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गुरुवार, 25 जून 2026

रविंद्र श्रीवास्तव जी का एक संस्मरण



कबीर के पद हमने अपने गांव के जोगियों के
मुख से सुने थे । वे सारंगी और खझड़ी के साथ जिस तरह डूंब कर कबीर के पदों का गायन करते थे तो लगता था कि साक्षात कबीर उतर आए हो। 
 कबीर की तरह उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी थी , वे यदा कदा  गांजे का दम लगाया करते थे । ताड़ी आदि का सेवन करते थे । वे गेरूआ ड्रेस में रहते थे और अलग से दिखाई देते थे । उनके पास विचित्र किस्म के बैल होते थे ,किसी के पास पांचवा पैर होता तो किसी के पास दो दो पूंछ होती थी । उनकी पीठ पर कौड़ियों से सुसज्जित आवरण होता था ।
  उन्हें लोकजीवन से कंठ मिला था ,एकदम ठेठ और दिल से भीतर तक उनकी आवाज उतर आती थी । उनका गायन किसी श्रेष्ठ गायक से कम प्रभावशाली नही था । हम न मरिहैं मरिहैं संसारा या देख तमाशा लकड़ी का ,उनके प्रिय पद थे । बचपन में हमें कबीर की उलटवाँसी समझ में नही आती थी लेकिन जैसे जैसे बड़ा होता उनके अर्थ खुलते गए ,आज वे मेरे इष्ट कवि है  । कुमार गन्धर्व ने कबीर के पदों का अद्भुत गायन किया है उनके गायन में लोकतत्व और शास्त्रीयता थी ।
  कबीर के पदों का ज्यादा ज्ञान मुझे रामलखन साधू से मिला ,उनका गृहस्थ जीवन से मोहभंग हो गया था और वे साधुआ गए थे । बहुत दिन तक भटकने के बाद उन्होंने गांव के पास की बुद्धा नदी के पास अपनी कुटी बनाई । यह नदी निर्जनता में बहती थी ,पास में घना और डरावना जंगल था । लोग वहां दिन में जाने से डरते थे लेकिन साधु कबीर के पद के सहारे रात के भय को पराजित करते थे ।
  साधु की यह कुटी हम दोस्तो का ठिकाना बन गयी थी । हम उनका रामरस खाते पीते और कबीर का पद खझड़ी के साथ सुनते थे । वे प्रायः कबीर के पद करुण रस में गाते थे , गाते समय उनकी आंखें बंद हो जाती थी । कभी कभी अश्रुधार बहने लगती थी । उनका प्रिय भजन - माया महाठगिनी हम जानी -था
  वे बताते थे कि तिरिया भी एक माया है , वह हमें कई तरह की नाँच नचाती है । उसी के चलते ही साधु के रूप में उनका रूपांतरण हुआ था ,उन्हें भरी जवानी में सन्यास ग्रहण करना पड़ा । वे कबीर के बारे में अनेक प्रचलित कहानियां सुनाते थे -झीनी झीनी बीनी चदरिया का मतलब विस्तार से बताते थे । उन्होंने मेरी जीवन दृष्टि को बदलने का काम किया  ।
 जब देवरिया या गोरखपुर से गांव जाना होता था तो मगहर मेरे रास्ते मे पड़ता था ,वहां उतर कर करघे की आवाज सुनता था  । वहां से हम 
 अंगोछा या लुंगी खरीदते थे । कबीर ने हमें बुनने के साथ गाने का हुनर सिखाया है  । नौकरी में भदोही और मऊ जैसी जगहों पर पदास्थापित हुआ ,वहां बुनकरों के कारनामे देखे ।
   साधु की कुटी वीरान हो गयी है ,उनके बाद एक दो पीढ़ी उनकी परम्परा का निर्वाह कर सकी है । यह एक कठिन पथ है , सूरमा ही उस योग्य हैं । अब भी वहां जाता हूँ और वहां उनके होने के अहसास को अनुभव करता हूँ । गांव के जोगी बूढ़े हो गए है ,उनके कंठ थक गए है । उनके बेटों को जोगी बनना कुबूल नही था ,उनके लिए गीत से ज्यादा जरूरी चीज पूंजी थी ।
  कबीर को याद करने के पहले मैं रामलखन साधु को याद करना चाहूंगा , वे मेरे लिए पहले कबीर थे जिन्होंने मेरा कबीर से परिचय कराया ।
पहली बंदिगी साधु को फिर कबीर की स्मृति को
प्रणाम ।
   रिपोस्ट

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