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रविवार, 5 जुलाई 2026

शिवकुमार अर्चन



शिवकुमार अर्चन जी की पुण्य तिथि पर विशेष आलेख प्रस्तुति
मनोज जैन 
        हिन्दी कविता की समृद्ध परम्परा में ऐसे कवि विरले ही मिलते हैं, जिन्होंने मंच की लोकप्रियता और साहित्य की गंभीरता दोनों को समान सहजता से साधा हो। कवि शिवकुमार अर्चन ऐसे ही विरल रचनाकार हैं, जिनकी कविता में लोकजीवन की संवेदना, सामाजिक सरोकार, आध्यात्मिक चेतना, प्रतिरोध का स्वर और मानवीय करुणा एक साथ स्पंदित होती है। वे उन कवियों में हैं जिन्होंने कविता को केवल शब्दों का विन्यास नहीं माना, बल्कि जीवनानुभवों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा और जिया।
अर्चन जी का रचनाकर्म किसी एक विधा, विचारधारा अथवा शिल्प तक सीमित नहीं है। गीत और ग़ज़ल उनके प्रिय माध्यम अवश्य रहे, किन्तु उनके लिए कविता का मूल उद्देश्य मनुष्य के सुख-दुःख, संघर्ष, विसंगतियों और आत्मिक अनुभवों को सम्प्रेषित करना था। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ शास्त्रीय आग्रहों से अधिक जीवन-सत्य की पक्षधर दिखाई देती हैं। उनकी कविता में जहाँ एक ओर लोकजीवन की मिट्टी की सोंधी गंध है, वहीं दूसरी ओर समय की विडम्बनाओं के विरुद्ध सजग प्रतिरोध भी है। उनके यहाँ प्रकृति भी है, प्रेम भी है, अध्यात्म भी है और आम आदमी की पीड़ा भी।
प्रस्तुत आलेख में शिवकुमार अर्चन के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन उनके प्रकाशित काव्य-संग्रहों, आत्मकथ्य, रचना-दृष्टि तथा उनके प्रतिनिधि गीतों और ग़ज़लों के आलोक में करने का विनम्र प्रयास किया गया है। 
यह आलेख किसी औपचारिक जीवनी अथवा आलोचनात्मक शोध का दावा नहीं करता, बल्कि एक निकटस्थ साहित्यिक सहयात्री की दृष्टि से उनके रचनात्मक अवदान को समझने और रेखांकित करने का प्रयास है। 
मेरा विश्वास है कि शिवकुमार अर्चन की कविता का मूल स्वर उसकी सहज सम्प्रेषणीयता, गहन संवेदना, वैचारिक प्रतिबद्धता और मानवीय ऊष्मा में निहित है। यही गुण उन्हें अपने समय के महत्त्वपूर्ण गीतकारों और ग़ज़लकारों की अग्रिम पंक्ति में प्रतिष्ठित करते हैं। प्रस्तुत आलेख उसी विश्वास की एक विनम्र अभिव्यक्ति है।

कविता की सहज सम्प्रेषणीयता और उत्कृष्टता के कवि : शिवकुमार अर्चन

 मनोज जैन 'मधुर'
_____________________

सम्प्रेषणीय कविता और प्रभावी प्रस्तुति के बल पर पिछले पाँच दशकों तक कवि-सम्मेलनों में निरन्तर सक्रिय रहे कविवर शिवकुमार अर्चन की पहचान भले ही एक लोकप्रिय मंचीय कवि के रूप में रही हो, किन्तु उनका रचनात्मक व्यक्तित्व केवल मंच तक सीमित नहीं था। वस्तुतः वे गंभीर चिंतन, सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदना और आध्यात्मिक दृष्टि से सम्पन्न ऐसे कवि थे, जिन्होंने गीत और ग़ज़ल दोनों विधाओं को अपनी मौलिक अनुभूतियों से समृद्ध किया।

अर्चन जी की रचनाओं में जीवन के विविध रंग एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। कहीं आम आदमी की पीड़ा है, कहीं सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर है; कहीं प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य है, तो कहीं आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा का सूक्ष्म अनुभव। यही बहुआयामी रचनात्मकता उन्हें अपने समकालीन कवियों से विशिष्ट बनाती है।

उनके अब तक प्रकाशित चार काव्य-संग्रह "उत्तर की तलाश में", "ग़ज़ल क्या कहे कोई", "मेरे भीतर कोई गाता है" तथा "साधो दरस परस सब छूटे" उनकी सृजन-यात्रा के क्रमिक विकास के साक्षी हैं। इन चारों कृतियों को पढ़ने के बाद यह अनुभव होता है कि अर्चन जी ने कभी भी केवल कविता लिखने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने समय और समाज की धड़कनों को शब्द देने का सतत प्रयत्न किया।

सन 2022 में प्रकाशित "मेरे भीतर कोई गाता है" में कवि ने आत्मीय मित्रों और परिजनों से संवाद-विहीन हो जाने की पीड़ा को अत्यन्त मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। आधुनिक जीवन की बढ़ती एकाकी चेतना इस संग्रह का प्रमुख स्वर है। इस भावभूमि को व्यक्त करता उनका यह नवगीत द्रष्टव्य है 

"मुँह बाए उँगली चटकाते,
बीत गया एक और दिन।

आँखों से छँटे नहीं स्वप्न के कुहासे,
साँसों में धुले नहीं धूप के बताशे।

भीतर ही भीतर धुँधवाते, 
बीत गया एक और दिन।

मित्रों का, परिजनों का फोन नहीं आया,
कमरे में डटा रहा चुप्पी का साया।

खुद अपने ऊपर झुँझलाते, 
बीत गया एक और दिन।

शायद यह कठिन समय किसी तरह बहले,
खीसे में प्यास लिए सड़कों पर टहले।

इधर-उधर आँखें मटकाते,
बीत गया एक और दिन।"

इस गीत में आधुनिक मनुष्य का अकेलापन केवल एक व्यक्ति का निजी अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि वह हमारे समय की सामूहिक त्रासदी का रूप ग्रहण कर लेता है। बहुत कम शब्दों में कवि ने संवादहीनता की उस पीड़ा को व्यक्त किया है, जिससे आज का संवेदनशील मनुष्य प्रतिदिन गुजर रहा है।

अर्चन जी की रचना-प्रक्रिया में वस्तु-जगत की सघन उपस्थिति, आम आदमी की पीड़ा, जनमानस के संघर्ष और जीवन की जद्दोजहद समान रूप से उपस्थित हैं। उनके यहाँ तरल संवेदना, अनूठी कल्पनाशीलता, रचनात्मक तल्लीनता तथा जीवन को देखने-परखने के अनेक दृष्टिकोण मिलते हैं। यही कारण है कि उनकी गीतनुमा और ग़ज़लनुमा रचनाएँ पाठक को बार-बार नए अर्थ देती हैं।

गीत और ग़ज़ल के क्षेत्र में अर्चन जी कभी विशुद्धतावादी नहीं रहे। यदि वे केवल शास्त्रीय आग्रहों के बन्धन में बँधे रहते, तो सम्भवतः हिन्दी साहित्य को उनकी यह समृद्ध रचनात्मक सम्पदा प्राप्त न होती। किसी भी रचना का मूल्यांकन केवल छन्दशास्त्र के पैमानों पर नहीं किया जा सकता। उरूज़ अथवा पारम्परिक छन्दों के कुछ कट्टर अध्येता प्रायः छन्दशास्त्र का फीता लेकर कमियाँ खोजने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि कथ्य के निर्मल आनन्द और संवेदना की ऊष्मा तक पहुँच ही नहीं पाते।

अर्चन जी स्वयं इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे कि उनकी गीत और ग़ज़ल-रचनाएँ शास्त्रीय मानकों का पूर्णतः पालन नहीं करतीं। यही कारण था कि वे मंच से अपनी रचनाओं को पहले ही "गीतनुमा" अथवा "ग़ज़लनुमा" कहकर प्रस्तुत करते थे। यह उनकी विनम्रता भी थी और आलोचना के प्रति उनका सहज उत्तर भी। वैसे आज के साहित्यिक परिवेश में इस प्रकार की जड़ताएँ बहुत कम रह गई हैं।

अपनी रचना-दृष्टि का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उद्घाटन अर्चन जी "उत्तर की तलाश में" के पुरोवाक में करते हैं। वे लिखते हैं कि कोई भी कविता स्वतः नहीं बन जाती। उसके पीछे जीवन के संघर्ष, एक दर्शन, एक विचार-प्रणाली, जीवन का ताप और सुलगते हुए एहसास सक्रिय रहते हैं।

इसी क्रम में वे लिखते हैं—

"पाखण्ड, विसंगति, असत्य, अन्याय और व्याप्त अँधेरे के खिलाफ़ जंग में ग़ज़ल ने मेरी रहनुमाई की। ग़ज़ल मेरे लिए आम आदमी तक पहुँचने का जरिया रही है। इन ग़ज़लों में पिरोए एहसास मेरे अपने हैं और उनकी आँच भी।"

यह कथन अर्चन जी की सम्पूर्ण रचना-दृष्टि का उद्घोष है।

"उत्तर की तलाश में" के पुरोवाक में ही व्यक्त उनका एक और कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मेरे मत में प्रत्येक रचनाकार को इसे वेद की ऋचाओं की भाँति कण्ठस्थ कर लेना चाहिए—

"मैं समय से बड़ा न्यायाधीश और लोक से बड़ा आलोचक न किसी को मानता हूँ, न जानता हूँ।"

अर्चन जी के नवीन काव्य-संग्रह "साधो दरस परस सब छूटे" की भूमिका में प्रख्यात आलोचक डॉ. धनञ्जय वर्मा ने उनकी भाषा की सहजता पर अत्यन्त सार्थक टिप्पणी की है। वे लिखते हैं-

"हम-आप अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जैसे बोलते और लिखते हैं, उसी सादी ज़बान में ये कविताएँ लिखी और कही गई हैं। यह सादगी 'सरल' या 'आसान' नहीं, बल्कि अकृत्रिम है। दरअसल यह सहजता का परिणाम है। अनुभव और अनुभूति जितनी तुर्श-ओ-तल्ख होगी, अभिव्यक्ति उतनी ही सहज होगी।"

इस टिप्पणी का आशय केवल इतना है कि एक बड़ा कवि विचार के स्तर पर कितना ही गम्भीर और शास्त्रीय क्यों न हो, अभिव्यक्ति के स्तर पर उसे सदैव सरल, सहज, उत्तरदायी और सम्प्रेषणीय होना चाहिए।

अब "साधो दरस परस सब छूटे" में संकलित एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गीत की चर्चा अपेक्षित है। इस गीत में प्रयुक्त 'अनहद' शब्द पाठक और श्रोता-दोनों का ध्यान सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। सम्पूर्ण गीत ध्यान की सर्वोच्च भाव-दशा का साक्षात्कार कराता है। इसी भाव-दशा में उतरकर साधक स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करता है। कवि ने सिद्धावस्था की अनुभूति के साथ सोऽहम् की आराधना और शिवत्व की मंगल-अर्चना का अत्यन्त प्रभावी चित्र उपस्थित किया है।

द्रष्टव्य है गीत का यह अंश-

"अनहद के मतलब समझाता है।
ये गीत नहीं मेरा, 
आवाज़ नहीं मेरी।
ये शब्द नहीं मेरे, 
ये कहन नहीं मेरी।
जाने उनसे कैसा नाता है,
मेरे भीतर कोई गाता है।"

गीत का अगला अंश कवि की आध्यात्मिक अनुभूति को और अधिक गहन बनाता है।

"मिल जाए मुझको, आँखों में उसे भर लूँ।
गुलमोहर बनूँगा मैं, आ तुझे ज़रा छू लूँ।
सरफूँदें मेरी सुलझाता है,
मेरे भीतर कोई गाता है।"

जिस साधक को अनहद नाद का श्रवण होने लगे, जो बिना किसी औपचारिक गुरु को स्वीकार किए साधना की सिद्धावस्था की ओर अग्रसर हो, वह यदि अपनी अन्तःप्रज्ञा के आलोक में भविष्य का भी साक्षात्कार कर ले, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यह गीत बाह्य जगत से अधिक अंतर्जगत की यात्रा का गीत है। यहाँ कवि का 'मैं' व्यक्तिगत न रहकर सार्वभौमिक चेतना का रूप ग्रहण कर लेता है।
"साधो दरस परस सब छूटे" शीर्षक गीत में अर्चन जी ने अपने समूचे जीवनानुभव को अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त किया है। यह गीत जीवन के बदलते मूल्यों, टूटते संवादों और समय की निर्मम विडम्बनाओं का दस्तावेज़ बन जाता है। 
द्रष्टव्य है-
"साधो! दरस परस सब छूटे।
सूख गई पन्नों की स्याही,
संवादों के रस छूटे।

साधो! दरस परस सब छूटे।
मृत अतीत की नई व्याख्या
पढ़ना-सुनना है।

शेष विकल्प नहीं अब कोई,
फिर भी चुनना है।

रातें और संध्याएँ छूटीं,
अब कुनकुने दिवस छूटे।
साधो! दरस परस सब छूटे। 

नहीं निरापद हैं यात्राएँ,
उठते नहीं कदम।
रोज-रोज सपनों का मरना
देख रहे हैं हम।

हाथों से उड़ गए कबूतर,
कौन बताए , कब छूटे?
साधो! दरस परस सब छूटे।

आदमकद हो गए आइने,
चेहरे बौने हैं।
नोन, राई, अक्षत, सिंदूर के
जादू-टोने हैं।

लहलहाई अपयश की फसलें,
जनम-जनम के यश छूटे।
साधो! दरस परस सब छूटे।"

यह गीत केवल समय की त्रासदी का आख्यान नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों का गम्भीर दार्शनिक विश्लेषण भी है। संवादहीनता, स्मृतियों का क्षरण, असुरक्षित जीवन, बौने होते व्यक्तित्व और अपयश की बढ़ती फसल-ये सब मिलकर हमारे समय की एक प्रामाणिक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

दार्शनिक अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति ही किसी कवि को कालजयी बनाती है। अर्चन जी ने अपने आत्मकथ्य में जो छोटे-छोटे वक्तव्य दिए हैं, उनका अर्थ-विस्तार अत्यन्त व्यापक है। वे केवल शारीरिक कद-काठी से ही बड़े नहीं थे, बल्कि अपने वैचारिक कद के कारण भी हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं।
अर्चन जी की पहचान केवल आध्यात्मिक अथवा आत्मपरक गीतों तक सीमित नहीं है। साहित्य-जगत ने उन्हें उनके प्रतिरोध-बोध, सामाजिक चेतना और समय के प्रति सजग दृष्टि के कारण भी याद रखा है। उनके गीतों में व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त स्वर सुनाई देता है। वे मंचीय लोकप्रियता और साहित्यिक गंभीरता-दोनों के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित करने वाले विरल कवि थे। 'क्लास' और 'मास'-दोनों वर्गों में समान रूप से सम्मानित होना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

उनकी एक अत्यन्त चर्चित मंचीय रचना के कुछ अंश इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं-

"ऐसी हवा चली, मत पूछो,
चन्दन-वन अंगार हो गए।
नन्हे-मुन्ने सपने हमारे,
तलवारों की धार हो गए।

क्या गाऊँ ऐसे में,
जब सब दर्द उगाते हैं,
मेरे गीत अधर तक 
आने में शरमाते हैं।

जीवन होम हो गया सारा,
ऐसी जली पेट की ज्वाला।
सूरज लाने वालों ने ही
तम से समझौता कर डाला।

क्या गाऊँ,जब कुएँ स्वयं 
पानी पी जाते हैं,
मेरे गीत अधर तक आने,
में शरमाते हैं।"

यहाँ कवि का आक्रोश केवल व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उन मूल्यों के विरुद्ध भी है, जिन्होंने मनुष्य के सपनों और विश्वासों को छलनी कर दिया है। प्रतिरोध का यह स्वर किसी नारेबाज़ी से नहीं, बल्कि गहरी मानवीय संवेदना से उपजता है। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।
अर्चन जी के भीतर एक अत्यन्त कुशल शब्द-चित्रकार भी निवास करता था। उन्होंने प्रकृति के सौन्दर्य को भी उतनी ही आत्मीयता से चित्रित किया, जितनी संवेदनशीलता से जनजीवन की पीड़ा को। उनका मन लोकजीवन के रंगों से रँगा हुआ था। वे प्रकृति के माध्यम से भी जीवन-दर्शन रचते हैं और लोकानुभव के माध्यम से भी।

उनके एक गीत का यह अंश द्रष्टव्य है-

"थके-थके संध्या के पाँव रे,
आजा माझी अपने गाँव रे।
फैला पर लौट घर पंछी,
ले-लेकर चोंच पर उजाले।
मेरे घर-आँगन पर बैठा
सूनापन गलबहियाँ डाले।
मूक हुई नयनों की नाव रे।"

इस गीत में संध्या, पंछी, उजाला, सूनापन और नाव-ये सभी बिम्ब मिलकर विरह, प्रतीक्षा और आत्मीयता का अत्यन्त प्रभावी वातावरण निर्मित करते हैं। अर्चन जी की विशेषता यही है कि वे बहुत कम शब्दों में गहन संवेदना का सृजन कर देते हैं। वे स्वयं भले कम बोलते रहे हों, किन्तु उनके गीत जीवन भर बोलते रहेंगे।
चार काव्य-संग्रहों में प्रकाशित अर्चन जी का रचना-संसार किसी भी संवेदनशील पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त उनके व्यक्तित्व के अनेक ऐसे आयाम हैं, जो उन्हें एक विशिष्ट साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
अर्चन जी अत्यन्त अध्ययनशील और मननशील व्यक्ति थे। वे अपने समकालीन रचनाकारों को पूरे मनोयोग से पढ़ते, सुनते और उन पर गंभीरतापूर्वक लिखते भी थे। उनका रचनात्मक सरोकार केवल गीत और ग़ज़ल तक सीमित नहीं था। कथा, उपन्यास, नई कविता, आलोचना और साहित्य की अन्य विधाओं पर भी उनकी समान रूप से सजग दृष्टि थी। यही कारण है कि वे अपने समय के एक समर्थ समीक्षक के रूप में भी सम्मानित थे। भोपाल में आयोजित होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों, विमर्शों और संगोष्ठियों में उनकी उपस्थिति प्रायः अनिवार्य मानी जाती थी। वे जहाँ भी जाते, अपनी गंभीर टिप्पणियों और संतुलित दृष्टि से विमर्श को समृद्ध करते थे।
अर्चन जी का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान उनके सम्पादन-कर्म के रूप में भी स्मरणीय है। उन्होंने भोपाल के सात चर्चित गीतकारों , हुकुमपाल सिंह 'विकल', जंगबहादुर श्रीवास्तव, बंधु, दिवाकर वर्मा, मयंक श्रीवास्तव, शिवकुमार अर्चन, दिनेश प्रभात तथा मनोज जैन ,के दस-दस गीतों का चयन कर "सप्तराग" शीर्षक से एक महत्त्वपूर्ण गीत-संकलन तैयार किया। वर्ष 2012 में प्रथम पहल प्रकाशन, भोपाल से प्रकाशित यह संकलन न केवल चर्चित हुआ, बल्कि समकालीन गीत-साहित्य का एक दस्तावेज़ भी सिद्ध हुआ।

यद्यपि अर्चन जी को मैंने भोपाल की अनेक साहित्यिक गोष्ठियों में बार-बार सुना था, किन्तु 1 जून, 2017 को दतिया में आयोजित एक विशेष काव्य-आयोजन में उन्हें देर रात तक बड़े मंच पर सुनने का जो अवसर मिला, वह आज भी स्मृतियों में अक्षुण्ण है। कवि स्व.मैथिलीशरण तिवारी जी की पुण्यतिथि पर आयोजित इस समारोह में वरिष्ठ कवि एवं संयोजक शैलेन्द्र बुधौलिया के आमंत्रण पर मैं भी एक आमंत्रित कवि के रूप में उपस्थित था।

उस आयोजन में अर्चन जी को निकट से सुनने और देखने का अवसर मिला। उनकी प्रस्तुति में शब्द, स्वर और संवेदना का ऐसा अद्भुत सामंजस्य था कि श्रोता देर रात तक मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। उस दिन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने की मेरी यात्रा ने एक नया आयाम ग्रहण किया।
बाद के वर्षों में अर्चन जी को और निकट से समझने में 'राग भोपाली' पत्रिका के उस विशेषांक ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो पूर्णतः उन पर केन्द्रित था। उस विशेषांक ने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व, वैचारिक प्रतिबद्धता और साहित्यिक अवदान को समग्रता में देखने की दृष्टि प्रदान की।
आज जब अर्चन जी हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी स्मृतियाँ, उनकी रचनाएँ और उनकी आत्मीय आवाज़ ही उनकी जीवित उपस्थिति का अहसास कराती हैं। सच ही कहा गया है ,मनुष्य चला जाता है, पर उसकी सृजनात्मक ऊर्जा समय के पार भी जीवित रहती है। अर्चन जी भी अपनी रचनाओं के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के बीच बने रहेंगे।
उनकी ही एक ग़ज़ल के ये शेर मानो उनके रचनात्मक जीवन का शाश्वत सत्य बन गए हैं ,

"बस्तियाँ रह जाएँगी, 
न हस्तियाँ रह जाएँगी।
इन दरख्तों पर हरी कुछ, 
पत्तियाँ रह जाएँगी।
तुम भले न याद रक्खो 
मेरी ग़ज़लें, मेरे गीत,
पर मेरी आवाज़ की ,
परछाइयाँ रह जाएँगी।"

निश्चय ही, अर्चन जी के कंठ में लोकधुनों की सहज मिठास थी। उनकी गायकी का अंदाज़ बिल्कुल अलग था। वे जब मंच पर गीत गाते थे, तो शब्द केवल सुने नहीं जाते थे, बल्कि श्रोताओं के भीतर उतरते चले जाते थे। उनकी जादुई आवाज़ में ऐसी आत्मीयता थी कि श्रोता अनायास ही उनसे जुड़ जाते थे। यही कारण था कि वे मंचीय काव्य-पाठ के अत्यन्त लोकप्रिय और सम्मानित हस्ताक्षरों में गिने जाते थे।
आज भी अनेक साहित्यिक गोष्ठियों की स्मृतियों में उनका स्वर उसी ताजगी के साथ गूँजता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि दूर कहीं से उनकी वही परिचित आवाज़ फिर सुनाई दे रही है। मन बरबस ठिठक जाता है और स्मृतियों के आकाश में अर्चन जी अपने किसी प्रिय गीत के साथ पुनः उपस्थित हो उठते हैं।
 समग्रतः कहा जा सकता है कि शिवकुमार अर्चन का रचनाकर्म सहज सम्प्रेषणीयता, मानवीय संवेदना, वैचारिक सजगता और सामाजिक प्रतिबद्धता का सशक्त दस्तावेज़ है। उन्होंने गीत और ग़ज़ल को केवल छन्द अथवा शिल्प की परिधि में सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें अपने समय के मनुष्य की पीड़ा, संघर्ष, प्रतिरोध, आत्मिक अनुभव और जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पढ़ते समय पाठक केवल शब्दों से नहीं, बल्कि एक जीवंत मनुष्य और उसके समय से संवाद करता है।
अर्चन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे विचार की ऊँचाइयों पर पहुँचकर भी अभिव्यक्ति को कभी दुरूह नहीं होने देते। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहजता है, अनुभूति की प्रामाणिकता है और सम्प्रेषण की अद्भुत शक्ति है। उन्होंने सिद्ध किया कि कविता की वास्तविक कसौटी केवल शास्त्रीय अनुशासन नहीं, बल्कि उसकी संवेदनात्मक प्रामाणिकता और पाठक के हृदय तक पहुँचने की क्षमता है। इसी कारण उनकी रचनाएँ मंच पर भी समान रूप से लोकप्रिय रहीं और गंभीर साहित्यिक विमर्श में भी सम्मान के साथ पढ़ी और उद्धृत की जाती रहेंगी।
एक रचनाकार के रूप में शिवकुमार अर्चन का मूल्यांकन केवल उनके प्रकाशित काव्य-संग्रहों के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका सम्पूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व ,एक कवि, ग़ज़लकार, समीक्षक, सम्पादक, मंचीय प्रस्तोता और साहित्य-प्रेमी मनुष्य के रूप में ,हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने अपने जीवन और साहित्य के माध्यम से यह स्थापित किया कि सच्चा रचनाकार समय के पीछे नहीं चलता, बल्कि अपने समय की चेतना को शब्द देता है।
आज अर्चन जी हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनकी रचनाएँ, उनकी विचार-दृष्टि, उनका आत्मीय व्यक्तित्व और उनकी सम्मोहक काव्य-ध्वनि हिन्दी साहित्य की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगी। उनकी कविता आने वाली पीढ़ियों को भी यह विश्वास दिलाती रहेगी कि शब्द यदि जीवन से जन्म लेते हैं, तो वे समय की सीमाओं का अतिक्रमण कर अमर हो जाते हैं। यही किसी भी बड़े रचनाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है और यही शिवकुमार अर्चन के साहित्य का स्थायी महत्त्व भी है।
मनोज जैन 
106 विट्ठलनगर 
गुफा मंदिर रोड
लालघाटी भोपाल
462030