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शनिवार, 18 जुलाई 2026

यशवंत गोरे जी का एक व्यंग्य प्रस्तुति वागर्थ



साहित्य का अलंकरण नहीं , अलगकरण समारोह -एक रिपोर्ट 

जिस प्रकार शासकीय कर्मचारियों के लिए सरकार द्वारा डीए के एरियर की घोषणा होते ही उसका लाभ पाने वाले कर्मचारियों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है वैसे ही साहित्य के पुरस्कारों की घोषणा होते ही साहित्यकारों में प्रसन्नता छा जाती हैं। क्योकि  साहित्यिक पुरस्कार भी डीए  की तरह एरियर में ही दिए जाते है।  घोषणा के साथ यह भी एक पुछल्ला रहता है कि डीए एरियर में  मिलने  वाली राशी आधी पीएफ में जमा होगी तो कुछ कर्मचारीयों में निराशा के भाव आ  जाते है,   वैसे ही जिन साहित्कारों के नाम पुरस्कारों की सूचि में नहीं होते निराश हो जाते है।  सरकार के खजाने में मंत्रियों  और अफसरों के लिए लग्जरी गाड़ियों , बंगलों की सजावट के लिए बजट में  तो कोई कमी नहीं होती है परन्तु कर्मचारियों के डीए के भुगतान के लिए और साहित्य के पुरस्कारों की राशि के लिए बजट का बहाना बताकर टाल दिया जाता हैं। इसलिए डीए की तरह पुरस्कार भी दो -तीन साल के  एरियर में दिए जाते है।  

पुरस्कारों की घोषणा होते ही चयनित  साहित्यकारों को  सोशल मिडिया पर बधाइयों की बाढ़ सी  आ जाती है।  जिसका नाम चयनित सूची में  नहीं होता वे " बन्दर बाँट " "अँधा बाटे रेवड़ी" जैसे  कमेंट कर अपनी भड़ास निकाल लेते है।  पुरस्कारों की दुनिया में हमेशा रचनाकार गरीबी रेखा से निचे ही रहता है।  क्योंकि पुरस्कार मिलते ही दूसरे ज्यादा पुरस्कृत  द्वारा खींची गई लाइन के नीचे आ  जाता हैं।  
पुरस्कारों की घोषणा और अलंकरण समारोह के बीच की अवधि चयनित साहित्यकारों  की  मन स्थिति वैसी  ही होती है जैसे शादी तय होने के बाद सगाई और शादी की अवधि में एक  होने वाले दूल्हे और उसकी  मंगेतर की होती है।  अलंकरण समारोह की  तिथि की घोषणा होते ही अलंकरण प्राप्त करने वाले साहित्यकार फिर एक बार  अपने आभासी मित्रों को सोशल मीडिया पर सूचना डालकर फिर से बधाई की अपेक्षा करने लगते है।  
घोषित तिथि पर नगर का "कवीन्द्र भवन "  का "कागध्वनि " सभागार खचाखच ऐसे लोगों से भर  जाता है , जिन्हे अलंकरण दिया जाना है,  जिन्हे पहले मिल चुका है और  जिन्हे भविष्य में मिलने की आशा है ।  अगली पंक्ति में  ऐसे वरिष्ठ साहित्यकार जिनके प्रोफ़ाइल में   पुरस्कारों/ सम्मानों  की सूचि लम्बी है,  बैठाये  जाते है।  उसके बाद  गले  में नीली पट्टी  में टंगे  परिचय पत्र के साथ  घूमने  वाले  पुरस्कृत होने वाले साहित्यकारों को जगह दी जाती है।  ऐसे साहित्यकारों की बड़ी  संख्या दिखाई देती है , जिन्हे अगले सालों में पुरस्कार मिलने की उम्मीद है।  कुछ साहित्यकार अपने साथ एक साथी  को लेकर अवश्य लाता हैं ,  वह कोई परिजन या  साहित्यिक मित्र  भी हो सकता है ,  जो पुरस्कार ग्रहण करते समय अपने मोबाइल पर फोटो अवश्य लें  , क्योंकि तुरंत सोशल मीडिया पर जो डालना होता है। 

समारोह तय समय पर शुरू कैसे होता  क्योंकि पुरस्कार संस्कृति विभाग के संस्कारित मंत्री द्वारा दिए जाने थे। संस्कार देने वाले संगठन से आये   मंत्रियों  के संस्कारों में  कुछ कमी रह ही जाती हैं, इस कारण वे समय पर नहीं आ  पाते।  इस बीच  समय का सदुपयोग  करते हुए , पुरस्कृत होने वाले साहित्यकार और जो भविष्य में अपेक्षा रखते है संस्था प्रमुख और अन्य  साहित्यकारों  के साथ सेल्फी/ फोटो खिंचवाने  लगते है ।  मंच से  घोषणा की गई कि मंत्री जी  शीघ्र  ही हमारे बीच होंगे तब तक संस्था के प्रमुख पुरस्कारों की पृष्ठभूमि और संस्था की उपलब्धियों के बारे में अपना वक्तव्य देंगे।  संस्था प्रमुख को अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने के लिए पर्याप्त  समय  मिल गया था। संस्था प्रमुख  बीच -बीच में  यह घोषणा  जरूर  कर रहे थे  कि मंत्री जी शीघ्र ही हमारे बीच  होंगे।  तभी पीछे से उदघोषक  ने धीरे से कुछ कान  में  आकर कहा , उन्हें लगा शायद समय ज्यादा लेने के कारण बैठने के लिए  इशारा कह रहे हैं, परन्तु मामला यह था कि मंत्री के नहीं आने की सूचना  आ चुकी थी।   संस्था प्रमुख ने  क्षमा मांगते हुए घोषणा की कि  मंत्री जी को  किसी आकस्मिक  बैठक में जाना पड़ा है  अतः मंत्री जी नहीं आ  पा रहे है।     पुरस्कार वितरण के लिए सामने बैठे एक वरिष्ठ साहित्यकार से निवेदन कर मंच पर आने का आग्रह किया।  आजकल साहित्यकारों में ऐसे साहित्यकार बहुत मिल जायेंगे जो वरिष्ठ पहले हुए और साहित्यकार बाद में। इसलिए यह चयन करना कठिन  होता है कि वे वरिष्ठ अपने सृजन के कारण है या उम्र के कारण।   
  
आखिरकार अलंकरण समारोह पूरी गरिमा के साथ  संपन्न हुआ।  क्योंकि कार्यक्रम में पूर्व में पुरस्कृत , आज के कार्यक्रम में  अलंकृत  एवं जिनका चयन नहीं हुआ उनकी सबकी गरिमा का  पूरा का ख्याल रखा गया था। पूर्व  में पुरस्कृत , आज के समारोह में पुरस्कृत , जो पुरस्कृत  नहीं हो पाए   , जिनकी कोई पुस्तक अभी तक  प्रकाशित नहीं हुई , जिन्हे  अलंकरण  प्राप्त हुआ उन्हें बधाई देने वाले , सब अलग -अलग स्पष्ट नजर आ  रहे थे।  ऐसा लग रहा था यह  अलंकरण समारोह न होकर साहित्यकारों का अलगकरण  समारोह हो।  
साहित्यकारों की कई श्रेणियां होती है।  डॉक्टरों की   तरह  रचनाकारों  में   भी विशेषज्ञ  होते है   कवि ,  गीतकार , ग़ज़लकार , कोई  दोहे लिखने  के विशेषज्ञ होते है , निबंधकार , व्यंग्यकार , (इस विधा में लिखने वालों साहित्यकार    कुछ ज्यादा ही पाए  जाते  है)।  हर रचनाकार इस विधा में हाथ आजमाना की कोशिश कर  रहा है।  कुछ रचनाकार नगर की हर साहित्यिक संस्था से जुड़ने की लिए हर विधा  में कुछ - न - कुछ  लिखने लगते है।    नगर की हर साहित्यिक के  कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति  अवश्य  दर्ज करते है।  हर  साहित्यिक  संस्था में पद पाने की कोशिश भी  करते  लगते  हैं।  यदि किसी संस्था में पद नहीं मिलता  है , तो अपनी एक अलग साहित्यिक संस्था खड़ी कर लेते है। अपनी संस्था बनाने के  लिए करना  क्या होता है , एक केवल बैनर ही तो बनाना होता है।  दो चार महीने में  अपने कुछ साहित्यिक मित्रों को बुलाकर एकाध कार्यक्रम कर लो सोशल मीडिया में अपलोड कर लो , छोटे - बड़े  अख़बारों में  अपनी फोटो के  साथ खबर छपवा दो , मौका मिले तो सरकार के संस्कृति  विभाग से  थोड़ा बहुत अनुदान  झटक  लो।  कार्यक्रमों की अध्यक्षता ,  मुख्य अतिथि , सारस्वत अतिथि , विशेष अतिथि के लिए योग्यता प्राप्त हो ही जाती  है। कुछ रचनाकार दो-चार सम्मान मिलने के बाद अपने नाम के आगे डाक्टर भी लिखने लगते है।   

साहित्यकारों की उत्पत्ति  भी कई  प्रकार से होती है   कुछ को  विरासत में ही मिलती है।    ऐसे  साहित्यकारों को  अपनी रचनाओं के   प्रकाशन के  लिए  ज्यादा संघर्ष  और इंतजार नहीं करना पड़ता। अपने पूर्वर्जो की रचनाओं को अपने नाम से छपवाने पर भी कोई रचना चोरी का  दाग  नहीं लगता।  जिस प्रकार राजनीति में पारिवारिक पार्टियों के लिए बिना कोई संघर्ष किये सब कुछ  मिल जाता है। ऐसे साहित्यकार भाग्यशाली होते है।     कुछ अधिकारी   नौकरी में रहते अपने पदों पर रहने के कारण साहित्यकार  बन जाते है।   इस श्रेणी में वे  लोग आते  है जो विभागों में जनसम्पर्क अधिकारी ,राजभाषा अधिकारी या ऐसे पदों पर रहे हो जहाँ साहित्यकारों से पाला  पड़ता रहा हो या उनके बॉस साहित्यकार रहे हो।   पत्रकारिता करते -करते सृजन  करने वाले भी साहित्कार कहलाने लगते है।   साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन करते हुए  लम्बे अनुभव के कारण ऐसे  संचालक भी कुछ दिनों बाद साहित्यकार की श्रेणी में आ जाते है। 2020  के बाद एक नए  प्रकार के साहित्यकारों की उत्पत्ति हुई  है।  जो लोग कोरोना के वायरस से बच गए , परन्तु उनके शरीर में जो  सृजन धर्मी का  वायरस था अचानक   क्रियाशील हो गया और सृजन में लिप्त हो गए।  साहित्यकार  बन गए , पुस्तकें  प्रकाशित होने लगी। साहित्यिक संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियों की बाढ़ सी आने लगी।  प्रकाशकों की दुकान चल पड़ी , नए- नए प्रकाशक बाजार में  आ  गए। गोष्ठियों , साहित्यिक कार्यक्रमों से ज्यादा पुस्तक  विमोचन  के कार्यक्रम ज्यादा होने लगे।  पुस्तक मेलों में पुस्तकें  सजने  लगी है। 

 अलंकरण  समारोह समाप्त होने के बाद जिन्हें  पुरस्कार मिले थे,  वे प्रसन्नता के साथ "कवीन्द्र भवन " के सामने एवं अन्य पुरस्कृत साहित्यकारों के  साथ अलंकरण सहित फोटो खिचवाने एवं एक दूसरे को बधाई देने वालों की बड़ी चहल पहल थी।  जिनका चयन पुरस्कारों के लिए नहीं हुआ उनके चेहरों पर निराशा स्पष्ट झलक रही थी।  वे संस्था  प्रमुख को घेरे खड़े थे , अपनी मुलाकातों और रचनाओं की जानकारी देते हुए उनके साथ फोटो खिचवानें के लिए उत्सुक लग रहे  थे।  
कुछ "मीडिया फ्रेंडली " साहित्यकार नगर के प्रमुख अख़बारों जैसे  "सुबह शाम " " पुरानी दुनिया "  दैनिक रेल का सफर " काली भूमि " सुबह का अँधेरा " " दैनिक ऑस्कर " जैसे अख़बारों में मुख्य अतिथि से  अलंकरण  प्राप्त करते हुए  फोटो के साथ  खबर छपवाने के लिए  मोबाईल पर  ही प्रेस नोट  बनाने में व्यस्त हो गए। उनके लिए  दैनिक ऑस्कर में  फोटो छपना किसी ऑस्कर पुरस्कार से कम नहीं है। कुछ साहित्यकार कंधे पर एक झोला   जिसमें अपनी प्रकाशित पुस्तकें  , जिनका चयन पुरस्कार के लिए नहीं हुआ , घूमते  हुए  बाटतें,   फोटो खिंचवाते  दिखें  , जो सोशल मीडिया पर डालकर उसे प्रसारित करें , ताकि अगली बार पुरस्कार के लिए  चयनित हो सके। 

इस प्रकार अगले दो- चार साल के इंतजार के साथ यह अलगकरण  समारोह माफ़ करना अलंकरण समारोह  संपन्न  हुआ।    

 यशवंत गोरे

व्यंग्यकार यशवंत गोरे जी के साथ ब्लॉगर मनोज जैन और साथ में बैठे हैं आदरणीय बी एल गोहिया जी सेल्फी गोरे जी के कैमरे से