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रविवार, 14 जून 2026

डॉ.भावना की सात ग़ज़लें प्रस्तुति वागर्थ

 डॉ.भावना की सात ग़ज़लें
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समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की सशक्त हस्ताक्षर डॉ.भावना जी की सात ग़ज़लें लोकप्रिय समूह "वागर्थ" में प्रस्तुत हैं। डॉ.भावना की इन ग़ज़लों में रोज़मर्रा के विषयों और सामाजिक समस्याओं पर व्यंग्य के साथ-साथ गहरी चिंता भी व्यक्त हुई है। आजकल बच्चियों पर होते हमले, हिजाब, माँ, नदी, गाँव, चिड़िया आदि विषयों पर उन्होंने अत्यंत संवेदनशील ढंग से अपनी बात कही है।
ग़ज़लों की भाषा अत्यंत सहज, सरल और बोधगम्य है, जो सामान्य पाठक और श्रोता की समझ के भीतर रहती है। डॉ.भावना के अब तक छह ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जो व्यापक रूप से चर्चित रहे हैं। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य विधाओं की कृतियाँ भी देशभर में चर्चा का विषय रही हैं। उन्हें देश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है।
उनकी एक ग़ज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत हैं, जिनमें सच्चाई और मर्म की गहरी अनुभूति है—

कभी महलों की रानी थी 
कभी महफ़िल की थी रौनक,
ग़ज़ल निर्धन के कंधों पर 
ही अब आसीन लगती है।

हमेशा घर की बहुओं में 
हज़ारों दोष होते हैं,
हमेशा अपनी बेटी ही, 
हमें शालीन लगती है।

अमीरों को मुबारक हों 
बड़े सोफ़े, नरम गद्दे,
हमारी ये चटाई ही 
हमें कालीन लगती है।

संवेदनशील और चर्चित ग़ज़लकारा डॉ.भावना की इन ग़ज़लों को पढ़िए, उन पर चिंतन कीजिए और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए।
प्रस्तुति टीप
सुनील चतुर्वेदी

एक
अजब-सा दर्द सहती है 
किसी से कह नहीं पाती

समय की तेज धारा में 
हकीकत बह नहीं पाती

मरीजों को भला वो किस 
तरह कर पायेगी चंगा

चिकित्सक बन के बेटी 
जब सुरक्षित रह नहीं पाती

कभी ताने कभी छींटाकशी 
के बढ़ते फैशन में

मेरी बिटिया बहुत नादान है 
सब सह नहीं पाती

जो खुशियों के सरोवर में 
मचल कर पाँव रखती हो

उसे कहते हो दुख की पोटली 
क्यों तह नहीं पाती

समुन्दर हो तो कोशिश करके 
वो चाहे तो मह भी ले

सरोवर को तरीके से वो 
अक्सर मह नहीं पाती

दो

लौटा है गांव कलुआ 
कमाने के बाद फिर

हासिल हुआ है प्रेम 
घर आने के बाद फिर

ऐसा नहीं वो शख़्स जो 
हारे तो चुप रहे

चट्टान बन खड़ा है 
दबाने के बाद फिर

बंधन बना था जिसका, 
उस आँगन का हर उसूल

वह लौट आया रास-
रचाने के बाद फिर

इक बार सुन लिया था 
मगर कितनी बार और

दोहरा रहा है बात 
बताने के बाद फिर

उसका भी घर जलेगा ही 
बस्ती अगर जली

पछता रहा है आग 
लगाने के बाद फिर

ओढ़े नकाब बैठा था 
घर में ही वो अमीर

चौकस हुये हैं लोग 
सताने के बाद फिर

जब तक चला वो 'केस',
रहा उससे बेदखल

वापस मिली ज़मीन 
हराने के बाद फिर

तीन
कभी झुकती है धीरे से 
कभी झटके से तनती है

हमारी जिन्दगी भी इक 
पहेली रोज बनती है

तवे पर फूलती रोटी 
गवाही दे रही उसकी

कठौती में जो आटे की 
मुलायम लोई सनती है

जिसे अपने ख्यालों में 
बसाया है मुहब्बत से

उसी को देखकर हर रोज 
अपनी ईद मनती है

कई सदमें जनम लेते 
यकीनन दोस्तों उस पल

किसी की रूह से जब रूह 
टकराती है, ठनती है

निकल आता है सच का 
सूर्य बिल्कुल उस तरह ही तो

किसी चलनी में कोई चीज
जैसे खुद ही छनती है

चार

किसी के ख़्वाब में वह 
इस क़दर तल्लीन लगती है

नदी वह गाँव वाली आज-
कल ग़मगीन लगती है

कभी महलों की रानी थी 
कभी महफ़िल की थी रौनक

ग़ज़ल निर्धन के कंधों पर 
ही अब आसीन लगती है

भरोसा है जिन्हें अपनी 
कठिन-सी साधनाओं पर

जुगाड़ों की कोई चर्चा 
उन्हें तौहीन लगती है

हमेशा घर की बहुओं में 
हज़ारों दोष होते हैं

हमेशा अपनी बेटी ही 
हमें शालीन लगती है

अमीरों को मुबारक हों 
बड़े सोफे , नरम गद्दे

हमारी ये चटाई ही 
हमें कालीन लगती है

अकड़ कुछ ऐसी दौलत की 
लगे हर शै बिकाऊ है

हमें दुनिया की नीयत तो 
अलोपीदीन लगती है

पाँच

कुछ दिन का एकान्त हुआ है 
सहना मुश्किल

माँ की पीर घनी थी कितनी 
कहना मुश्किल

जैसे जल बिन मीन,दिया है 
बिन बाती का

वैसे पल भर दूर हुआ है
रहना मुश्किल

जल,जीवन,हरियाली नारे 
खूब हैं लेकिन

दलदल में तब्दील नदी का 
बहना मुश्किल

एक हिजाब ने शांत हवा को 
उग्र बना दी

ऐसे रूढ़ विचारों का क्यों 
ढहना मुश्किल

सोने के लालच में वो न 
फँसे भी कैसे

बनना है पीतल से असली 
गहना मुश्किल

इक बक्से में खूब जमा कर 
रख भी दूँ पर

दुख की लम्बी-चौड़ी चादर 
तहना मुश्किल

छह

बड़ी उल्टी कहानी 
कर रही हूँ
मैं अब भी बदजुबानी 
कर रही हूँ

गयी हूँ माँ पे सब 
कहने लगे हैं

वही बातें पुरानी 
कर रही हूँ

बिना गलती ही शर्मिन्दा 
बहुत हूँ 
मैं खुद को पानी-पानी 
कर रही हूँ

तुम्हारे वास्ते है झूठ 
पर मैं किसी 
का हक बयानी कर रही हूँ

तुम्हें हरियालियों से 
प्रेम है तो लो
मैं अपना रंग धानी कर रही हूँ

सात

मुसीबत में भी तनती जा रही हूँ
मैं अपनी माँ-सी बनती जा रही हूँ

समझ लो बस कि मैं बहती नदी हूँ
मैं अपने आप छनती जा रही हूँ

बना कर माँ गई जीवन की मूरत
उसी मिट्टी में सनती जा रही हूँ

ये दर्पण साथ मेरा दे, नहीं दे
मैं बनती और ठनती जा रही हूँ

उधर बस रूठने का सिलसिला है
इधर मैं सिर्फ़ मनती जा रही हूँ

गई हो सौंप कर तुम वस्त्र सुख के 
मगर मैं दुःख पहनती जा रही हूँ

तुम्हें तो बेटियाँ भाती रही माँ
ग़ज़ल मैं रोज जनती जा रही हूँ

परिचय
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डॉ.भावना का जन्म 20 फरवरी को बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ। प्रारम्भ से ही अध्ययन, संवेदना और साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि रही। उन्होंने रसायन-शास्त्र में एम.एस.सी. तथा पीएच-डी. की उपाधि प्राप्त की। इसके अतिरिक्त डी.एन.एच.ई. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा भी ग्रहण की। विज्ञान और साहित्य; दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय रहते हुए उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान निर्मित की है। वर्तमान में वे बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के रसायन शास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
डॉ. भावना समकालीन हिन्दी ग़ज़ल, कविता, आलोचना तथा बज्जिका साहित्य की महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। उनके प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रहों में ‘अक्स कोई तुम-सा’, ‘शब्दों की कीमत’, ‘चुप्पियों के बीच’, ‘मेरी माँ में बसी है ’, ‘धुंध में धूप’ तथा ‘चिड़ियों की दावेदारी’ विशेष रूप से चर्चित हैं। ‘सपनों को मरने मत देना’ उनका महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह है। आलोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। ‘हिन्दी ग़ज़ल के बढ़ते आयाम’, ‘हिन्दी ग़ज़ल भाषा और मूल्यांकन’, ‘कसौटी पर कृतियाँ’, ‘बदलते परिवेश में हिन्दी ग़ज़ल’ तथा ‘हिन्दी ग़ज़ल दृष्टि और संकल्पनाएँ’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल की आलोचनात्मक परम्परा को समृद्ध किया है। बज्जिका भाषा में उनका कविता-संग्रह ‘हम्मर लेहु तोहर देह’ तथा उपन्यास ‘लाडो’ भी अत्यंत चर्चित रहे हैं। रसायन-शास्त्र विषय पर उनकी पुस्तक ‘Some Complexes of Benzothiazole Derivative’ भी प्रकाशित है।
संपर्क : आद्या हॉस्पिटल, जीरोमाइल, सीतामढ़ी रोड, मुजफ्फरपुर
ई-मेल : bhavna.201120@gmail.com

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