शनिवार, 24 सितंबर 2022

मनोज जैन का एक नवगीत "फुलझड़ी" प्रस्तुति : ब्लॉग वागर्थ



फुलझड़ी
__________

एक नन्हीं
फुलझड़ी
अनगिन सितारे छोड़ती हूँ।

स्वर्ण की आभा समेटे 
हर सितारा जिंदगी भर
जगमगाता है।

टूटने से ठीक पहले 
नेह मंगल का नया 
नवगीत गाता है।

एक क्षण में
नेह के
संवेदनों को जोड़ती हूँ।

ज़िन्दगी अनमोल है 
चाहे बड़ी हो
या रहे पल की। 

ज़िन्दादिली पहचान इसकी
झोंपड़ी हो या 
महल की। 

मैं निमिष भर
तमस पीकर 
मुस्कुराहट ओढ़ती हूँ।


मनोज जैन
106,विट्ठलनगर 
गुफामन्दिर रोड 
लालघाटी
भोपाल 462030

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

मनोज जैन का एक नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ

एक नवगीत 
उठी भागवत
____________

घात लगा चहुँदिश 
बैठे हैं,
सब आश्वस्त शिकारी

ठाकुर जी को भोग 
लगा, फिर
करुणा का रस बरसा।

वाचक ने पाखंड
उचारा,
नेता ने छल परसा।

अपने हिस्से की 
बढ़-चढ़ कर 
सबने खेली पारी।

म्यूजिक सिस्टम नें
म्यूजिक का 
झटका फिर दे मारा।

डिस्को में तब्दील 
हो गया
चारों तरफ़ नजारा।

चिंता छोड़
गोपियाँ नाची 
जमकर बारी-बारी।

भरी सभा में
 पुण्य-पाप के
 जुमले सबने छोड़े।

भक्ति-भाव के 
रस में डूबे
भगत खड़े कर जोड़े।

चंदे के धन से 
पंडित के
घर की चुकी उधारी।

उठी भागवत,
भक्तजनों ने
मिल जयकारे बोले।

धीरे-धीरे चढ़े
सभी के
फिर से उतरे चोले।

निकल लिए कुछ
इधर-उधर से
कुछ चल दिए कलारी।

मनोज जैन

एक नवगीत मनोज जैन प्रस्तुति : वागर्थ


उठी भागवत
_________

साधकर सब 
मौन मन में
दूर तक बैठे शिकारी।

ठाकुर जी को भोग 
लगा फिर
करुणा का रस बरसा।

वाचक ने पाखण्ड 
पसारा
नेता ने छल परसा।

अपने हिस्से की 
बढ़ चढ़ कर 
सबने खेली पारी।

म्यूजिक सिस्टम नें
म्यूजिक का 
झटका धीरे मारा।

डिस्को में तब्दील 
हो गया
चारों तरफ़ नजारा।

चिंता तजकर नची 
गोपियाँ
जमकर बारी-बारी।

भरी सभा में पुण्य 
पाप के
जुमले जमकर छोड़े।

भक्ति-भाव के 
रस में डूबे
भगत खड़े कर जोड़े।

चंदे के धन से 
पण्डित के
घर की चुकी उधारी।

उठी भागवत
भक्तगणों ने
मिल जयकारे बोले।

धीरे धीरे चढ़े
सभी के
फिर से उतरे चोले।

निकल लिये कुछ
इधर उधर से
कुछ चल दिये कलारी।

मनोज जैन

रविवार, 18 सितंबर 2022

कवि परिचय देवेन्द्र सफल जी प्रस्तुति : वागर्थ ब्लॉग


नाम-देवेन्द्र कुमार शुक्ल
उपनाम-देवेन्द्र सफल
जन्म-4 जनवरी 1958, कानपुर महानगर
शिक्षा-स्नातक एवं तकनीकी शिक्षण प्राप्त
सम्मान/ पुरस्कार -
श्रृंगवेरपुर क्षेत्र विकास संस्थान, प्रयागराज- 1995
अनमोल साहित्यिक संस्था, कानपुर- 1997
आचार्य प.गोरे लाल स्मृति निधि सम्मान-1998
हिंदी प्रचारिणी समिति,कानपुर प्राज्ञ शेखर सम्मान-2000
मानस संगम,कनपुर-सारस्वत सम्मान-2008
मानस परिषद कानपुर-विशिष्ट साहित्यकार सम्मान
कायाकल्प 'साहित्य श्री सम्मान नोयडा-2010
हिंदी साहित्य सम्मेलन दिल्ली- सारस्वत सम्मान- 2010
साहित्यिक संस्था'अक्षरा'
मुरादाबाद सम्मान-2011
,उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन-सम्मान-पत्र-2011
रामकिशन दास स्मृति साहित्यसम्मान-काठमांडू नेपाल -2013
स्व.मदनमोहन सिंह स्मृति-हिंदी शिखर सम्मान-दुबई ,यू ए ई 2014
एनाल्को यूनिवर्सिटी पेरिस-फ्रांस 'विश्व हिंदी सेवी- सम्मान-2016
उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान, कनपुर सम्मान- पत्र-2018
साहित्यिक यात्राएं- काठमांडू ,दुबई ,शारजाह, आबूधाबी,पेरिस, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड, वैटिकन सिटी
प्रकाशित कृतियाँ- पखेरू गन्ध के (गीतसंग्रह)१९९८
नवान्तर (नवगीत -संग्रह)२००७
लेख लिखे माटी ने (नवगीत- संग्रह)2010
सहमी हुई सदी (नवगीत संग्रह)2012
हरापन बाकी है (नवगीत संग्रह)2016
शीशे के मकाँ में (ग़ज़ल-संग्रह)2021
परछाइयाँ हमारी (ग़ज़ल-संग्रह)2022
विशेष- आकाशवाणी के मान्य कवि,स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन
सम्प्रति-निदेशक/प्रबन्धक- गीतांजलि इंटरनेशनल स्कूल,कानपुर
अध्यक्ष-सरस्वती ट्रष्ट (रजि.)कानपुर
स्थाई पता- 117/क्यू/759ए, शारदा नगर, कानपुर - 208025(उ.प्र)
मो.09451424233, 09005222266

कवि देवेन्द्र सफल जी के नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ ब्लॉग

कवि देवेन्द्र सफल जी के नवगीत

1

जाने क्यों मेरा बीता कल
मुझको याद करे
जितना दूर-दूर रहता
उतना संवाद करे।

मेरे सिरहाने आ बैठा
खुलकर बोल रहा
बचपन की खोई किताब के
पन्ने खोल रहा

वह रातों की नींद उड़ाये
दिन बर्बाद करे।

कभी गोद में मुझे उठा ले
कभी गाल चूमे
कभी थाम कर उंगली मेरी
साथ- साथ घूमे

मेरे गूंगे शब्दों का भी 
वह अनुवाद करे।

बाग,खेत- खलिहान, पोखरे
तुम कैसे भूले
बता रहा फागुन की मस्ती
दिखा रहा झूले

लौट चलो अपने अतीत में
फिर फरियाद करे ।

कहता, निष्ठुर-निर्मोही तू
मुझसे दूर हुआ
सोंधी रोटी याद क्यों रहे
खाकर मालपुआ

बहस वकीलों जैसी करता
दाखिल वाद करे ।

2

दिन हैं शर्मीले
-----------------

सिर पर चढ़ी धूप ने पहने
कपड़े कुहरीले
कांपे तन-मन चुभें शीत के ये शर ज़हरीले ।

चारों ओर
धुंध का घेरा
नजर न कुछ आये
राख मले 
जोगी - सा मौसम
जिसे न जग भाये

दबे पाँव आकर छुप जाते
दिन हैं शर्मीले ।

वृक्षों और लताओं
के अब
पीत हुए पत्ते
इन पत्तों पर 
गिरे ओस- कण
आँसू- से झरते

उपवन,खेत, मेड़,पगडंडी
सब गीले-गीले ।

पंछी दुबक गये 
कोटर में
सूनी अंगनाई
लेकिन चक्की से
चूल्हे तक
नाच रही माई

सर्द अलाव हुआ तो बाबा
हुए लाल-पीले ।

3

प्राण नहीं उमगे

--------------------
चर्चा जोर- शोर से है
घर के बंटवारे की
बात फँसी, अम्मा-बापू के
सिर्फ गुजारे की ।

सबकी मंशा
कमरे - आँगन
सँग दालान बंटे
छोटी मेड़ें हों
सब चाहें
जल्दी फसल कटे

चौके तक पाला खींचे
चखचख ओसारे की ।

संग रहेंगे सास- ससुर
सुन
चिहुंकी बहू बड़ी
कहीं न पड़े दबाव
सोचकर
छोटी दूर खड़ी

चैन नहीं मुखिया को
टूटी आस सहारे की ।

देख इंद्र-धनु
बापू के अब
प्राण नहीं उमगे
चटक रंग जो
कल दिखते थे
हल्के आज लगे

चुभे पड़ोसी की हमदर्दी
सांझ-सकारे की ।
4
 उनको शाम सुहानी दें ।

आने वाली पीढ़ी को
हम आओ
 सुखद जवानी दें
अपने जले पाँव हों चाहे
उनको 
शाम सुहानी दें ।

जहरीली जो हुईं हवाएं
उनमें भी वो जहर 
न भर दें
बढ़ें कदम तो झंझायें आ
उन्हें कहीं
भयभीत न कर दें

डरें न झुकें उन्हें
 हम ऐसा
गैरत वाला पानी दें ।

नये दौर की चाल तेज है
बढ़े जोश को
चलो सराहें
करवट लेने लगा समय अब
बदल गई हैं उनकी चाहें

पिज्जा, बर्गर वे खायें पर
थोड़ी सी
गुड़धानी दें ।

वे अतीत के पृष्ठ सुनहरे
जिन्हें भुलाना
कभी न संभव
आनेवाले कल की खातिर
फिर उनमें रँग भर दें अभिनव

पुरखों के स्वर्णिम 
अतीत की ताजा
लिखी कहानी दें ।

5
क्यों हैं ? चौड़े जबड़े

छोटे प्रश्नों के  समूह भी
इतने हुए बड़े
हमसे माँग रहे जवाब अब
कई सवाल खड़े ।

कैसे उनके हक आये
जंगल और नदी
क्यों पंछी रटते पिंजरों में
नेकी और बदी

प्रगतिशील भी यहाँ रूढ़ियों में
अबतक जकड़े ।

कुछ के अधरों पर मुस्कानें
कुछ के होंठ सिले
कुछ को फूलों के गुलदस्ते
कुछ को शूल मिले

निर्गुट में गुटबन्दी है
क्यों दिखते कई धड़े ।

जल-थल, वायु, वनस्पतियों ने
सबको सुख बांटे
हम क्यों खुशियां 
लुटा न पाये
खींचे सन्नाटे

किसने लिखा हमारी
किस्मत में
अगड़े - पिछड़े ।

क्यों हंगामा बरपा
कोई
गया नहीं तह में
पत्थर इतनी तेज
 उछलते
दर्पण हैं सहमें

आदमखोर सियासत के
क्यों हैं चौड़े जबड़े 

6

खुश बहुत गिलहरी है

डाल-डाल पर दौड़ रही
खुश बहुत 
गिलहरी है।

चादर कुहरे की सिमटी
दिन गये रजाई के
गदराये हैं खेत खुशी में
गेहूँ - राई के

सुबह- शाम ठण्डक 
फिर भी
गुनगुनी दुपहरी है ।

कुठला खाली हुआ
भुसौरे एक नहीं तिनका
घर अनाज आये तो कुछ
ऋण चुके महाजन का

सरसों, चना, मटर पियराये
हरी अरहरी है ।

खुशियों ने फिर दस्तक दी
घर में पाहुन आये
होली की मस्ती में तन-मन
झूम-झूम जाये

पकी पकी फसलों की रंगत
हुई सुनहरी है ।

पिछले साल पड़ा सूखा
मर गई भैंस- गइया
पूरी हो इस साल साध
सुन लें देवी मइया

मुन्नी हुई सयानी
लेकिन
अभी छरहरी है ।

7

 चारों ओर गंध बारूदी

कंधे झुकने लगे हमारे
थोड़ा लिखा समझना ज्यादा ।

वाणी मूक ,शुष्क आँखें हैं
कटी हुई तर्जनी हमारी
अपनी दूरी बढ़ती जाती
पहरे में जिंदगी तुम्हारी

तुमसे ताकत उसे मिली है
बोल रहा सिर चढ़कर प्यादा ।

अन्तः पुर में तुम खोये हो
चारों ओर गंध बारूदी
सागर की लहरें बन्दी हैं
तुमने आँख अभी तक मूँदी

सुख की नींद सभी सोयेंगे
हँसकर कभी किया था वादा ।

पंछी आँगन उतरे लेकिन
लगता बदला-बदला घर है
गतिविधियां संदिग्ध लग रहीं
अब बिखरे दानों से डर है

चीख सुनी ,कुछ लोग भागते
बहे लहू पर पड़े बुरादा ।

वंशी ने आकर्षण खोया
अब न विरह में आँसू झरते
शब्दों का सम्मोहन टूटा
अक्षर-अक्षर चुगली करते

सहती जीभ दाँत की घातें
बैठी सिर धुनती मर्यादा ।

8

आँगन में पंछी उतरे हैं

देहरी भीतर खुशियां आईं
लगता अपने दिन बहुरे हैं
बहुत दिनों के बाद हमारे
आँगन में पंछी उतरे हैं ।

अच्छी फसल हुई है अबकी
खूब हुए हैं चना औ मटर
कुठला भरा हुआ गेहूँ से
धरे बरोठे राई- अरहर

बेच अनाज चुकाया कर्जा
ईश -कृपा से अब उबरे हैं।

कजरारे नैना शर्मीले
दर्पण से खुलकर बतियाते
सेंदुर टिकुली और महावर
बिन बोले सब कुछ कह जाते

वर्षों बाद बज रही पायल
मेंहदी रचे हाथ निखरे हैं।

शुभशुभ शगुन हो रहे हैं 
नित कागा भी मुंडेर पर बोले
चैता, बन्ना गावै तिरिया
भेद जिया के रह रह खोले

गेरू मिले हुए गोबर से
घर औ'द्वार लिपे-सँवरे हैं।

पिछले साल पड़ा सूखा तो
रोई मुनिया की महतारी
देवी की किरपा अबकी
गौना देने की तैयारी

जो सम्बन्धी तने तने थे
लगे तनिक वो भी निहुरे हैं।

9

एक पाँव पर खड़े हुये हैं---

यक्षप्रश्न है वही सामने
पीढ़ी के क्रम अगले हम
निष्ठा की बातें करते हैं
फिर भी कितने बदले हम।

सत्य यही चलना जीवन है
थके- थके कुछ पैर बढ़े
कदम कभी जो गलत पड़े तो
राहों पर ही दोष मढ़े

गिरने का क्रम जारी है पर
समझ रहे हैं संभले हम ।

दीमक चट कर गईं पुस्तकें
तोते ज्ञान बघार रहे
अजगर निगल रहा है मृग को
इस सच को सच कौन कहे

एक पाँव पर खड़े हुए हैं
मौनवृती- से बगुले हम ।

सम की बात विषम मुद्रायें
सभी लोग हैं डरे- डरे
शंकाओं के गहरे बादल
कोई क्यों विश्वास  करे

हिमखण्डों - से जमे हुये हैं
सच पूछो कब पिघले हम।

10

 चुप रहना,कुछ मत कहना,
दीवारों के हैं कान
चुगली कर देंगे दरवाजे,
खिड़की, रोशनदान ।

खुसुरपुसुर, मूहाचाई से
होगी नींद हराम
घर के बाहर भीड़ जुटेगी
अगर हुआ संग्राम

व्यंग्य-वाण वे संधानेंगे
सुन भइया ब्रजभान ।

सूरजमुखी आग उगलेगी
जब कल होगी भोर
रूठी हुई रातरानी के
होंगे शब्द कठोर

चम्पा, बेला उकसायेंगी
कहाँ तुम्हारा ध्यान ।

शातिर मुखिया क्या जाने कब
चल दे कैसी चाल
चुटकी ले-ले कीच उछालेंगे
नौरंगी लाल

खाई चौड़ी होती ही जायेगी
इस दरम्यान ।

11

आँखें फाड़े उद्धव देखें,
ये सच है या मति भरमाई।

राग-रंग का खेल अजूबा
कोई नहीं प्रेम में डूबा
व्याकुल सभी नजर आते हैं
जन-जन असमंजस से ऊबा

अपनी ढपली अपनी तानें
बेपरवाह दिखी अंगड़ाई ।

अल्हड़पन न दिखी अलमस्ती
रोग-शोकमय बस्ती- बस्ती
कदम-कदम कोहराम मचा है
जान यहाँ पर दिखती सस्ती

रोटी पर मंहगी की छाया
छाती पीट रही अंगनाई ।

गोप- ग्वाल सब दिखें निरंकुश
ताल ठोंकते घर-घर लव-कुश
लम्पट, चोर,नराधम व्यापे
लूटमार जो करके हैं खुश

जाग-जाग कर रात गुजरती
अब न सुरक्षित आना-पाई।

प्यासे तन-मन,प्यासी गागर
वैसे पास हहरता सागर
आँख गड़ाये घूम रहे हैं
जिंदा लाशों के सौदागर

लोग खा रहे झूठी कसमें
प्रीति बनी कब की हरजाई।

12

तुम गाण्डीव धनुर्धारी हो
तुमको कितना याद दिलायें
शोभा तुम्हें नहीं देती हैं
वृहन्नला-वाली मुद्रायें ।

सूरज जैसे तेजस्वी, तुम
रहे उजाले की परिभाषा
शर- शैय्या पर पड़े भीष्म की
तुमने पूरी की अभिलाषा

शंखनाद जब किया युद्ध में
बैरी की बढ़ गई व्यथायें ।

कालजयी, जन-जन के नायक
जग में चर्चित कीर्ति तुम्हारी
बने सारथी युद्ध भूमि में
रहे हाँकते रथ, गिरधारी

कर्मयोग के तुम ज्ञाता हो
नीति भला क्या तुम्हें बतायें।

द्वापर की वो बात और थी
कलयुग में मत वेश बदलना
शर्तों पर अधिकार मिले तो
जीते जी होता है मरना

जब गूँजे स्वर 'देवदत्त' का
गूँज उठें फिर सभी दिशायें।

देवेन्द्र सफल


परिचय
________

नाम-देवेन्द्र कुमार शुक्ल
उपनाम-देवेन्द्र सफल
जन्म-4 जनवरी 1958, कानपुर महानगर
शिक्षा-स्नातक एवं तकनीकी शिक्षण प्राप्त
सम्मान/ पुरस्कार -
श्रृंगवेरपुर क्षेत्र विकास संस्थान, प्रयागराज- 1995
अनमोल साहित्यिक संस्था, कानपुर- 1997
आचार्य प.गोरे लाल स्मृति निधि सम्मान-1998
हिंदी प्रचारिणी समिति,कानपुर प्राज्ञ शेखर सम्मान-2000
मानस संगम,कनपुर-सारस्वत सम्मान-2008
मानस परिषद कानपुर-विशिष्ट साहित्यकार सम्मान
कायाकल्प 'साहित्य श्री सम्मान नोयडा-2010
हिंदी साहित्य सम्मेलन दिल्ली- सारस्वत सम्मान- 2010
साहित्यिक संस्था'अक्षरा'
मुरादाबाद सम्मान-2011
,उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन-सम्मान-पत्र-2011
रामकिशन दास स्मृति साहित्यसम्मान-काठमांडू नेपाल -2013
स्व.मदनमोहन सिंह स्मृति-हिंदी शिखर सम्मान-दुबई ,यू ए ई 2014
एनाल्को यूनिवर्सिटी पेरिस-फ्रांस 'विश्व हिंदी सेवी- सम्मान-2016
उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान, कनपुर सम्मान- पत्र-2018
साहित्यिक यात्राएं- काठमांडू ,दुबई ,शारजाह, आबूधाबी,पेरिस, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड, वैटिकन सिटी
प्रकाशित कृतियाँ- पखेरू गन्ध के (गीतसंग्रह)१९९८
नवान्तर (नवगीत -संग्रह)२००७
लेख लिखे माटी ने (नवगीत- संग्रह)2010
सहमी हुई सदी (नवगीत संग्रह)2012
हरापन बाकी है (नवगीत संग्रह)2016
शीशे के मकाँ में (ग़ज़ल-संग्रह)2021
परछाइयाँ हमारी (ग़ज़ल-संग्रह)2022
विशेष- आकाशवाणी के मान्य कवि,स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन
सम्प्रति-निदेशक/प्रबन्धक- गीतांजलि इंटरनेशनल स्कूल,कानपुर
अध्यक्ष-सरस्वती ट्रष्ट (रजि.)कानपुर
स्थाई पता- 117/क्यू/759ए, शारदा नगर, कानपुर - 208025(उ.प्र)
मो.09451424233, 09005222266



शनिवार, 17 सितंबर 2022

राघवेन्द्र तिवारी जी के अभिनव गीत प्रस्तुति : वागर्थ ब्लॉग


राघवेन्द्र तिवारी के 
अभिनव गीत

     1

फटी कमीज के टूटे 
हुये बटन जैसा
अटक गया है दिन 
कण्ठ में घुटन जैसा

उतर रही है साँस 
प्राण के  झरोखे से
सम्हल गई है हवा
किसी नये धोखे से

पाँव चलते रहे इन 
काँच  हवा-महलों
दर्द बढ़ता रहा है 
एडियों फटन जैसा

चढ़े बुखार में वह
धूप में तपे ऐसे
भरी दोपहर कहीं 
प्यास बढ रही जैसे

वही फुटपाथ के पत्थर 
पर पड़ा सकुचाता
वक्त की बाँह पर खोयी
हुई खटन जैसा

बस एक चाह साँझ
कैसे भी उतर आये
रेंगता समय जहाँ 
मन्द-मन्द मुस्काये

बच गई एक आस
तनिक कहीं राहत की
जिसे कहा करते हम
नाम की रटन जैसा

2
  

बुनना है इतने समय में
तुमको कहानियाँ
बचपन या बुढ़ापा या 
किंचित जवानियाँ

महल, कुटीर, कोठियाँ
या फिर अटारियाँ
घर ,मकान,भवन,या कि
बस आलमारियाँ

निष्ठुर हुये से बैठे
फिर से कई कई
हैं राजनीति में ही
गुम राजधानियाँ

दासी- दास, नौकरों 
की भीड़ में पड़े
भूले हुये से वक्त के
गुमशुदा झोंपड़े

मुमकिन है खोजते रहें
अपनी शिनाख्त को
इस शहर में तमीज की
कुछ मेहरवानियाँ

जो दोस्त, दूकानदार
या व्यापार में मशगूल
सड़कों पर चहल-पहल 
को कुछ लौटते स्कूल

उनकी ही पीठ पर लदी
जनकृत व्यवस्थायें
खिडकियों से देखतीं
कुलवंत रानियाँ

3

वस्तुतः जैसे
प्रवाली बन गई हो
श्यामली तुम फिर
दिवाली बन गई हो

फटे आँचल को 
पकड़ कर प्यारमें
भर रही हो रोशनी
अँकवार में

किसी भूखे की
प्रतिष्ठा साधने को
भोग- छप्पन सजी
थाली बन गई हो

थप-थपाती उजाले
के बछेरू को
और सहलाती समय
के पखेरू को

आँख में भर उमीदों 
के समंदर को
ज्योति की खुशनुमा
डाली बन गई हो

अनवरत श्रम से
लगा जैसे थकी हो
झरोखे में थम गई 
सी टकटकी हो

रही खाली पेट
पर,आपूर्ति की
सुनहली कोई
प्रणाली बन गई हो

4

सूरज का लगा 
माँग -टीका 
बदल गया 
आचरण नदी का 

मद्धिम -मद्धिम चञ्चल 
सहमा-सहमा अविरल 
लेकर संग चलता है 
मौसम की हर हलचल 

हवा की हवेली से 
आ उतरे -
जल का यह 
कौन सा तरीका ?

आँखों का यह वत्सल 
जिस की है कल-कल-कल
दोनों किनारों पर 
रखी मेखला - वल्कल

बदला-बदला 
लगता बूंदों का -
उत्प्रेरक ,आधुनिक 
सलीका |

कहीं ठहरती अधमुँदी 
पलकों पर कोई सदी 
व्यवहलता , जैसे विस्थापित 
हो आँकने चली द्रोपदी 

नदी : एक रूप ,
हुई बारिश का -
अविकल अनुवाद ,
मगर /तनिक फीका |

गाती है गुन-गुन -गुन 
चलती है छुन -छुन-छुन 
फैलती विखरती है 
मीलों तक कोई धुन 

जैसे कि दूर कहीं 
बजता है -
गीत कोई 
मोहम्मद रफ़ी का।


5

खबर तो यह भी जरूरी
है, नई
फर्श से दीवार आकर 
सट गई

शून्य पसरा भवन के 
सद विचारों में
दिख रहे ध्वंश के बादल
दरारों में

ईंट की अपनी व्यथा
सहकर्मियों से
दूसरी एक ईंट आकर 
कह गई

 शुरू झड़ना हुआ 
 चूना समय का
बचा न अस्तित्व
जैसे विनय का

लोक प्रचलित कहावत
सी चेतना
डाक में आये खतों
सी बँट गई

अस्तव्यस्तस्थितियाँ 
सिंहद्वारों की
भूख में डूबी 
बस्ती कहारों की

कमर से आ झुकी 
नाइन पूछती 
जल रही वो आग
कैसे बुझ गई ?


राघवेन्द्र तिवारी

जगदीश पंकज जी का एक समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुति : वागर्थ

 

जगदीश 'पंकज' जी की दृष्टि से गुजरते हुये कृति '.न बहुरे लोक के दिन ' । 

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'न बहुरे लोक के दिन'-- अनामिका सिंह  (नवगीत संग्रह)
' समय के सम्पुष्ट प्रलेख जो समय के प्रवक्ता का समय पर हस्तक्षेप हैं '-- जगदीश पंकज 
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पिछले कुछ वर्षों में जो युवा रचनाकार अपनी रचनाओं को लेकर साहित्यिक पटल पर उभर कर सामने आये हैं उनमें से अधिकतर का रुझान गीत-नवगीत की ओर रहा है। इस शताब्दी में, विशेषकर सदी के तीसरे दशक तक आते -आते, उभरे अधिसंख्य युवा रचनाकारों ने छान्दसिक कविता को अपनाते हुए नवगीत के कथ्य और शिल्प को अपना वर्ण्य बनाया है। इन युवा रचनाकारों में जो मुख्य नाम सामने आये हैं उनमें अनामिका सिंह ऐसा नाम है जो नवोदित महिला नवगीतकारों की पंक्ति में अपने नवगीतों के द्वारा कम समय में विशेष स्थान बना चुका है। सोशल मीडिया पर स्वतंत्र रूप से तथा गीत-नवगीत के समूह 'वागर्थ' पर एक प्रस्तोता के रूप में उपस्थित होकर अनामिका ने अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। इसी बीच अपने स्वतंत्र लेखन को जारी रखकर जो सर्जना की है, उसे संगृहीत रूप में अपने नवगीत संग्रह 'न बहुरे लोक के दिन' लेकर साहित्य-जगत में उपस्थित हुई हैं। 

नवगीत संग्रह 'न बहुरे लोक के दिन' के गीतों से गुजरते हुए सबसे पहले ही उस स्थिति का पता चलता है कि अनामिका 'लोक' के सरोकारों से जुड़ी हैं। वह व्यवस्था का चित्र खींचती हैं जहाँ स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी लोक की स्थिति में बदलाव नहीं आया है। नवगीतों का केंद्रीय तत्व आमजन के इर्द-गिर्द उसकी पीड़ा से जुड़ा है जिसे लोकजीवन की भाषा के भदेस शब्दों और मुहावरों के द्वारा व्यक्त किया गया है। इन गीतों का फलक इतना विस्तृत है जिसमें अनेक मानवीय संवेदना के पक्षों को स्थान मिला है। पारिवारिक तथा मानवीय रिश्तों से लेकर राजनीति , रूढ़िवादिता पर प्रहार, सम्प्रदायिकता, किसानों की दुर्दशा और आंदोलन ,पर्यावरण और प्रकृति का अंधाधुंध दोहन और उसका जनजीवन पर दुष्प्रभाव , वैश्विक महामारी , प्रगति और विकास के थोथे नारों के विज्ञापनों पर प्रहार आदि ऐसे प्रासंगिक विषय हैं जिन्हें अनामिका ने अपने लेखकीय सरोकारों में शामिल किया है।  इन्हीं के साथ-साथ प्रणय की कोमल भावनाओं से युक्त गीत और प्रकृति एवं मौसम के मानवीय अंतर्जगत को प्रभावित करने वाले कारकों पर कलम चलाकर शालीन श्रृंगार को गीतों में व्यक्त किया है। कथ्य की विविधता ने अनामिका को कहीं भी अपनी जन-प्रतिबद्धता से विचलित नहीं होने दिया है और वह लोक के दिन न बहुरने की वास्तविकता को अंत तक नहीं भूली हैं।
प्रस्तुत संग्रह 'न बहुरे लोक के दिन' यों तो अनामिका का प्रथम संग्रह है किन्तु संग्रहीत गीतों की परिपक्वता उनकी गहन वैचारिक पौढ़ता तथा अनुभव और अभ्यास को दर्शाते हैं। अपने आत्मकथ्य में यों तो अनामिका ने व्यक्त किया है कि उसने बहुत बाद में नवगीत लिखने आरम्भ किये हैं लेकिन इन गीतों के शिल्प और गठन को देखने से लगता है कि उसकी अंतर्चेतना में नवगीतों की चेतना बहुत पहले ही उत्पन्न होकर विकसित हो चुकी होगी। इस संग्रह में सत्तर नवगीतों को स्थान दिया गया है जो अपनी भाषा , शिल्प और अंतर्वस्तु में बेजोड़ हैं और पाठक को अंत तक  पढ़ने के लिए आकर्षित करते हैं। प्रत्येक गीत अपने आप में सबसे पहले गीत होता है किन्तु हर गीत नवगीत नहीं होता है।  गीति की नव्यता और नव्यता की गीति इन समय-सापेक्ष गीतों को नवगीत बनाती है। 

संग्रह पर विचार करते हुए अनामिका द्वारा दिए अनुक्रम के अंतिम नवगीत से शुरू करते हैं। अनामिका ने अपने सरोकारों को अपने गीत 'घर-घर रोशन हों  कंदील' में इस प्रकार व्यक्त किया है :
'रहे जिन्दगी जगमग, घर-घर /रोशन हों कंदील। 
जातिवाद,पाखंड अशिक्षा/ तोड़ सभी अवरोध। / विगत द्वेष की भूल कहानी/ करें लोकहित शोध। '
अनामिका के अनुसार स्वार्थवाद की चील संवेदन को गटक चुकी है. सबके उदर संतृप्त रहें और भूख का नृत्य अश्लील न हो। अतः -
'जलन दीप आँगन ओसारे/ घर-घर देहरी द्वार। / वंचित रहने एक न पाए ,/ तम की भरे दरार। '
अनामिका की चाहना है कि समष्टि में मीलों-मील तक ख़ुशी के दृश्य फैले रहें। अतः --
'उन प्रश्नों का समाधान हो/ जीवन का जो मूल। / खुली आँख के स्वप्न विवशता / न कर सके उदूल। '   ('घर-घर रोशन हों कंदील')

पारिवारिक और मानवीय रिश्तों को लेकर अनामिका ने अपने भावुक अंतर्मन से शब्द दिए हैं। संग्रह का पहला गीत ही अम्मा को लेकर है :
'शाम सबेरे शगुन मनाती/ खुशियों की परछाई/ अम्मा की सुध आई। '
***
अम्मा के पास घर की हर समस्या का समाधान रहता है :
'बाँधे रखती थी कोंछे, हर/ समाधान की चाबी / बनी रही उसके होने से/ बाखर द्वार नवाबी/
अपढ़ बाँचती मौन पढ़ी थी/ जाने कौन पढ़ाई / अम्मा की सुध आई। '    (अम्मा की सुध आई)

इसी के साथ संबंधों में प्रेम और अपनेपन के क्षरण की ओर इशारा करते हुए गीत भी संवेदनाओं को झकझोरते हैं जब माँ-पिता को वृद्धाश्रम में रहना पड़ता है और उन्हें मुड़कर देखा भी नहीं जाता। (काग मुंडेरों पर) पुत्र की आशा में वंश के वारिश की चाहना होने से बेटी के जन्म पर न कोई ख़ुशी मनाई जाती है न ही बधाई दी जाती है ( कोख भी कुछ कसमसाई) ।  बाँझ होते रिश्तों पर :
 'संबंधों का गर्भ न ठहरा, / रिश्ते बाँझ हुए (संबंधों का गर्भ न ठहरा) । ' 
दोहरे चरित्र और दहेज़ की लालची मानसिकता के कारण शगुन की मेंहंदी रचे हाथ गले में रस्सी बाँध कर लटक जाने को मजबूर हो जाते हैं।
 'भाँवर वाले वचन खा गई , / फिर लालच की भूख। '
***
'दोहरे दिखते मानदंड हैं,/ दोहरे सभी चरित्र। / समय-समय पर दुश्चरित्र का, / दिखता सच्चा चित्र। '  ( काया लटक गई )
दरकते हुए रिश्तों पर सुन्दर गीत में व्यक्त किया है :
'भित्तियाँ कितनी उठी हैं,/ बीच घर-घर के।  / अजनबी साये हुए,/ रिश्ते सभी दरके। / मृत हुईँ संवेदनाएँ / मूल्य बिसराये। / जिंदगी की दौड़ में ,/ इतना कमा पाये। / कांच के घर-बार में ,/हैं लोग पत्थर के। ' (भित्तियाँ कितनी उठी हैं)

गीतों की केन्द्रीयता में जहां जनपक्ष है वहीँ अपने समय की विद्रूपता और विडम्बना का भी सशक्त शब्दों में चित्रण है। जन-सरोकारों से प्रतिबद्धता को डिगने नहीं दिया है। अपने समय के रचनाकारों को भी सम्बोधित गीतों में अनामिका स्पष्ट रूप से कहती हैं कि कलम के अनुरोध को सुनो और कविकुल की मर्यादा रखना। --
'वंचित की हर / पीड़ा कहना,/ कुल का फ़र्ज निभाना। / कंगूरों की/ स्तुति करना,/  हरगिज सीख न जाना।/ 
शब्दों की शुचिता / संग करना,/  समरसता पर शोध, सुनो !
***
पंक्ति-पंक्ति की/ अन्तर्लय में ,/ रखना सच का बोध ,सुनो !
***
मरहम औषधि/ बनाना कविवर,/ जैसे तरुवर लोध ,सुनो ! '  (कलम करे अनुरोध सुनो) 

'गंगी कड़ी उदास' गीत के द्वारा अपने मूल विचार को पुष्ट किया है अनामिका ने :
''बीती सदियाँ कुएँ जगत पर,/गंगी कड़ी उदास,/ मिटी न जोखू प्यास। 
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सद्भावों के/ दृश्य लुप्त हैं,/ बंध्या हर उम्मीद। / समरसता की/ भेदभाव ने/ की तस्वीर पलीद। / 
ऐसे दोज़ख से/ की जाती है/ क्या कोई आस ? ''  --(गंगी कड़ी उदास)

प्रणय गीतों में अनामिका ने मिलन-विरह और प्रतिकूल मौसम में दूरियों से उत्पन्न स्वाभाविक संवेदन को अपने कई गीतों में सफलता से व्यक्त किया है। --
'सरस पारस पा दो अधरों का, / हुए नयन जब बंद,/ सजन ने रचे प्रीति के छंद। 
***
बाजूबंद गिरे खुल-खुल जब, कसें बांह के फंद ,/सजन ने रचे प्रीति के छंद। '  --(सजन ने रचे प्रीति के छंद)  

इसी का दूसरा पक्ष देखिये :
'घोर घटा / उमड़ी अंबर पर,/ झैँ धारा पर /बूँदें झर-झर। / दिग-दिगंत विहँसे, / पावस हमें डँसे। /दूर खड़े मेरे सांवरिया,/ सुधियाँ करें विलाप।  / हर आहट पर / बढ़ता घटता, /श्वासों का आलाप। /अंबर से / जो गिरे दामिनी , आकर ह्रदय धँसे। '  --(तरी-तरी मन घाट) 

परिस्थितियाँ और परिवेशगत यथार्थ मनुष्य की चेतना का निर्माण करते हैं। अनामिका की चेतना पर पिता की समतामूलक और संघर्षशील विचारधारा का निश्चय भी प्रभाव पड़ा है जिसे उसने स्वीकार भी किया है। यही यथार्थ अनामिका की प्रतिरोध शक्ति का आधार है जिसे अपने गीतों में सफलता से व्यक्त किया है। सच की अभिव्यक्ति और विसंगतियों पर प्रहार और प्रतिरोध के स्वर अनामिका के गीतों की विशेषता है। राजनीति प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती है, कभी प्रत्यक्ष रूप से तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से। अनामिका के गीत इन्हीं विद्रूपताओं , विडम्बनाओं पर एक सजग नागरिक तथा सचेतन रचनाकार की लेखकीय प्रतिक्रिया हैं। जिनका निष्कर्ष 'न बहुरे लोक के दिन' के नवगीतों में व्यक्त हुआ है। कुछ उदाहरण केंद्रीय तत्व की पुष्टि करते हुए उद्धृत हैं :
'आश्वासन ही आश्वासन पर,/ देख रहा गणतंत्र। / हाकिम फूंकें लालक़िले से ,/ विफल हुए वे मंत्र। / वादों की नंगी तकली पर, / सूट रहे हैं कात। ' --(आंत करे उत्पात)   
तथा 
'परिधि तुम्हारे पंखों की लो ,/ रहे हितैषी खींच,/ चिरैया बचकर रहना। 
***
साँसें कितनी ली हैं कैसे,/बही निकालेंगे। / चाल-चलन की पोथी पत्री / सभी खँगालेंगे। / संघर्षों से हुई प्रगति पर / उछल न जाए कींच।/ चिरैया बच कर रहना। ' 
   --(चिरैया बच कर रहना)
***
'लानत रख लो जान गण मन की ,/ राजा निकले पाथर तुम। '     --( लानत रख लो ) 
***
'चुपचाप बैठे हो मगन क्यों / भेजिए लानत सभी। / नाखून सत्ता के तुम्हारी /गर्दनों तक आ गए।  '  -- (नाखून सत्ता के)

'आग लगा दी पानी में' गीत की पंक्तियाँ में साम्प्रदायिकता पर प्रतिक्रिया :
'रामराज की जय हो जय हो, /आग लगा दी पानी में। 
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'अनाचार की विषबेलों ने , ज़हर हवा में घोला। / पाखंडी चेले करते हैं , /रोज़ -रोज़ ही रोला। / न्याय तुला भी नहीं उड़ेले , /पानी चढ़ी जवानी में। '  --( आग लगा दी पानी में)

अनेक उत्कृष्ट उद्धरण दिए जा सकते हैं संग्रह के गीतों से जो अपनी वैचारिकी और समकाल की व्याख्या ही नहीं करते बल्कि उसे बदलने के लिए भी कह रहे हैं। संग्रह के शीर्षक की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं :

' मूँद कर आँखें /भरोसा था किया,/ न बहुरे लोक के दिन। 
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न्याय पैंताने डुलता है चँवर , न तैरते शोक के दिन। '  --(न बहुरे लोक के दिन)

हर व्यक्ति की अपनी दृष्टि होती होती है जो घटनाओं, परिस्थितियों या लेखन पर कोई राय बनाती हैं। एक पाठकीय दृष्टि से देखने पर संग्रह के जिन गीतों ने मुझे अधिक आकर्षित किया उनमें 'धर्म खड़े ले हाथ जख़ीरे', 'एक कलम पर सौ ख़ंजर हैं', 'क्या खोया क्या पाया हमने', 'निकला शून्य फलन', 'व्यथा मुनादी कर रही', 'रंगमंच पर सभी जमूरे', 'आधुनिकता ने हमें बौरा दिया ', ' भित्तियाँ कितनी उठी हैं', 'एक दीप मन की देहरी पर', ' मगहर रोये कबीर', 'सुनो तथागत सम्मुख बैठो' , ' गायें यश की गाथा', ' कैसी चली हवाएँ बोल' आदि ऐसी रचनायें हैं जो अनामिका की सम्पुष्ट सोच का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। गीतों में प्रयुक्त देशज शब्द, शब्द-युग्म और मुहावरे अनामिका के लेखन को एक अलग पहचान देते हैं जो उसके जमीन से जुड़े अनुभवों के संकेत हैं। इन नवगीतों के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है किन्तु स्वयं पढ़कर जो रसास्वादन तथा आनंद की अनुभूति होती है उसका कोई विकल्प नहीं होता।
 
अंत में अपने मंतव्य और लेखन को सार्थक बनाते हुए गीत की पंक्तियाँ उद्धृत करना बहुत आवश्यक है जिसके बिना संग्रह के सार-तत्व को समझाना संभव नहीं है। --
' ओढ़कर बैठे रहेंगे मौन,
यह न होगा। 
हम करेंगे 
ज़ुल्म का प्रतिरोध। 

दर्द जिसका 
टीसता है अनकहा,
मौन हर उस दर्द का 
स्वर बनेंगे हम। 
बेजुबाँ बनकर दमन 
सहना नहीं,
मिल निकालेंगे 
अहम् के ख़म। 

वंचना को हम सराहें 
यह न होगा, 
हम करेंगे 
यंत्रणा पर शोध।  '  --(यह न होगा)

अनामिका सिंह के प्रस्तुत संग्रह 'न बहुरे लोक के दिन' के नवगीत अपने समय के सम्पुष्ट प्रलेख हैं जो समय के प्रवक्ता का समय पर हस्तक्षेप हैं। संग्रह विस्तृत विमर्श की मांग करता है। मुझे विश्वास है कि संग्रह पठनीय, संग्रहणीय तथा सुधी पाठकों, विमर्शकारों, अध्येताओं, और शोधार्थिओं के लिए समकाल पर प्रतिक्रिया के रूप में एक समर्थ दस्तावेज की तरह आकर्षित करेगा।  अनमिका सिंह का यह प्रथम नवगीत संग्रह उसके समृद्ध भविष्य की और आश्वस्त करता है।  मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !

--जगदीश पंकज 

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समीक्षित कृति :       'न बहुरे लोक के दिन'  (नवगीत संग्रह)
रचनाकार  :             अनामिका सिंह 
प्रकाशक :               बोधि प्रकाशन, जयपुर   
 प्रथम संस्करण :      वर्ष 2021  
मूल्य :                     रु. 250/- मात्र       

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संपर्क :
जगदीश पंकज 
सोमसदन ,5/41सेक्टर2,राजेन्द्रनगर,साहिबाबाद,गाज़ियाबाद-20100

आलेख अनामिका सिंह

रघुविन्द्र यादव के दोहों में – वैचारिक संघर्ष 

सितम्बर-1966 में नीरपुर, नारनौल (हरियाणा) में जन्में श्री रघुविन्द्र यादव ने छंद और विशेषतः दोहा छन्द पर कार्य कर जो ख्याति प्राप्त की है वह श्लाघनीय और सर्वविदित है। समकालीन दोहे रचने में इनका विशेष दखल है। इनके द्वारा अब तक कई दोहा-संग्रह प्रकाशित हुये हैं. जिनमें प्रमुख हैं – नागफनी के फूल, मुझमें संत कबीर, आये याद कबीर, वक्त करेगा फैसला आदि। इसके अतिरिक्त कई श्रेष्ठ दोहा संकलनों का सम्पादन भी आपने किया हैं, जिनमें प्रमुख हैं – आधी आबादी के दोहे, आधुनिक दोहा, दोहे मेरी पसंद के,दोहों में नारी, हलधर के हालत, नयी सदी के दोहे आदि। रघुविन्द्र यादव के दोहे  शृंगार , विरह आदि विषयों से दूर वर्तमान में मानव समाज की पीड़ा को लिपिबद्ध करते हैं। उनकि प्रतिबद्धता समाज के उस वर्ग के प्रति है जो रात-दिन श्रम करके भी सामान्य जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहा है ।  



गधे पँजीरी खा रहे, कुत्ते खाएँ खीर।
जंगल के मालिक धरें, आखिर कब तक धीर।।

जमीन से जुड़ा व्यक्ति अपनी जड़ों को कभी नहींं भूलता ।
इस जुड़ाव की तीव्रता रघुविन्द्र यादव जी की वैचारिकी में स्पष्ट परिलक्षित होती है । 
   कृषि प्रधान देश होते हुये भी किसानों की माली हालत किसी से छिपी नहींं । उनकी समस्याएँ और कष्टप्रद स्थिति
कवि को ज़ेहनी तौर पर मथती रहती है , नतीजा वे स्वयं एक संकलन ही वे कृषकों पर केन्द्रित कर देते हैं और
 कृषकों की समाज में स्थिति को जन-जन तक पहुँचाने के अपने प्रयास में लगभग 47 दोहाकारों के दोहों का संग्रह ‘हलधर के हालात’ का सम्पादन भी करते हैंं ।  कृषकों की  इस त्रासद स्थिति पर वे  स्पष्ट कहते हैं कि भारत अब मात्र कहने को कृषि प्रधान देश रह गया है ।
  सच ही तो है कि कृषकों के हितों पर सत्ता की नीयत और दमनकारी गतिविधियों को अभी हम सबने हाल ही में देखा  । बजाय हित संरक्षण करने के नीति नियंता झाँसे देने वाली नीतियाँ बनाकर जमकर शोषण अवश्य कर रहे हैं । सरकारें इनके लिए अल्पकालिक दोमुही योजनाएँ बनातीं हैं।

सत्यता को समझने के लिए उनका एक दोहा ही पर्याप्त है 

भूख, गरीबी, बेबसी, घर में सुता जवान।
शासन सुध लेता नहीं, मरते रोज किसान।।

केवल कृषक ही नहीं दोहों में स्त्री विमर्श पर 360 डिग्री विवेचन है । महिलाओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार, ,बलात्कार , लैंगिक विभेद , पितृसत्ता की जकड़न आदि तमाम बिन्दुओं पर वे अपनी विचारों में स्पष्ट अंकित करते हैं ।

रावण लूटें आबरू, मूक खड़े हैं राम।
सीताओं का हो गया, जीना आज हराम।।



रघुविन्द्र यादव के दोहे नज़ाकत नफ़ासत से इतर पारदर्शी संवाद करते हैं।आपके दोहे बहुत अलंकारिक न होकर सामाजिक कुरीतियों का खण्डन करने को  विवश करते हैं ।


गंगू पूछे भोज से , यह कैसा इन्साफ़।
कुर्की मेरे खेत की , कर्ज सेठ का माफ़ ।।


उनके विचारों की कड़ियाँ सामाजिक विसंगतियों , सत्ता की थेथरई , सर्वहारा की दारुण स्थितियों पर बार- बार आकर  जुड़ती हैं ।

बुलबुल ने आकाश में, जब-जब भरी उड़ान ।
बाजों ने प्रतिबन्ध के , सुना दिये फरमान ।।

चोर लुटेरे हो गये , सारे मालामाल ।
वर्ग कमेरा भूख से , अब तक है बेहाल ।।

बस्ती में रावण बढ़े , सड़कों पर मारीच ।
घिरी हुई है जानकी , फिर दुष्टों के बीच ।।


इस संक्रामक दौर में आज जब कुछ  लेखक खुलेआम दरबारी राग गा रहे हैं , कुछ बेहद शाब्दिक समन्वय के साथ , संतुलन बनाकर ऐसा लेखन कर रहे हैं जिससे पाठक ही दिग्भ्रमित है कि लेखक आवश्यक मुद्दे के पक्ष में खड़ा है या विपक्ष में , कुल मिलाकर शब्दों का ऐसा घालमेल जिससे लेखक की वैचारिक तटस्थता का सटीक आकलन नहींं किया जा सकता , ऐन उसी समय रघुविन्द्र यादव की वैचारिक दृष्टि एकदम स्पष्ट है , उन्हें जो कहना है वो कहकर ही रहते हैं । 
कोई संकोच , कोई खौफ़ उन्हें उनकी वैचारिक तटस्थता से विस्थापित नहींं करता ।


बात चाहे न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति की हो , या चुनावी दौर में सोलह कलाएँ बदलते जनप्रतिनिधियों की वो सब की असलियत और किरदारों पर दो टूक लिखते हैं ।


धन के बल पर आज फिर , हुआ पराजित न्याय ।
अरी व्यवस्था कोढ़ का, कुछ तो ढूँढ उपाय ।।

जनसेवा की आड़ में , करने को व्यवसाय ।
बन जाते हैं भेड़िये,वोटों खातिर गाय ।।

आपके जनधर्मी तेवर के दोहे न सिर्फ़ अपने स्वरूप और उसकी अंतर्वस्तु से ही नहीं प्रभावित करते बल्कि 
उनमें अभिव्यक्ति की सहजता, भावों की गहनता, मार्मिकता और सम्प्रेषण की त्वरा भी देखने लायक है 
थोड़े में बहुत कह जाना ही आपके दोहों की विशेषता है ।


आज जब आधी आबादी अपने ही घर-परिवार , सड़क , कार्यस्थल पर महफूज़ नहींं है , समाज उसे मात्र मादा भर की दृष्टि से नापता जोखता है , जहाँ नवजात से लेकर मृत्यु की कगार पर खड़ी बुजु़र्ग महिलाओं से हो रहे बलात्कार हमें विचलित नहीं कर रहे , कुछ अप्रिय घटित हो जाने पर उसे धार्मिक खाँचों में फिट कर या पहनावे आदि पर छींटाकशी कर सत्ता और समाज के ठेकेदार अपनी निकृष्ट दलीलें देकर कुंठित मानसिकता का परिचय देते हैं बजाय पीड़ित के पक्ष में खड़े होने के , ऐसे में वो कहते हैं


घर से निकलीं तितलियाँ, खतरों से अनजान ।
बीच बाग में कर गये,भँवरे लहूलुहान।।


कहीं भेड़िये घात में , कहीं शिकारी जाल ।
है हिरनी के भाग्य में , मरना सदा अकाल ।।


है नारी के भाग्य में , दर्द , घुटन , अवसाद ।
अपने जिसको लूटते, कहाँ करे फरियाद ।।


 अनैतिकता के इस भयावह संक्रामक समय में भ्रष्टाचार, शोषण,  बलात्कार, लूटपाट अपहरण और हत्या जैसे जघन्य अपराधों की निर्लज्ज और मनबढ़ पताकाएँ फहराई जा रही हैं । आम जन और संसाधनों पर माफ़ियाओं का एकछत्र राज्य है । सुधार ग्रह अपराध के अड्डे बन गए हैं। सत्ता , पूँजीवाद और प्रशासन की गलबहियाँ आम जनमानस के हितों की गर्दन मरोड़ रही हैं ।
 अपराध के गठजोड़ से जनता संत्रस्त ही नहीं, भयभीत भी है और कौतुक की बात यह कि इसी जनता का कुछ मनबढ़ और उन्मादी हिस्सा सरेआम अपराधों को अंज़ाम दे 
रहा है ।  यह सब घटित होते देखकर भी वे जिन पर गण के हितों का दारोमदार है वे ही आँखें बंद कर लेते हैं या यों कहा जाये कि वे भी या वे ही इन स्थितियों के क्रियान्वयन में संलग्न होते हैं । तब सच कहने और प्रतिरोध करने का नैतिक साहस और दायित्व लेखकों का ही रहा है । सो इस भूमिका का निर्वहन रघुविन्द्र यादव जी अपने दोहों , ग़ज़लों के जरिये बख़ूबी निभा रहे हैं  —

शिल्प की बात की जाये तो 13,11 पुष्ट मात्रिक विन्यास में आपके दोहों का स्थापत्य सुस्पष्ट वैचारिक बुनियाद और संवेदना से बना है । दोहों का कथानक और वैचारिकी यथार्थपरक है । हाँ , सौन्दर्य और प्रकृति प्रेमी पाठक कुछ मायूस अवश्य हो सकते हैं , क्योंकि आपके दोहों में न ही  प्रकृति झूम-झाम गा रही है , न ही प्रेयस-प्रेयसी अभिसाररत हैं । न ही मिलन का उच्छवास है न ही विरह का अवसाद !  है तो सिर्फ़ जन की बात , न्याय की बात , विसंगतियों पर बात , हाकिम की तानाशाही पर बात , आधी आबादी के जमीनी सच पर बात ।   पारिवारिक विघटन पर बात , भौतिकता वादी युग में बुजुर्गों की त्रासद स्थिति पर बात ।

   यह बात ऐसे ही अनवरत जारी रहे ,
यह सततता यों भी आवश्यक है कि जन जो सुप्तावस्था में हैं ,जागरूक हों , पाठक मनन करें और सत्ता स्तुति करने वाले साहित्यकार प्रेरणा लें , क्योंकि चार चने भले ही भाड़ नहींं फोड़ सकते किन्तु मुँह का स्वाद अवश्य बदल सकते हैं ।

       - अनामिका सिंह

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

रघुविन्द्र यादव के दोहों में "हलधर के हालात" आलेख : मनोज जैन





रघुविन्द्र यादव जी के दोहों में "हलधर के हालात" : मनोज जैन 

                     27, सितम्बर 1966 गाँव नीरपुर नारनौल हरियाणा में जन्मे ख्यात साहित्यकार आदरणीय  रघुविन्द्र यादव जी से परिचय के परोक्ष अवसर का श्रेय उनके द्वारा सम्पादित शोध और साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका "बाबू जी का भारत मित्र" को जाता है,पत्रिका का नाम मैंने पहली बार कीर्तिशेष दादा देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी से सुना था।
                              यह बात सम्भवतः 2013 की है जब देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी पर उनके दो शिष्य एक विशेषांक की तैयारी कर रहे थे। पत्रिका में प्रकाशनार्थ तत्कालीन अतिथि सम्पादकद्वय डॉ पंकज परिमल जी और सञ्जय शुक्ल जी दोनों;  दादा इन्द्र जी से मेरी निकटता से परिचित थे। इसी सन्दर्भ के चलते डॉ. पंकज परिमल जी ने पत्रिका के इस विशेषांक के लिए मुझसे भी सामग्री आमन्त्रित की थी। यह बात और है कि न मैंने सामग्री भेजी और न उन्होंने पुनः स्मरण दिलाया।
                 अंक प्रकाशित होने के बाद पता चला कि इस पत्रिका के प्रधान संपादक सुप्रसिद्ध दोहाकार रघुविन्द्र यादव जी हैं जो मेरी फेसबुक सूची में मित्र हैं और जिनके दोहों का मैं पहले से ही मुरीद हूँ । मेरे परिचय का प्रस्थान बिंदु यहीं से आरम्भ होता है। हम दोनों परस्पर व्यक्तित्व से भले ही अब तक अपरिचित  हों पर एक दूसरे के कृतित्व से भलीभाँति परिचित हैं।
       रघुविन्द्र यादव जी का लेखन संसार मूलतः दो रूपों में निरन्तर विस्तार पा रहा है। विधा चाहे गद्य की हो या फिर पद्य की वह अपनी रुचि के अनुसार सबसे छोटे फॉर्मेट को चुनते हैं। गद्य में लघुकथा तो पद्य में दोहा !
      वे लघुता में विराटता भर देने के कारण अपने पाठकों के मध्य काफी लोकप्रिय हैं। उनके तथ्य में छुपे रहस्य को उनकी फेसबुक वॉल पूरी तरह उजागर करती है।
            अब तक उनके द्वारा प्रकाशित और सम्पादित लगभग दो दर्जन से भी ज्यादा पुस्तकों के भण्डार में सृजनात्मक दृष्टि से देखा जाय तो समकालीन दोहों के साथ समसामयिक विषयों पर उनका काम बोलता है। विषय वैविध्य की दृष्टि से रघुविन्द्र जी के दोहों का फलक बहुत बड़ा है।
              एक अच्छा कवि या साहित्यकार अपनी कलम की ताकत का इस्तेमाल जनसामान्य के पक्ष में अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते आम जनता के समर्थन में अपनी तरफ से प्रतिपक्ष की भूमिका तैयार करता है। और अपनी बात बेबाक़ तरीके से वहाँ पहुँचाता है जहाँ जो बात सही मायने में पहुँचनी चाहिए।
          रघुविन्द्र यादव जी के लेखन का मूल स्वर भी यही है वे प्रतिरोध के कवि हैं।वह एक ओर जहाँ अपने दोहों में अपने समय के खुरदरे यथार्थ और सामाजिक सरोकारों पर पैनी नजर रखते हैं तो वहीं दूसरी ओर उनके दोहों में प्रकृति चित्रण है, पर्यावरणबोध है, स्त्री विमर्श है पाखण्ड पर करारी चोट है। विषयों की विविधता से उन्हें प्रेम है कथ्य को पकड़कर संदर्भित विषय में ढालने में कवि को महारत हासिल है। वे समाज की जड़ों में गहरी जमी विद्रूपताओं पर भी नजर रखते हैं। थोथली राजनीति पर गहरे कटाक्ष चुटीले अंदाज़ में करते हैं। शैली में व्यंग्य और स्वभाव में सहजता उनकी अन्यतम विशेषताओं में से एक है।
                हममें से लगभग सभी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि विश्व में किसी भी भाषा का साहित्य किसान जीवन के सुख-दुख,आशा- निराशा, जीवन और मृत्यु के सरोकारों से अछूता नहीं रहा यदि हम वैश्विक साहित्य को बारीकी से खंगालें तो कृषि और कृषक जीवन पर बड़ी तादाद में साहित्य की उपलब्धता है।
            भारत के कृषि प्रधान होने से यहाँ लोक से लेकर समकालीन साहित्य तक ग्राम्य जीवन और कृषकों से गहरे सरोकार जुड़ते हैं। हर कलमकार कृषक जीवन की हर एक भंगिमा को शब्दों में ढालने के लिए सदैव तत्पर और लालायित रहता है। 
               रघुविन्द्र यादव जी को यदि दोहा का पर्याय कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। चूँकि कवि की जड़ें नीरपुर, नारनौल हरियाणा के ग्राम्य परिवेश से जुड़ी रहीं यहीं से सृजनात्मक संवेदनाओं को ख़ूब खादपानी मिलता रहा। रघुविन्द्र यादव जी के दोहों में खेती किसानी के साथ-साथ ग्रामीण परिवेश एवं इससे जुड़े सरोकार प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। समय कितना परिवर्तनशील है देखते-देखते कब करवट ले लेता है हमें पता ही नहीं चलता। एक समय था जब लोक में यह मान्यता प्रचलन में थी जिसे लोग मिसाल के तौर पर प्रस्तुत करते थे।
          " उत्तम खेती मध्यम बान
      निशिद चाकरी भीख निदान"
                     खेती किसानी को सर्वोत्तम कार्य माना जाता था लेकिन कालान्तर में यह स्थिति एक दम उलट नजर आती है। रघुविन्दर यादव जी इसी भावभूमि पर अपनी बात बड़े प्रासंङ्गिक तरीके से कुछ इस तरह हमारे सामने रखते हैं। उनका एक-एक दोहा हमारे सामने सरकारी दाँवों के उलट हलधर के हालात का कच्चा चिट्ठा खोलता है। द्रष्टव्य हैं उनके सृजित कुछ

 अवलोकनार्थ दोहे :-
1.
हलधर को मिलते नहीं,बिजली पानी खाद।
केवल वक़्त चुनाव के, आती उसकी याद।।
2.
भूख गरीबी बेवसी, घर में सुता जवान।
शासन सुध लेता नही,मरते रोज किसान।।
3.
हलधर हो जिस देश का, भूखा औ' बदहाल।
कैसे होगा देश वो, हरा-भरा-खुशहाल?
4.
पूजे केवल कर्म को, छोड़ भाग्य की आस|
फिर भी हलधर को मिले, पीड़ा दुख संत्रास
5.
जिनकी मंशा काटना, हलधर के भी हाथ।
मुखिया उनके साथ है,हम दुखिया के साथ।

                            कहते हैं कि किसी भी देश की सच्ची तस्वीर देखना हो तो वहाँ के साहित्य को खँगालिये! प्रस्तुत दोहे हलधर के वर्तमान हालात का बयान करते हैं। और एक सच्चे क़लमकार की प्रतिबद्धता का भी तभी तो कवि कहता है ;-"हम दुखिया के साथ"।
                खेती किसानी विषयक दोहों का समग्र अध्धयन करने से कवि रघुविन्द्र यादव की सूक्ष्म संवेदनात्मक दृष्टि का पता चलता है। वह अपने दोहों में एक ज्वलन्त मुद्दा उठाकर देश के रहनुमाओं के समक्ष प्रश्न खड़े करते हैं, उन्हें किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के वह दृश्य दिखाते हैं जिनसे तमाम राजनेता और सरकारें जानबूझकर मुँह फेर लेना चाहती हैं। 
                             सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष औसतन 15168 किसान आत्महत्या को मजबूर होते हैं ; इनमें से 72% तो ऐसे छोटे किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है। उक्त संदर्भित तथ्य को कविवर बहुत कम शब्दों में जनता जनार्दन के समक्ष किसान आत्महत्या जैसे विषय को प्रस्तुत करते हैं :- 
कथन की प्रतिपूर्ति के लिए उदाहरणार्थ कुछ दोहे देखें: -
1.
माटी में जिस देश की, थी सोने की खान।
ज़हर निगल कर मर रहे,उसके आज किसान॥ 
2.
चिंतित रहता हर घड़ी, कर्ज़े दबा किसान।
कैसे पीले हाथ हों, बेटी हुई जवान॥
3.
कनक कर्ज़ में खप गई, सस्ती बिकी कपास।
रामदीन रुखसत हुआ, खा गोली सल्फास।
4.
जाले आँखों में लगे, सत्ता की श्रीमान।
उसको दिखते ही नहीं, मरते हुए किसान॥
5.
हलधर पर फेंके गए, तरह तरह के जाल।
भोले थे समझे नहीं, मरते रहे अकाल॥

      किसानों को उनके उत्पाद की सही कीमत न मिलने का एक बड़ा कारण बिचौलिए भी रहें हैं इनके खासे हस्तक्षेप और बढ़ते दख़ल के कारण किसानों को बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस आशय के कई संकेत दोहाकार रघुविन्द्र यादव जी अपने दोहों में समय-समय पर देते रहे हैं।
वे कहते हैं कि
1.
कनक हुई जब खेत में, दो कौड़ी था मोल।
लाला के गोदाम से, बिकी कनक के तोल॥
2.
भाव कौड़ियों के बिके, हलधर का सब माल।
लाभ कमाते आढ़ती, भरते जेब दलाल।।
3.
रोटी जो पैदा करे, वही रहे मुहताज।
साहूकार, बिचौलिये, करें देश पर राज॥
4
चाहे बेचा बाजरा, चाहे बेचा धान।
हुआ मुनाफा सेठ को, हलधर को नुकसान॥
5
मिनरल वाटर बेचकर, लाला मालामाल।
खाली पेट ज़मीन का, भीषण पड़ें अकाल
6
रात- रातभर जागकर, सींचा करता खेत|
उपज बिचौले ले गये, बची हाथ में रेत।।
7
 जीवनभर हलधर लड़ा, हुआ न दुख का अंत|
मगर बिचौलों का रहा, सारी उम्र बसंत||

           चंद सयाने, भले ही आढ़ती और किसान के रिश्ते को दिल और धड़कन का रिश्ता बताकर प्रचारित और प्रसारित क्यों न करें ? पर इसकी तह में जाकर किसानों को जो कड़वे अनुभव मिले उनसे स्वतः सिद्ध होता है कि ; यह रिश्ता दिल और धड़कन का ना होकर 'गिद्ध' और 'चील' जैसा ही है। सम्भवतः इन सब बातों को आधार बनाकर रघुविन्द्र यादव जी का कवि मन किसानों की पैरवी करते हुए कहता है कि - रोटी पैदा करने वाला किसान ही यहाँ मुहताज है जबकि साहूकार, बिचौलिये, देश पर राज कर रहे हैं भला यह कौन सा न्याय है ?
                     चूँकि कवि का सीधा जुड़ाव खेती किसानी से गहरा होने के कारण कवि की दृष्टि उन अछूते सन्दर्भों तक पहुँचती है। ऐसा नहीं कि कवि ने सिर्फ समस्याएं ही उकेरी हैं।उन्होंने विषय के साथ न्याय किया है। शासन की बुदनियत को दोहों में अभिव्यक्ति देकर छल को उजागर किया है। दोहा के सन्दर्भ में एक बात कही जाती है कि यह सबसे छोटा छन्द होने के नाते अपने आप में कोट किये जाने की ताकत रखता है। 
                                     आशा है सभी दोहे दोहाकार ने जिस निमित्त से सृजित किए हैं,और जिनको सृजित किए हैं, वहाँ बड़ी आसानी से पहुँचेंगे और अपने उद्देश्य को पूरा करेंगे। सत्ता की आँखों में लगे जाले हटाने में सौ फीसदी सफल होंगे। राजपथ पर इन दोहों की आवाज गूंजेगी। संसद अपना मौन तोड़कर नीतियाँ बनाएगी। कर्ज़ में डूबे हलधर को जल्द न्याय मिल सकेगा।

मनोज जैन 
106 विठ्ठलनगर गुफामन्दिर रोड
भोपाल 462030
मोबाइल 9301337806

16 सितम्बर 2022
भोपाल

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

अनामिका सिंह के नवगीत


जीवन खूँटे से बाँधे हैं
छुट्टे आदमखोर ।

उन्मादी बन फिरें बावले,
लाज शर्म पी ली ।
रग-रग टीसे देह देश की ,
आह ! पड़ी नीली ।

समरसता में रोज़ पलीता 
लगा रहे पुरजोर ।

सर्प नेवलों की यारी ने 
दुर्गति कर डाली ।
गुलशन दहका, कलियों को खुद, 
मसल रहा माली ।

लोकहितों को जो पानी दें 
उनको दण्ड कठोर ।

बस्ती-बस्ती ख़ौफ़ ,
भेड़िये घूम रहे खूनी ।
लगा धर्म के तिलक ,
द्वेष की
रमा रहे धूनी ।

मानवता के माथे कालिख 
पोतें रह-रह ढोर ।

          2

मौन रहना हम सभी का 
अब भयानक है !

न्याय की पलटी तराजू
सत्य की हँस डाँड़ मारे ,
वंचितों का स्वर बने जो
दण्ड के खोले किवारे ।

न्याय के अन्याय से कब
सच गया छक है !

बाँटते संकेत पर भय 
तान बन्दूकें दरोगे ,
और रख झूठी दलीलें
फैसले दें श्याम चोगे ।

कोई  भी उम्मीद 
इनसे झूठ 
नाहक है ।

डंक जहरीले चुभातीं 
नव पनपती आस्थाएँ ,
और पुजती जा रहीं हैं
मुँह सिले फिर भी शिलाएँ ।

आग है, 
धर्मांधता के हाथ
चक़मक है !

                 3

तालियों की,
थाप के शुभ स्वर ।
हर सगुन के 
काज आये 
द्वार पर किन्नर ।

सगुन के गीत गाते , 
दें 
बधाई लो बधाई ।

ब्याह,गौने ,जच्चगी में 
नाचते 
छम छम ।
नयन रंजन कर रहे 
जन ,
देख तन के खम ।

जिए लल्ला जिए जच्चा,
दुआएँ दे रहे माई।

बोलते , 
लगते बहुत बरजोर 
हैं सारे ।
चल रहे 
लचका कमर नर 
देह से हारे ।

हिकारत से 
गये देखे
सहे हर साँस रुसवाई ।

मारता कहकर 
शिखंडी 
जग इन्हें ताना ।
कौन है 
हम-आप में
इंसान जो माना ।
  
उद्धारकों की 
आँख की 
छँटती नहीं काई ।

जी रहे जीवन 
कटी ,
सबसे अलग धारा ।
दर्द  है अनकथ 
हुई , ऐसी 
इन्हें कारा।

सहारा नेग का केवल
नाचकर ,
जोड़नी पाई ।

 4

क्या-क्या देख रहीं  हैं आँखें 
क्या-क्या और देखना बाकी !

चलें धर्म की ओट 
यहाँ पर सिर्फ़ द्वेष के 
गोरखधंधे ।
कर असत्य की पैरोकारी 
सच भूले  
आँखों के अन्धे ।

पीस रहे 
समरसता सारी
फेर-फेर कर उल्टी चाकी ।

पत्रकारिता हुई बेहया ,
लोकतंत्र 
के मुँह पर गाली ।
कर सत्ता की अंध चाकरी ,
अर्थी अपनी 
स्वयं निकाली ।

सारे अमले 
बिके हुये जब
पीछे कैसे रहती खाकी ।

अव्वल हैं नकटौरे में वो ,
जिनके हाथों 
बागडोर है ।
उजियारे को सौंप अमावस 
कहें सुहाना 
सुखद भोर है ।

लोकतंत्र की 
नाव पलटकर
पार लगाई कहे पताकी ।

5
    
ढोलकी  की थाप गुम है ,
कोख भी  कुछ  
कसमसाई ।

है विकट संताप बखरी
वंश का वारिस  
न आया । 
सोच में जच्चा , न सोहर 
कंठ कोई    
गुनगुनाया ।।

झूठ मुँह  फूटी  नहीं   है ,
जन्म  बिटिया पर   
बधाई ।

सब  पढ़ेंगे सब  बढ़ेंगे , 
मुँह  चिढ़ाता  
रोज स्लोगन ।
भेद  की  है भीति   ऊँची ,
रोपता है खेत  
बचपन ।।

आखरों संग हैं अपरिचित ,
क्या  इकाई   
क्या  दहाई  ।

नित्य  ही  होती   बलत्कृत ,
राह  में  
हर  रोज   ' मीना '।
और आरोपी  विचरते ,
खोलकर 
बेलौस सीना ।।

न्याय उनके  हित खड़ा 
ले मुट्ठियों  में    
नून   राई ।

देह का  यह  चाक   घूमा ,
है  कटा  जीवन   
अलोना ।
पृष्ठ  जो  पलटें  विगत , है
आखरों का स्वाद  
नोना ।

उम्र भर  ठहरी अमावस ,
फेर  मुँह बैठी    
जुन्हाई ।

                      - अनामिका सिंह

 परिचय -
---------
नाम- अनामिका सिंह 
०९ अक्टूबर १९७८
जन्मस्थान -इन्दरगढ़ जिला कन्नौज 
शिक्षा - परास्नातक (विज्ञान ), बी.एड.
संप्रति -शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश में कार्यरत
अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में नियमित नवगीत प्रकाशन
सम्पादन ' सुरसरि के स्वर ' ( साझा छंद संकलन ) 

 संपादन साहित्यिक पत्रिका  'अंतर्नाद ' एवं  ‘ कल्लोलिनी’ 

प्रकाशित पुस्तक :  ' न बहुरे लोक के दिन ' नवगीत संग्रह 

सम्पादक / संचालक   वागर्थ ( नवगीत पर एकाग्र साहित्यिक समूह )

पता -
--------
अनामिका सिंह
स्टेशन रोड गणेश नगर , शिकोहाबाद- जिला -फिरोजाबाद (283135)

yanamika0081@gmail.com
सम्पर्क सूत्र-9639700081

युवा कवि धर्मेंद्र के नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ ब्लॉग



कुछ अच्छा पढ़ने के क्रम में अचानक दृष्टि पड़ी ' सज्जन ' धर्मेंद्र जी के नवगीतों पर । आपके नवगीत पढ़कर लगा ,जैसे यह आज ही लिखे गये हैं , शब्द-शब्द सामयिक परिदृश्य का सजीव खाका खींचता हुआ । 
   बात चाहे धर्मांधता की हो , महँगाई की हो , पूँजीवाद को प्रश्रय देने की हो , वर्ण व्यवस्था के कुरूप पिरामिड की हो , मज़हबी दाँव-पेंच की हो या शोषितों के अनवरत शोषण की ! आपके गीतों में समाज में गहरी जड़ें जमाये हर विसंगति पर सवाल उठाये गये हैं ।
 विसंगतियों पर कहते-बोलते कवि  जब प्रेम पर बोलते हैं , "भूल गया सब याद रहा बस तेरा हाथ हिलाना " ,भले लगते हैं।

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(1)

आतंकित हो
मानवता की कोयल भूली कूक ।
अंधा धर्म
लिए फिरता है
हाथों में बंदूक ।

नफ़रत के प्यालों में
जन्नत के सपनों की मदिरा देकर ,
कुछ मदहोशों से
मासूमों की निर्मम हत्या करवाकर ।

धर्म बेचने वाले सारे
रहे ख़ुदी पर थूक ।

रोटी छुपी दाल में जाकर ,
चावल दहशत का मारा है ।
सब्ज़ी काँप रही है थर-थर ,
नमक बिचारा हत्यारा है ।

इसके पैकेट में आया था ,
लुक-छिपकर बारूद ।

इक दिन शल्य-चिकित्सा से जब
अंधा धर्म आँख पायेगा ,
हाथों पर मासूमों का ख़ूँ देखेगा
तो मर जाएगा ।

देगी मिटा धर्मगुरुओं को ,
ख़ुद उनकी ही चूक ।

(2)

पत्थर-दिल पूँजी के दिल पर
मार हथौड़ा 
टूटे पत्थर ।

कितनी सारी धरती पर
इसका जायज़ नाजायज़ कब्ज़ा ,
विषधर इसके नीचे पलते
किन्तु न उगने देता सब्ज़ा ।

अगर टूट जाता टुकड़ों में
बन जाते
मज़्लूमों के घर ।

मौसम अच्छा हो कि बुरा हो 
इस पर कोई फ़र्क़ न पड़ता ,
बिन बारूद
धमाके के बिन 
आसानी से नहीं उखड़ता ।

ख़ुद उखड़े तो
कितने मुफ़्लिस
मरते इसकी ज़द में आकर ।

छूट मिली इसको तो
सारी हरियाली ये खा जाएगा ,
नाज़ुक पौधों की कब्रों पर
राजमहल ये बनवाएगा ।

रोको इसको
वरना इक दिन
सारी धरती होगी बंजर ।

(3)

सुनकर मज़्लूमों की आहें
ब्राह्मणवाद हँसा ।

धर्म, वेद के गार्ड बिठाकर
जाति, गोत्र की जेल बनाई ,
चंद बुद्धिमानों से मिलकर
मज़्लूमों की रेल बनाई ।

गणित, योग, विज्ञान सभी में
जाकर धर्म घुसा ।

स्वर्ग-नर्क गढ़ दिये शून्य में
अतल, वितल, पाताल रच दिया ,
भाँति भाँति के तंत्र-मंत्र से
भरतखण्ड का भाल रच दिया ।

कवियों के कल्पित जालों में
मानव-मात्र फँसा ।

सत्ता का गुरु बनकर बैठा
पूँजी को निज दास बनाया ,
शक्ति जहाँ देखी
चरणों में गिरकर अपने साथ मिलाया ।

मानवता की साँसें फूलीं
फंदा और कसा ।

(4)

पूँजी के काले खातों में
महज़ आँकड़े भर हैं
हम सब !

पूँजी हमें बदल सकती है
कम या ज़्यादा कर सकती है ,
शून्य गुणा कर अपने हल में
हमें मिटा सकती है पल में ।

इसका बुरा क़र्ज़ भरने को
बढ़ते जाते कर हैं
हम सब ।

भाँति भाँति के खेल दिखाकर ,
पूँजी का दिल बहलाते हैं ।
गाली, पत्थर, डंडा, गोली,
जाने क्या-क्या सह जाते हैं ।

चेहरे पर मुस्कान सजाये
सर्कस के जोकर हैं
हम सब ।

नींद न टूटे पूँजीपति की
सोच यही हम डरते रहते ,
बहरी पूँजी के कानों में
भिन-भिन-भिन-भिन करते रहते ।

ख़ुशबू पर मर मिटने वाले
नाली के मच्छर हैं
हम सब ।

(5)

खिसिया जाते बात बात पर
दिखलाते ख़ंजर ,
पूँजी के उत्तर ।

अभिनेता ही नायक है अब
और वही खलनायक ,
जनता के सारे सेवक हैं
पूँजी के अभिभावक ।

चमकीले पर्दे पर लगता
नाला भी सागर ।

सबसे ज़्यादा पैसा जिसमें
वही खेल है मज़हब ,
बिक जाये जो
कालजयी है
उसका लेखक है रब ।

बिछड़ गये सूखी रोटी से
प्याज और अरहर ।

जीना है तो ताला मारो
कलम और जिह्वा पर ,
गली-मुहल्ले श्वान सूँघते
सब काग़ज़ सब अक्षर ।

पौध प्रेम की सूख गई है
नफ़रत से डरकर ।

(6)

पूज्य कमल जी !
क्यों ख़ुद पर इतना इतराते हैं
रंग रूप सब
कीचड़ के शोषण से पाते हैं ।

इनके कर्मों से घुटती है
बेचारे कीचड़ की साँस ,
मज़्लूमों के ख़ूँ से बुझती
चमकीले रंगों की प्यास ।

पर खिल कर ये सदा कीच के बाहर जाते हैं 
कीचड़ से इनके सारे मतलब के नाते हैं ।

ये ख़ुश रहते वहाँ ,जहाँ
कीचड़ समझा जाता कुत्सित ।
देवों के मस्तक पर चढ़कर
इनको दिखते नहीं दलित ।

बेदर्दी से जब सब मुफ़्लिस कुचले जाते हैं ,
कष्ट न उनके इनके दिल को छू तक पाते है ।

फेंक दिये जाते हैं बाहर ,
ज्यूँ ही मुरझाने लगते ।
कड़ी धूप में और धूल में
घुट-घुट कर मरने लगते ।

ऐसे में निर्धन-निर्बल ही गले लगाते हैं
पर इनको निःस्वार्थ भाव कब पिघला पाते हैं ।

(7)

तेरा हाथ हिलाना
---------------------
ट्रेन समय की
छुकछुक दौड़ी
मज़बूरी थी जाना ।
भूल गया सब
याद रहा बस
तेरा हाथ हिलाना ।

तेरे हाथों की मेंहदी में
मेरा नाम नहीं था ,
केवल तन छूकर मिट जाना
मेरा काम नहीं था ।

याद रहेगा तुझको
दिल पर
मेरा नाम गुदाना ।

तेरा तन था भूलभुलैया
तेरी आँखें रहबर ,
तेरे दिल तक मैं पहुँचा
पर तेरे पीछे चलकर ।

दिल का ताला
दिल की चाबी
दिल से दिल खुल जाना ।

इक दूजे के सुख-दुख बाँटे
हमने साँझ-सबेरे ,
अब तेरे आँसू तेरे हैं
मेरे आँसू मेरे ।

अब मुश्किल है
और किसी के
सुख-दुख को अपनाना ।

              - ' सज्जन ' धर्मेन्द्र 

परिचय
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नाम: धर्मेन्द्र कुमार सिंह

जन्म तिथि: 22 सितम्बर, 1979

शिक्षा: प्रौद्योगिकी स्नातक (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) एवं प्रौद्योगिकी परास्नातक (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की)

प्रकाशन:
ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर (2014)
पूँजी और सत्ता के ख़िलाफ़ (2017)

नवगीत संग्रह

नीम तले (2018)
कहानी संग्रह
द हिप्नोटिस्ट (2017)
उपन्यास
लिखे हैं ख़त तुम्हें (2022)

सम्प्रति: एनटीपीसी लिमिटेड की तलाईपाली कोयला खनन परियोजना में उप महाप्रबंधक (सिविल) के पद पर कार्यरत

साभार - कविता कोश

बुधवार, 14 सितंबर 2022

कृति चर्चा में आज "न बहुरे लोक के दिन" अनामिका सिंह की कृति पर डॉ विनय भदौरिया जी का समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुति : वागर्थ


कृति चर्चा में आज आदरणीय विनय भदौरिया जी की दृष्टि से गुजरते हुये नवगीत कृति ' न बहुरे लोक के दिन ' 

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   ‘न बहुरे लोक के दिन’ युवा कवयित्री अनामिका सिंह का प्रकाशित प्रथम नवगीत संग्रह है वैसे नवगीत जगत के लिए यह नाम अपरिचित नहीं है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, आभासी दुनिया के फेसबुक व व्हाट्सएप समूह में प्रकाशित उनके नवगीत हम सब पढ़ते रहे हैं तथा प्रशंसा भी करते रहे हैं। उनके सशक्त नवगीतों ने अल्प समय में ही उन्हें प्रतिष्ठित नवगीत कवियों की सूची में सूची बद्ध कर दिया है। अद्यतन नवगीत बहुत मात्रा में लिखे जा रहे हैं तथा नवगीत संग्रह भी प्रचुर मात्रा में प्राकशित हो रहे हैं किन्तु स्वतंत्र समीक्षकों का नितांत अभाव है। स्वतंत्र समीक्षक न होने के कारण नई कविता के कवियों की तरह नवगीतकार भी एक दूसरे की समीक्षा लिखने के लिए बाध्य हैं। हिंदी गीत साहित्य में समीक्षा जगत के समक्ष यह यक्ष प्रश्न है।
    आज समीक्षा के सिद्धांत भी बदल चुके हैं। इस संदर्भ में नए-पुराने गीत अंक 5 के सम्पादकीय में उल्लिखित दिनेश सिंह का यह कहना प्रासंगिक प्रतीत होता है कि “गीत की समीक्षा में द्वंद्वबद्धता की शर्त से अधिक समीक्ष्य कृति की किसी शास्त्रीयता से टकराने का सवाल ही नहीं उठाता बल्कि निसृत सामाजिकता तथा उससे सांस्कृतिक सन्दर्भों का ही विश्लेषण अंतर्वस्तु की बिना पर किया जाए कि जिससे मनोलय के साथ रचनात्मकता का मंतव्य पूरी तौर पर साफ़ हो सके। गीत रचना की प्रासंगिकता कारगर ढंग से उसकी समीक्षा के इसी सिद्धांत पर सिद्ध की जा सकेगी। सामाजिकता चूँकि समय से निबद्ध रहती है इसलिए किसी भी शास्त्रीयता से अधिक सामाजिक चेतना का विश्लेषण ही समीक्षा पद्धति से आज के गीत में हो सकता है।

     उपर्युक्त कथन के सापेक्ष यदि समीक्ष्य कृति के गीतों को जांचा परखा जाए तो इन गीतों में लोक की समस्याओं की ही अभिव्यक्ति टटके बिम्बों, ताज़े कथ्यों नई लयों के साथ सहज भाषा में हुई है जिसके कारण सम्प्रेषणीयता निर्बाध रूप से विद्यमान है। संग्रह के शीर्षक से तो नैराश्य बोध का ही भान होता है किन्तु अन्तःसामग्री में आक्रोश और खीझ निकालने के साथ व्यवस्था से जूझने का हौसला भी है। शीर्षक का शुभारम्भ ही ‘न’ अक्षर से है। लोक शब्द का अर्थ वैसे तो बहुत व्यापक है लेकिन यहाँ “दिन बहुरने” के सम्बन्ध में प्रयुक्त हुआ है इसलिए सीधे तौर पर समाज के लिए या यह कहा जाय कि शोषित और दलित समाज के लिए तो अधिक उपयुक्त  होगा। यूँ भी देखा जाए तो वर्तमान में नवगीत का प्रमुख स्वर व्यवस्था के प्रति आक्रोश जो विभिन्न रूपों में यथा गरीबी, महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राज नेताओं का चारित्रिक पतन आदि हैं साथ ही वैश्विक स्तर पर आए हुए पारिवारिक और सामजिक ढाँचे में बदलाव का है। और हो भी क्यों न? क्योंकि आजादी के 75 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी पचास प्रतिशत दलित और शोषित वर्ग की कमोवेश स्थिति जस की तस है। जिसकी बानगी संग्रह के पहले और दूसरे नवगीत में ही मिल जाति है जिसमें सर्वहारा वर्ग को रूपायित किया गया है :-

शाम सबेरे
शगुन मनाती
अम्मा की सुधि आयी।

बड़े सिदौसे उठी बुहारे
कचरा कोने कोने
पलक झपकते भर देती थी
नित्य भूख को दोने।

जिसने बचे
खुचे से अक्सर
अपणी भूख मिटाई
xxxxxxxxxxxxxxx
रिक्त उदर में
जले अंगीठी
आंत करे उत्पात
हर कातर स्वर
करे अनसुना
विकट पूष की रात।

    नवगीत अपने उद्गम काल से नवता बनाये रखने की ओर निरंतर गतिशील रहा है। जागरूक कवियों द्वारा कथ्य, शिल्प, भाषा, बिम्ब और मुहावरों के माध्यम से नूतनता लाने का प्रयास होता रहा है। लोकोन्मुख्ता सदैव से स्वभाव में रही है। जब-जब गीत लोक से असंपृक्त हुआ है वह अग्राह्य रहा है। यह भी स्थापित सत्य है कि जब भी गीत में बासीपन महसूस किया गया है तो ताजगी लोक तत्व के माध्यम से ही आई है। छायावादी या हालावादी गीतों का आम आदमी से कोई सरोकार नहीं रहा। वायवीय कल्पना का छायावादी व लिजलिजी भावुकता और माँसलता का आरोप लगाकर तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा गीत को खारिज करने का प्रयास किया गया था तब सजग कवियों द्वारा गीत को जन मानस के निकट लाने का उपक्रम लोक तत्वों के माध्यम से किया गया था। उन गीतों को पहले नए गीत तथा बाद में नवगीत की संज्ञा से विभूषित किया गया जो आज केन्द्रीय भूमिका में हैं।  गीत में पहले-पहल जो बदलाव आया वह देशज शब्दों व लोक गीतों की धुनों के प्रयोग से था जिसकी प्रासंगिकता आज भी है  जिसकी महसूसियत अनामिका के गीतों में भरपूर है। यहाँ कहना आवश्यक समझता हूँ कि अनामिका के नवगीतों में देशज शब्दों का प्रयोग बड़े करीने से हुआ है जबरदस्ती ठूँसे हुए नहीं प्रतीत होते इसलिए अर्थ भावन में कहीं कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।

    उदाहरणार्थ पृष्ठ 118 पर कलमकारों कको अल्पने दायित्व का बोध कराते हुए नवगीत में सत्यम-शिवम् सुन्दरम तीओं तत्वों की उपस्थिति श्लाघनीय है :-

कवि कुल की
मर्यादा रखना
क़लम कर अनुरोध सुनो।
उन गीतों
को प्रश्रय देना
जो जन मंगल गायें।
उनसे निश्चित
दूरी रखना
जो बस धोक लगाये।

पँक्ति-पँक्ति की
अन्तर्लय में
रखना सच का बोध सुनो।

    प्रस्तुत नवगीत में देशज शब्द ‘धोक’ (जानवरों से खेतों की सुरक्षा के लिए आदमी का पुतला) का प्रयोग अपनी सम्पूर्ण अर्थवत्ता के साथ प्रयुक्त हुआ है जो सौन्दर्य को भी द्विगुणित कर रहा  और भावन में भी सहायक है।
    इस संग्रह के परायण से यही निष्कर्ष निकलता है कि अनामिका का सृजन बहु आयामी है। कहीं गरीबी और भुखमरी से जूझने की व्यथा-कथा है तो कहीं व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, लोक मंगल की कामना है, दायित्वों के प्रति जागरूकता के भाव के साथ ही प्रेम और आध्यात्मिक विषयक नव्गेत भी हैं जो सीमित दायरे में कैद रहने वाले तथा कथित नवगीतकारों की सोच के विल्परीत भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए कुछ गीत की पंक्तियाँ प्रस्तुत है। सब से पहले वह गीत जिसकी चुनौती पूर्ण सशक्त पँक्ति गीत और संग्रह दोनों का शीर्षक है। यह छोटा सा गीत बहुत बड़ा कैनवास समेटे है जिसमें प्रजातंत्र के चारों खम्भों को कटघरे में खड़ाकर दिया गया है। स्वतन्त्रता के इतने वर्ष व्यतीत होने के बाद भी भरोसा v आश्वासन के मध्य पेंडुलम की तरह आम आदमी झूल रहा है।

मूँद कर आँखें 
भरोसा था किया 
 न बहुरे लोक के दिन।

“खेत चल कर आ गए चक रोड पर”
“रेंगती मुंसिफ के जू 
न कान पर”
“हर क़लम का जो असल दायित्व है”

**********************

“इसी प्रकार रोटी का भूगोल *
“गंगी खडी उदास” आदि गीतों में गरीबों,शोषितों की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है। उत्तर आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता की आंधी ने हमारी सर्वोपरि संस्कृति को लहूलुहान कर दिया है ; अर्थ की धुरी पर समस्त सम्बन्ध नृत्य कर रहे हैं। पारिवारिक, सामाजिक रिश्तों में स्वार्थ की वजह से टिकाऊ पन नहीं है चौगिर्द बिखराव ही बिखराव दृष्टिगत है। व्यक्ति,व्यक्ति के बीच की दूरी बढ़ गयी है। जिन माँ बाप को हम देवता समझते रहे जो कल तक पूजनीय थे आज वही वर्जनीय हो गये। घर के किसी कोने में या वृद्धाश्रम में एकाकी जीने के लिए मजबूर हैं। उन्नति के जिस शिखर पर हम हैं वही मानवता की अवनति का रसातल है। इसे अनामिका जी ने बड़ी मार्मिकता के साथ व्यंजित किया है :-

क्या खोया क्या पाया हमने
होकर अधुनातन।
उन्नति के हित नित्य चढ़े हम
अवनति की सीढ़ी
संवादी स्वर मूक हुए हैं
पीढ़ी दर पीढ़ी।
रिश्तों में अनवरत बढ़ा है
धातक विस्थापन।

    संग्रह में कुछ गीत प्रेम परक यथा 
“तरी-तरी मन घाट”
*******
*नयन बांचते पत्र वासंती*

    तथा कुछ गीत आध्यात्मिक और जीवन दर्शन की सफलतम अभिव्यक्ति हैं जिनमें 

अनसुलझी 
जीवन की पटरी 
कौन पा सका थाह। प्रमुख हैं।

    अंत में संग्रह के गीतों के सन्दर्भ यह कहना चाहूँगा कि नवगीत के लिए जिन पुर्जों की जरूरत होती है ये गीत उन सबसे लैस हैं और हर पुर्जा अपनी अपनी जगह खूब टाईट हैं। अंग्रेजी, फ़ारसी व देशज शब्दों का इस्तेमाल कर भाषा के मामले में तो ये गीत अति प्रयोग शील हैं। पूरा विश्वास है कि ये नवगीत गीत प्रेमियों के हृदय में स्थान बनाने में समर्थ हैं तथा यह संग्रह हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में पहचान बनायेगा ।

विनय भदौरिया 
साकेत नगर, लाल गंज, राय बरेली 
9450060729

सोमवार, 12 सितंबर 2022

रमेश रंजक के नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ

आज रमेश रंजक जी की जयन्ती पर उन्हें याद करते हुये ...


(1)

एक दीगर मार
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सह रहा हूँ
एक दीगर मार...
कैदखाने  के  झरोखे  से
   वही तो कह रहा हूँ

दीखते मुस्तैद पहरेदार,
कंठीदार   तोते
      टूटते लाचार खोखे

कुछ न पूछो
किस तरह से दह रहा हूँ
              सह रहा हूँ

चन्द बुलडोजर
सड़क की पीठ पर तैनात,
हाँफती-सी, काँपती-सी,
           आदमी की जात

उफ !
कलम होते हुए 
पाबन्दियों में रह रहा हूँ
            कह रहा हूँ ।

(2)

सम्बोधन झूले
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सुधियों की अरगनी बाँध कर सम्बोधन झूले
सहन भर गीत फूल-फूले

सर्वनाम आकर सिरहाने
माथा दबा गया
अनबुहरा घर लगा दीखने
फिर से नया-नया
तन-मन हल्का हुआ, अश्रु का भारीपन भूले

मिली, खिली रोशनी, अँधेरा
पीछे छूट गया
ऐसा लगा कि दीवाली का
दर्पण टूट गया
लगे दीखने तारे जैसे हों लँगड़े-लूले

हवा किसी रसवन्ती ऋतु की
साँकल खोल गई
होठों की पँखुरी न खोली
फिर भी बोल गई
सम्भव है यह गन्ध तुम्हारे आँचल को छू ले

दमक उठे दालान, देहरी
महकी क्यारी-सी
लगी चहकने अनबोली
बाखर फुलवारी-सी
झूम उठे सारे वातायन भीनी ख़ुशबू ले

(3)

ईमान की चिनगी
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हाय रे ! ईमान की चिनगी !
जोहती है बाट सारी उम्र
उजले एक दिन की

एक दिन यह यों नहीं आता
कि जैसे आम आते
टूट जाते हैं न जाने
किस तरह कितने अहाते

फूस के पाँवों तले
चिकनी छतें दिखतीं मलिन-सी

चटक मैले घाघरे
घुटनों उठी धोती किसानी
कामगर चिक्कट कमीज़ों का
चिपकता ख़ून-पानी

उफन कर तस्वीर सारी
बदल देता है पुलिन की

(4)

गीत-विहग उतरा 
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हल्दी चढ़ी
पहाड़ी देखी
मेंहदी रची धरा ।
अँधियारे के साथ
पाहुना गीत-विहग उतरा ।

गाँव फूल-से
गूँथ दिये
सर्पिल पगडण्डी ने ।
छोर फैलते 
गये मसहरी के
झीने-झीने ।

दिन,
जैसे बाँसुरी बजाता
बनजारा गुज़रा ।

पोंछ पसीना
ली अँगड़ाई
थकी क्रियाओं ने ।
सौंप दिये
मीठे सम्बोधन
खुली भुजाओं ने ।

जोड़ गया 
सन्दर्भ मनचला 
मौसम हरा-भरा ।

(5)

अजगर के पाँव दिये 
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अजगर के पाँव दिये जीवन को
और समय को डैने ।
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?

लहरों की भीड़ मुझे धकिया कर
जा लगी किनारे ।
झूलता रहा मेरा तिनकापन
भाग्य के सहारे ।

कुन्दन विश्वासों ने चुभो दिये
अनगिन नश्तर पैने ।
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?

शीशे का बाल हो गई टूटन
बिम्ब लड़खड़ाये
रोशनी, अँधेरे से  कितने दिन
और मार खाये ?

पूछा है झुँझला कर राहों से
पाँवों के बरवै ने ।
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?
 
(5)

संक्षिप्त परिचय -
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नाम : रमेश रंजक ।
मूल नाम : रमेश उपाध्याय ।
उपनाम : रंजक । 
जन्म : 12 सितम्बर, 1938 ई.। 
गाँव नदरोई , ज़िला-अलीगढ़, उत्तरप्रदेश । 
माँ : श्रीमती सुख देवी उपाध्याय । 
पिता : पं. दाताराम उपाध्याय ।

शिक्षा :
 प्राथमिक परिषदीय प्राथमिक शाला नदरोई, अलीगढ़। ग्यारहवी कक्षा उच्च.माध्य.आर्य विद्या.एटा। बारहवीं माहेश्वरी इंटर कालेज, अलीगढ़ । बी.ए.धर्म समाज कालेज, अलीगढ़ । एम.ए.,एम.एम.एच.कालेज गाजियाबाद से तथा बी.एड.,धर्म समाज कालेज, अलीगढ़ उ.प्र. से ।

प्रकाशित कृतियाँ :

[1] 'किरन के पाँव' नवगीत संग्रह ।
 [2] 'गीत विहग उतरा' नवगीत संग्रह ।
 [3] 'हरापन नहीं टूटेगा' नवगीत संग्रह।
 [4] 'मिट्टी बोलती है' नवगीत/जनगीत संग्रह । 
[5] 'इतिहास दुबारा लिखो' नवगीत/जनगीत संग्रह।
[6] 'रमेश रंजक के लोकगीत'
 [7] 'दरिया का पानी' नवगीत ग़ज़ल, कविताएँ । 
[8] गोलबंदी : बतर्ज़ आल्हा एक प्रबंधात्मक लंबी कविता । 
[9] 'अतल की लय' नवगीत, कविताएँ । 
[10] 'पतझर में वसंत की छवियाँ' नवगीत, कविताएँ ।