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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

पंडित सुधाकर शर्मा जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ

पं सुधाकर शर्मा जी के गीत

       कृपा दृष्टि माँ तेरी
       हर क्षण सम्बल मेरा है !

       मैं तो मूक - अशक्त 
       बोल भी कब पाता था ?
       ऍ,ऑ,ऊॅ,ओं जैसे --
       शब्दों से ही बस नाता था!
       वह भी तो था समय कि जब
       खा-पी भी कब सकता था?
       तू जब कौर खिलाती मॉ
       तब - तब मैं खा पाता था !!

       मैंने तब समझा था; तू है तो
       प्रति पल मेरा है !!

       तेरी उॅगली की इंगिति पर
       धरती पर पद धरता!
       तू उछाह भरती तो मेरा
       मन उछाह था भरता !
       मेरी किलकारी सुन-सुन कर
       तू  किलकारी भरती...
       मेरे गिर कर उठने पर...
       तेरा मन मचल-सॅवरता!

      तेरा प्रबल प्रवाह तरंगित 
      अविरल मेरा है !!

दो

   पार्थ सदृश सौभाग्य नहीं,
   जो धर्म क्षेत्र में 
   नारायण के विराटत्व को वरता!
   किंतु परम सौभाग्य कि माॅ की 
   करुणा ने बीज रूप को ममता के     
   संस्पर्श विराट दिये हैं !!

वह दुलार - वात्सल्य असीमित 
कितना है विस्तार अनन्त ?
जिसके स्नेह सिक्त ऑचल में 
स्वत: सिमट कर रहें दिगंत !!

चुम्बन से अभिषिक्त कपोलों ने रक्ताभा पायी है,
अरुणिम अधरों ने उन्नत सर्वोच्च ललाट किये हैं !!
  
माॅ के प्रति स्पंदन से ही -
स्पंदित है जीवन!
स्रोत अजस्र शक्तियों का माॅ;
स्नेह-छत्र संजीवन !!

ऊॅचे-नीचे दुर्गम पथ पर पद भर दूभर चलना;
प्रेरक शक्ति-संस्कारों ने सुपथ सपाट किये हैं !!

 तीन

मॉ जैसी बस मॉ ही होती ; 
शेष दृश्य - अदृश्य सदा   
माॅ के सम्मुख बौना है !

     अ-अनार,आ-आम और 
     क्ष, त्र, ज्ञा मॉ से सीखा!
     अन्य कोई क्या पहला गुरु 
      हो सकता मातु सरीखा !
      
 माॅ की स्नेहिलछवि से महका 
 मन का  हर कौना  है !!
      
       माॅ  के पल्लू में सिमटा -
       सहमा था शैशव मेरा !
       पल-पल प्रेरक शक्ति जगाती 
       मुझमें अलख सबेरा !!

 माॅ के अंक सदृश अप्रतिम -
 क्या कोई बिछौना है ?

        ऑखों में जीवन - संवेदन 
        माॅ ने ही दिखलाया !
        मूल्यवान नैतिक-निष्ठा का
        पग - पग पाठ पढ़ाया !!
 
सच्चाई है चोखी चाॅदी, 
साहस शुभ सौना है !!

                    
चार

माॅ तू मेरे इस अमोल -
जीवन का अथ है!
   
   जिसका अथ तू है ;
   उसका क्या कोई समापन होगा?
   गूढ़ रहस्यों के "अ " - ज्ञात का
   कैसे ज्ञापन होगा ?

तेरे वरद हस्त पा संसृति -
भला अकारथ है ?

       यह अकूत विश्वास कि 
       तू है तो स्फूर्ति है!
       मातृ तत्व से प्रकट प्रकृति ही
       सतत  पूर्ति  है  !!

" चरैवेति " की ऋचा फलित,
   तू जाग्रत रथ है !!

        अंक निरंक नहीं,
        सपने साकार सॅजोता !
        तुझे पा लिया,
        व्यर्थ रत्न-रत्नाकर- गोता !!

 मन्तव्यों - गन्तव्यों का तू 
  सुगम - सुपथ है !!

माॅ ! तू मेरे इस अमोल -
जीवन का अथ है !!

पाँच
           
सोच रहा हूॅ ....
तुम्हें क्यों करूॅ मैं सम्बोधित ?
क्यों कि तुम्हीं तो हो मेरा सारा सम्बोधन!
       
       साॅसों में विश्वास रच रहा 
       नित नूतन उत्साह!
       हुलसित हृदय भर रहा रह-रह
        उच्छल उदधि उछाह !!

सारा कथ्य ध्यान में रख
वाक्यों में नव विन्यास बूझता !
स्वगत तुम्हीं को तो करता रहता उद्बोधन !!

      हर युग में ही तो कहता -  
      आया है कवि - मन !
      फिर भी कितना रहा -
      अनकहा शब्द- समर्पन ?

साध्य - साधना मध्य रहे जो
पृष्ठ अनलिखे अनगिन,
वह रचाव ही तो माॅ है तेरा शुभ शोधन !!

        छह  
 
    तेरे हेतु असम्भव क्या माँ ?
    तू प्रतीक है हर सम्भव की!
    मैने निरखा रूप समुच्छल,
    हरिताभा तू प्रति पल्लव की !!

        दूर - दूर तक फैले खेतों में 
        तू स्वेद कणों की आभा!
        श्रम तुझसे है स्वयं प्रतिष्ठित,
        तू खलिहानों की दिव्याभा !!

  अन्नपूर्णे सर्व धान्य - धन
  पराकाष्ठा तू वैभव की !!
   तेरे हेतु असम्भव क्या माँ?
   तू प्रतीक है हर सम्भव की !!    

          रूप, गंध, रस, मिट्टी के -
          सोंधेपन का आभास तुम्हीं हो!
          धर्म - धरा, विस्तृत नीलाम्बर,
           जाग्रत जग विश्वास तुम्हीं हो !!

माँ तुम ही दर्शन - दिग्दर्शन,
तुम उत्पन्ना नव - अभिनव की !!
तेरे हेतु असम्भव क्या माँ ?
 तू प्रतीक है हरसम्भव की !!

प्रस्तुति
वागर्थ ब्लॉग

डॉ कैलाश गुप्ता सु मन जी के दो गीत प्रस्तुति ब्लॉग वागर्थ

          डॉ कैलाश गुप्ता सु मन जी


गाँव गली घर शहर देश में ,
अलख जगाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की ,
पीर सुनाता  हूँ।

मेरे मन में पाप नहीं है
किंचित भी संताप नहीं है
वेशक ढंग पुराना मेरा
किंतु किसी की छाप नहीं है

मैं स्वारथ में नहीं किसी को 
बाप बनाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की  
पीर सुनाता हूँ।

रखता महज ईश से आशा। 
नहीं आज तक मिली निराशा। 
काव्य द्रोहियों को लग सकती, 
कुछ कड़वी सी मेरी भाषा।। 


कड़वी दवा पिलाकर जड़ से 
रोग मिटाता हूँ ।
मैं अपने नगमों में जग की 
पीर सुनाता हूँ। 


नहीं  लोभ  में, मैं बिकता हूँ। 
जो दिखता है वह लिखता हूँ। 
सच कहने के कारण कुछ को, 
खलनायक सा में दिखता हूँ। ।


शब्दों के द्वारा तानों के  ,
तीर चलाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की 
पीर सुनाता हूँ।। 


प्रेम सभी से मैं  करता हूँ।
सदभावों के घट भरता हूँ ।
बेशक काल खड़ा हो सम्मुख, 
बस ईश्वर से मैं डरता हूँ। ।

श्रम से संग तोड़कर अपनी 
राह बनाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की 
पीर सुनाता हूँ।। 

दो

हम जगत पहचानने को चल दिये।
पर स्वंय को आज तक ना पढ़ सके।।

दादुरों को आज बगुले खल रहे ।
दृग पलक पर भाव ओछे पल रहे।
द्वेष की जलती मशालों से स्वंय,
व्यर्थ में ही बाँस जैसे जल रहे।।

पड़ गई आदत हमे बैशाखिंयों की
हम स्वंय के पाँव से ना बढ़ सके।

खो चुके  इंसानियत  हम ताव  में।
दानवों   को   मात   दें  दुर्भाव  में।
मर्म ना समझे कभी हम प्रीति का,
ढोर   से   बदतर   हुये   वर्ताव  में ।।

दर्प  में  बातें  करें  हम  व्योम  की
भूधरों पर आज तक ना चढ़ सके।

आज जग में झूठ सबको भा रहा। 
देखकर सिर सत्य का चकरा रहा ।
आलिमों   के  भाग  में  रोटी  नहीं, 
जाहिलों  का  दल मिठाई खा रहा।। 

किस तरह से हम जगत के गुरु बने,
जब प्रगति के संग हम ना गढ़ सके।

गीत  गजलें सब लतीफा   हो   गये।
अब   धतूरे  भी  शरीफा   हो  गये ।
जब सियासत लाभ का सौदा दिखी,
चोर  जितने  थे  खलीफा  हो  गये।। 

सत्य  पर  हावी  दिखी  तब झूठ के
हम  तमाचे  गाल पर  ना जड़ सके।

कैलाश गुप्ता (सु मन)
मुरैना मध्य प्रदेश
9826819117

शुक्रवार, 24 मई 2024

डॉ.रामवल्लभ आचार्य जी का एक गीत प्रस्तुति: ब्लॉग वागर्थ


ओ मछुआरे !
___________

ओ मछुआरे ! साँझ सकारे
मीन फँसाये जाल में ।
सोच ज़रा तू तुझे फँसाया
किसने इस जगजाल में ।। 

सोच ज़रा तू कौन बुन रहा
साँसों का ताना बाना ।
किस कारण होता है प्राणी
का जग में आना जाना ।
किसने देह बनाकर जोड़ा
तुझे नाभि की नाल से ।।
सोच ज़रा तू तुझे फँसाया
किसने इस जग जाल में ।। 

सोच ज़रा तू किन कर्मों का
फल भव में भटकाता है ।
किन कर्मों के फल के कारण 
जीव मुक्त हो जाता है ।
लिखता कौन अहर्निश अविरत
भाग्य मनुज के भाल में ।।
सोच ज़रा तू तुझे फँसाया
किसने इस जग जाल में ।। 

सोच ज़रा तू किसने तुझको
दिया सुनहरा यह मौका ।
भवसागर तरने को दी है
पंचतत्व की यह नौका । 
भूल गया तू तुझे तराना
है नैया हर हाल में ।।
सोच ज़रा तू  तुझे फँसाया
किसने इस जग जाल में ।।

© डाॅ. राम वल्लभ आचार्य

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

कविवर महेश कटारे सुगम जी का एक गीत प्रस्तुति ब्लॉग वागर्थ

चर्चित कवि महेश कटारे सुगम जी का एक लोकप्रिय गीत
प्रस्तुति
वागर्थ ब्लॉग

बेशक घोषित करो छंद को मरा हुआ 
पर कविता के प्राण छंद में बसते हैं।

एक सदी होने को आई है लेकिन ,
गद्य काव्य को खड़ा नहीं कर पाये हो 
खूब पिलाये पोषक तत्व बहुत से पर 
उसके कद को बड़ा नहीं कर पाये हो 
माना साज़िश हुई छंद के साथ मगर 
लोक अभी तक लय छंदों में हँसते हैं। 

इतने वर्षों बाद बता तो दो मुझको
गद्य काव्य की पैठ दिलों में कितनी है।
गद्य काव्य से पाट दिया बाज़ारों को,
लेकिन वह अब भी ठिगनी की ठिगनी है।
गद्य काव्य कितने लोगों को याद हुआ 
गद्य काव्य को कितना लोक समझते हैं।

खूब शाब्दिक अय्याशी कर डाली पर,
संस्कार छंदों के नहीं मिटा पाये।
लोक आज भी हँसता गाता छंदों में 
गद्य काव्य से रिश्ते नहीं बना पाये।
लोक नहीं स्वीकारे जब तक बोलो 
दिल के शिखर कलश कैसे बन सकते हैं। 

लय छंदों से मुक्ति चाहने वालों को,
कवि कहने की चाहत को तजना होगा।
गद्य लिखो पूरी स्वतंत्रता है उसमें,
कवि को लय अनुशासन में चलना होगा।       
कविता कर्म मज़ाक नहीं न सुविधामय,
शब्द अर्थ की तेज़ धार पर चलते हैं। ..

गद्य काव्य भी गेय हुआ करता था पर,
अब तो लय भी गद्य काव्य से बाहर है।
 शुद्ध गद्य को कविता जो भी बता रहे,
साफ साफ उनका मंतव्य उजागर है।
यश लोलुपता काव्य कर्म को लील रही,
यश के सारे सूत्र इस तरह सस्ते हैं। 

महेश कटारे सुगम

कवि 
परिचय

नाम-महेश कटारे "सुगम"
जन्म.. 24 जनवरी 1954 में ललितपुर जिले के पिपरई गाँव में.

प्रतिष्ठित हिंदी पत्र पत्रिकाओं हंस, नया ज्ञानोदय, इंडिया टुडे,
इन साइड इंडिया,साक्षात्कार, प्रयोजन,कला समय, कथादेश,  वीणा,अविलोम,इंगित,निकट, अभिव्यक्ति,संविदा, साहित्य भारती, म. प्र.विवरणिका, 
वर्तमान साहित्य,हरिगंधा, लहक,साहित्य सरस्वती, स्पंदन, नान्दी, अक्षर शिल्पी, राग भोपाली, शब्द शिखर, बुंदेलखंड कनैक्ट,अविलोम, शब्द संगत, व्यंग्य यात्रा, 
सरिता,  इंद्रप्रस्थ भारती, अर्बाबे कलाम, अनामा, शुचि प्रिया, सुख़नवर, सरस्वती सुमन, संबोधन, समकाल, इलैक्ट्रॉनिकी, भू भारती,
कहानियाँ मासिक चयन, कथाबिंब,सुमन सौरभ, पराग,लोटपोट,बाल भारती, 
अच्छे भैया,देवपुत्र, चकमक आदि में रचनाएँ प्रकाशित.

प्रकाशन..... 

उपन्यास
रोटी पुत्र

कहानी संग्रह
1.....प्यास.
2......फसल

कविता संग्रह
पसीने का दस्तख़त.

 नवगीत संग्रह
तुम कुछ ऐसा कहो.

बाल गीत संग्रह
हरदम हंसता गाता नीम.

लंबी कविता
1....वैदेही विषाद.
2.......प्रश्न व्यूह.

ग़ज़ल संग्रह
आवाज़ का चेहरा, दुआएँ दो दरख़्तों को, सारी खींचतान में फ़रेब ही फ़रेब है, आशाओं के नये महल, शुक्रिया, अयोध्या हय हय, ख़्वाब मेरे भटकते रहे, कुछ तो है, ऐसी तैसी, ला हौल बला कुब्बत,प्रतिरोधों के पर्व.


बुंदेली गजल संग्रह
गाँव के गेंवड़े, बात कैसे दो टूक  कका जू, अब जीवे कौ एकई चारौ, कछू तौ गड़बड़ है, सुन रये हौ.

ग़ज़ल गलियारा सीरीज़ के पांच ग़ज़ल संकलन संपादित

संपादन
महेश कटारे "सुगम "का रचना संसार.(डाॅ.संध्या टिकेकर) . 

महेश कटारे " सुगम " की श्रंगारिक ग़ज़लें ( प्रवीन जैन) . 

सम्मान..... हिंदी अकादमी दिल्ली  सहभाषा सम्मान,जनकवि मुकुट बिहारी सरोज सम्मान ग्वालियर (म.प्र.),स्पेनिन सम्मान रांची ( झारखंड),जनकवि नागार्जुन सम्मान गया ( बिहार) , लोकभाषा सम्मान दुष्यंत संग्रहालय भोपाल ( म. प्र.)  गुंजन साहित्य सदन जबलपुर म.प्र. द्वारा लोक साहित्य अलंकरण सहित अनेक महत्वपूर्ण संस्थाओं द्वारा सम्मानित.

पुरस्कार
कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (कथा बिंब) मुंबई
रामनारायण शास्त्री (स्वदेश) कथा पुरस्कार म. प्र.

उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में सम्मिलित.

कुछ विश्वविद्यालयों से शोध

पता-काव्या चंद्रशेखर वार्ड, माथुर कालोनी बीना, जिला सागर, म. प्र. पिन 470113

मोबाइल नम्बर-9713024380

मेल आईडी- prabhatmybrother@gmail.com

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

एक गीत नेमा माहुले



 नेमा माहुले का एक गीत 
____________________

योग्यता को मिले यश जरूरी नहीं,
श्रेष्ठ हो कर अचर्चित कई लोग हैं ।

कर्मपथ पर बढ़े अनवरत जो चरण,
ख्याति से माँगते वो नहीं है शरण ।
कीर्ति का नाद चाहे निनादित न हो,
नाम अधरों सजे या प्रसादित न हो ।
अर्चना से परे वंचना से परे,
मौन रहकर समर्पित कई लोग हैं ।
श्रेष्ठ हो कर अचर्चित कई लोग हैं ।

शुद्धतम काव्य को रच रहे छंद में,
हैं कला के पुजारी स्व-अनुबंध में ।
लक्ष्य साधे सतत साधनालीन हैं,
बुद्धिदा के तनय ज्ञान तल्लीन हैं
सर्जना बस रही श्वास-दर-श्वास में,
सर्जना में समाहित कई लोग हैं ।
श्रेष्ठ हो कर अचर्चित कई लोग हैं ।

मोहते ही नहीं लब्धि के श्री शिखर,
पद प्रतिष्ठा न मोहित करे लेश भर ।
कामनाएँ न किंचित कि जयकार हो,
निज प्रभा का जगत में सुविस्तार हो ।
चाहना को चरण में सजाए हुए,
तृप्ति से पूर्ण परिचित कई लोग हैं ।
श्रेष्ठ हो कर अचर्चित कई लोग हैं ।

                 तृप्ति