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सोमवार, 29 जून 2026

मधूलिका श्रीवास्तव जी का आलेख


आज कबीर जयंती के अवसर पर उन्हें प्रणाम करते हुए मेरा एक लेख—

रांगेय राघव और कबीर के साहित्य में ज्ञान परंपरा

मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ,
निरीह पग पर काल झुके है,
क्योंकि जी रहा हूँ मैं
अब तक प्यार-भरों के प्यार में।
        मानव जीवन से अटूट प्यार करने वाले साहित्य साधना के अथक रचनाकार रांगेय  राघव ने साहित्याकाश में अपनी अलग विलक्षण छवि अंकित की है।
     भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराणों का उनका विस्तृत अध्ययन किया था। खास तौर से पुरातत्व और इतिहास से उन्हें प्यार था। जो कि उनकी रचनाओं में भी झलकता है। रांगेय राघव की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी के लिए अपनी आख़िरी सांस तक कुर्बान रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा, संस्कृति और कला का मूल्यांकन मार्क्सवादी नज़रिए से किया। अपने लेखन से दलित, शोषित, वंचितजनों में एक नई चेतना विकसित की।हिंदी साहित्य में इस मामले में सिर्फ राहुल सांस्कृत्यायन ही उनकी जोड़ी के हैं। 
      उनके पौराणिक चरित्रों पर लिखे उपन्यास जैसे लोई का ताना , यशोधरा जीत गयी, देवकी का बेटा, रत्ना की बात आदि अपने आप में अद्भुत हैं ऐसा लगता है मानो ये सभी चरित्र उनके संगी साथी रहे हों ।इन चरित्रों का जीवन परिचय उनका रहनसहन , समाज व साहित्य में उनके योगदान के वे जैसे चश्मदीद गवाह रहे हों।
    आज मैं रांगेय राघवजी पर यहां बात नहीं करूंगी पर उनके द्वारा संत कबीर के जीवन पर अपने विचार व्यक्त करूँगी । लेखक ने कबीर के पुत्र कमाल के माध्यम से कबीर के जीवन का खूबसूरत चित्रण इतने रोचक ढंग से किया है मानो वे स्वयं कमाल की उँगली पकड़ कदम दर कदम उनके साथ रहे हों ।
    संत कबीर के लिए रांगेय जी लिखते हैं कि उनके जीवन के तथ्य बहुत तो नहीं मिलते हैं पर उनके साहित्य को पढ़कर मैं जिन निष्कर्षों पर पहुंचा उसी के आधार पर  यहाँ पर उनके पुत्र कमाल के माध्यम से आपके सामने परोसने का प्रयत्न किया है । संत कबीर जाति से जुलाहे थे तथा अनपढ़ थे पर उनका ज्ञान उनकी अभिव्यक्ति जीवन की सच्चाई को उजागर करती थी वह स्वयं नहीं लिखते थे पर वे जो कहते उसे उनके संगीसाथी उनके शिष्य लिपिबद्ध  कर लेते । जो कि कहीं भी बहुत अच्छे से संकलित नहीं हैं पर उनके दोहे उनकी उक्तियाँ जैसे लोगों की जबान पर अंकित हो गई थी और मन मस्तिष्क में टंकित हो गई थीं ।
    कबीर निर्गुण के परे थे उन्होंने जो राह दिखाई वह  मानवता को कल्याण  की ओर ले जाने वाली थी वह भेदभाव वाले ब्राह्मणवाद और इस्लाम का भी विरोध करते वे कट्टरपंथ के खिलाफ थे।
      कबीर ने भारत में सांस्कृतिक जन जागरण की नींव डाली उनकी भाषा में क्रांति थी  उनकी भाषा में श्रंगार था ना ही लालित्य था ।वह आम जन की भाषा थी। रांगेय जी कहते हैं कबीर के चेले कबीर पंथ चलाना चाहते थे पर उनके बेटे कमाल इस पक्ष में नहीं थे उनका कहना था कि वे कबीर की शिक्षा को तोड़ मरोड़ कर पेश करना चाहते हैं कमाल की असहमति पर  चेलों ने कमाल के लिए प्रसिद्ध कर दिया कि 
    “बूढ़ा बंस  कबीर का 
     जब उपजा पूत कमाल “
     रांगेय जी ने लोई का ताना को विभिन्न भागों में बाँट कर कबीर के जीवन का पूरा चित्र दर्शाने की कोशिश की है पुस्तक का आरंभ कबीर की मृत्यु के दृश्य से प्रारंभ है। कबीर कमाल से काम बंद कर अपने पास बुला कर कहते हैं कि मेरे जाने का समय है । कमाल डर जाता है तब वे कहते हैं -“ इस संसार में कोई भी सनातन होकर नहीं आया सब आते हैं सब चले जाते हैं । गुण निर्गुण की पहचान करने वाले हों  या  राम-लक्ष्मण हों या पांडव !  यहाँ तक कि रावण भी चला गया सब खाली हाथ आए थे खाली हाथ चले गए ।”
    “भूला लोग कहै घर मेरा 
     जा घरवा में फूला डोलैं
     सो घर नाहीं तेरा 
     हाथी घोड़ा  बैल खजाना 
     खूब यही सब रहा धरा “
           मृत्यु शैया पर लेटे पिता के मुँह से मानो अमृत बरस रहा था । उनका स्वर गूंजा -
“उठो सखी मोरी माँग सँवारो
दुलहा मोसे रूसल हो।”
      यह रूठना कितना मधुर था। अंतिम क्षणों में भी जीवन के प्रति कितनी मादकता थी।
“आये जमराज पलंग चढि बैठे
  नैनन आँसू टूटल हो “
     कमाल कहते हैं कि उस समय वे मेरे पिता नहीं थे वरन् वहाँ मुझे अनेक शताब्दियों का ज्ञान रूपी मनुष्य की आत्मा के सच्चे दर्शन हो रहे थे।
  “चारि जने मिलि खाट उठाइन 
   चहुं दिसि  धू दू ऊठल हो 
   कहत कबीर सुनो भाई साधो 
   जग से नाता छूटत हो “
       उनके चेहरे पर शांति की मुस्कुराहट थी । वे तो सो गए... मैं उनका बेटा मंत्रमुग्ध सा खड़ा रह गया । उनकी मृत्यु पर हिंदू और मुसलमानों में बवाल उठा कि वे हिंदू थे कुछ कहते मुसलमान थे। तब कमाल कहता है-
     "आखिर तो जो जिस दायरे में रहता है, वहाँ उससे बाहर की बात सोच भी तो नहीं सकता। हिंदू और मुसलमान दोनो अलग अलग कुएँ में पड़े हुए मेंढक थे। उनकी सारी परंपराएँ , उनके सारे फैलाव वहीं तक तो जाकर पहुँचते थे।"
        कबीर की पत्नी का नाम लोई था वह भी जुलाहिन थी और कबीर की प्रेरणा भी थी। वह कबीर के नारी पर कहे दोहों पर सवाल करती और उसका निचोड़ निकलवाती। कबीर ने कहा -
   “नारी की जानी परत
   अंधा होत भुजंग
   कबीरा जिनकी कौन गति
   जो नित नारी संग “
       लोई के सवाल करने पर कहते हैं -" नारी माया है पर कब ? वे जो नारी को विषय की वस्तु समझते हैं, और उसके भोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेते हैं । उनके लिए ऐसा क्यों न कहा जाए ?"
       कबीर और लोई दोनों एक ही रंग में रंगे हुए थे । एक बार कबीर घर छोड़ने की बात करते हैं तब लोई कहती है - "जो लोग घर छोड़कर भागते हैं वे एक आँख से दुनिया को देखते हैं उनके जीवन में हाँ और ना के पलड़े हमेशा होड़ करते रहते हैं। एक तरफ मरघट है, योग है, त्याग है वन है, सन्यास है और दूसरी तरफ दुनिया है , लोगों का लाभ है , मदद है , पाप का पर्दाफाश करना है । दो पाँवों पर बोझ सँभाल , एक पर न चल दुख उठाकर भाग मत , यहीं रह कर सच्चाई से लड़ । मैं तेरी साथिन हूँ तेरी राह का थोड़ा नहीं ।" कबीर ने तब एक नवीन मार्ग देखा वह एक समन्वय था जो किसी प्रकार की दासता को अस्वीकार करता था ।
         कबीर ने लोई के सानिध्य में प्रेम को देखा और उसकी साधना करते करते उन्होंने देखा कि सारा संसार ही प्रेम के बल पर चल रहा है।
   “ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ 
     पंडित भया न कोय
    एकै अक्षर प्रेम का 
     पढ़े सो पंडित होय “
  कमाल अपनी माँ से पूछते हैं कि -" माँ लोग कहते हैं कि वे सब से लड़ जाया करते थे ?" तब लोई कहती हैं कि -“वे तो प्रेम के भूखे थे क्रोध नहीं था उनमें वे कहते हैं -
  “जब मैं था तब गुरु नहीं
   अब गुरु हैं हम नाहिं
   प्रेम गली अति साँकरी
   ता मैं दो न समाँहि “
     बेटा प्रेम रस पीने की चाह रखने वाला कभी मान नहीं रख सकता, एक म्यान में दो खड्ग तो साथ साथ रह ही नहीं सकते।
       लोई कबीर की सच्ची साथिन थी वह कबीर के कहे को कंठस्थ कर लेती और कमाल को सुनाया करती जिसके आधार पर ही कमाल कबीर के बारे में बहुत कुछ जान पाया और लिपिबद्ध करता गया । जब कबीर ने जाना कि किस तरह लोई कमाल को उनके कहे दोहों और उक्तियों को  लिखवा रही है , तब उन्होंने लोई  से कहा - " आज मैं मुक्त हो गया आज कोई फांस ना रही “-
   “कबीरा हम गुरु रस पिया 
     बाकी रही न छाक
    पाका कलस कुम्हार का 
    बहुरि न चढसी चाक “
       कबीर जो देखते उसी पर कुछ न कुछ कह देते उनका कहना था कि -   
    “मैं कहता हूँ आँखन देखी
    तू कहता कागद की देखी “
    मंदिरों में भीड़ देखकर कबीर गा उठे -
   “ऐसी दुनिया भई दिवानी
    भक्ति भाव नहीं बूझै जी
     कोई आवे तो बेटा माँगे
    कोई आवे तो दौलत माँगे
    कोई करावे ब्याह सगाई
    साँचे का कोई गाहक नहीं “
         इस पर कुछ लोग कबीर की हत्या की साजिश करने लगे तो वे निडर होकर बोले -
 “जा को राखे साइयाँ मारि न सक्कै कोय
 बाल न बाँका करि सकै जो जग बैरी होय
      आगे कमाल कहते हैं कि मेरे पिता ने जोगियों पर कहा है कि - “ रामा, श्रंगी चमकाने से क्या होता है ? सारे बदन पर भभूत मल लेने से क्या मन का मैल जल जाता है , अगर नंगे रहने से ही योग हो जाता तो काशी के सारे ढोरों को योगी क्यों नहीं कहा जाता ?”
    “मन न रँगाए , रँगाए जोगी कपरा
   आसन मारि मँदिर में बैठे
   नाम छाँडि पूजन लगे पथरा
   कनवा फडाय जोगी जटवा  
बढौले “
  दाढ़ी बढाय जोगी है गैले बकरा “
     आगे एक ब्राह्मण द्वारा गुजरती हुई महिलाओं को  माला फेरते हुए ताकते देख कबीर बोल पड़े -
   “माला फेरत जुग भया 
    फिरा न मन का फेर
    कर का मनका डारि दे 
    मन का मन का फेर “
   एसे ही पिंडदान के लिए लोगों को सिर मुंडवाते देख कबीर कह उठे -
  मूँड मुँडाये हरि मिलैं 
 सब कोई लेओ मुँडाय
 बार बार के मूँडते भेड़ न बैकुँठ जाय
      कबीर कहते हैं -“भीड़ की भीड़ यह साधुता के नाम पर जो भिखमंगों की जमात चलती है वह क्या दूसरों की मेहनत से कमाए हुए माल को हराम में नहीं खाती उस अन्न का फल ग्रहस्थ भोगते हैं साधु उसे  खाकर भगवान को पाते हैं , यह कैसे हो सकता है ? ये सब तो शून्य की आशा में  वनखंड जाने वाले भटके हुए लोग हैं यह धर्म के नाम पर मुफ्त खाने वाले अधर्म कर रहे हैं ।”
      कमाल कहते हैं कि जब कबीर को गुरु रामानंद ने ठुकराया तो कबीर ने कहा -"क्या राम मेरा नहीं है ।" रामानंद हतप्रभ रह गए और चिंतन में डूब गए । अगले दिन जब कबीर से सामना हुआ तो रामानंद कह उठे -"कबीर मैं अँधा हो गया था सारा ब्रह्मांड  राम है यह भेद  मनुष्य के बनाए हैं , वही राम तू है , वही गंगा है , राम तो सबका है ।" 
      कबीर को लगा जैसे वह मुक्त हो गया खुशी खुशी लोई को बताता है तब वह हंसकर कहती है -“मुझे तो तू वैसा ही लग रहा है ब्राह्मण के मना कर देने से तू राम का नहीं रहा और उसके छू देने भर से तू मुक्त हो गया यह क्या बात हुई।”
कबीर गा उठे -
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत
कह कबीर पिउ पाइए
मन ही की परतीत
    कमाल कहते हैं - मेरे पिता अद्भुत थे उन्होंने कहा था -
“काल करे सो आज कर 
आज करै सो अब्ब , 
पल में परलै होएगी 
बहुरि करेगा कब्ब “
     कर्तव्य के लिए वे देरी नहीं सह सकते थे पर मैं सचमुच कुछ न कर सका । प्रलय हो ही गई ।
     कबीर को चेलों ने डुबा ही दिया , क्योंकि मठ बना , धन आया और मोह ने सत्य को ढँक लिया । पर यदि मैं कुछ नहीं करता तो क्या यह भी ना कहूँ कि मेरा बाप वह ही नहीं था जिसे शून्य-शून्य कहकर सब बखानतें हैं । वे उसे महान कह देते हैं पर उसकी उन बातों को नहीं कहते जो उसका अपना चिंतन थी । वह संस्कृति का पुनर्जागरण था दीन जनता का पहला स्पष्ट स्वस्वर निनाद था पर लोगों ने उसे दबा दिया और उसको शून्यवाद से ढँक दिया ।
       रांगेय राघव जी ने कबीर पर गहन अध्ययन किया और उनके कहे हर शब्द को इस पुस्तक में लगभग समाहित किया है। कबीर अद्भुत थे जिन पर लिखने का साहस रांगेय राघव ही कर सकते थे ।

उन्हें शत शत नमन
मधूलिका श्रीवास्तव

परिचय

मेरा परिचय—

मधूलिका श्रीवास्तव 
संस्थापक सदस्य व संचालिका 
श्री अरविन्दो स्कूल भोपाल
जन्म - 10:5:1959
जन्म स्थान-नागपुर (महाराष्ट्र)
शिक्षा - एम .ए.संस्कृत ( स्वर्ण पदक)
  एम. फ़िल.भाषा शास्त्र एवं बी. जे .
पिता:- स्व. श्री हरशरण लाल वर्मा 
असिस्टेंट कमिश्नर ,सेंट्रल एक्साइज एवं कस्टम्स 
माता:- स्व. श्रीमती कमल वर्मा 
पति:- श्री ब्रजमोहन श्रीवास्तव 
राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय सचिव 
राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी,नई दिल्ली
रचनाएँ - 
-अंतर्कथा (उपन्यास)(पुरस्कृत)
-मन की दहलीज़ (लघुकथा संग्रह)(पुरस्कृत)
-दस्तक (कहानी संग्रह)(पुरस्कृत)
-बचपन के संग जीवन के रंग (बाल कहानी संग्रह )पुरस्कृत 
-मंत्रमुग्ध जंगल की बाल कहानियाँ व कवितायें
अंतर्मन की गूँज (कहानी संग्रह)
प्रकाशित रचनायें-
लघुकथा गवाक्ष , साझा संकलन (लघुकथा)
क्षितिज और भी हैं साझा संकलन (लघुकथा)
साझा लघुकथा संकलन (2 लघुकथा)
शैशव की गिन्नियाँ , सफ़र सुहाना (साझा संस्मरण संकलन )     
सम्मान - 
-रत्नावली पुरस्कार 2022
तुलसी साहित्य अकादमी  
-कृति पुरस्कार 2023
हिन्दी लेखिका संघ म.प्र.भोपाल 
-पुष्पलता जोशी स्मृति राष्ट्रीय बाल कहानी प्रतियोगिता 2021 तृतीय पुरस्कार 
 -नाटक लेखन में प्रथम स्थान 
लेखिका संघ म.प्र. भोपाल 2022
- श्रीमती सुशीलादेवी केशवराम क्षत्रिय स्मृति बाल प्रतियोगिता- 2022 में द्वितीय स्थान 
-कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार 2023 हिन्दी लेखिका संघ म.प्र. भोपाल
-विशिष्ट कर्मठता सम्मान 2024
हिन्दी लेखिका संघ म.प्र. भोपाल
-कृति पुरस्कार 2025
बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल म.प्र.
-सीमा अपराजिता अवॉर्ड 2026
गुफ्तगू  साहित्य संस्था प्रयागराज उ.प्र.
-गंगा अधिकारी स्मृति बाल साहित्य सम्मान 
पिथौरागढ़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

नवगीत

समकालीनता का पर्याय: नवगीत
                                                                                                                                          - मधुकर अष्ठाना
          संवेदना जब अभिनव प्रतीक-बिम्बों को सहज रूप से सटीक प्रयोग कर अपने समय की विविध सामाजिक समस्याओं एवं विषम परिस्थितियों से जूझती साधारण जन के जटिल जीवन संघर्ष को न्यूनतम शब्दों में छान्दसिक गेयता के साथ मार्मिक रूप में परिणत होती है तो नवगीत की सृष्टि होती है। नवगीत की कुछ मुख्य शर्तें हैं, जिनमें गीत का पारम्परिक छान्दसिक शब्द संयोजन, सहज-सम्प्रेषणीय प्रतीक-बिंब योजना, कम से कम छोटे छन्दों में और दो या तीन बन्दों में विशिष्ट कहन के साथ कथ्य का प्रस्तुतिकरण एवं लोक संवेदना के प्रति निष्ठा, नवगीत में लोक-संस्कृति, लोक व्यवहार, पूँजीवाद समर्थक व्यवस्था के प्रति गंभीर आक्रोश, प्रशासन में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता, विषमता एवं विसंगति उत्पन्न करते रहने की साजिश, धार्मिक कट्टरता, शोषित-उत्पीड़ित आम आदमी की पीड़ा बेकारी, रोजी-रोटी की समस्या, मानवाधिकारों की उपेक्षा, आत्महत्या करते किसानों की व्यथा-कथा, महिलाओं की दयनीय दशा आदि वर्तमान अनुत्तरित प्रश्नों को समाहित करते हुए जो अभूत पूर्व कथ्य आज के नवगीतकार प्रस्तुत कर रहे हैं, वह लोक संवेदना का ही काव्य है, जनसाधारण की पीड़ा की सम्प्रेषणीयता हेतु ही नवगीत में आंचलिक संस्पर्श की रंगिमा एवं मिथकों की भंगिमा ने इसे नयी ऊँचाई प्रदान की। वर्तमान में ऐसी स्थिति आ गयी है कि नवगीत के सम्मुख काव्य की समस्त विधाएँ बौनी लगती हैं और नवगीत मुख्य धारा में अर्द्धशती यात्रा कर, लोक संवेदना का प्रमुख प्रवक्ता सिद्ध हो रहा है। प्रत्येक रचनाकार अपनी रागात्मक अनुभूतियों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का मार्ग स्वतः तलाश करता और स्वतः मार्ग प्रशस्त करता है जो उसकी मौलिक प्रवृत्ति का परिचायक होता है, यों तो लीक से हटकर चलना सरल नहीं है, किन्तु वास्तविक नवगीतकार तो वही है जो समतल-सुव्यवस्थित राजपथ का परित्याग कर वनांचल की कँटीली झाड़ियों से होता हुआ अपने दुर्गम पथ का स्वयं निर्माण करता है। यद्यपि छंदात्मक गीत की लयात्मक सर्जना के सोपानों पर चढ़ते हुए ही नवगीत की शिखरीय साधना सम्पन्न हो पाती है, किन्तु युग सापेक्ष सोद्देश्य चिन्तन की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ‘‘किसी भी उत्कृष्ट कला की तरह नवगीत भी अस्तित्व का साक्षात्कार कराता है। हमारा शरीर, हमारी आत्मा, हमारे स्वप्न, हमारी मृत्यु भी हमारे विचारों को प्रभावित करते हैं और नवगीत का एक-एक शब्द, एक-एक बिम्ब उसकी प्रतिच्छाया है।’’
          प्रत्येक दृष्य में एक विशिष्ट वातावरण का सृजन होता है, हम अपने नेत्रों से दिन-प्रति-दिन उन दृश्यों को देखते हैं और बार-बार दृष्टि पड़ने से उनका सूक्ष्म प्रभाव अन्तर्मन पर पड़ता है। उन दृश्यों द्वारा मुखरित भावनाओं, स्थितियों, मुद्राओं के अनुसार ही हमारे मन में बिम्ब उभरते हैं और वैसी ही मनस्थितियों में उसी के अनुरूप भावनाएँ प्रकट होती हैं, मनुष्य का मन कैमरे के सूक्ष्मदर्शी लेन्स की भाँति होता है। कुछ कैमरों की शक्ति भी अधिक होती है और लेन्स भी उच्चकोटि का लगा रहता है कि उनमें स्पष्ट और यथार्थ बिंब बोलते प्रतीत होते हैं। वाह्य दृष्यों से उत्पन्न वातावरण के प्रभाव से प्रकट दृश्य हमारे हृदय में तो निगेटिव रूप में आकार ग्रहण करता है जिसे पाजिटिव रूप में बिम्बों के माध्यम से उतारने पर प्रभावित विचार एवं संदेश स्पष्ट होते हैं। बिम्ब संबंधित दृश्य को न्यूनतम शब्दों में व्यक्त करने की ऐसी कला है जो शिल्प
की गुणवत्ता एवं वास्तविकता को विश्वसनीयता प्रदान करती है, साथ ही संश्लिष्ट भावनाओं को भी सहज एवं बोधगम्य बना देती है। एक निष्ठावान, ईमानदार अभिव्यक्ति के लिये प्रतिश्रुत रचनाकार को इसीलिये आवश्यकता है अपनी दृष्टि को उच्च गुणवत्तायुक्त लेन्स की तरह प्रयोग करने की क्षमता का
विकास करने की जिससे वास्तविक बिम्बों का सृजन कर सके, किन्तु आज का रचनाकार गहन अध्ययन एवं काव्य-साधना के बगैर काव्य-सिन्धु में छलाँग लगा रहा है, फिर उसकी नियति क्या होगी ? यों भी वर्तमान में नवगीत को विकृत करने की साजिश भी उसे गंभीर क्षति पहुँचा रही है। नवगीत से छान्दसिकता का लोप करने तथा नयी कविता की भाँति मुक्त काव्य बना देने को प्रयत्नशील कुछ रचनाकार न जाने किसी आदर्श से प्रेरित है। कुछ नवगीतकार नयी कविता और नवगीत दोनों विधाओं में समान रूप से सृजन कर रहे हैं जिससे प्रतीत होता है कि नवगीत के विशिष्ट अधुनातन रूप में स्वयं की अनुभूतियों को व्यक्त नहीं कर पाते और इतिवृत्तात्मकता, वायवीयता एवं काल्पनिकता से ही उन्हें संतुष्टि मिल पाती है या नवगीत के प्रति निष्ठा और आत्म विश्वास के अभाव का आग्रह उन्हें अन्य विधा को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने हेतु प्रेरित करता है। नवगीत, एक ही बिम्ब से विस्तृत और गंभीर कथ्य प्रस्तुत करने की विशिष्ट शैली का नाम है, जिसमें न्यूनतम शब्दों का प्रयोग अनिवार्य है। परम्परागत गीतकारों अथवा नयी कविता से संतुष्टि प्राप्त करने वाले रचनाकारों को नवगीत रास नहीं आता, किन्तु किसी लोकप्रिय विधा को जान-बूझ कर विरूपित करने की चेष्टा करना उचित नहीं कहा जा सकता, छान्दसिकता के अभाव में नवगीत की गेयता आहत होती है और न वह नवगीत कही जा सकती, न ही नयी कविता, इसके साथ ही यह तथ्य है कि नवगीत लोक संवेदना का काव्य है लेकिन गेयता के अभाव में वह जन-साधारण से दूर हो जायेगी, जिसकी पीड़ा को सम्प्रेषित करने के लिये सृजन किया जाय, उसी की जबान पर न चढ़े तो वह रचना उद्देश्यहीन हो जायेगी, अतः यदि नवगीत को जन-जन तक व्यापक बनाना है तो गेयता एवं सहजता अनिवार्य तत्त्वों को दर किनार नहीं किया जा सकता है। जहाँ तक दोहा तथा ग़ज़ल का प्रश्न है, ये नवगीत की सहयोगी विधाएँ हैं जिनसे इसे कोई क्षति पहुँचनेवाली नहीं प्रतीत होती है। नवगीत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं चर्चित आचार्य प्रो० देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' भी दोहा तथा गजल को नवगीत की सहयोगी विधा मानते हैं और स्वयं भी प्रतिष्ठित दोहाकार एवं श्रेष्ठ गजलकार हैं।
          वर्तमान युग में नवगीत काव्य-संसार एवं समकालीनता का पर्याय बन चुका है और इसको पृथक कर अपने युग की पहचान असंभव प्रतीत होती है| जीवन की आपाधापी में एक ऐसी लक्ष्यहीन दौड़ चल रही है जिसका अंत अंतिम साँस के ही साथ होता है। विखण्डन, बिखराव, विसंगति, विषमता की परिधि में जीवन की उन्मुक्त सहजता एवं स्वाभाविकता जो उसकी स्वभावगत विशेषता है, चिन्ताओं एवं समस्याओं में उलझ कर तार-तार हो चुकी है और प्रत्येक व्यक्ति एक बनावटी जीवन जीने को विवश है, जिसमें मन रोता है, किन्तु अधरों पर मुस्कान रहती है। संवेदनाहीन व्यवस्था के प्रति प्रत्येक हृदय में आक्रोश एवं प्रतिरोध का सागर भरा है। मानव की स्वाभाविक सहनशक्ति को निर्मम परिवेश ने सोख लिया है और जिजीविषा के पथ में त्रासदी बढ़ती जा रही है, ऐसी जटिल परिस्थिति में नवगीत ही पाखण्ड को खण्ड-खण्ड करता हुआ, अँधेरे को छिन्न-भिन्न कर, छल-छद्म के पर्त दर पर्त छिलके उतारता, मानवीय अस्मिता को जीवन्त बनाने को सफल प्रयास कर रहा है, निश्चय ही नवगीत ने मानवता को नूतन जीवनशक्ति प्रदान की है और समय की आवश्यकता के अनुरूप अभिव्यक्ति में जन साधारण की त्रासदियों एवं कुण्ठाओं को पूरी ईमानदारी के साथ यथार्थ रूप में चित्रित करते हुए पाठकों को इस दिशा में चिन्तन करने हेतु प्रेरित किया है जिसके दूरगामी परिणाम निकलने की प्रबल संभावना है। समय की धारा अविच्छिन्न रूप से निरन्तर आगे बढ़ती रहती है, किन्तु धारा की गति के साथ तटवर्ती दृष्य भी परिवर्तित होते रहते है और यही परिवर्तन तत्सम्बन्धी अनुभूतियों एवं भावनाओं के कारण हमारी अभिव्यक्ति की प्रवृत्तियों में भी बदलाव लाता है तथा परम्परागत रूढ़िग्रस्त विचारों में भी नूतन दृष्टिकोण से परिपूर्ण अभिनव चेतना जाग्रत कर देता है। भौतिक जगत की अपेक्षा साहित्य जगत में परिवर्तन की प्रक्रिया अधिक तीव्र होती है और इसमें शीघ्र परिलक्षित होने लगता है। जिसके परिणाम स्वरूप समयानुकूल तथा आवश्यकतानुरूप जनाकांक्षाओं की अपेक्षा में सक्षम साहित्य का सृजन होता है, जिसमें युगबोधी समकालीन परिवेश के साथ भाव-शिल्प-शब्द विन्यास प्रतीक-बिम्ब कथ्य एवं कहन का विकसित एवं नूतन स्वरूप स्वतः प्रकट होने लगता है जिसकी काल सापेक्षता, प्रासंगिकता तथा अभिनव प्रयोगशीलता टटकेपन का एहसास कराने में सक्षम होती है तथा जन-जन की संवेदनाओं से जोड़ती है। परिष्कृत, सुसंस्कृत, न्यूनतम शब्दों की संरचना, परस्पर व्यवहार में प्रयुक्त सहज एवं बोधगम्य प्रवाहपूर्ण भाषा और अभिव्यक्ति में सत्यनिष्ठा, छान्दसिक लयबद्धता प्रवाहपूर्ण भाषा और अभिव्यक्ति में सत्यनिष्टा, छान्दसिक लयबद्धता के साथ लोकमानस की निकटता सामाजिक चेतना के विविध आयामों को व्यापक बनाती है जिसकी सामर्थ्य एक मात्र नवगीत में ही दिखाई पड़ती है।
          युग परिवर्तन के साथ, वैयक्तिक स्थापनाओं के साथ, तात्कालिक समस्याओं तथा आस्था विश्वासों के साथ और संस्कृति एवं मानव मूल्यों के क्षरण के साथ, इनके अतिरिक्त अनेक अपरिहार्य विसंगतियों तथा हर क्षेत्र में अव्यवस्थाओं के फल स्वरूप गीत कब नवगीत में परिवर्तित हो गया, इसे तो डॉ० शंभुनाथ सिंह ने पहचाना और सामयिक आवश्यकता के अनुरूप नयी कविता के समकक्ष नवगीत नाम से अविहित किया, जो अब तक किसी भी कालखण्ड में अप्रासंगिक नहीं घोषित किया जा सका, जबकि इसके विपरीत अनेक विधाएँ एक आंदोलन की तरह आई और अपनी क्षणिक चमक दिखा कर समय के गर्त में विलीन हो गईं। नवगीत की रचनात्मक प्रवृत्ति में अनेक गुणात्मक उपलब्धियाँ, उसके कलेवर, शब्द-विन्यास, भाव एवं कथ्य के संरचनात्मक धरातल पर अभिनव शिल्प में परिलक्षित हुई, जिनमें तीक्ष्ण धार है, अपूर्व तेवर है और ऐसी मारक क्षमता है, जो प्रत्येक मन में संवेदना उत्पन्न कर पाषाण को भी पानी-पानी कर देती है। अनेक नवगीत के विद्वानों ने अपने व्यक्तिगत अहम की संतुष्टि हेतु अलग-अलग नामकरण करने का प्रयास किया, किन्तु उन्हें पाठकों ने नकार दिया और अन्ततः नवगीत शब्द ही आरूढ़ हो गया जो आधी शताब्दी की यात्रा पूर्ण करते हुए वर्ष बहुआयामी हो चुका है और वर्तमान समय में काव्य की मुख्यधारा बन चुका है, नया गीत, आज के गीत, ऐंटीगीत, ताजागीत, टटके गीत, प्रतिबद्ध गीत, जनबोधी गीत, जनवादी गीत, जनगीत, परागीत, पुनर्नवगीत, समकालीन गीत, नवान्तर गीत आदि नाम नवगीत के सम्मुख अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर सके| उक्त नामधारी स्वरूपों रंग-प्रभाव-आचरण-संबोधन-बुनावट कसावट एवं समस्त आनुषंगिक परिवर्तन संपूर्णता के जिस बिन्दु पर एकाकार होकर एकाग्र एकात्मता ग्रहण करते हैं, वहीं वास्तविक नवगीत की संज्ञा सार्थक करता है| अनेक रूपों में भी गीत की आत्मा, उसका शाश्वत भाव, उसका चिन्तन, उसकी संवेदना चेतना को प्रभावित एवं सकारात्मक चिन्तन की प्रेरणा देती है। नवगीत की तथ्यपरकता, समसामयिक संवेदनशीलता उसकी प्रासंगिकता एवं सम्प्रेषणीयता के गुणत्व का बोध कराती है, जब हम हिन्दी काव्य के गत आधी शताब्दी से चली आ रही धारा का अनुशीलन एवं मंथन करते हैं तो नवगीत के अतिरिक्त अन्य कोई विधा इतनी भाव-प्रवणता से लोक संवेदना का साक्षात्कार नहीं कराती है, जिसमें जनसाधारण के दुख-सुख और समाज में व्याप्त विसंगतियों का जीता- जागता चित्रण हो, मानव मूल्यों के क्षरण की पीड़ा हो, भूख-प्यास, शोषण उत्पीड़न का यथार्थ चित्रण हो, जिसमें राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक भ्रष्टाचार-विषमता छल-छद्म-पाखण्ड और कुरीतियों का कच्चा चिट्ठा हो और प्रतिरोध एवं आक्रोश का तेवर हो। नवगीत आम जनता के जीवन से जुड़ा उनकी परिधि के हर पहलू का कालजयी गायन है जिसका युग बोधीय समकालीन प्रदेय शब्दातीत है।
           सर्व प्रथम गीति रचनाओं में नूतनता का समावेश हमे वर्ष 1952 में अज्ञेय के सम्पादन में प्रकाशित द्वितीय तारसप्तक में दिखाई पड़ता है जिसकी प्रखर पुनरावृत्ति वर्ष 1958 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा सम्पादित संकलन (गीतांगिनी) में प्रकाशित गीतों में होती है, जिन्हें सर्वप्रथम नवगीत अथवा नये गीत की संज्ञा दी गयी। तत्कालीन परिवेश में उक्त काव्य संकलन ने इतना प्रभावित किया कि अनेक पत्रिकाओं ने वैसे ही गीतों के विशेषांक प्रकाशित किये और उस नये प्रवर्तन के तथा गीतों के समसामयिक युग बोधक अभिनव कायाकल्प के सम्बन्ध में आचार्यों, विद्वानों एवं गीतकारों में चर्चा-परिचर्चा का स्वरूप सबको आंदोलित कर गया। पूरे भारत के हिन्दी काव्य जगत में स्थान-स्थान पर गोष्ठियों का आयोजन होने लगा, जिसमें नागार्जुन, धर्मवीर भारती, वीरेन्द्र मिश्र, डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, रमेश रंजक, नईम, देवेन्द्र कुमार, प्रो० देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, गुलाब सिंह, उमाकांत मालवीय, रवीन्द्र भ्रमर, किशन सरोज़ आदि गीतकार सर्वाधिक प्रख्यात हुए, जिन्होंने गीतों को नयी दिशा देकर नवगीत का बीज साहित्य की उर्वर धरती पर बोया, जो आज विशाल वट-वृक्ष हो गया है, जिसकी छाया में साधना कर कितने रचनाकार बोधिसत्व होते जा रहे हैं। बोधिसत्व होने का अर्थ है अभिव्यक्ति की इयत्ता में निजी अस्मिता को विलीन कर समष्टि को समर्पित हो जाना, जिसकी विशिष्ट प्रविधि का आविष्कार कर तत्कालीन गीत महर्षियों ने अभिनव सौंदर्यबोध की सृष्टि की जो नवगीत की प्रमुख विशेषता है। वर्तमान नवगीत मन एवं मस्तिष्क का समन्वय है जिसमें यथार्थ एवं शिल्प के प्रतीकात्मक बिम्ब अपनी आनुभूतिक, विश्वसनीय, तार्किक अभिव्यक्ति से रचनाकारों ने संवेदना के प्रतिमान स्थापित कर, काव्य-जगत को नूतन आयाम दिया।
          प्रारम्भ में जो नवगीत रागात्मक आंचलिकता से परिपूर्ण था, कालान्तर में विकास के द्वितीय चरण में नगरीय विसंगतियों, समसामयिक समस्याओं से जूझता अनास्थावादी हो गया जिसमें वर्ग संघर्ष, पूँजीवादी व्यवस्था में शोषण उत्पीड़न, रूढ़ियों पाखण्डों के विरुद्ध आक्रोश एवं जुझारू भाव व्यक्त होने लगते हैं| इस क्रम में सोम ठाकुर, उमाकान्त मालवीय, प्रो० देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, माहेश्वर तिवारी, देवेन्द्र कुमार, शलभ श्री राम सिंह, शांतिसुमन तथा नचिकेता आदि ने पुनः नवगीत में अस्तित्ववादी वैचारिकी को प्रतिष्ठित किया और सौन्दर्यबोध में भी विचारधारा के परिवर्तन से जिसके अंतर्गत ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ (वर्ष 1969) का प्रकाशन चन्द्रदेव सिंह के संपादन में हुआ जिसे नए मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है, जिसमें सम्पादक के अनुसार वर्ष 1941 से 1961 के मध्य सृजित एवं प्रकाशित ऐसे गीतकारों को प्रस्तुत किया गया है, जिसमें उस कालखण्ड की मानुषी मनस्थिति का स्पष्ट दर्शन मिलता है। इस संकलन में निराला और माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं के साथ डॉ०शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रामचन्द्र 'चन्द्रभूषण', चन्द्र देव सिंह, सोम ठाकुर, सूर्य प्रताप सिंह, रवीन्द्र ‘भ्रमर’, केदार नाथ सिंह, देवेन्द्र कुमार, अमरनाथ, नईम, माहेश्वर तिवारी आदि चालीस रचनाकारों का प्रतिनिधित्व हुआ है। डॉ० राजेन्द्र गौतम के अनुसार नवगीत आज अपने समय की जिह्वा है, वह युगबोध को समग्रता से व्यक्त कर रहा है, काव्य-तत्त्व को अक्षुण्ण रखकर समय के सत्य को उद्घाटित करने का महत्वपूर्ण कर्म नवगीत कर रहा है। ( उत्तरशती का गीत-नवगीत) वर्ष 1950 से 1965 की अवधि में लोक संवेदना नवगीत की प्रमुख प्रवृत्ति बन गया और उसके उपरान्त नवगीत कथ्य-शिल्प की दृष्टि से लोक संवेदना के नये आयाम प्रस्तुत करता वर्ष 1980 तक ठाकुर प्रसाद सिंह की परम्परा का अनुगामी बन कर लीक-बद्ध यात्रा करता रहा, किन्तु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं रह सकी। नवगीत में पुनः परिवर्तन के लक्षण दिखाई पड़ने लगे और वह अपनी नूतन आभा से काव्य जगत को प्रभासित करने लगा, उक्त अवधि में 'नवगीत दशक' ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई 1982, 83, 84 में लगातार डॉ० शम्भुनाथ सिंह के सम्पादन में प्रकाशित इन संकलनों में तीस नवगीतकारों के प्रतिनिधि गीत संकलित हैं जिसने नवगीत को समूह-मन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, फलस्वरूप नवगीत को नयी दिशा मिली जिसने नवगीत का निखरा रूप प्रस्तुत किया, इसके अतिरिक्त 'अर्धशती' भी प्रकाशित हुई जिससे नवगीत को नयी प्रतिष्ठा के साथ सुदृढ़ आधार मिला| इसमें 81 नवगीतकारों का प्रतिनिधित्व है।
          इसी प्रकार 'कविता-64' संपादक ओम प्रभाकर तथा ‘यात्रा में साथ-साथ’ जिसके संपादक प्रो. देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र‘ हैं और ‘नवगीत एकादश’ जिसका संपादन डॉ० भारतेन्दु मिश्र ने किया है आदि संकलन नवगीत की प्रमुख प्रवृत्तियों को भली-भाँति दर्शाते हैं। उपर्युक्त नवगीत संकलनों में तत्कालीन चर्चित नवगीतकारों की प्रतिनिधि रचनायें संकलित हैं, जो नवगीत को नूतन स्वरूप में परिभाषित करने में सक्षम हैं। ऐसे श्रेष्ठ रचनाकारों में डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, उमाकान्त मालवीय, रवीन्द्र भ्रमर, वीरेन्द्र मिश्र, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, श्री कृष्ण तिवारी, नईम, ओम प्रभाकर, मुकुट सक्सेना, रामचन्द्र 'चन्द्रभूषण', किशोर काबरा, अवध बिहारी श्रीवास्तव, अनूप अशेष, नचिकेता, राम सेंगर, विजय किशोर ‘मानव’, मयंक श्रीवास्तव, इसाक ‘अश्क’, कुअँर बेचैन, विनोद निगम, शांति सुमन, जहीर कुरेशी, योगेन्द्र दत्त शर्मा, अश्वघोष, श्याम नारायण मिश्र, कौशलेन्द्र, गुलाब सिंह, उमाशंकर तिवारी, नीलम श्रीवास्तव, कैलाश गौतम, दिनेश सिंह, कुमार रवीन्द्र, राधेश्याम शुक्ल, बुद्धिनाथ मिश्र, डॉ० राजेन्द्र गौतम आदि प्रमुख रूप से उभर कर सामने आये, जिन्होंने नवगीत की अनवरत यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया। नवगीत की विकास यात्रा में अनेक परिवर्तनों के साथ अवरोधों की झड़ी लगती रही, किन्तु इसका प्रवाह और वेग अप्रतिहत रहा। अन्य विधाओं, परम्परावादियों एवं नयी कविता के विद्वानों के श्रृंखलाबद्ध आक्रमण भी उसे आतंकित नहीं कर सके और हर संघर्ष के उपरान्त वह और भी वेग एवं पराक्रम से अग्रसर होकर दिन प्रतिदिन निखरता रहा। नवगीत की विकास यात्रा के सहयात्री सुप्रसिद्ध साहित्यकार और श्रेष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से नवगीत की संरचना, विविधता और विशिष्टता की पहचान कर लिखा है। ‘नवगीत का वैविध्य अपने संसार में उपस्थित है, जीवन्त है, विधाओं के विकास में कोई भी चीज मरती नहीं इसी प्रकार नवगीत को भी अमरत्व प्राप्त हुआ है। पहले कुछ वर्षों के कालखण्ड में गीत के कथ्य, उसकी कहन, उसके शिल्प, सभी में बदलाव आया है। गीत की कहन अधिक सहज हो चुकी हैं। यह इक्कीसवीं सदी का नवगीत है, जो कई पड़ावों से होता हुआ चौथे पड़ाव पर है’, यह स्थिति अब साफ हो चुकी है कि वर्तमान समवर्ती विधायें जो नवगीत के 'उत्तरायण' ऊपर आक्रामक हैं, उसे पकड़ पाने में नितान्त असमर्थ हैं और उनका महत्व भी दिनोदिन हास की ओर पतनोन्मुख है। अब साहित्य मर्मज्ञ यह पहचान चुके हैं और महसूस भी कर रहे हैं, कि वर्तमान तो नवगीत का है ही, भविष्य भी उसी का है। नवगीत जीवन के समस्त आयामों को आत्मसात कर चुका है और इससे हटकर काव्य-सृजन की कल्पना भी असंभव लगती है। यद्यपि पूर्व में भी नवगीत में नये-नये हस्ताक्षरों का स्वागत योग्य पदार्पण होता रहा, किन्तु वर्तमान में नवगीतकारों की पूरी फौज ही काव्य जगत में नये कथ्य, नये शिल्प और नयी कहन के साथ प्रत्येक चुनौती को तैयार है जिसमें शीलेन्द्र कुमार सिंह ‘चौहान’, राधेश्याम ‘बन्धु’, भारतेन्दु मिश्र, महेश अनघ, ओमप्रकाश सिंह, जगदीश श्रीवास्तव, अशोक गीते, मधुकर अष्ठाना, हरीश निगम, वीरेन्द्र आस्तिक, यश मालवीय, निर्मल शुक्ल, गणेश गम्भीर, सुधांशु उपाध्याय, ब्रजनाथ श्रीवास्तव, रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’, विनय भदौरिया, मृदुल शर्मा, मधुसूदन साहा, श्याम निर्मम, रविशंकर पाण्डेय, विनोद श्रीवास्तव, जयकृष्ण राय ‘तुषार’, कुमार शिव, रामबाबू रस्तोगी, जय चक्रवर्ती, राजेन्द्र वर्मा, सुरेश श्रीवास्तव, जवाहर ‘इन्दु’, रमाकान्त, सुश्री शरद सिंह, कृष्ण वक्षी,अतुल ‘कनक’, विष्णु विराट, सत्य नारायण, डॉ० देवेन्द्र, विश्वनाथ पाण्डेय, लालसा लाल ‘तरंग’, हरीश सक्सेना, अश्वघोष, रमेश पन्त आदि सैकड़ों रचनाकार निरन्तर सृजन में संलग्न हैं और प्रतिवर्ष प्रकाशित हो रही नवगीत कृतियों की गणना भी संभव नहीं रह गयी है। नवगीत कोई आंदोलन नहीं, बल्कि गीत का क्रमिक विकास है जो समयानुकूल परिवर्तनशील और सर्वदा समकालीन अभिनव सौन्दर्यबोध का जीवन्त रूप है, जिसमें परम्परा नवता और गेयता का अपूर्व सामंजस्य है और कथ्य को न्यूनतम शब्दों में प्रतीकों बिम्बों और मिथकों के माध्यम से हर कथ्य को नयी शिल्पिता में नयी कहन की रंगिमा-भंगिमा में मुहावरों लोकोक्तियों तथा देशज शब्दों के प्रयोग से नये शब्द विन्यास में, सहज रूप से प्रस्तुत करने की क्षमता है जो जन-साधारण के निकट, उन्हीं की अनुभूतिक यथार्थ गाथा है।
          नवगीत के संदर्भ अब शोध ग्रन्थों एवं संदर्भ का अभाव नहीं है। अनेक विश्व विद्यालयों में नवगीत के सम्बन्ध में शोध हुए हैं और संदर्भ ग्रन्थों के रूप में 'नवगीत का युगबोध' ( राधेश्याम ‘बन्धु’) तथा ‘शब्दपदी’ (निर्मल शुक्ल) अद्यतन प्रकाशित ग्रन्थ हैं जिनकी साहित्य जगत में व्यापक सराहना हुई है। डॉ० राजेन्द्र गौतम का मानना है कि- जब हम समकालीन कविता के संदर्भ में नवगीत के समग्र आकलन की बात करते हैं तो हमारा मानना यह भी है कि नवगीत मूल्य संस्थापक कविता है, मूल्य स्थापना की दिशा में 'गीत नवान्तर' पाँच खण्ड (मधुकर गौड़), ‘नये-पुराने’ (दिनेश सिंह) तथा (निर्मल शुक्ल) के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं ने अभूतपूर्व कार्य किया और नवगीत के साथ-साथ नवगीतकारों को भी उचित स्थान देकर गरिमामण्डित किया। वर्तमान में तो कतिपय पूर्वाग्रही पत्रिकाओं को छोड़कर हर पत्रिका नवगीत विशेषांक निकालने की दौड़ में प्रयासरत हैं। इन सभी पत्रिकाओं में वर्तमान में 'अपरिहार्य' भाग १, भाग-२ नवगीत विशेषांक (मधुकर अष्ठाना) मानक रूप में सराहना एवं प्रसंशा का पात्र सिद्ध हुआ है जिसमें भारत के सर्वाधिक विद्वानों के आलेख एवं नवगीत संचयित हैं| इसके अतिरिक्त भोपाल से प्रकाशित ‘प्रेसमेन’ (साहित्य संपादक मयंक श्रीवास्तव) ने नवगीतकारों को प्रस्तुत कर, आलोचना एवं समीक्षा के क्षेत्र में अभिनव क्रांति का बिगुल बजाया है, जिसकी पूरे देश में सराहना की जा रही है| दूर-दूर बसे हुए, परस्पर अपरिचित नवगीतकारों के चित्र, परिचय एवं प्रतिनिधि नवगीत प्रकाशित कर पूरे भारत की नवगीतीय नूतन मेधा को जागरुक सृजन की नयी दिशा का बोध कराया है| भौतिकवादी वर्तमान सभ्यता में संवेदना का नितान्त अभाव है और संवेदनात्मक संरचना का पुनर्निर्माण ही नवगीत का मुख्य उद्देश्य है। नवगीत के मर्मज्ञ, आलोचक, समीक्षक श्री कुमार रवीन्द्र के शब्दों में -'आज का नवगीत वर्तमान सभ्यता की विकृतियों से जूझते हुए मानव जिजीविषा के उन शाश्वत स्रोतों की खोज में है, जिनकी बदली परिस्थितियों में नये जीवन-मूल्यों और मानव अस्मिता की नयी कसौटियाँ भी गढ़ी जा सकें, पुरातन और नवीन के संधि-स्थल पर खड़े आज के गीत में पुरातन के प्रति मोह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और जो होना भी नहीं चाहिये| किंतु नवगीत के प्रति जो आशंका का भाव अभी कुछ समय पहले तक उसमें प्रमुखता से उपस्थित था, कम हुआ है| नया गीत एक ऐसी भाव-भूमि पर खड़ा है, जहाँ मानव मन के उत्सवी क्षणों का पुनरुत्थान संभव है|' भौतिकवादी सभ्यता के नकारात्मक प्रभाव को शून्य करने का संकल्प नवगीत के क्रांतिकारी अभियान के व्यापक आधार देता है जिसमें मानव मूल्यों के प्रति प्रबल आस्था एवं विश्वास है| प्रो० देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' भी इस भावना को निम्न रूप से व्यक्त किया है- “संस्कृतियों के नंदन में हास और विघटन होता है, वैसा सृष्टि की सहज सामान्य विकास प्रक्रिया के दौरान नहीं| इस तथ्य को एक या दो सहस्त्राब्दियों के इतिहास में ही नहीं प्रत्युत सुदूर प्रागैतिहासिक युगों के घटनाचक्र में भी हमको देखना होगा| जब मानव मूल्यों पर आघात होता है, तब चेतना का प्रवाह भी वामपन्थी हो जाया करता है, जिसके फलस्वरूप हमारे भीतर निषेध का नाशकारी वासुकि अपने असंख्य फणों से गरल के फूत्कार पूर्ण स्फीत-फेन के अग्निल समुद्र का उद्वमन करता है|' इसीलिये वर्तमान मशीनी सभ्यता की संवेदन-शून्यता के विनाश हेतु नवगीत जन-जन में सांस्कृतिक चेतना और मानव मूल्य के उत्सवी क्षणों की पुनर्स्थापना के लिये संघर्षरत हैं| नवगीत निषेधात्मकता के विरूद्ध वह शंखनाद है जिसकी प्रतिध्वनि बहुआयामी एवं दूरगामी है| यह सकारात्मक अन्तश्चेतना की आनुभूतिक रागात्मक पदार्थ का सामान है जो जनसाधारण की जीवन पद्धति से संगति दाता उन्हें उन्हीं की भाषा में संवाद का आमंत्रण देता है।
          वर्तमान नवगीत लोक-जीवन, लोक-संस्कृति, लोकभाषा और लोक तत्त्वों के यथार्थ को बिम्बित करता हुआ गहरी पैठ बना चुका है, चारणों, भाँटों एवं विदूषकों की मंडली मंचों तक ही सीमित हो गयी है। जनचेतना से दूर आर्थिक लोभ में जो साहित्य को विकृत करने के प्रयास में निरन्तर संलग्न हैं उन्हें साहित्य कभी क्षमा नहीं करेगा। नवगीत के प्रति समाज में एक साकारात्मक आश्वस्ति की भावना विकसित हुई है, जो नवगीतकारों को प्रेरणा देकर नवीन आशा का संचार कर रही है। इन परिस्थितियों से भलीभांति अवगत और नवगीत समर्थ विवेचक की दृष्टि में “समग्रतः हम कह सकते हैं कि आज का नवगीत रागात्मक अन्तश्चेतना के प्रवाह से उपजा एक ऐसा काव्य रूप है, जिसमें विचार और भाव-संज्ञाएँ एकात्म होकर प्रस्तुत हुई हैं| नया गीत चिंतनपरक तो है पर इसमें अनुभूति और चिंतन का अधिक प्रीड रूप में परिपाक हुआ है, साथ ही इसकी कथ्यात्मक और भाषिक संरचना में व्यापकता अधिक है। आंचलिक शब्द इसमें सहज होकर आते हैं, उनका आग्रह भी नहीं है। इधर के गीतों में बिस्वाग्रह और प्रतीक-कथन भी कम हुआ है और सहज प्रवाहमय बातचीत की शैली और भाषा की और रुझान बढ़ा है। नवगीत की ये विशेषतायें और प्रवृत्तियाँ जहाँ उसे व्यापक बनाती हैं वहीं सम्प्रेषणीय भी| नवगीत के साठवर्षीय विकास का परिवर्तनशीलता का, समकालीनता एवं युग-बोध का लोक- जीवन के समस्त आयामों को व्यक्त करने की आनूभूतिक यथार्थपरक रचना-प्रक्रिया, सहज संवादशैली, न्यूनतम शब्द-विन्यास में चिन्तन से उपजी विचारशीलता आदि ऐसे विशिष्ट उपादान है जो उसे सम्प्रेपणीच ही नहीं, कालजयी भी बनाते हैं, छायावादोत्तर गीत के क्षीर-सिन्धु-मंथन से उपजा नवगीत ही अब काव्य की मुख्य धारा है और अन्य अल्पकालिक विद्याओं की अपेक्षा इसका योगदान भी सर्वाधिक ही नहीं असीमित एवं शब्दातीत है और अभी तो इब्तिदाये इश्क है नवगीत के सम्मुख अनन्त आकाश है और सामर्थ्य भी जो संभावनाओं के प्रति आश्वस्त करती है।

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शुक्रवार, 16 अगस्त 2024

नवगीत कविता के समकालीन परिदृश्य के अदृश्य कवि : डॉ.जीवन शुक्ल ©आलेख : मनोज जैन

डॉ जीवन शुक्ल आलेख मनोज जैननवगीत कविता के समकालीन परिदृश्य के अदृश्य कवि : डॉ.जीवन शुक्ल 
                 ©आलेख : मनोज जैन 
      डॉ.जीवन शुक्ल जी, से मेरा पूर्व का कोई परिचय नहीं हैं। यों, तो समय-समय पर मेरा मिलना-जुलना अनेक कवियों से हुआ है। गीत-नवगीत के संकलनों से लेकर शोधसन्दर्भ ग्रन्थों तक की यात्रा में भी मुझे जीवन शुक्ल जी कहीं दिखाई नहीं दिए। इससे दो बातें निकलकर सामने आती हैं या तो मैं इन्हें नहीं पहचान सका या फिर उन संपादकों ने समय रहते इन्हें नहीं पहचाना, हो सकता जानबूझ कर दरकिनार कर दिया। बहरहाल, जो भी हो संकलनों में होने या ना होने से शुक्ल जी के साहित्यिक महत्व पर कोई फर्क नहीं पड़ता और ना ही उन्हें इसका कोई मलाल है।
           अमूमन, नैसर्गिक प्रतिभा के धनी व्यक्तियों के साथ ऐसा इसलिए किया जाता है कि वह अनावश्यक ऐसे मानी संपादकों के फेर में नहीं रहते, और ना ही अपने लिखे का बढ़-चढ़ कर महिमामंडन करते हैं। हाँ, एसे लोगों को अपने लिखे पर, गर्व जरूर होता है जिसे साजिशन कई बार 'दम्भ' की श्रेणी में रखकर एक नैरेटिव की तरह प्रचारित कर दिया जाता है। ऐसा राजनैतिक क्षेत्र में तो आम है ही, पर साहित्य में राजनीति से भी ज्यादा राजनैतिक पैंतरेबाजी देखने को मिलती है। इस पूरी कबायद में, प्रतिभा को हाशिये पर धकेल दिया जाता है। पर प्रतिभा तो प्रतिभा है वह अपनी जगह मुख्यपृष्ठ पर बना ही लेती है।
       खुजहा, फतेहपुर उत्तरप्रदेश में जन्में वरेण्य कवि डॉ.जीवन शुक्ल जी ऐसे ही प्रातिभ कवियों में से एक हैं, जिन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में, जो भी लिखा उद्देश्यपूर्ण लिखा। मैंने डॉ.जीवन शुक्ल जी के खरेपन को पहले सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म फेसबुक पर मेरे ही द्वारा संचालित समूह 'वागर्थ' में प्रस्तुत पोस्ट पर उनकी तार्किक, सारवान और तीखी टिप्पणियों से जाना, फिर यदा-कदा टेलिफ़ोनिक वार्ताओं से भी उन्हें पहचानने के भरपूर अवसर मेरे हिस्से में आये। 
           देखा जाय तो डॉ.जीवन शुक्ल जी की गिनती महाप्राण निराला की परम्परा के उद्भट विद्वानों में होती है, वैसे भी निराला जी ने इस आशय के संकेत स्वयं शुक्ल जी को दिए भी हैं। सम्बन्धों के मामले में शुक्ल जी सचमुच धनी रहे हैं। यह बात और है कि उन्होंने, अपने स्वाभिमान के चलते संम्बधों का कहीं कोई लाभ नहीं लिया, जबकि सच्चाई तो यह है कि, तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी स्वयं शुक्ल जी को सांसद का टिकिट देना चाहते थे। खैर, इस बात को यहाँ विस्तार देना विषयान्तर होगा।
         डॉ.जीवन शुक्ल जी को, जैसे-जैसे जानने और समझने का मौका मिला, उनका विराट व्यक्तित्व मेरे सामने और खुलता चला गया। निःसन्देह! शुक्ल जी के बड़े व्यक्तित्व के पीछे शुक्ल जी के ठोस विचार हैं, जो हर हाल में उन्हें दृण और रीढ़ के बल खड़ा रखते हैं। डॉ.जीवन शुक्ल जी बहुभाषाविद हैं। उर्दू, हिंदी,अंग्रेजी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में वे, साधिकार लिखते हैं। आपकी शैली में अकाट्य तार्किकता है जो पाठक को प्रभावित किए बिना नहीं रहती। 
       कथन की पुष्टि के लिए उनकी एक समानांतर - गीत कृति "दर्द साक्षर हो गया है" से दो-एक बातें उल्लेख करना चाहूँगा ; पहली बात, अपने आत्म कथ्य "ये गीत" शीर्षक में वे स्वयं अपने सन्दर्भ में लिखते हैं; वे कहते हैं कि "वादों की भाषा में, "मैं जीवनवादी हूँ," और आलोचना की बिरादरी की व्याख्या में सर्वकालिक !"
                   दूसरी बात, नवगीत को अपने शब्दों में परिभाषित करते हुए कवि डॉ जीवन शुक्ल जी ने, कम शब्दों में सटीक और प्रासङ्गिक बात कही है। वे कहते हैं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के साथ लिखा गया गीत ही 'नवगीत' है। मैंने, आरम्भ में संपादकों की खेमेबाजी का जिक्र किया था। इस बात के संकेत इस भूमिका में भी दिखलाई देते हैं। शुक्ल जी ने बड़ी साफगोई से लिखा है। वे कहते हैं कि;- "कुछ प्रतिबद्ध बौद्धिक बैतालिक साहित्य की धरती पर नए टापू बसाकर जिल्लेसुभानी होने का सुख जीना चाहते हैं। मुझे उनसे भी दुराव नहीं है क्योंकि पठारों, नदियों, पर्वतों और टापुओं के एकमिलन से ही धरती का सौंदर्य, साहित्य की थाती और मानवता के मुक्त विचरण का आंगन सजता है। चिंतन में,तथा शिल्प में भिन्नता तो मान्य है, पर वरेण्य है पर बिरादरी से विद्वेष अपने लिए ही घातक है।"  डॉ.जीवन शुक्ल जी के उक्त कथन के आलोक में बहुत कुछ छिपा है। प्रातिभ रचनाकारों को अपने समय के शोधसन्दर्भ ग्रन्थों में शामिल ना करने के कुत्सित इरादे को भी सांकेतिक रूप से इस कथन में जरूरी जगह मिली है। डॉ.जीवन शुक्ल जी स्वयं को या किसी अन्य को नकारने की बात कबीराना अंदाज़ में कहते हैं। उन्हें स्वयं को नकारे जाने का कोई मलाल नहीं, यह उनके स्वाभिमान की ठसक का उच्चतम प्रतिदर्श है, लेकिन उनका कहना है कि नकारने के लिए भी आप रचनाकार के व्यक्तिव और कृतित्व को पढ़ने का जो धर्म तुम्हारे हिस्से में आया है, उस धर्म का निर्वहन तो किया ही जाना चाहिए।
      मैं, डॉ.शुक्ल जी की, इस तार्किकता को प्रणाम करता हूँ। मेरी दृष्टि में हर लेखक और समीक्षक को, इस कोट को, अपने ज़ेहन में रखने की जरूरत है।
       " दर्द साक्षर हो गया है " डॉ.जीवन शुक्ल जी के 65 महत्वपूर्ण समानांतर गीतों का अनूठा दस्तावेज है जिनमें अपना समय खुलकर बोलता है। द्रष्टव्य है उनके एक महत्वपूर्ण गीत का अंश जिसमे उन्होंने साहित्यिक ख़ेमेबाजी का ख़ाका खुलकर खींचा है। 
         देखें उनके गीत का एक अंश;- "मेरा कद छोटा करने को/कोई बड़ी लकीर न खींची/लेकिन कीचड़ को उछालकर/तुमने होली ही कर डाली/सदा सर्वदा एक रंग ही/रहा प्रकट अपनी आँखों में/लदी हुई फल से हर डाली/उगे फूल उपवन शाखों में/मेरा उन्नत शिखर घटाने/नए क्षितिज किसने कब खोजे/लेकिन धूल भरे बादल से/तुमने अपने में जय पाली/"
                संग्रह के, लगभग सभी गीत पाठक का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचते है। भिन्न भावभूमियों पर सृजित इन गीतों में हमें जीवनानुभव की अनन्त छवियाँ स्पष्ट को देखने मिलती हैं। डॉ.जीवन शुक्ल जी के काव्य संसार में हम जितने गहरे उतरते हैं; अर्थ की व्यापकता उसी स्तर से जुड़ती चली जाती है। उनके रचनात्मक अनुशीलन में एक बात और जो मेरे देखने और समझने में स्वाभाविकरूप से आई है, वह है समय सापेक्षिक प्रासंगिकता। देश, दुनिया की स्थितियां जो भी हों, पर शुक्ल जी के गीत हों या कविता उनका रचनात्मक कथ्य आज भी उतना ही प्रासङ्गिक और धारदार है जितना, आज से पाँच दशक पहले के समय में हुआ करता था। 
         देखिए उनकी पुस्तक क़लम अभी ज़िंदा है" से एक गीत ;- ये वतन अपना नहीं /ये चमन अपना नहीं/बना लें अपना इसे/या चलें और कहीं/जिसके मन्दिर में/मुसलमा का ऐतबार न हो/जिसकी मस्ज़िद में/हिन्दुओं के लिए प्यार न हो/जिसके गुरुद्वारे में/सूफी को तसव्वुर न मिले/जिसके सीने में जिगर/हाथ में तलवार न हो/ये वतन अपना नहीं/ये चमन अपन नहीं/बना लें अपना इसे/या चलें और कहीं
                उक्त पंक्तियों को पढ़कर आप स्वयं निर्णय करें जिस सौहार्द की चाह या कामना कवि के मानस में है वह वर्तमास में आपको कहीं दिखाई देती है? आज कल चारों तरफ नफ़रत का विषाक्त वातावरण है। सच तो यह है सौहार्द्र की बात करने वाले को आज देशद्रोही ठहराया जा रहा है। इसी के साथ डॉ.शुक्ल जी की एक और 54, कविताओं की पुस्तक "बोलो प्राणों के अस्ताचल" पढ़ने का सौभाग्य मेरे हिस्से में आया। बोलो प्राणों के अस्ताचल में कवि ने कबीराना अंदाज में अपने जीवन के द्वैत को ख़ूबसूरती के साथ उकेरा है। इस पुस्तक में शैली के आधार पर रचनाओं को गीतों और नवगीतों में बाँटा जा सकता है। यह पुस्तक मूलतः शुक्ल जी के दार्शनिक पक्ष को पाठकों  के सामने लाती है। "बोलो प्राणों के अस्ताचल" की पृष्ठभूमि अन्य दोनों पुस्तकों की भाव भूमि से एक दम अलग है। वरेण्य कवि डॉ. जीवन शुक्ल जी के वारे में और भी सविस्तार लिखने का मन है।
       सच्चाई यह है कि मेरी लेखनी शुक्ल जी के भावों और विचारों को पकड़ने में असफ़ल रही है। शुक्ल जी असाधारण प्रतिभा और व्यक्तित्व के धनी हैं। स्वभाव में स्वाभिमानी अक्खड़पन है पर भीतर से उतने ही संवेदनशील हैं। उनके चिंतन में बहुत कुछ नया झलता है। तभी इसना सुलझा स्टेटमेंट उनका जीवन कोट है जिसे वह जीते हैं और सपने कथन का अनुसरण भी करते हैं। बकौल डॉ जीवन शुक्ल "ज्ञान और संपत्ति दोनों पर समाज का अधिकार है। दोनों का प्रयोग समाज के लिए होना चाहिए।"
       डॉ. शुल्क जी अपने भावों पर किसी तरह का कोई पर्दा नहीं डालते जब जो जैसा मन में भाव आता है उसे वैसा ही लिख देते हैं। पारदर्शिता उनके स्वभाव में है तभी तो वह अपने एक गीत में कहते हैं;-
              "जागूँ तो सोने का मन हो
               सोऊँ तो जागरण सताए
               गीत लिखूँ तो अधर न बोले
               मौन रहूँ मन जी भर गाए"
        सार संक्षेप में कहूँ तो वरेण्य कवि साहित्यकार डॉ जीवन शुक्ल का लिखा, जितना मैंने पढ़ा,और मैंने जितना उन्हें समझा, मुझे तो अच्छा लगा।
       आप भी पढ़ें!  किसी को ख़ारिज करने के लिए ही सही पर पढ़ें! हाँ, एक बात और बेशक लोगों को ख़ारिज कीजिए लेकिन ऐसा करने से पहले उन्हें एक बार पढ़ जरूर लें। समापन का समय है और ऐसे में मुझे अपने ही लेख का आरम्भिक भाव स्मृत हो आया। नवगीत दशक से लेकर अब तक के संकलनों में यदि डॉ शुक्ल होते तों शुक्ल जी के होने से उन दस्तावेजी संकलनों का मान ही बढ़ता और नहीं होने से शुक्ल जी जैसे मूर्धन्य व्यक्तित्व को कौन सा फर्क पड़ा!
                 डॉ.जीवन शुक्ल जी, शतायु हों
वैसे भी दार्शनिक तो  हमेशा अपनी मस्ती और लय में ही जीता हैं यह बात और है कि हम उस आनन्दमयी भाव दशा को समझ ही नहीं पाते! तभी तो वह लिखते हैं;
           मन तो पवन झकोरे सा है
           कभी इधर तो कभी उधर
           तुम्हीं कहो गंतव्य प्राण के
           अपना महामिलन कब होगा?
पता
मनोज जैन 
106 विट्ठलनगर गुफ़ामन्दिर रोड
भोपाल 
462030
9301337806


गुरुवार, 25 जुलाई 2024

कहाँ तुम चले गए : पुण्य स्मरण दादा माहेश्वर तिवारी जी को याद करते हुए - मनोज जैन

कहाँ तुम चले गए

कहाँ तुम चले गए : दादा माहेश्वर तिवारी जी को याद करते हुये 
__________


              मनोज जैन

                    एक

                कुछ सत्य ऐसे होते हैं जो भले ही अकाट्य क्यों न हों पर उन्हें अपना भावुक मन मानने को जरा भी तैयार नहीं होता। यथार्थ और वस्तु स्थिति से अवगत होते हुए भी मनः स्थिति सत्य को जानते समझते हुए भी बार-बार झुठलाना चाहती है। ऐसा ही एक सत्य हमारे सामने दिनांक 16, अप्रैल 2024 को घटित हुआ जिसकी पहली सूचना मुझे देश के यशश्वी कवि और दादा के मन के अत्यंत निकट रहने वाले यश मालवीय जी के माध्यम मोबाइल फोन पर मिली " मनोज भाई एक बुरी खबर है, शायद आपको मालूम नहीं माहेश्वर जी अब हमारे बीच नहीं रहे!
     यह वही अकाट्य सत्य था जिसे जिसे मन मानने को कतई तैयार नहीं था। मैंने सबसे पहले दादा के मानस पुत्र अग्रज योगेन्द्र वर्मा व्योम जी की वाल स्क्रॉल की उनकी स्क्रीन पर यह दुखद समाचार देख कर मन बैचेन और अशांत हो गया।चित्त में उनके एक नवगीत की पंक्ति रह रह कर अंतरमन  को मथने लगी। 
       "एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है। बेजुवान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में/ आता है/ ऐसे अर्थ पिरोना/ गीत बन गया-सा/ लगता है/ घर का कोना-कोना/ एक तुम्हारा होना/ सपनों को स्वर देता है/ आरोहों-अवरोहों से/ समझाने लगती हैं/ तुमसे जुड़ कर चीज़ें भी/बतियाने लगती हैं/ एक तुम्हारा होना/ अपनापन भर देता है ।
              अकेला मुरादाबाद ही क्या पूरा देश ही दादा का घर था। इस नवगीत के मूल में दादा के ना होने की कसक हर उस मन को सालती है जो उनसे किसी न किसी बहाने एक बार मिला भर हो। दादा माहेश्वर तिवारी जी अब हमारे बीच नही हैं। यों तो मैं दादा के छोटे-छोटे मीटर के छोटे अधिकतम दो या तीन बंद के नवगीतों को उनसे मिलने के, एक दशक पहले से परिचित रहा हूँ, आज भी बहुत से उनके नवगीत अक्षरशः कंठस्थ हैं। दादा माहेश्वर तिवारी से मेरी पहली भेंट के बाद, यह दूसरी भेंट थी जो दिनाँक 21, फरवरी 2016 को, आरोही कला संस्थान, मुरादाबाद के एक आयोजन में हुई थी। अग्रज योगेन्द्र वर्मा व्योम जी के आमंत्रण पर मुझे आरोही कला संस्थान के भव्य कार्यक्रम में दादा के साथ मंच पर बैठने, पाठ करने, और उन्हें जी भरकर सुनने के साथ-साथ यहाँ के वरिष्ठ साहित्यकारों से मिलने का सुअवसर मिला था। यह यात्रा कई मायनों में यादगार साबित हुई। कहते हैं की यात्रा हमारे जीवन में बहुत से अनुभवों को जोडती है। बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मुरादाबाद की इस यात्रा से जुड़ा दादा के सन्दर्भ में कत्थई कलर का वह बहुत प्यारा श्वेटर याद आ रहा है, जिसमें दादा के मन की स्नेहासिक्त तरलता और संवेदनशीलता की विराटता के दर्शन होते हैं। सचमुच यह प्रसङ्ग हम सब के लिए भावुक करने के लिए काफी है साथ ही अनुकरणीय उदाहरण भी है।
              अग्रज आदरणीय योगेन्द्र वर्मा व्योम जी ने कार्यक्रम के कुछ दिन बाद मेरे पास कुछ फोटोग्राफ्स भेजे जिनमें से एक फोटो ने इस लेख को लिखते समय मुझे रुला दिया। दरअसल  कत्थई कलर के श्वेटर से जुड़ा प्रसङ्ग है जो मैंने स्वयं को फोटोग्राफ में पहने देखा जो, दादा माहेश्वर तिवारी जी ने मुझे जिद करके पहनाया था। उस दिन अचानक मौसम बदल गया। मुझे कँपकपाते देख यह बात मन ही मन ताड़ ली दादा उठे और सीधे ऊपर वाले हॉल में ले गये, जहाँ दादा ने अपनी एक अलमारी में बहुत सारे श्वेटर सम्हालकर रखे थे। दादा ने अलमारी खोली और मेरे सामने श्वेटरों का ढेर सारा अम्बार लगाते हुये कहा, "पहले अपना बचाव फिर कविता! चलो, इनमें से कोई सा भी श्वेटर जल्दी से पहनो लो मौसम ठंडा है और तुम्हें कार्यक्रम के ठीक बाद निकलना भी है।" लौटने की जल्दी इसलिए थी की ठीक अगले दिन मुझे अपने एक रिलेटिव के यहाँ समारोह में पहुचना था और इस दृष्टि से मेरे पास समय बहुत कम था।
           दादा की तरल संवेदना से जुड़ा यह संस्मरण, मुझे प्रसंगवश अग्रज योगेंद्र वर्मा व्योम जी ने आज फिर, सात साल बाद याद दिला दिया। आरोही कला संस्थान मुरादाबाद के इस आयोजन का, आमन्त्रण आदरणीय योगेन्द्र वर्मा व्योम जी के माध्यम से ही मेरे पास आया था। मुरादाबाद के अनेक चर्चित साहित्यकारों सर्वश्री कृष्णकांत नाज़ साहब , आनन्द गौरव जी, जिया ज़मीर साहब सहित अनेक गणमान्य जिन्हें पत्र पत्रिकाओं सहित मुरादाबाद की साहित्यिक गतिविधियों में पढ़ने का सौभाग्य समय समय पर मिलता रहा उन सभी विभूतियों से मिलने का सुयोग यहीं बना।
                 कार्यक्रम के उपरान्त भोपाल वापसी के लिए, देर रात बस तक ड्राप करने हमारे एक और अनन्य आत्मीय साहित्यिक मित्र डॉ.अवनीश सिंह चौहान जी से कार्यक्रम स्थल से बसअड्डे तक की वार्ता आज भी जस की तस स्मृतियों में बनी हुई है। एक तरलता ही तो है, जो हमें परस्पर जोड़े रहती है। यह तरलता हमारे मध्य आज भी जस की तस है। अब दादा सशरीर हमारे मध्य भले ही न हों पर उनकी अनन्त स्मृतियां जस की तस हैं।
          माहेश्वर तिवारी जी का फोन अक्सर आता और वे सबकी खबर लेते हाल-चाल पूछते। मीठे स्वर में उनकी वार्ता के नवगीत का अक्सर पहला मुखड़ा यही होता था।  "बहु बच्चे कैसे हैं?"
          "और सब ठीक तो है न" 
           और फिर अगले अंतरों में 
भोपाल साहित्य जगत के क्या हाल चाल हैं? 
डॉ.रामवल्लभ आचार्य जी कैसे हैं कभी कभार तांतेड़ जी का भी पूछते ? 
       बगैरह बगैरह, वार्ता क्या पूरा गीत का माधुर्य होता था उनकी बातचीत में।
            सिर्फ मेरे ही नहीं, पूरे परिवार के, और पूरा परिवार ही क्या पूरे भोपाल की खैर खबर लेते दादा की वार्ता 'थीक है' वाक्य की चार-पाँच बार की पुनरावृति पर समाप्त होती।
   एक बड़ा रचनाकार वही होता है जो निष्प्रह भाव से परवर्ती, पूर्ववर्ती और अपने समकालीनों
यानी तीन पीढ़ियों के त्रिकोण में स्वाभाविक सम्यक संतुलन साधने की कला में निष्णात हो। दादा के व्यक्तित्व में यह बात थी। नवगीत के मामले में वे ट्रेन्ड सैटेर नवगीतकार थे,जो लिखा पुख्ता लिखा, और ऐसा लिखा कि लिखे का विस्तार सैकड़ों रचनाकारों की पंक्तियों मिल जाएगा।
              यह बात प्रसंगवश नहीं कह रहा हूँ बल्कि इसे पुख्ता प्रमाण के तौर पर भी कहना चाह रहा हूँ। फेसबुक पर आज के चर्चित वागर्थ समूह और वागर्थ ब्लॉग के आरम्भिक रूप चित्र में, मैंने (दादा के साथ कॉफी पीते हुए) तस्वीर जोड़ी थी। यह विशेष क्लिप हमें योगेन्द्र वर्मा व्योम जी के मोबाइल से मिली थी। वागर्थ के इस रूप चित्र को मैं दादा का आशीर्वाद ही मानता हूँ।आज समूह वागर्थ के स्तर की धमक पूरे देश में है यहाँ तक की देश से बाहर अनेक देशों में वागर्थ समूह पढ़ा जाता है। दादा वागर्थ के अनन्य प्रसंशकों में से एक थे। हमनें दादा के नवगीतों के साथ साथ समकालीन दोहों की कुछ पोस्ट समूह में जोड़ी जिनको मुक्तकण्ठ से सराहा गया। सोशल मीडिया पर दादा की उपस्थिति उनके स्वस्थ्य रहने तक बनी रही। वे निरन्तर अपनी वाल से लेकर विभिन्न समूहों में आवाजाही करते और अच्छा लगने पर टिप्पणियाँ भी करते थे उनकी सघन टिप्पणियाँ संग्रहनीय है और अब तो धरोहर भी वागर्थ उनका प्रिय समूह था जिसकी प्रसंशा वे मुक्तकण्ठ से किया करते थे। मुझे याद है जब उन्होंने वागर्थ समूह में उन्हीं के शहर मुरादाबाद की युवा कवयित्री मीनाक्षी ठाकुर के नवगीत पढ़े और उन गीतों की सराहना की।
निःसन्देह इस सराहना ने मीनाक्षी ठाकुर को और बेहरत रचने के लिए प्रेषित किया है।
      ऐसा ही एक प्रसङ्ग मुझे कुछ वर्षों पहले का आता है जब जागरण में माहेश्वर जी का एक साक्षात्कार पढा था जिसमे उन्होंने नवगीत के क्षेत्र में उभरने वाली नई सम्भावनाओं में चार छह नाम लिए थे जो आज नवगीत के क्षेत्र में अपना श्रेष्ठ प्रदान कर रहे हैं। इन नामों में हमारे शहर के युवा नवगीतकार चित्रांश बाघमारे भी एक हैं जिन्हें दादा का आशीर्वाद मिला सिर्फ चित्रांश ही अनेक नवोदितों और स्थापितो का नाम माहेश्वर जी लिया करते थे प्रकारान्तर से कहें तो उनके के सृजन को सम्मान दिया करते थे। इसीलिए दादा बड़े थे।

                          दो
       संचारक्रांति के चलते सोशल मीडिया पर साहित्यिक उपस्थित पिछले दो ढाई दशकों में बहुत ज्यादा बड़ी है। हम में से हर एक के पास एंड्रॉइड फोन और टच स्क्रीन पर सॉफ्ट साहित्य का अनन्त रंगीन संसार उपलब्ध है। मैंने भी लोगों की साहित्यिक  अभिरुचि और सक्रिय उपस्थित पर मंथन किया और दो समूहों की स्थापना ठीक आज से दस से पहले की ।
            पहले साहित्यकारों को व्हाट्सएप्प समूह से जोड़ कर उन्हें सद्साहित्य परोसा फिर उन दोनों समूहों को पाठकों की अभिरुचि और बढ़ती सँख्या को देखकर उन्हें 'वागर्थ' और 'अंतरा' समूह से जोड़ दिया आज दोनों समूहों में पाठक सदस्यों की संख्या पाँच अंकों में है और जोड़ी जाने वाली पोस्ट को देखने पढ़ने वालों की संख्या देश विदेश में लाखों से ऊपर है। अकेले ब्लॉग वागर्थ में ही 50,000 पृष्ठों की सामग्री इन दोनों समूहों से उठाकर हमनें जोड़ी है। इन दोनों समूहों हमें और ब्लॉग वागर्थ को दादा माहेश्वर तिवारी जी का प्रत्यक्ष और परोक्ष आशीर्वाद था।
उनकी सैकड़ों टिप्पणियाँ इस बात का पुख़्ता प्रमाण हैं। द्रष्टव्य है दादा माहेश्वर तिवारी जी द्वारा समूह वागर्थ जोड़ी गई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी
       प्रिय मनोज जैन, वागर्थ में श्रद्धेय अग्रज स्मृतिशेष उमाकांत मालवीय के गीतों को प्रस्तुत करके एक और उल्लेखनीय कार्य किया है। डॉक्टर शंभूनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह ,वीरेंद्र मिश्र और उमाकांत मालवीय जैसे लोगों को छोड़कर नवगीत की कोई पीठिका ही नहीं होती। ये लोग नवगीत की जययात्रा के रथ की वे धुरी और पहिए हैं जो एक तरफ उसकी अनवरत गति के आधार और विजययात्रा के नायक भी रहे अपनी अपनी रचनाधर्मिता के साथ ।
     उमाकांत मालवीय जी की जो अपार स्नेहयुक्त कुटुम्बवत आत्मीयता मिली उसने हम जैसे कई लोगों को अपनी रचनाधर्मिता के लिए नई ऊर्जा मिली । उनके व्यक्तित्व की यह विशिष्टता रही की किसी नये रचनाकार को सुनते और कुछ अच्छा लगता तो वह उनके स्मृतिकोष में जमा हो जाता और मिलने पर उसके अंश हमें सुनाते ।
       मेहंदी और महावार के गीतों से अलग थी उनके दूसरे संग्रह सुबह रक्त पलाश की भाषा और गीतों में शामिल सरोकार ।मेहंदी और महावार में एक अलग तरह की सौंदर्य दृष्टि और भाषा है तथा सुबह रक्त पलाश में अलग ।इसी तरह मेहंदी और महावार में लोक संस्कृति के प्रति लगाव है तो मेहंदी और महावार में एक वयस्क सामाजिक,राजनीतिक चिंतक का रूप सामने आता है । एक बात ध्यान में रखने की है की मालवीय जी शासकीय सेवा में थे और देश में प्रजातंत्र एक आंधी में घिरा था वे प्रजातंत्र पर चोट करने वालों को वैचारिक प्रतिरोध से भरे गीत लिख रहे थे एक जोखिम उतार हुए और उसके लिए उनके वार्षिक वेतन में होने वाली वृद्धि रोक दी गई लेकिन वे रुके नहीं और झूले एमबीएचआई नहीं क्योंकि वे तनी रीढ़ के व्यक्ति थे इसीलिए मैंने उनके लिए लिखा था हिंदी नवगीत का पौरूषेय बोध। वागर्थ में प्रस्तुत उनके गीतों में यह पढ़ा जा सकता है। यह उमाकांत मालवीय ही थे जो खबरों जैसी घटनाओं को गीतकविता बना देते थे 
        आ गया प्यारा दशहरा
        भेंट लाया हूं तुम्हारे लिए बेटे,
        पुलिस की मजबूत बूटों से
        अभी कुचला गया 
        ताजा ककहरा
       यामेज साफ करने को
       रह गईं ध्वजाएं
                        माहेश्वर तिवारी
(वागर्थ की वाल से साभार 
माहेश्वर तिवारी जी की टिप्पणी)
     दादा की टिप्पणियाँ बहुत कुछ कहती हैं और इसमें कहने से ज्यादा अनकहा रह जाने की कसक भी स्पष्ट देखी जा सकती है। इसी क्रम में हम दादा के नवगीत पाठकों के लिए जोड़ते गए और ब्लॉग में संग्रहित भी करते गए।
       1जून 2020 को हमनें दादा के गीत जोड़े। इन गीतों पर उनके पाठकों ने सैकड़ों टिप्पणियाँ जोड़ी और उनको पोस्ट को 88 लोगों ने अपनी अपनी वाल पर शेयर किया। यहाँ पाठकों के लिए हम उनकी चयनित पस्टों को पाठकों की चयनित
    टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं
 1
  माहेश्वर तिवारी जी के नवगीतों के बहाने
_____________________________
       समूह वागर्थ प्रस्तुत करता है अपने समय के सबसे ज्यादा चर्चित नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत 
            प्रस्तुत नवगीतों में कवि की पंक्ति-पंक्ति में कविता है जिसे ढूँढना नहीं पड़ता। जबकि हमारे यहाँ ऐसे-ऐसे धुरन्धर विराजमान हैं, जिनके कहने को तो छह दर्जन संग्रह हैं, लेकिन उनके यहाँ ढूँढने से भी उनकी पूरी नवगीत यात्रा में बमुश्क़िल से 15 पँक्तियाँ भी नहीं है। ऐसे फर्जी गुरुओं के सक्रिय चेलों नें उन्हें तमाम साहित्य के  विभूषणों से घोषित कर रखा है।
   बहरहाल ऐसे गुरु और शिष्य दोनों को माहेश्वर तिवारी जी को पढ़ना चाहिए। प्रस्तुत है अपने समय के सबसे ज्यादा चर्चित और चमकदार नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत 

प्रस्तुति
वागर्थ
सुनो सभासद
__________

सुनो सभासद
हम केवल
विलाप सुनते हैं
तुम कैसे सुनते हो अनहद

पहरा वैसे
बहुत कड़ा है
देश किन्तु अवसन्न पड़ा है

खत्म नहीं
हो पाई अब तक
मन्दिर से मुर्दों की आमद

आवाजों से
बचती जाए
कानों में है रुई लगाए

दिन-पर-दिन है
बहरी होती जाती
यह बड़ बोली संसद

बौने शब्दों के
आश्वासन
और दुःखी कर जाते हैं मन

उतना छोटा
काम कर रहा
जिसका है जितना ऊँचा कद

दो

घर जैसे

खुद से खुद की
बतियाहट
हम, लगता भूल गए ।

डूब गए हैं
हम सब इतने
दृश्य कथाओं में
स्वर कोई भी
बचा नहीं है
शेष, हवाओं में

भीतर के जल की
आहट
हम, लगता भूल गए ।

रिश्तों वाली
पारदर्शिता लगे
कबंधों-सी
शामें लगती हैं
थकान से टूटे
कंधों-सी

संवादों की
गरमाहट
हम, लगता भूल गए।

माहेश्वर तिवारी 
दिन पर दिन है
बहरी होती जाती
यह बड़बोली संसद।।।
और
संवादों की 
गरमाहट हम 
लगता भूल गए।।
                         दोनों ही महत्वपूर्ण बहुत उल्लेखनीय और विचारणीय नवगीतों की यह अभिनव प्रस्तुति पटल के वातावरण को और भी ज्यादा सार्थक बनाती है। बहुचर्चित बहुप्रशंसित गीतकार आदरणीय श्री माहेश्वर तिवारी जी सहज सरल शब्दों की जादूगरी से लाजवाब बहुत विचारणीय और मर्मस्पर्शी गीत रचना करने में सिद्ध हस्त हैं। उनके महत्वपूर्ण नवगीतों में सहज सरल शब्दों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है फिर भी उनकी प्रभावशीलता प्रशंसनीय और विचारणीय हैं। इन गीतों को प्रस्तुत करने के लिए मैं वागर्थ के  प्रमुख संस्थापक आदरणीय मनोज जैन जी का आभार और धन्यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा।
     मुकेश तिरपुड़े
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           वैसे नहीं, ऐसे गीतों से नवगीत समृद्ध हुआ है । वागर्थ का आभार अग्रज माहेश्वर जी के इन गीतों की प्रस्तुति के लिए।
        विनोद श्रीवास्तव कानपुर


दो


6 दिसम्बर 2020
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कल तलक सुनते रहे जो आज बहरे हैं यशस्वी कवि दादा माहेश्वर तिवारी जी के दो गीत

     यश के महत्व को प्रतिपादित करती हुई एक सूक्ति पर कल मेरा ध्यान गया उस समय गया जब मैं भोपाल के भेल औधोगिक क्षेत्र से अपनी गाड़ी की सर्विसिंग कराने के उपरान्त घर लौट रहा था। सूक्ति का सार कुछ इस तरह था मनुष्य को यश की प्राप्ति बड़े पुण्यों से होती है, और पुण्य सद्कर्म और साधना का ही परिणिति है। दादा माहेश्वर तिवारी जी नवगीत के जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं। उनकी विचार धारा जन तक सम्प्रेषित होती है। विचारधारा के स्तर पर वे असमानता को जड़ से मिटा देने के पक्ष में हैं उनकी कविता जनधर्मी है यहाँ प्रस्तुत दादा के दोनों नवगीतों में प्रतिरोध के मद्धम नही अपितु तीखे स्वर हैं।
        प्राकृतिक प्रतीकों और बिम्बों से जनपक्षधरता उकेरना दादा माहेश्वर जी के बूते की ही बात हो सकती है। बेजोड़ प्रतीकों और बिम्बों के नायाब रचनाकार को प्रणाम नमन अपनी रचनाधर्मिता को जनपक्ष में समर्पित करके दादा अनायास ही अक्षय पुण्य के कोष से सदैव भरे रहते हैं और यही कोष उनके यश का एकमात्र राज है आइये पढ़ते हैं यशभारती सम्मान से विभूषित दादा माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत
प्रस्तुति
मनोज जैन

हँसो भाई पेड़ 
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कहती है दूब
हँसो भाई पेड़ 
बाहर जितना देखते हो 
धरती में 
धसो भाई पेड़ ।

जड़ें बहुत गहरे ले जाओ 
यहाँ वहाँ उनको फैलाओ
चील की तरह बाहों पंजों में 
आंधी को 
कसो भाई पेड़

चील किसे देती है सोचो 
आसमान गुर्राए तो नोचो 
गीत की तरह हरियाली पहनो 
जन-जन में 
बसो भाई पेड़।
2
चीख बनते जा रहे
हम सब खदानों की 
हो गए हैं शोकधुन 
बजते पियानो की

कल तलक सुनते रहे जो 
आज बहरे हैं 
आँसुओं के बोल जिनके-
पास ठहरे हैं
जिंदगी अपनी हुई है 
मैल कानों की 

देखते जब शब्द के 
बारीक  छिलके खोल 
देश लगता रह गया 
बनकर महज भूगोल 

एक साजिश है खुली
ऊंचे मकानों की।
           माहेश्वर तिवारी

आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी के नवगीतों में तरलता, सरलता और उत्कृष्टता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उनके नवगीत सीधे दिल में उतर जाने का हुनर रखते हैं। उन्हें सादर प्रणाम।
मृदुल शर्मा,  लखनऊ
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श्रद्धेय दादा माहेश्वर तिवारी जी वर्तमान में नवगीत के हिमालय हैं.दादा को पढ़ना और सुनना हमेशा मन को सुख देता है.दादा को सादर प्रणाम.लेख और गीत साझा करने हेतु आपका हार्दिक आभार.
रघुवीर शर्मा, खंडवा
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दोनों गीत मर्मस्पर्शी भीतर तक आन्दोलित करते हैं दादा को चरणवन्दन। मनोज जी आपकी इस 
काव्य प्रस्तुति परम्परा को प्रणाम।
    रमेश गौतम,  बरेली उत्तरप्रदेश
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                    नवगीत विधा में देश के  सबसे सशक्त और वरिष्ठ हस्ताक्षर आ.माहेश्वर तिवारी जी के दोनों ही गीत आज के समय की त्रासद  सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिम्ब भी हैं और उनके खिलाफ सशक्त स्वर भी। 
    तिवारी जी के गीत अपने शिल्प, कथ्य भाषा और छंद से अपनी अलग पहचान रखते हैं। उन्हें पढ़ने और विशेषकर दादा तिवारी जी से साक्षात सुनने का आनन्द और अनुभूति ही कुछ और है। आदरणीय तिवारी जी की लेखनी को प्रणाम। 
          और मनोज जी को साधुवाद इतनी अच्छी पोस्ट के लिए

        माहेश्वर जी के नवगीत पढ़ने के बाद मुझको घरबाहर का परिसर  सामान्य ही नहीं, कोमल और मोहक भी दिखने लगा। माहेश्वर नवगीत  लिखकर मनःस्थिति और परिस्थिति भी बनाते हैं इनके गीत मनुष्यता के पर्याय हैं। ऐसा गीत लिखना सामान्य बात नहीं है। इन गीतों से नवगीत का मान बढ़ा है ।
शांति सुमन

तीन

        माहेश्वर तिवारी जी की मूल पहचान भले ही नवगीतकार के रूप में क्यों न रही हो पर उन्होंने
 नवगीत से इतर  ग़ज़ल भी कही है और समय की हाथ पर नब्ज़ रखते हुए समकालीन दोहे भी लिखे हैं। कुछ समय पहले मैंने अपनी वाल पर समकालीन दोहों की एक सीरीज़ चला रखी थी जिसमें एक दोहाकार के कम से दस दोहे और अधिकतम बीस दोहे पाठकों के समक्ष रखते थे
यह सीरीज़ चल पड़ी और दस कड़ियों से लेकर पन्द्रह कड़ियों तक हमें प्रकाशित करने के लिए अच्छी सामग्री मिली बाद में हमारे पास दोहे के नाम पर बहुत रद्दी सामग्री मिलने लगी और लोग सम्बन्धो के आधार पर हमारी श्रंखला में येन केन प्रकारणेन शामिल होने की जुगत में रहते हमनें माहेश्वर तिवारी जी के मानक दोहे प्रस्तुत कर सीरीज को अघोषित विराम दे दिया।

  7, जून 2021 को समूह में कड़ी के प्रकाशित होते ही समूह वागर्थ धड़ाधड़ शेयर किया जाने लगा। देखें दोहों का स्तर और दोहों पर टिप्पणियाँ

           माहेश्वर तिवारी

समकालीन दोहा चौदहवीं कड़ी
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दादा माहेश्वर तिवारी 
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समकालीन दोहा में आज दूसरे पड़ाव की चौथी कड़ी में प्रस्तुत हैं प्रख्यात नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी के चुनिन्दा दोहे
             बहुत कम लोग ऐसे होते हैं  जिनकी लेखनी का परस पाकर सृजन सोने में बदल जाता है। दादा माहेश्वर तिवारी जी उनमें से एक हैं, जिनका सारा सृजन चमकदार है। चाहे नवगीत हों या दोहे उनके यहाँ क़्वान्टिटी की अपेक्षा क़्वालिटी वर्क ज्यादा है। प्रस्तुत समकालीन दोहे भी आज के लिखे नहीं हैं परन्तु आज जो लिखा जा रहा है उन दोहाकारों को, अपने सृजन को मापने का पैमाना जरूर हैं। अस्सी के दशक में दोहा कितनी ऊँचाईयों पर था इसका अंदाजा कम से कम इन दोहों को पढ़कर लगाया जा सकता है। दादा माहेश्वर तिवारी जी अपने आपको मूलतः गीत कवि ही मानते हैं और इस बात को लेकर स्वधर्मे निधनं श्रेयः की हद तक प्रतिबद्धता उनके यहाँ देखी जा सकती है। हाँ, यदि उन्हें आस्वाद परिवर्तन के लिए गीत के अलावा कुछ लिखना भी हो तो वे स्तर से कम्प्रोमाइज नहीं करते। हम सब उनकी इस प्रस्तुति से यही प्रेरणा ले सकते हैं।
        दोहा छन्द को लेकर यश मालवीय जी के कथन को दोहराना समीचीन होगा वे कहते हैं कि " दो पंक्तियों में बड़ी बात कहना छोटे फ्रेम में आसमान मढ़ने जैसा है "। आइए पढ़ते हैं दो पंक्तियों के कैनवास में सुरमई आसमान जड़े दोहे।

   प्रस्तुति
 मनोज जैन
   वागर्थ

  उधर साजिशों के नये, बुने जा रहे जाल
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वस्त्र पहनकर गेरुआ, साधू सन्त फकीर ।
नये मुकदमों की पढ़ें, रोज नयी तहरीर।।

परिवर्तन के नाम पर, बदली क्या सरकार ।
रफ्ता रफ्ता हो रहा ,पूरा देश बिहार ।।

चिन्तित हैं शहनाइयाँ, गायब हुई मिठास ।
बिस्मिल्ला के होंठ की,पहले जैसी प्यास ।।

रिश्तों  के बदले हुए, दिखते सभी उसूल ।
भैया कड़वे नीम- से,दादी हुई बबूल ।।

आँखों में दाना लिये, पंखों में आकाश ।
जाल उठाए उड़ गया, चिड़ियों का विश्वास ।।

दाने -दाने के लिए,चिड़िया है बेहाल ।
उधर साजिशों के नये ,बुने जा रहे जाल।।

मूल प्रश्न से हट गया,जब से सबका ध्यान ।
सूरज बाँटे रेवड़ी,चाँद चबाये पान।।

क्या सपने क्या लोरियाँ,खाली-खाली पेज ।
जिनकी नींदों को मिली,फुटपाथों की सेज ।।

लाकर पटका समय ने, कैसे औघट घाट।
अनुभव तो गहरे हुए, कविता हुई सपाट।।

शामें लौटीं शहर की,अंग लपेटे धूल।
सिरहाने रख सो गयीं, कुछ मुरझाये फूल।।

कैसे कैसे लोग हैं,कैसे कैसे काम ।
जाकर कुंज-करील में, ढूँढ रहे हैं आम।।

खुश है रचकर सीकरी,नया -नया इतिहास।
हैं उसके दरबार में,हाज़िर नाभादास।।

भोग रहे इतिहास का,हैं अब तक दुर्योग।
तक्षशिला को जा रहे,नालन्दा के लोग।।

पुल की बाँहों में नदी,मछली-सी बेचैन।
अनहोनी के साथ सब ,दे बैठी सुख-चैन।।

बरगद से लिपटी पड़ी, है बादल की छाँह।
घेरे बूढ़े बाप को, ज्यों बेटे की बाँह।।

तन की प्रत्यंचा खिंची, चले नज़र के तीर।
बच पाया केवल वही,मन से रहा फकीर।।

लाक्षागृह सबके अलग,क्या अर्जुन क्या कर्ण।
आग नहीं पहचानती, पिछड़ा दलित सवर्ण।।

सारंगी हर साँस में, मन में झाँझ मृदंग।
फागुन आते ही हुए, साज हमारे अंग।।

एक आँख तकती रही, दूजी रही उदास।
इन दोनों में ही बँटा, जीवन का इतिहास।।

खुली पीठ से बेंत का ,ऐसा हुआ लगाव।
लिये सुमरनी हाथ हम, गिनते कल के घाव।।


     सचमुच यह दोहे ख़ुशबू के शिलालेख हैं, मेरे समेत दोहों के उत्पादन में लगे तमाम दोहाकारों  को इन दोहों से सीखना चाहिए और दोहा नियोजन करना चाहिए ताकि इस विधा में लोगों की आस्था बनी रहे।कम लिखें और अच्छा लिखें का संकल्प लेना चाहिए,इन काल का अतिक्रमण करते दोहों से। आम आदमी के माथे की सलवटों-शिकनों से सीधा सरोकार रखते यह दोहे हमारी उजली परम्परा के संवाहक हैं।
यश मालवीय
               आदरणीय माहेश्वरी तिवारी जी वर्तमान में नवगीत के बड़े स्तंभ हैं। उनके नवगीतों में जो एक अलग सी महक है वही इन दोहों में भी रची-बसी है। यही तिवारी जी को आदर्श रूप में खड़ा करती है।जिन रचनाकारों की अपने भीतर की महक रचनाओं में महकने लगती है, वही बड़े रचनाकार कहाते हैं। क्या दोहे हैं? इनमें चमत्करण बैठा है। इन पर तो बस सोचते रहो, जब-तक सोच सको।
"मूल प्रश्न से हट गया,जब से सबका ध्यान।
सूरज बांटे रेवड़ी, चांद चबाये पान।।"
          मैं तो इसी में जमा पड़ा हूं।
आदरणीय भाई साहब आपको और आपकी मारक लेखनी को प्रणाम।
              मक्खन मुरादाबादी

                जीवन में साधन चतुष्टय- धर्म अर्थ काम मोक्ष की सीढ़ियां चढ़ने पर जब धर्म के सार्थक निर्वहन से अर्थोपार्जन उपरान्त काम (कर्म) के प्रति समर्पित होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है तो जो आनंद आता है आज उसी आनंद की अनुभूति हो रही है मधुर दोहावली की चौदहवीं प्रस्तुति में। दोहा सृजन के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उपर्युक्त विवेचन अपने मंतव्य को स्वत: ही प्रमाणित कर देता है। "एक तुम्हारा होना ही क्या से क्या  कर देता है, " यह पंक्ति आज की प्रस्तुति के मूलाधार में समाहित है।  आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी से प्रत्यक्ष भेंट शिवपुरी में आयोजित नवगीत पुरस्कार वितरण समारोह में हुई थी, उनके मुख से झरते गीत-नवगीत की वर्षा ने ऐसा रसविभोर किया था कि उसकी मिठास आजतक महसूस हो रही है। अग्रज यशमालवीय जी के कथन से मैं पूर्णतः सहमत हूं और दोनों हाथ उठाकर यह कहने मैं कोई संकोच भी नहीं कर रहा हूं कि सुरमयी आसमान में जड़े दोहे अपनी आभा से क्षितिज को दैदीप्यमान कररहे हैं। श्रध्देय तिवारी जी के दोहे धर्म के मर्म को बेधते हुए राजनैतिक परिदृश्य पर तीक्ष्ण दृष्टिपात करते हुए मानवीय रिश्तों में आई बदलाव की बयार से परिवार को न बचा पाने की पीड़ा को अभिव्यंजित करने में सफल रहे हैं। दोहा दृष्टव्य है-- रिश्तों के बदले हुए,दिखते सभी उसूल। भैया कड़वे नीम से,दादी हुईं बबूल। अपनी आस्था-विश्वास की सामर्थ्य को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते हुए उसे "श्रध्दा विश्वास रूपिणौ " परमसत्ता का मान दे दिया जो असंभव को भी संभव कर देता है-- आंखों में दाना लिए, पंखों में आकाश। जाल उठाये उड़ गया, चिड़ियों का विश्वास।  मात्र दो पंक्तियों में अनूठा बिम्ब संयोजन जो व्यंजना शब्दशक्ति और वक्रोक्ति का अनुपम उदाहरण बन गया जिसे सिर्फ और सिर्फ माहेश्वर तिवारी जी ही सृजित कर सकते हैं-- मूल प्रश्न से हट गया जब से सबका ध्यान।  सूरज बांटे रेवड़ी, चांद चबाएं पान। , जबकि मुहावरा है अंधा बांटे रेवड़ी। श्रमिक वर्ग के असहनीय दर्द को अपनी लेखनी की शक्ति से अमर करने वाला दोहा- क्या सपने क्या लोरियां,खाली खाली पेज। जिनकी नींदों को मिली फुटपाथों की सेज। अविस्मरणीय है। ऐतिहासिक संदर्भ हों या प्रकृति का मानवीकरण, श्रृंगार का रसमय आकर्षण हो या मन फकीरी का साधन,अगड़े पिछड़े वर्ग की आरक्षण की तात्कालिक समस्या, रचनाकार ने अपनी लेखनी से अनछुआ नहीं रहने दिया। और फिर जीवन की सांध्यवेला का मार्मिक चित्रण कर मन के घावों को सहलाने तथा बेंत और सुमिरनी से साथ निभाने का मूल मंत्र भी दे दिया-- खुली पीठ से बेंत का , ऐसा हुआ लगाव, लिए सुमिरनी हाथ हम, गिनते कल के घाव। यह कहकर दोहाकार अपने लेखिकीय दायित्व से उऋण होने का प्रयास भी कर गया।  गीत ऋषि माहेश्वर तिवारी जी के सृजन सामर्थ्य को सादर प्रणाम करते हुए भाई मनोज जैन मधुर जी की मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा पूर्ति की शुभेच्छा है। 
वागर्थ पटल की टीम को साधुवाद। 
               डॉ मुकेश अनुरागी शिवपुरी

                 परम आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी जितने समर्थ साहित्यकार हैं उससे बड़े वो नेक व संवेदनशील रचनाकार हैं जो हर समय साहित्य के नए रचनाकारों को दिशा दिखाने व उनकी हर अच्छी बात पर खुली तारीफ़ करके उनका उत्साहवर्धन करते हैं। आपके दोहे आपके गीत सभी कालजयी रचना हैं यहाँ पर (१)लाक्षागृह का दोहा(२)बरगद से लिपटी पडी(३)पुल की बाँहों में नदी(४)मूल प्रश्न से हट गया(५)वस्त्र पहनकर गेरुआ ये सभी दोहे  आप भुलाना चाहें तब भी आपकी मन की देहरी अपनी उपस्थिति दर्ज एक लम्बे समय तक कराते रहेंगे। ऐसे ही लेखन के कारण मुझ जैसे न कितने रचनाकारों के आप प्रेरणादायी हैं व सदैव रहेंगे 

 डॉ  अजय जनमेजय
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                     बहुत अलग तरह के दोहे सच्ची कविता के आस्वाद में नहाए हुए। दोहों की ऐसी खुशबू केवल यश के दोहों में मिलती है। सच कहा  यश कह दें तो फिर कुछ और कहना बिना पेट्रोल की गाड़ी हांकना है। 
सचमुच यश जी ये दोहे खुशबू के शिलालेख हैं।
                 डॉ ओम निश्चल

             आदरणीय तिवारी जी प्रयोगधर्मी कवि हैं और उनकी यह प्रयोगधर्मिता हर विधा मे परिलक्षित है बिम्बो प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करने मे वे सिद्धहस्त हैं सूरज बाटे रेवडी, चांद चबाये पान जैसे अनूठे प्रयोग करना आपका शगल है नई पीढी के प्रेरणास्रोत दादा को प्रणाम निवेदित कर मनोज जी को अप्रतिम दोहे प्रस्तुत करने के लिए कोटिशःसाधुवाद प्रेषित है।

          डॉ.विनय भदौरिया
                 सूरज बांटे रेवड़ी चांद चबाए पान। क्या बात है...दादा माहेश्वर जी के शब्दों में छंद स्वयं अपनी पूरी संवेदना को समेटकर बिंध जाता है। 
भारतेंदु मिश्र 
                 सभी दोहे श्रेष्ठ हैं। यह दोहा तो कमाल का है -- "ख़ुश है रच कर सीकरी..... हाज़िर नाभादास।।" 
आदरणीय माहेश्वर भाई साहब को प्रणाम!
       डॉ सुभाष वसिष्ठ
            इन दोहों की प्रस्तुति पर माहेश्वर तिवारी जी अपनी ओर से वागर्थ के पाठकों के लिए अपनी तरफ से एक महत्वपूर्ण टिप्पणी वागर्थ के पटल पर जोड़ी थी जो यहाँ जस की तस चस्पा है।  "अपने सभी आत्मीय तथा स्नेह देकर मेरे लेखन को सराहने और प्रोत्साहित करने वालों के प्रति हार्दिक आभार। मनोज जैन को धन्यवाद देना उसे अपने से कुछ दूर खिसका देने जैसा है। यश और ओम निश्चल, भारतेन्दु मिश्र, सुभाष वशिष्ठ की टिप्पणियाँ आगे के लेखन के लिये चुनौतियों जैसी है कि अब आगे सीढ़ी से उतरने की सोची तो खैर नहीं। अन्य पारखी और प्रबुद्धजनों के प्रति भी आभार।"
              माहेश्वर तिवारी
 1, दिसम्बर 2022 को वागर्थ समूह में जोड़ी गई एक पोस्ट वागर्थ समूह  से साभार। माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत समय के प्रख्यात नवगीतकार दादा माहेश्वर तिवारी जी के दो नवगीत 1964 में, बस्ती प्रवास के दौरान रचे इन नवगीतों में आज भी सौंधी मिट्टी की सुगन्ध जस की तस मौजूद है। अपनी बोली-बानी में बतियाते इन नवगीतों में आकुल मन की व्यथा के साथ-साथ समूचा परिवेश समाहित है। इन नवगीतों में एकाकीपन और ऊब की सहज और चित्ताकर्षक अभिव्यक्ति देखने मिलती है। दोनों नवगीत "हरसिंगार कोई तो हो" से साभार  हैं।
अकेलापन
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तना जाले-सा
अकेला पन
कहाँ, तक झेले 
अकेला मन

किसी ठहरी 
झील-सा
हिलता नहीं तिनका
साथ हम 
कब तक निभाएँ
अधमरे दिन का

कट नहीं पाता 
नसों में 
उगा नंगा पन

थक गया है
बाँस वन की
सीटियों का मौन
आहटों में 
चुप्पियों को
सिल गया है कौन

दिशाओं में 
झूलता है
क्षितिज का बन्धन

दो
सारे दिन
__________

सारे दिन 
पढ़ते अखबार
बीत गया 
यह भी इतवार

गमलों में 
पड़ा नहीं पानी
पढ़ी नहीं गई 
संत वाणी

दिन गुजरा 
बिलकुल बेकार
सारे दिन 
पढ़ते अखबार

पुँछी नहीं
पत्रों की गर्द
खिड़की-
दरवाजे बेपर्द

कोशिश की है 
कितनी बार
सारे दिन 
पढ़ते अखबार

मुन्ने का 
तुतलाता गीत
अनसुना गया
बिलकुल बीत

कई बार 
करके स्वीकार
सारे दिन 
पढ़ते अखबार

माहेश्वर तिवारी         
बैंकटेश्वर मिश्र
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बहुत खूब ! आदररणीय चाचा जी ( माहेश्वर तीवारी जी ) बस्ती ( मिश्रौलिया, बस्ती ) मेरे घर पर  लगभग 1662--19667 रहे है । प्रसिद्ध गीत " याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलस भरे  ---- । जैसे कई चर्चित गीत लिखे गये थे   कई संस्मरण  हैं ।  बस्ती की चरचा करने हेतु साधुवाद ।
                  नवगीत के पुरोधा कवि है आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी अभिधा में होते हुए भी इन गीतों में सामुद्रिक गहराई है। लेकिन  कवि का मन तो सागर से भी अधिक गहरा होता है।स्वयं कवि के ही गीत की पंक्ति है----
        कितना गहरा है मेरा मन
        सागर क्या जाने!
इस स्तरीय प्रस्तुति के लिए कवि के साथ-साथ  मनोज जैन साहब को भी बधाई!
    •  उदय शंकर अनुज
               दादा तिवारी जी के नवगीत स्थूल से सूक्ष्म की ओर भावनात्मक संचरण होते हैं। शब्दलय और अर्थलय को साधते गीत रचनाकारों को प्रेरित करते हैं। दादा तिवारी जी को सादर नमन तथा वागर्थ समूह को श्रेष्ठ गीतों की प्रस्तुति के लिए आभार!
                जगदीश पंकज
जब जब माहेश्वर तिवारी जी का नाम आता है, मुझे उनका "सुर्ख सुबह चंपई दुपहरी मोरपंखिया शाम, तरह तरह के लिख जाता मन पत्र तुम्हारे नाम" याद आता है।। कभी 72-73 में मुरैना के कवि सम्मेलन में उन्होंने यह गीत सुनाया था।। आठवें दशक के उत्तरार्ध में वे विदिशा भी रहे थे।
            उपेंद्र पुरुषोत्तम कुमार
              सीधी-सादी बोली-बानी का अप्रतिम बिम्ब,एकाकीपन का अनूठा रेखाचित्र प्रयोग धर्मिता का प्रतीकात्मक सौंदर्य एवं प्रतीकों का अनुशासित प्रयोग। दोनों गीतों में प्राण तत्व हैं ।
रचनाकार को प्रणाम मनोज जी को हार्दिक बधाई।
            ईश्वर दयाल गोस्वामी
 

             उपर्युक्त सभी फेसबुक, ब्लॉग और वागर्थ से साभार प्रस्तुतियों से उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को पहचाना जा सकता है। निःसन्देह, वे बड़े और जमीन से जुड़े रचनाकार लोकप्रिय कवि थे। वाचिक परम्परा हो या पत्र- पत्रिकाएँ, उनकी दोनों जगह समान रूप से उपस्थिति अंत तक बनी रही। उन्होंने सदैव नई पीढ़ी के रचनाकारों का उत्साह वर्धन किया उन्हें सराहा और आगे बढ़ाया।

          4,अक्टूबर 2014 के गीतोत्सव के आयोजन गीत चाँदनी जयपुर राजस्थान में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर भोपाल के दुष्यंत अलंकरण, अभिनव कला परिषद का श्रेष्ठ कला आचार्य, सहित अनेक समारोहों एवं गोष्ठियों सम्मेलनों में मुझे उनका आशीर्वाद मिलता रहा। 
            अब, जब दादा नहीं हैं तब उनसे जुड़ी यादें और और सघन हो चलीं। मेरी कृति "धूप भरकर मुट्ठियों में" उनका लिखा फ्लैप अब धरोहर है। दादा का इस तरह असमय जाना हम सब के लिए पीड़ादायक है। उनका जाना हम सबकी अपूर्णीय क्षति है। इस लेख को लिखने के कुछ माह पहले ही उनका एक कॉल आया था मुझे नहीं पता था अब इसके बाद नेह उड़ेलने वाला कॉल कभी नहीं आएगा।
     ठीक से तो याद नहीं पर हाँ, अन्तिम कॉल पर जो बात हुई तब उन्होंने शायद किसी शोध सन्दर्भ ग्रन्थ का जिक्र किया था जिसे वह पढ़ना और देखना चाहते थे पर वह उन तक पहुँच नहीं सका। 
       शायद इस ग्रन्थ में माहेश्वर तिवारी जी के नवगीत सम्मिलित किए गए पर उन तक ग्रंथ की प्रति नही पहुँची। काश ! मैं, उस ग्रंथ का नाम ठीक से  सुन पाता तो उन तक, उस ग्रन्थ की प्रति उन तक भेजने की कोशिश जरूर करता। अफ़सोस ! ऐसा कर नहीं सका।
        खैर,1998 में रिरीज हुई एक मूवी 'दुश्मन' का एक गीत जो आंनद बक्शी ने लिखा और जिसे जगजीत सिंह नें दिलकश अंदाज़ में में मखमली आवाज़ में अपना रेशमी स्वर दिया,
खासतौर से इस प्रसंग पर हमें बहुत रुलाता है।
       "चिट्ठी ना कोई संदेश,
        जाने वो कौन सा देस, 
        जहाँ तुम चले गए!
    मैं, यह भली भाँति जानता हूँ कि, कॉल पर ना मुखड़ा, ना अंतरा, और ना वह समापन की पुनरावृत्ति वाली, ठीक है ! ठीक है ! ठीक है ! की आवाज़ मेरे और मेरे जैसे अनेक उनके प्रसंशको के कानों में कभी नहीं आएगी।
       नम आँखों और भारी मन से उन्हें याद करते हुए पूछता तो हूँ पर कोई उत्तर ही नहीं देता ...
              कहाँ तुम चले गए..........।
अंत में पहले लंबे आलेख का श्रेय जाता है अत्यन्त प्रिय मेरे बड़े भाई मित्र योगेन्द्र वर्मा व्योम जी को उन्होंने ठीक उसी वेसे ही जैसे हनुमान जी उनकी प्रेरणा से जलधि लाँघ लंका जा पहुँचे।
       उसी तर्ज पर  मुझ जैसे अलाल से यह काम करवा लिया साथ ही समूह वागर्थ, समूह अंतरा और ब्लॉग वागर्थ में प्रस्तुत स्तरीय सामग्री की शक्ति अहसास भी करा दिया जिसका का मुझे  अभी तक भान ही नहीं था।
  
मनोज जैन 
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संस्थापक संपादक 
समूह / ब्लॉग वागर्थ 
106 विट्ठलनगर
गुफ़ामन्दिर रोड लालघाटी 
भोपाल
462030