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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

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यायावर घूमता रहा मैं : समय और संवेदना का रागात्मक दस्तावेज़

                    नपे-तुले शब्दों और सधी हुई लय में मन के भावों और विचारों को अभिव्यक्त कर उन्हें पाठकों तक सहज, सलीकेदार ढंग से पहुँचाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। यह एक ऐसा सुयोग है, जो सतत साधना और सुदीर्घ अनुभव के संयोग से ही संभव होता है। यही कारण है कि एक सच्चा कवि अपने पाठकों से सीधे संवाद स्थापित कर पाता है।
जनपद समस्तीपुर (बिहार) के वरेण्य कवि श्री हरिनारायण सिंह 'हरि' का गीत-संग्रह "यायावर घूमता रहा मैं" इसी साधना और संवेदनात्मक प्रखरता का सशक्त प्रमाण है। संग्रह के 146 गीत/नवगीतों से गुजरते हुए पाठक न केवल कवि की सूक्ष्म अनुभूतियों से साक्षात्कार करता है, बल्कि अपने समय और समाज के विविध सरोकारों को भी निकट से अनुभव करता है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि आप किसी भी पृष्ठ से पाठ आरम्भ करें, गीतों की रागात्मकता आपको सहज ही बाँध लेती है।
इन गीतों में समय का यथार्थ, जीवन की जटिलता और मानवीय संवेदनाओं का सहज, पारदर्शी और प्रभावी चित्रण मिलता है। कवि ने अपनी भाव-तूलिका से समय के कैनवास पर ऐसे जीवंत चित्र उकेरे हैं, जिनसे पाठक स्वतः जुड़ता चला जाता है। यह संग्रह केवल काव्य-संवेदना का ही नहीं, बल्कि कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व की पारदर्शी अभिव्यक्ति का भी सशक्त दस्तावेज़ है।
कथ्य और शिल्प—दोनों ही स्तरों पर ये गीत पूर्णतः खरे उतरते हैं। अपने समय और सरोकारों की सार्थक पैरवी करना ही इन गीतों का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है।
वरेण्य कवि श्री हरिनारायण सिंह 'हरि' को इस उत्कृष्ट कृति के लिए हार्दिक बधाई। आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि "यायावर घूमता रहा मैं" अपनी सुदृढ़ बनावट और आकर्षक बुनावट के कारण हिंदी पट्टी के गीत-नवगीत साधकों, पाठकों और रचनाकारों के बीच व्यापक लोकप्रियता अर्जित करेगा।
मनोज जैन 'मधुर'
106, विट्ठल नगर
गुफ़ा मंदिर रोड
लालघाटी, भोपाल – 462030
मोबाइल: 09301337806