवी राजे सिंधिया जी को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके यशश्वी पुत्र श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया जी से भेंट की। डॉ.देशमुख जी के शिड्यूड पहले से ही तय थे प्री प्लान शैडयूल्ड के अनुसार सर के साथ उनकी पूरी टीम के लंच का जिम्मा भोपाल शहर के चर्चित डेंटल सर्जन डॉ रोहित श्रीवास्तव जी, जो स्वयं बीजेपी चिकित्सा प्रकोष्ठ से जुड़े हैं; ने सम्हाल रखा था। ग्वालियर रेलवे स्टेशन के कैंटीन की यह ट्रीट सचमुच हम सभी के लिए बहुत यादगार और खास थी। 
लंच के बाद डॉ अभिजीत जी के स्वागत सम्मान के पलों के फोटो सदैव इस यात्रा से जुड़ी यादें ताज़ा करते रहेंगे।
       एक बात मैंने जो डॉ.अभिजीत जी के व्यक्तिव में नोटिस की वह यह है की डॉ देशमुख जी, यात्रा के हर पल का डूबकर आनन्द लेते हैं। इस दौरान उन्होंने सारे जरूरी कॉल अटेंड किये, फॉलोअप लिए
पेशेंट्स से या उनकें परिजनो के जो काल थे उन्हें बहुत धैर्य से जरूरी समझाइशें दी।
            यात्रा का दूसरा चरण ग्वालियर से गंतव्य स्थल भोपाल की ओर आरंभ हो चुका था और हम लोग डॉ. साहब के साथ दतिया स्थित पीताम्बरा पीठ के दर्शनार्थ  माँ बगुलामुखी के दर्शनार्थ मन्दिर परिसर में आ चुके थे। स्थानीय दो पुजारियों के निर्देशन में हम सभी ने माई के दर्शन और माई से जुड़े रोचक तथ्यों को बहुत मनोयोग से जाना। 
   भीषण गर्मी और दतिया के झुलसा देने वाले टेम्प्रेचर के बाबजूद मन्दिर परिसर में हमें अतीव शान्ति का अनुभव हुआ और यह हम सभी की अनुभूति का विषय लम्बे समय तक बना रहा। 
      यहाँ हमारी भेंट दतिया के वरिष्ठ कवि शैलेन्द्र बुधौलिया जी से हुई जो मेरे एक काल पर टेम्प्रेचर को धता दिखाते हुए
मन्दिर परिसर में आ पहुँचे। यद्धपि यह सौजन्य भेंट बहुत कम समय की थी पर कुछ लोगों का प्रभाव उनके स्वभाव के चलते ऐसा पड़ता है जिसे कभी भुलाया ही नही जा सकता। हम सभी वापसी के मूड में थे और वाया शिवपुरी-गुना हमें भोपाल आना था। पर क्या पता बुधौलिया जी के दिमाग में कौन सी ग़ज़ल या गीत की पंक्ति चल रही थी कि अचानक उन्होंने बिना माँगे एक सलाह हवा में उछाल दी।
    बुधौलिया जी बोले आप लोग दिनारा वाले पुल से होकर वाया पिछोर होते हुये भोपाल जाइए। एकदम चकाचक रोड और समय भी बचेगा सो अलग। 
फिर क्या था डॉ.अभिजीत देशमुख जी का रथ उसी रोड पर मुड़ गया।
      मुड़ तो गया पर यह दिशा गलत थी फिर भी हम सबने इस यात्रा का पूरा आनन्द लिया। मैं अपने गाँव बामौर कला से गुजरा यहीं पर मेरे अपने बाल सखा हाईकोर्ट के एडवोकेट संजीव पांडेय के होटल "जैनपथ" पर छोटा सा स्टे और लाइट खिचड़ी लेकर हम वाया चन्देरी होते हुए डॉक्टर साहब के रथ के सारथी भाई दलभान यादव उर्फ छोटू के गाँव जहाँ छोटू भाई ने डॉक्टर साहब के खासे आतिथ्य के साथ स्वागत सम्मान का खासा इंतज़ाम अपने मित्रों के सानिध्य से करा रखा था। सचमुच यह आत्मीयता मोहने वाली थी। यह सब डॉ.अभिजीत जी के दिल जीत लेने वाले व्यवहार का सुफल था जिसका सुख हम लोग भी संग साथ भोग रहे थे।
       यात्रा के दौरान मैने अपनी जिज्ञासा के बशात डॉ देशमुख जी से एक प्रश्न पूछा। मेरा प्रश्न था, डॉक्टर साहब! सब लोग आपकी सफलता को देखते हैं पर मैं इस सफलता के पीछे के संघर्ष के बारे में जानना चाहूँगा। इस प्रश्न पर डॉक्टर अभिजीत देशमुख जी ने ठहरकर और सविस्तार बात की। उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों को फ़्लैश बैक में जाकर याद किया।
डॉक्टर साहब को दो संस्कृतियों में पलने बढ़ने फलने और फूलने का अवसर मिला है। वे मध्यप्रदेश के मालवा और महाराष्ट्र के कल्चर से जुड़े हैं। डॉक्टर साहब मध्य प्रदेश के प्रमुख चारों शहरों में पढ़े हैं। उन्होने अपने नाना जी, जो अपने समय के चर्चित सांसद रहे हैं, के जीवन में आये उतार चढ़ाव से बहुत कुछ सीखा है।
कठोर परिश्रम और ईमानदारी का संस्कार नाना जी ग्रहण करते हैं तो वही शख़्त अनुसाशन की सीख का श्रेय अपने पिता जी को देते हैं।  
     डॉ.अभिजीत देशमुख जी अपने क्षेत्र में एक सफल व्यक्तित्व का नाम है। फिर चाहे क्षेत्र चिकित्सा का हो या राजनीति का पूरे मनोयोग से वे अपने समय का सदुपयोग करते हैं। जनसम्पर्क उनकी ख़ूबी है। उन्हें लोगों से मिलना जुलना  अच्छा लगता है। ट्विटर का नया रूप एक्स हैंडलर, फेसबुक , व्हाट्सएप्प या फिर इंस्टा सोशल मीडिया के लगभग सभी प्लेटफार्म पर अभिजीत सर की उपस्थिति आपको खुल कर दिखाई देती है। इस यात्रा में मुझे एक बात का उत्तर बिना पूछे ही मिल गया जब डॉक्टर साहब ने चलती हुई गाड़ी से रेयर क्लिक कैप्चर करते दिखाई दिए।
        एक दृश्य जो उन्होंने कैप्चर किया वह सचमुच रेयर था जिस पर मेरा ध्यान गया। तीन पहिया वाले  खुले ऑटो में तरबूजों के ऊपर 47 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर में गहरी नींद में सोते दो बच्चों का एक बेहतरीन क्लिक !
         एक सफल व्यक्ति के साथ की गई 21 घण्टे की छोटी सी यात्रा हमारे अनुभव संसार में बहुत कुछ जोड़ सकती है। रात को 3 बजे हम लोग भोपाल सकुशल पहुँचे। इस औचक यात्रा का श्रेय मित्र सुबोध श्रीवास्तव जी को ही जायेगा जिन्होंने मुझे एक सफल व्यक्तित्व को निकट से जानने का सुयोग बनाया।





 

गुरुवार, 23 मई 2024

कहाँ तुम चले गए : दादा माहेश्वर तिवारी जी को याद करते हुए



कहाँ तुम चले गए : दादा माहेश्वर तिवारी जी को याद करते हुये 
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              मनोज जैन

                    एक

                कुछ सत्य ऐसे होते हैं जो भले ही अकाट्य क्यों न हों पर उन्हें अपना भावुक मन मानने को जरा भी तैयार नहीं होता। यथार्थ और वस्तु स्थिति से अवगत होते हुए भी मनः स्थिति सत्य को जानते समझते हुए भी बार-बार झुठलाना चाहती है। ऐसा ही एक सत्य हमारे सामने दिनांक 16, अप्रैल 2024 को घटित हुआ जिसकी पहली सूचना मुझे देश के यशश्वी कवि और दादा के मन के अत्यंत निकट रहने वाले यश मालवीय जी के माध्यम मोबाइल फोन पर मिली " मनोज भाई एक बुरी खबर है, शायद आपको मालूम नहीं माहेश्वर जी अब हमारे बीच नहीं रहे!
     यह वही अकाट्य सत्य था जिसे जिसे मन मानने को कतई तैयार नहीं था। मैंने सबसे पहले दादा के मानस पुत्र अग्रज योगेन्द्र वर्मा व्योम जी की वाल स्क्रॉल की उनकी स्क्रीन पर यह दुखद समाचार देख कर मन बैचेन और अशांत हो गया।चित्त में उनके एक नवगीत की पंक्ति रह रह कर अंतरमन  को मथने लगी। 
       "एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है। बेजुवान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में/ आता है/ ऐसे अर्थ पिरोना/ गीत बन गया-सा/ लगता है/ घर का कोना-कोना/ एक तुम्हारा होना/ सपनों को स्वर देता है/ आरोहों-अवरोहों से/ समझाने लगती हैं/ तुमसे जुड़ कर चीज़ें भी/बतियाने लगती हैं/ एक तुम्हारा होना/ अपनापन भर देता है ।
              अकेला मुरादाबाद ही क्या पूरा देश ही दादा का घर था। इस नवगीत के मूल में दादा के ना होने की कसक हर उस मन को सालती है जो उनसे किसी न किसी बहाने एक बार मिला भर हो। दादा माहेश्वर तिवारी जी अब हमारे बीच नही हैं। यों तो मैं दादा के छोटे-छोटे मीटर के छोटे अधिकतम दो या तीन बंद के नवगीतों को उनसे मिलने के, एक दशक पहले से परिचित रहा हूँ, आज भी बहुत से उनके नवगीत अक्षरशः कंठस्थ हैं। दादा माहेश्वर तिवारी से मेरी पहली भेंट के बाद, यह दूसरी भेंट थी जो दिनाँक 21, फरवरी 2016 को, आरोही कला संस्थान, मुरादाबाद के एक आयोजन में हुई थी। अग्रज योगेन्द्र वर्मा व्योम जी के आमंत्रण पर मुझे आरोही कला संस्थान के भव्य कार्यक्रम में दादा के साथ मंच पर बैठने, पाठ करने, और उन्हें जी भरकर सुनने के साथ-साथ यहाँ के वरिष्ठ साहित्यकारों से मिलने का सुअवसर मिला था। यह यात्रा कई मायनों में यादगार साबित हुई। कहते हैं की यात्रा हमारे जीवन में बहुत से अनुभवों को जोडती है। बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मुरादाबाद की इस यात्रा से जुड़ा दादा के सन्दर्भ में कत्थई कलर का वह बहुत प्यारा श्वेटर याद आ रहा है, जिसमें दादा के मन की स्नेहासिक्त तरलता और संवेदनशीलता की विराटता के दर्शन होते हैं। सचमुच यह प्रसङ्ग हम सब के लिए भावुक करने के लिए काफी है साथ ही अनुकरणीय उदाहरण भी है।
              अग्रज आदरणीय योगेन्द्र वर्मा व्योम जी ने कार्यक्रम के कुछ दिन बाद मेरे पास कुछ फोटोग्राफ्स भेजे जिनमें से एक फोटो ने इस लेख को लिखते समय मुझे रुला दिया। दरअसल  कत्थई कलर के श्वेटर से जुड़ा प्रसङ्ग है जो मैंने स्वयं को फोटोग्राफ में पहने देखा जो, दादा माहेश्वर तिवारी जी ने मुझे जिद करके पहनाया था। उस दिन अचानक मौसम बदल गया। मुझे कँपकपाते देख यह बात मन ही मन ताड़ ली दादा उठे और सीधे ऊपर वाले हॉल में ले गये, जहाँ दादा ने अपनी एक अलमारी में बहुत सारे श्वेटर सम्हालकर रखे थे। दादा ने अलमारी खोली और मेरे सामने श्वेटरों का ढेर सारा अम्बार लगाते हुये कहा, "पहले अपना बचाव फिर कविता! चलो, इनमें से कोई सा भी श्वेटर जल्दी से पहनो लो मौसम ठंडा है और तुम्हें कार्यक्रम के ठीक बाद निकलना भी है।" लौटने की जल्दी इसलिए थी की ठीक अगले दिन मुझे अपने एक रिलेटिव के यहाँ समारोह में पहुचना था और इस दृष्टि से मेरे पास समय बहुत कम था।
           दादा की तरल संवेदना से जुड़ा यह संस्मरण, मुझे प्रसंगवश अग्रज योगेंद्र वर्मा व्योम जी ने आज फिर, सात साल बाद याद दिला दिया। आरोही कला संस्थान मुरादाबाद के इस आयोजन का, आमन्त्रण आदरणीय योगेन्द्र वर्मा व्योम जी के माध्यम से ही मेरे पास आया था। मुरादाबाद के अनेक चर्चित साहित्यकारों सर्वश्री कृष्णकांत नाज़ साहब , आनन्द गौरव जी, जिया ज़मीर साहब सहित अनेक गणमान्य जिन्हें पत्र पत्रिकाओं सहित मुरादाबाद की साहित्यिक गतिविधियों में पढ़ने का सौभाग्य समय समय पर मिलता रहा उन सभी विभूतियों से मिलने का सुयोग यहीं बना।
                 कार्यक्रम के उपरान्त भोपाल वापसी के लिए, देर रात बस तक ड्राप करने हमारे एक और अनन्य आत्मीय साहित्यिक मित्र डॉ.अवनीश सिंह चौहान जी से कार्यक्रम स्थल से बसअड्डे तक की वार्ता आज भी जस की तस स्मृतियों में बनी हुई है। एक तरलता ही तो है, जो हमें परस्पर जोड़े रहती है। यह तरलता हमारे मध्य आज भी जस की तस है। अब दादा सशरीर हमारे मध्य भले ही न हों पर उनकी अनन्त स्मृतियां जस की तस हैं।
          माहेश्वर तिवारी जी का फोन अक्सर आता और वे सबकी खबर लेते हाल-चाल पूछते। मीठे स्वर में उनकी वार्ता के नवगीत का अक्सर पहला मुखड़ा यही होता था।  "बहु बच्चे कैसे हैं?"
          "और सब ठीक तो है न" 
           और फिर अगले अंतरों में 
भोपाल साहित्य जगत के क्या हाल चाल हैं? 
डॉ.रामवल्लभ आचार्य जी कैसे हैं कभी कभार तांतेड़ जी का भी पूछते ? 
       बगैरह बगैरह, वार्ता क्या पूरा गीत का माधुर्य होता था उनकी बातचीत में।
            सिर्फ मेरे ही नहीं, पूरे परिवार के, और पूरा परिवार ही क्या पूरे भोपाल की खैर खबर लेते दादा की वार्ता 'थीक है' वाक्य की चार-पाँच बार की पुनरावृति पर समाप्त होती।
   एक बड़ा रचनाकार वही होता है जो निष्प्रह भाव से परवर्ती, पूर्ववर्ती और अपने समकालीनों
यानी तीन पीढ़ियों के त्रिकोण में स्वाभाविक सम्यक संतुलन साधने की कला में निष्णात हो। दादा के व्यक्तित्व में यह बात थी। नवगीत के मामले में वे ट्रेन्ड सैटेर नवगीतकार थे,जो लिखा पुख्ता लिखा, और ऐसा लिखा कि लिखे का विस्तार सैकड़ों रचनाकारों की पंक्तियों मिल जाएगा।
              यह बात प्रसंगवश नहीं कह रहा हूँ बल्कि इसे पुख्ता प्रमाण के तौर पर भी कहना चाह रहा हूँ। फेसबुक पर आज के चर्चित वागर्थ समूह और वागर्थ ब्लॉग के आरम्भिक रूप चित्र में, मैंने (दादा के साथ कॉफी पीते हुए) तस्वीर जोड़ी थी। यह विशेष क्लिप हमें योगेन्द्र वर्मा व्योम जी के मोबाइल से मिली थी। वागर्थ के इस रूप चित्र को मैं दादा का आशीर्वाद ही मानता हूँ।आज समूह वागर्थ के स्तर की धमक पूरे देश में है यहाँ तक की देश से बाहर अनेक देशों में वागर्थ समूह पढ़ा जाता है। दादा वागर्थ के अनन्य प्रसंशकों में से एक थे। हमनें दादा के नवगीतों के साथ साथ समकालीन दोहों की कुछ पोस्ट समूह में जोड़ी जिनको मुक्तकण्ठ से सराहा गया। सोशल मीडिया पर दादा की उपस्थिति उनके स्वस्थ्य रहने तक बनी रही। वे निरन्तर अपनी वाल से लेकर विभिन्न समूहों में आवाजाही करते और अच्छा लगने पर टिप्पणियाँ भी करते थे उनकी सघन टिप्पणियाँ संग्रहनीय है और अब तो धरोहर भी वागर्थ उनका प्रिय समूह था जिसकी प्रसंशा वे मुक्तकण्ठ से किया करते थे। मुझे याद है जब उन्होंने वागर्थ समूह में उन्हीं के शहर मुरादाबाद की युवा कवयित्री मीनाक्षी ठाकुर के नवगीत पढ़े और उन गीतों की सराहना की।
निःसन्देह इस सराहना ने मीनाक्षी ठाकुर को और बेहरत रचने के लिए प्रेषित किया है।
      ऐसा ही एक प्रसङ्ग मुझे कुछ वर्षों पहले का आता है जब जागरण में माहेश्वर जी का एक साक्षात्कार पढा था जिसमे उन्होंने नवगीत के क्षेत्र में उभरने वाली नई सम्भावनाओं में चार छह नाम लिए थे जो आज नवगीत के क्षेत्र में अपना श्रेष्ठ प्रदान कर रहे हैं। इन नामों में हमारे शहर के युवा नवगीतकार चित्रांश बाघमारे भी एक हैं जिन्हें दादा का आशीर्वाद मिला सिर्फ चित्रांश ही अनेक नवोदितों और स्थापितो का नाम माहेश्वर जी लिया करते थे प्रकारान्तर से कहें तो उनके के सृजन को सम्मान दिया करते थे। इसीलिए दादा बड़े थे।

                          दो
       संचारक्रांति के चलते सोशल मीडिया पर साहित्यिक उपस्थित पिछले दो ढाई दशकों में बहुत ज्यादा बड़ी है। हम में से हर एक के पास एंड्रॉइड फोन और टच स्क्रीन पर सॉफ्ट साहित्य का अनन्त रंगीन संसार उपलब्ध है। मैंने भी लोगों की साहित्यिक  अभिरुचि और सक्रिय उपस्थित पर मंथन किया और दो समूहों की स्थापना ठीक आज से दस से पहले की ।
            पहले साहित्यकारों को व्हाट्सएप्प समूह से जोड़ कर उन्हें सद्साहित्य परोसा फिर उन दोनों समूहों को पाठकों की अभिरुचि और बढ़ती सँख्या को देखकर उन्हें 'वागर्थ' और 'अंतरा' समूह से जोड़ दिया आज दोनों समूहों में पाठक सदस्यों की संख्या पाँच अंकों में है और जोड़ी जाने वाली पोस्ट को देखने पढ़ने वालों की संख्या देश विदेश में लाखों से ऊपर है। अकेले ब्लॉग वागर्थ में ही 50,000 पृष्ठों की सामग्री इन दोनों समूहों से उठाकर हमनें जोड़ी है। इन दोनों समूहों हमें और ब्लॉग वागर्थ को दादा माहेश्वर तिवारी जी का प्रत्यक्ष और परोक्ष आशीर्वाद था।
उनकी सैकड़ों टिप्पणियाँ इस बात का पुख़्ता प्रमाण हैं। द्रष्टव्य है दादा माहेश्वर तिवारी जी द्वारा समूह वागर्थ जोड़ी गई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी
       प्रिय मनोज जैन, वागर्थ में श्रद्धेय अग्रज स्मृतिशेष उमाकांत मालवीय के गीतों को प्रस्तुत करके एक और उल्लेखनीय कार्य किया है। डॉक्टर शंभूनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह ,वीरेंद्र मिश्र और उमाकांत मालवीय जैसे लोगों को छोड़कर नवगीत की कोई पीठिका ही नहीं होती। ये लोग नवगीत की जययात्रा के रथ की वे धुरी और पहिए हैं जो एक तरफ उसकी अनवरत गति के आधार और विजययात्रा के नायक भी रहे अपनी अपनी रचनाधर्मिता के साथ ।
     उमाकांत मालवीय जी की जो अपार स्नेहयुक्त कुटुम्बवत आत्मीयता मिली उसने हम जैसे कई लोगों को अपनी रचनाधर्मिता के लिए नई ऊर्जा मिली । उनके व्यक्तित्व की यह विशिष्टता रही की किसी नये रचनाकार को सुनते और कुछ अच्छा लगता तो वह उनके स्मृतिकोष में जमा हो जाता और मिलने पर उसके अंश हमें सुनाते ।
       मेहंदी और महावार के गीतों से अलग थी उनके दूसरे संग्रह सुबह रक्त पलाश की भाषा और गीतों में शामिल सरोकार ।मेहंदी और महावार में एक अलग तरह की सौंदर्य दृष्टि और भाषा है तथा सुबह रक्त पलाश में अलग ।इसी तरह मेहंदी और महावार में लोक संस्कृति के प्रति लगाव है तो मेहंदी और महावार में एक वयस्क सामाजिक,राजनीतिक चिंतक का रूप सामने आता है । एक बात ध्यान में रखने की है की मालवीय जी शासकीय सेवा में थे और देश में प्रजातंत्र एक आंधी में घिरा था वे प्रजातंत्र पर चोट करने वालों को वैचारिक प्रतिरोध से भरे गीत लिख रहे थे एक जोखिम उतार हुए और उसके लिए उनके वार्षिक वेतन में होने वाली वृद्धि रोक दी गई लेकिन वे रुके नहीं और झूले एमबीएचआई नहीं क्योंकि वे तनी रीढ़ के व्यक्ति थे इसीलिए मैंने उनके लिए लिखा था हिंदी नवगीत का पौरूषेय बोध। वागर्थ में प्रस्तुत उनके गीतों में यह पढ़ा जा सकता है। यह उमाकांत मालवीय ही थे जो खबरों जैसी घटनाओं को गीतकविता बना देते थे 
        आ गया प्यारा दशहरा
        भेंट लाया हूं तुम्हारे लिए बेटे,
        पुलिस की मजबूत बूटों से
        अभी कुचला गया 
        ताजा ककहरा
       यामेज साफ करने को
       रह गईं ध्वजाएं
                        माहेश्वर तिवारी
(वागर्थ की वाल से साभार 
माहेश्वर तिवारी जी की टिप्पणी)
     दादा की टिप्पणियाँ बहुत कुछ कहती हैं और इसमें कहने से ज्यादा अनकहा रह जाने की कसक भी स्पष्ट देखी जा सकती है। इसी क्रम में हम दादा के नवगीत पाठकों के लिए जोड़ते गए और ब्लॉग में संग्रहित भी करते गए।
       1जून 2020 को हमनें दादा के गीत जोड़े। इन गीतों पर उनके पाठकों ने सैकड़ों टिप्पणियाँ जोड़ी और उनको पोस्ट को 88 लोगों ने अपनी अपनी वाल पर शेयर किया। यहाँ पाठकों के लिए हम उनकी चयनित पस्टों को पाठकों की चयनित
    टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं
 1
  माहेश्वर तिवारी जी के नवगीतों के बहाने
_____________________________
       समूह वागर्थ प्रस्तुत करता है अपने समय के सबसे ज्यादा चर्चित नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत 
            प्रस्तुत नवगीतों में कवि की पंक्ति-पंक्ति में कविता है जिसे ढूँढना नहीं पड़ता। जबकि हमारे यहाँ ऐसे-ऐसे धुरन्धर विराजमान हैं, जिनके कहने को तो छह दर्जन संग्रह हैं, लेकिन उनके यहाँ ढूँढने से भी उनकी पूरी नवगीत यात्रा में बमुश्क़िल से 15 पँक्तियाँ भी नहीं है। ऐसे फर्जी गुरुओं के सक्रिय चेलों नें उन्हें तमाम साहित्य के  विभूषणों से घोषित कर रखा है।
   बहरहाल ऐसे गुरु और शिष्य दोनों को माहेश्वर तिवारी जी को पढ़ना चाहिए। प्रस्तुत है अपने समय के सबसे ज्यादा चर्चित और चमकदार नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत 

प्रस्तुति
वागर्थ
सुनो सभासद
__________

सुनो सभासद
हम केवल
विलाप सुनते हैं
तुम कैसे सुनते हो अनहद

पहरा वैसे
बहुत कड़ा है
देश किन्तु अवसन्न पड़ा है

खत्म नहीं
हो पाई अब तक
मन्दिर से मुर्दों की आमद

आवाजों से
बचती जाए
कानों में है रुई लगाए

दिन-पर-दिन है
बहरी होती जाती
यह बड़ बोली संसद

बौने शब्दों के
आश्वासन
और दुःखी कर जाते हैं मन

उतना छोटा
काम कर रहा
जिसका है जितना ऊँचा कद

दो

घर जैसे

खुद से खुद की
बतियाहट
हम, लगता भूल गए ।

डूब गए हैं
हम सब इतने
दृश्य कथाओं में
स्वर कोई भी
बचा नहीं है
शेष, हवाओं में

भीतर के जल की
आहट
हम, लगता भूल गए ।

रिश्तों वाली
पारदर्शिता लगे
कबंधों-सी
शामें लगती हैं
थकान से टूटे
कंधों-सी

संवादों की
गरमाहट
हम, लगता भूल गए।

माहेश्वर तिवारी 
दिन पर दिन है
बहरी होती जाती
यह बड़बोली संसद।।।
और
संवादों की 
गरमाहट हम 
लगता भूल गए।।
                         दोनों ही महत्वपूर्ण बहुत उल्लेखनीय और विचारणीय नवगीतों की यह अभिनव प्रस्तुति पटल के वातावरण को और भी ज्यादा सार्थक बनाती है। बहुचर्चित बहुप्रशंसित गीतकार आदरणीय श्री माहेश्वर तिवारी जी सहज सरल शब्दों की जादूगरी से लाजवाब बहुत विचारणीय और मर्मस्पर्शी गीत रचना करने में सिद्ध हस्त हैं। उनके महत्वपूर्ण नवगीतों में सहज सरल शब्दों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है फिर भी उनकी प्रभावशीलता प्रशंसनीय और विचारणीय हैं। इन गीतों को प्रस्तुत करने के लिए मैं वागर्थ के  प्रमुख संस्थापक आदरणीय मनोज जैन जी का आभार और धन्यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा।
     मुकेश तिरपुड़े
_______________

           वैसे नहीं, ऐसे गीतों से नवगीत समृद्ध हुआ है । वागर्थ का आभार अग्रज माहेश्वर जी के इन गीतों की प्रस्तुति के लिए।
        विनोद श्रीवास्तव कानपुर


दो


6 दिसम्बर 2020
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कल तलक सुनते रहे जो आज बहरे हैं यशस्वी कवि दादा माहेश्वर तिवारी जी के दो गीत

     यश के महत्व को प्रतिपादित करती हुई एक सूक्ति पर कल मेरा ध्यान गया उस समय गया जब मैं भोपाल के भेल औधोगिक क्षेत्र से अपनी गाड़ी की सर्विसिंग कराने के उपरान्त घर लौट रहा था। सूक्ति का सार कुछ इस तरह था मनुष्य को यश की प्राप्ति बड़े पुण्यों से होती है, और पुण्य सद्कर्म और साधना का ही परिणिति है। दादा माहेश्वर तिवारी जी नवगीत के जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं। उनकी विचार धारा जन तक सम्प्रेषित होती है। विचारधारा के स्तर पर वे असमानता को जड़ से मिटा देने के पक्ष में हैं उनकी कविता जनधर्मी है यहाँ प्रस्तुत दादा के दोनों नवगीतों में प्रतिरोध के मद्धम नही अपितु तीखे स्वर हैं।
        प्राकृतिक प्रतीकों और बिम्बों से जनपक्षधरता उकेरना दादा माहेश्वर जी के बूते की ही बात हो सकती है। बेजोड़ प्रतीकों और बिम्बों के नायाब रचनाकार को प्रणाम नमन अपनी रचनाधर्मिता को जनपक्ष में समर्पित करके दादा अनायास ही अक्षय पुण्य के कोष से सदैव भरे रहते हैं और यही कोष उनके यश का एकमात्र राज है आइये पढ़ते हैं यशभारती सम्मान से विभूषित दादा माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत
प्रस्तुति
मनोज जैन

हँसो भाई पेड़ 
__________
कहती है दूब
हँसो भाई पेड़ 
बाहर जितना देखते हो 
धरती में 
धसो भाई पेड़ ।

जड़ें बहुत गहरे ले जाओ 
यहाँ वहाँ उनको फैलाओ
चील की तरह बाहों पंजों में 
आंधी को 
कसो भाई पेड़

चील किसे देती है सोचो 
आसमान गुर्राए तो नोचो 
गीत की तरह हरियाली पहनो 
जन-जन में 
बसो भाई पेड़।
2
चीख बनते जा रहे
हम सब खदानों की 
हो गए हैं शोकधुन 
बजते पियानो की

कल तलक सुनते रहे जो 
आज बहरे हैं 
आँसुओं के बोल जिनके-
पास ठहरे हैं
जिंदगी अपनी हुई है 
मैल कानों की 

देखते जब शब्द के 
बारीक  छिलके खोल 
देश लगता रह गया 
बनकर महज भूगोल 

एक साजिश है खुली
ऊंचे मकानों की।
           माहेश्वर तिवारी

आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी के नवगीतों में तरलता, सरलता और उत्कृष्टता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उनके नवगीत सीधे दिल में उतर जाने का हुनर रखते हैं। उन्हें सादर प्रणाम।
मृदुल शर्मा,  लखनऊ
________________

श्रद्धेय दादा माहेश्वर तिवारी जी वर्तमान में नवगीत के हिमालय हैं.दादा को पढ़ना और सुनना हमेशा मन को सुख देता है.दादा को सादर प्रणाम.लेख और गीत साझा करने हेतु आपका हार्दिक आभार.
रघुवीर शर्मा, खंडवा
_______________

दोनों गीत मर्मस्पर्शी भीतर तक आन्दोलित करते हैं दादा को चरणवन्दन। मनोज जी आपकी इस 
काव्य प्रस्तुति परम्परा को प्रणाम।
    रमेश गौतम,  बरेली उत्तरप्रदेश
___________________________
                    नवगीत विधा में देश के  सबसे सशक्त और वरिष्ठ हस्ताक्षर आ.माहेश्वर तिवारी जी के दोनों ही गीत आज के समय की त्रासद  सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिम्ब भी हैं और उनके खिलाफ सशक्त स्वर भी। 
    तिवारी जी के गीत अपने शिल्प, कथ्य भाषा और छंद से अपनी अलग पहचान रखते हैं। उन्हें पढ़ने और विशेषकर दादा तिवारी जी से साक्षात सुनने का आनन्द और अनुभूति ही कुछ और है। आदरणीय तिवारी जी की लेखनी को प्रणाम। 
          और मनोज जी को साधुवाद इतनी अच्छी पोस्ट के लिए

        माहेश्वर जी के नवगीत पढ़ने के बाद मुझको घरबाहर का परिसर  सामान्य ही नहीं, कोमल और मोहक भी दिखने लगा। माहेश्वर नवगीत  लिखकर मनःस्थिति और परिस्थिति भी बनाते हैं इनके गीत मनुष्यता के पर्याय हैं। ऐसा गीत लिखना सामान्य बात नहीं है। इन गीतों से नवगीत का मान बढ़ा है ।
शांति सुमन

तीन

        माहेश्वर तिवारी जी की मूल पहचान भले ही नवगीतकार के रूप में क्यों न रही हो पर उन्होंने
 नवगीत से इतर  ग़ज़ल भी कही है और समय की हाथ पर नब्ज़ रखते हुए समकालीन दोहे भी लिखे हैं। कुछ समय पहले मैंने अपनी वाल पर समकालीन दोहों की एक सीरीज़ चला रखी थी जिसमें एक दोहाकार के कम से दस दोहे और अधिकतम बीस दोहे पाठकों के समक्ष रखते थे
यह सीरीज़ चल पड़ी और दस कड़ियों से लेकर पन्द्रह कड़ियों तक हमें प्रकाशित करने के लिए अच्छी सामग्री मिली बाद में हमारे पास दोहे के नाम पर बहुत रद्दी सामग्री मिलने लगी और लोग सम्बन्धो के आधार पर हमारी श्रंखला में येन केन प्रकारणेन शामिल होने की जुगत में रहते हमनें माहेश्वर तिवारी जी के मानक दोहे प्रस्तुत कर सीरीज को अघोषित विराम दे दिया।

  7, जून 2021 को समूह में कड़ी के प्रकाशित होते ही समूह वागर्थ धड़ाधड़ शेयर किया जाने लगा। देखें दोहों का स्तर और दोहों पर टिप्पणियाँ

           माहेश्वर तिवारी

समकालीन दोहा चौदहवीं कड़ी
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दादा माहेश्वर तिवारी 
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समकालीन दोहा में आज दूसरे पड़ाव की चौथी कड़ी में प्रस्तुत हैं प्रख्यात नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी के चुनिन्दा दोहे
             बहुत कम लोग ऐसे होते हैं  जिनकी लेखनी का परस पाकर सृजन सोने में बदल जाता है। दादा माहेश्वर तिवारी जी उनमें से एक हैं, जिनका सारा सृजन चमकदार है। चाहे नवगीत हों या दोहे उनके यहाँ क़्वान्टिटी की अपेक्षा क़्वालिटी वर्क ज्यादा है। प्रस्तुत समकालीन दोहे भी आज के लिखे नहीं हैं परन्तु आज जो लिखा जा रहा है उन दोहाकारों को, अपने सृजन को मापने का पैमाना जरूर हैं। अस्सी के दशक में दोहा कितनी ऊँचाईयों पर था इसका अंदाजा कम से कम इन दोहों को पढ़कर लगाया जा सकता है। दादा माहेश्वर तिवारी जी अपने आपको मूलतः गीत कवि ही मानते हैं और इस बात को लेकर स्वधर्मे निधनं श्रेयः की हद तक प्रतिबद्धता उनके यहाँ देखी जा सकती है।
हाँ, यदि उन्हें आस्वाद परिवर्तन के लिए गीत के अलावा कुछ लिखना भी हो तो वे स्तर से कम्प्रोमाइज नहीं करते। हम सब उनकी इस प्रस्तुति से यही प्रेरणा ले सकते हैं।
        दोहा छन्द को लेकर यश मालवीय जी के कथन को दोहराना समीचीन होगा वे कहते हैं कि " दो पंक्तियों में बड़ी बात कहना छोटे फ्रेम में आसमान मढ़ने जैसा है "। आइए पढ़ते हैं दो पंक्तियों के कैनवास में सुरमई आसमान जड़े दोहे।

   प्रस्तुति
 मनोज जैन
   वागर्थ

  उधर साजिशों के नये, बुने जा रहे जाल
   ____________________________

वस्त्र पहनकर गेरुआ, साधू सन्त फकीर ।
नये मुकदमों की पढ़ें, रोज नयी तहरीर।।

परिवर्तन के नाम पर, बदली क्या सरकार ।
रफ्ता रफ्ता हो रहा ,पूरा देश बिहार ।।

चिन्तित हैं शहनाइयाँ, गायब हुई मिठास ।
बिस्मिल्ला के होंठ की,पहले जैसी प्यास ।।

रिश्तों  के बदले हुए, दिखते सभी उसूल ।
भैया कड़वे नीम- से,दादी हुई बबूल ।।

आँखों में दाना लिये, पंखों में आकाश ।
जाल उठाए उड़ गया, चिड़ियों का विश्वास ।।

दाने -दाने के लिए,चिड़िया है बेहाल ।
उधर साजिशों के नये ,बुने जा रहे जाल।।

मूल प्रश्न से हट गया,जब से सबका ध्यान ।
सूरज बाँटे रेवड़ी,चाँद चबाये पान।।

क्या सपने क्या लोरियाँ,खाली-खाली पेज ।
जिनकी नींदों को मिली,फुटपाथों की सेज ।।

लाकर पटका समय ने, कैसे औघट घाट।
अनुभव तो गहरे हुए, कविता हुई सपाट।।

शामें लौटीं शहर की,अंग लपेटे धूल।
सिरहाने रख सो गयीं, कुछ मुरझाये फूल।।

कैसे कैसे लोग हैं,कैसे कैसे काम ।
जाकर कुंज-करील में, ढूँढ रहे हैं आम।।

खुश है रचकर सीकरी,नया -नया इतिहास।
हैं उसके दरबार में,हाज़िर नाभादास।।

भोग रहे इतिहास का,हैं अब तक दुर्योग।
तक्षशिला को जा रहे,नालन्दा के लोग।।

पुल की बाँहों में नदी,मछली-सी बेचैन।
अनहोनी के साथ सब ,दे बैठी सुख-चैन।।

बरगद से लिपटी पड़ी, है बादल की छाँह।
घेरे बूढ़े बाप को, ज्यों बेटे की बाँह।।

तन की प्रत्यंचा खिंची, चले नज़र के तीर।
बच पाया केवल वही,मन से रहा फकीर।।

लाक्षागृह सबके अलग,क्या अर्जुन क्या कर्ण।
आग नहीं पहचानती, पिछड़ा दलित सवर्ण।।

सारंगी हर साँस में, मन में झाँझ मृदंग।
फागुन आते ही हुए, साज हमारे अंग।।

एक आँख तकती रही, दूजी रही उदास।
इन दोनों में ही बँटा, जीवन का इतिहास।।

खुली पीठ से बेंत का ,ऐसा हुआ लगाव।
लिये सुमरनी हाथ हम, गिनते कल के घाव।।


     सचमुच यह दोहे ख़ुशबू के शिलालेख हैं, मेरे समेत दोहों के उत्पादन में लगे तमाम दोहाकारों  को इन दोहों से सीखना चाहिए और दोहा नियोजन करना चाहिए ताकि इस विधा में लोगों की आस्था बनी रहे।कम लिखें और अच्छा लिखें का संकल्प लेना चाहिए,इन काल का अतिक्रमण करते दोहों से। आम आदमी के माथे की सलवटों-शिकनों से सीधा सरोकार रखते यह दोहे हमारी उजली परम्परा के संवाहक हैं।
यश मालवीय
               आदरणीय माहेश्वरी तिवारी जी वर्तमान में नवगीत के बड़े स्तंभ हैं। उनके नवगीतों में जो एक अलग सी महक है वही इन दोहों में भी रची-बसी है। यही तिवारी जी को आदर्श रूप में खड़ा करती है।जिन रचनाकारों की अपने भीतर की महक रचनाओं में महकने लगती है, वही बड़े रचनाकार कहाते हैं। क्या दोहे हैं? इनमें चमत्करण बैठा है। इन पर तो बस सोचते रहो, जब-तक सोच सको।
"मूल प्रश्न से हट गया,जब से सबका ध्यान।
सूरज बांटे रेवड़ी, चांद चबाये पान।।"
          मैं तो इसी में जमा पड़ा हूं।
आदरणीय भाई साहब आपको और आपकी मारक लेखनी को प्रणाम।
              मक्खन मुरादाबादी

                जीवन में साधन चतुष्टय- धर्म अर्थ काम मोक्ष की सीढ़ियां चढ़ने पर जब धर्म के सार्थक निर्वहन से अर्थोपार्जन उपरान्त काम (कर्म) के प्रति समर्पित होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है तो जो आनंद आता है आज उसी आनंद की अनुभूति हो रही है मधुर दोहावली की चौदहवीं प्रस्तुति में। दोहा सृजन के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उपर्युक्त विवेचन अपने मंतव्य को स्वत: ही प्रमाणित कर देता है। "एक तुम्हारा होना ही क्या से क्या  कर देता है, " यह पंक्ति आज की प्रस्तुति के मूलाधार में समाहित है।  आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी से प्रत्यक्ष भेंट शिवपुरी में आयोजित नवगीत पुरस्कार वितरण समारोह में हुई थी, उनके मुख से झरते गीत-नवगीत की वर्षा ने ऐसा रसविभोर किया था कि उसकी मिठास आजतक महसूस हो रही है। अग्रज यशमालवीय जी के कथन से मैं पूर्णतः सहमत हूं और दोनों हाथ उठाकर यह कहने मैं कोई संकोच भी नहीं कर रहा हूं कि सुरमयी आसमान में जड़े दोहे अपनी आभा से क्षितिज को दैदीप्यमान कररहे हैं। श्रध्देय तिवारी जी के दोहे धर्म के मर्म को बेधते हुए राजनैतिक परिदृश्य पर तीक्ष्ण दृष्टिपात करते हुए मानवीय रिश्तों में आई बदलाव की बयार से परिवार को न बचा पाने की पीड़ा को अभिव्यंजित करने में सफल रहे हैं। दोहा दृष्टव्य है-- रिश्तों के बदले हुए,दिखते सभी उसूल। भैया कड़वे नीम से,दादी हुईं बबूल। अपनी आस्था-विश्वास की सामर्थ्य को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते हुए उसे "श्रध्दा विश्वास रूपिणौ " परमसत्ता का मान दे दिया जो असंभव को भी संभव कर देता है-- आंखों में दाना लिए, पंखों में आकाश। जाल उठाये उड़ गया, चिड़ियों का विश्वास।  मात्र दो पंक्तियों में अनूठा बिम्ब संयोजन जो व्यंजना शब्दशक्ति और वक्रोक्ति का अनुपम उदाहरण बन गया जिसे सिर्फ और सिर्फ माहेश्वर तिवारी जी ही सृजित कर सकते हैं-- मूल प्रश्न से हट गया जब से सबका ध्यान।  सूरज बांटे रेवड़ी, चांद चबाएं पान। , जबकि मुहावरा है अंधा बांटे रेवड़ी। श्रमिक वर्ग के असहनीय दर्द को अपनी लेखनी की शक्ति से अमर करने वाला दोहा- क्या सपने क्या लोरियां,खाली खाली पेज। जिनकी नींदों को मिली फुटपाथों की सेज। अविस्मरणीय है। ऐतिहासिक संदर्भ हों या प्रकृति का मानवीकरण, श्रृंगार का रसमय आकर्षण हो या मन फकीरी का साधन,अगड़े पिछड़े वर्ग की आरक्षण की तात्कालिक समस्या, रचनाकार ने अपनी लेखनी से अनछुआ नहीं रहने दिया। और फिर जीवन की सांध्यवेला का मार्मिक चित्रण कर मन के घावों को सहलाने तथा बेंत और सुमिरनी से साथ निभाने का मूल मंत्र भी दे दिया-- खुली पीठ से बेंत का , ऐसा हुआ लगाव, लिए सुमिरनी हाथ हम, गिनते कल के घाव। यह कहकर दोहाकार अपने लेखिकीय दायित्व से उऋण होने का प्रयास भी कर गया।  गीत ऋषि माहेश्वर तिवारी जी के सृजन सामर्थ्य को सादर प्रणाम करते हुए भाई मनोज जैन मधुर जी की मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा पूर्ति की शुभेच्छा है। 
वागर्थ पटल की टीम को साधुवाद। 
               डॉ मुकेश अनुरागी शिवपुरी

                 परम आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी जितने समर्थ साहित्यकार हैं उससे बड़े वो नेक व संवेदनशील रचनाकार हैं जो हर समय साहित्य के नए रचनाकारों को दिशा दिखाने व उनकी हर अच्छी बात पर खुली तारीफ़ करके उनका उत्साहवर्धन करते हैं। आपके दोहे आपके गीत सभी कालजयी रचना हैं यहाँ पर (१)लाक्षागृह का दोहा(२)बरगद से लिपटी पडी(३)पुल की बाँहों में नदी(४)मूल प्रश्न से हट गया(५)वस्त्र पहनकर गेरुआ ये सभी दोहे  आप भुलाना चाहें तब भी आपकी मन की देहरी अपनी उपस्थिति दर्ज एक लम्बे समय तक कराते रहेंगे। ऐसे ही लेखन के कारण मुझ जैसे न कितने रचनाकारों के आप प्रेरणादायी हैं व सदैव रहेंगे 

 डॉ  अजय जनमेजय
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                     बहुत अलग तरह के दोहे सच्ची कविता के आस्वाद में नहाए हुए। दोहों की ऐसी खुशबू केवल यश के दोहों में मिलती है। सच कहा  यश कह दें तो फिर कुछ और कहना बिना पेट्रोल की गाड़ी हांकना है। 
सचमुच यश जी ये दोहे खुशबू के शिलालेख हैं।
                 डॉ ओम निश्चल

             आदरणीय तिवारी जी प्रयोगधर्मी कवि हैं और उनकी यह प्रयोगधर्मिता हर विधा मे परिलक्षित है बिम्बो प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करने मे वे सिद्धहस्त हैं सूरज बाटे रेवडी, चांद चबाये पान जैसे अनूठे प्रयोग करना आपका शगल है नई पीढी के प्रेरणास्रोत दादा को प्रणाम निवेदित कर मनोज जी को अप्रतिम दोहे प्रस्तुत करने के लिए कोटिशःसाधुवाद प्रेषित है।

          डॉ.विनय भदौरिया
                 सूरज बांटे रेवड़ी चांद चबाए पान। क्या बात है...दादा माहेश्वर जी के शब्दों में छंद स्वयं अपनी पूरी संवेदना को समेटकर बिंध जाता है। 
भारतेंदु मिश्र 
                 सभी दोहे श्रेष्ठ हैं। यह दोहा तो कमाल का है -- "ख़ुश है रच कर सीकरी..... हाज़िर नाभादास।।" 
आदरणीय माहेश्वर भाई साहब को प्रणाम!
       डॉ सुभाष वसिष्ठ
            इन दोहों की प्रस्तुति पर माहेश्वर तिवारी जी अपनी ओर से वागर्थ के पाठकों के लिए अपनी तरफ से एक महत्वपूर्ण टिप्पणी वागर्थ के पटल पर जोड़ी थी जो यहाँ जस की तस चस्पा है।  "अपने सभी आत्मीय तथा स्नेह देकर मेरे लेखन को सराहने और प्रोत्साहित करने वालों के प्रति हार्दिक आभार। मनोज जैन को धन्यवाद देना उसे अपने से कुछ दूर खिसका देने जैसा है। यश और ओम निश्चल, भारतेन्दु मिश्र, सुभाष वशिष्ठ की टिप्पणियाँ आगे के लेखन के लिये चुनौतियों जैसी है कि अब आगे सीढ़ी से उतरने की सोची तो खैर नहीं। अन्य पारखी और प्रबुद्धजनों के प्रति भी आभार।"
              माहेश्वर तिवारी
 1, दिसम्बर 2022 को वागर्थ समूह में जोड़ी गई एक पोस्ट वागर्थ समूह  से साभार। माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत समय के प्रख्यात नवगीतकार दादा माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत 1964 में, बस्ती प्रवास के दौरान रचे इन नवगीतों में आज भी सौंधी मिट्टी की सुगन्ध जस की तस मौजूद है। अपनी बोली-बानी में बतियाते इन नवगीतों में आकुल मन की व्यथा के साथ-साथ समूचा परिवेश समाहित है। इन नवगीतों में एकाकीपन और ऊब की सहज और चित्ताकर्षक अभिव्यक्ति देखने मिलती है। दोनों नवगीत "हरसिंगार कोई तो हो" से साभार  हैं।
अकेलापन
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तना जाले-सा
अकेला पन
कहाँ, तक झेले 
अकेला मन

किसी ठहरी 
झील-सा
हिलता नहीं तिनका
साथ हम 
कब तक निभाएँ
अधमरे दिन का

कट नहीं पाता 
नसों में 
उगा नंगा पन

थक गया है
बाँस वन की
सीटियों का मौन
आहटों में 
चुप्पियों को
सिल गया है कौन

दिशाओं में 
झूलता है
क्षितिज का बन्धन

दो
सारे दिन
__________

सारे दिन 
पढ़ते अखबार
बीत गया 
यह भी इतवार

गमलों में 
पड़ा नहीं पानी
पढ़ी नहीं गई 
संत वाणी

दिन गुजरा 
बिलकुल बेकार
सारे दिन 
पढ़ते अखबार

पुँछी नहीं
पत्रों की गर्द
खिड़की-
दरवाजे बेपर्द

कोशिश की है 
कितनी बार
सारे दिन 
पढ़ते अखबार

मुन्ने का 
तुतलाता गीत
अनसुना गया
बिलकुल बीत

कई बार 
करके स्वीकार
सारे दिन 
पढ़ते अखबार

माहेश्वर तिवारी         
बैंकटेश्वर मिश्र
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बहुत खूब ! आदररणीय चाचा जी ( माहेश्वर तीवारी जी ) बस्ती ( मिश्रौलिया, बस्ती ) मेरे घर पर  लगभग 1662--19667 रहे है । प्रसिद्ध गीत " याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलस भरे  ---- । जैसे कई चर्चित गीत लिखे गये थे   कई संस्मरण  हैं ।  बस्ती की चरचा करने हेतु साधुवाद ।
                  नवगीत के पुरोधा कवि है आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी अभिधा में होते हुए भी इन गीतों में सामुद्रिक गहराई है। लेकिन  कवि का मन तो सागर से भी अधिक गहरा होता है।स्वयं कवि के ही गीत की पंक्ति है----
        कितना गहरा है मेरा मन
        सागर क्या जाने!
इस स्तरीय प्रस्तुति के लिए कवि के साथ-साथ  मनोज जैन साहब को भी बधाई!
    •  उदय शंकर अनुज
               दादा तिवारी जी के नवगीत स्थूल से सूक्ष्म की ओर भावनात्मक संचरण होते हैं। शब्दलय और अर्थलय को साधते गीत रचनाकारों को प्रेरित करते हैं। दादा तिवारी जी को सादर नमन तथा वागर्थ समूह को श्रेष्ठ गीतों की प्रस्तुति के लिए आभार!
                जगदीश पंकज
जब जब माहेश्वर तिवारी जी का नाम आता है, मुझे उनका "सुर्ख सुबह चंपई दुपहरी मोरपंखिया शाम, तरह तरह के लिख जाता मन पत्र तुम्हारे नाम" याद आता है।। कभी 72-73 में मुरैना के कवि सम्मेलन में उन्होंने यह गीत सुनाया था।। आठवें दशक के उत्तरार्ध में वे विदिशा भी रहे थे।
            उपेंद्र पुरुषोत्तम कुमार
              सीधी-सादी बोली-बानी का अप्रतिम बिम्ब,एकाकीपन का अनूठा रेखाचित्र प्रयोग धर्मिता का प्रतीकात्मक सौंदर्य एवं प्रतीकों का अनुशासित प्रयोग। दोनों गीतों में प्राण तत्व हैं ।
रचनाकार को प्रणाम मनोज जी को हार्दिक बधाई।
            ईश्वर दयाल गोस्वामी
 

             उपर्युक्त सभी फेसबुक, ब्लॉग और वागर्थ से साभार प्रस्तुतियों से उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को पहचाना जा सकता है। निःसन्देह, वे बड़े और जमीन से जुड़े रचनाकार लोकप्रिय कवि थे। वाचिक परम्परा हो या पत्र- पत्रिकाएँ, उनकी दोनों जगह समान रूप से उपस्थिति अंत तक बनी रही। उन्होंने सदैव नई पीढ़ी के रचनाकारों का उत्साह वर्धन किया उन्हें सराहा और आगे बढ़ाया।

          4,अक्टूबर 2014 के गीतोत्सव के आयोजन गीत चाँदनी जयपुर राजस्थान में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर भोपाल के दुष्यंत अलंकरण, अभिनव कला परिषद का श्रेष्ठ कला आचार्य, सहित अनेक समारोहों एवं गोष्ठियों सम्मेलनों में मुझे उनका आशीर्वाद मिलता रहा। 
            अब, जब दादा नहीं हैं तब उनसे जुड़ी यादें और और सघन हो चलीं। मेरी कृति "धूप भरकर मुट्ठियों में" उनका लिखा फ्लैप अब धरोहर है। दादा का इस तरह असमय जाना हम सब के लिए पीड़ादायक है। उनका जाना हम सबकी अपूर्णीय क्षति है। इस लेख को लिखने के कुछ माह पहले ही उनका एक कॉल आया था मुझे नहीं पता था अब इसके बाद नेह उड़ेलने वाला कॉल कभी नहीं आएगा।
     ठीक से तो याद नहीं पर हाँ, अन्तिम कॉल पर जो बात हुई तब उन्होंने शायद किसी शोध सन्दर्भ ग्रन्थ का जिक्र किया था जिसे वह पढ़ना और देखना चाहते थे पर वह उन तक पहुँच नहीं सका। 
       शायद इस ग्रन्थ में माहेश्वर तिवारी जी के नवगीत सम्मिलित किए गए पर उन तक ग्रंथ की प्रति नही पहुँची। काश ! मैं, उस ग्रंथ का नाम ठीक से  सुन पाता तो उन तक, उस ग्रन्थ की प्रति उन तक भेजने की कोशिश जरूर करता। अफ़सोस ! ऐसा कर नहीं सका।
        खैर,1998 में रिरीज हुई एक मूवी 'दुश्मन' का एक गीत जो आंनद बक्शी ने लिखा और जिसे जगजीत सिंह नें दिलकश अंदाज़ में में मखमली आवाज़ में अपना रेशमी स्वर दिया,
खासतौर से इस प्रसंग पर हमें बहुत रुलाता है।
       "चिट्ठी ना कोई संदेश,
        जाने वो कौन सा देस, 
        जहाँ तुम चले गए!
    मैं, यह भली भाँति जानता हूँ कि, कॉल पर ना मुखड़ा, ना अंतरा, और ना वह समापन की पुनरावृत्ति वाली, ठीक है ! ठीक है ! ठीक है ! की आवाज़ मेरे और मेरे जैसे अनेक उनके प्रसंशको के कानों में कभी नहीं आएगी।
       नम आँखों और भारी मन से उन्हें याद करते हुए पूछता तो हूँ पर कोई उत्तर ही नहीं देता ...
              कहाँ तुम चले गए..........।
अंत में पहले लंबे आलेख का श्रेय जाता है अत्यन्त प्रिय मेरे बड़े भाई मित्र योगेन्द्र वर्मा व्योम जी को उन्होंने ठीक उसी वेसे ही जैसे हनुमान जी उनकी प्रेरणा से जलधि लाँघ लंका जा पहुँचे।
       उसी तर्ज पर  मुझ जैसे अलाल से यह काम करवा लिया साथ ही समूह वागर्थ, समूह अंतरा और ब्लॉग वागर्थ में प्रस्तुत स्तरीय सामग्री की शक्ति अहसास भी करा दिया जिसका का मुझे  अभी तक भान ही नहीं था।
  
मनोज जैन 
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संस्थापक संपादक 
समूह / ब्लॉग वागर्थ 
106 विट्ठलनगर
गुफ़ामन्दिर रोड लालघाटी 
भोपाल
462030