वागर्थ में आज
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मनोज साहू 'निडर'
प्रस्तावना टीप
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मनोज साहू 'निडर' की रचनाएँ अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय यथार्थ की तीक्ष्ण पड़ताल करती हैं। उनकी ग़ज़लों में व्यवस्था की विसंगतियों, लोकतांत्रिक विडंबनाओं, नैतिक मूल्यों के क्षरण तथा आम आदमी की पीड़ा पर पैनी दृष्टि दिखाई देती है, वहीं 'अम्मा' और 'रोशनी की बात कर' जैसी रचनाएँ संवेदना, पारिवारिक आत्मीयता और जीवन-मूल्यों की उजली आभा भी रचती हैं। व्यंग्य, प्रतीक और सहज भाषा का सशक्त संयोजन उनकी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाता है। समकालीन सरोकारों से गहरे जुड़ा मनोज साहू निडर का सृजन पाठक को मंथन के लिए प्रेरित करता है।
सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और सृजनात्मक प्रतिबद्धता का यह संतुलन मनोज साहू 'निडर' को समकालीन हिं दी साहित्य में एक विशिष्ट स्वर के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
मनोज जैन 'मधुर'
संस्थापक-संचालक,
समूह वागर्थ
1.
मेहरबानी देखिए
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कौन है राजा यहाॅं पर, कौन रानी देखिए।
वक्त के सैलाब में, हर शय है फ़ानी देखिए।
छीनकर रंगत ये सारी, बाग बगिया पेड़ से
सज रही अब पत्थरों से, राजधानी देखिए।
कागज़ी पतवार थामे, ज़िद ये दरिया पार की
डगमगाती नाव की, जोश ए जवानी देखिए।
राह पर मजमे लगाकर, क़ैद करके सीन को
वेदना पर कैमरे की, मेहरबानी देखिए।
पोत ली कालिख स्वयं पर, मौज मस्ती शौक में
चार पैसों की खनक में, गुम जवानी देखिए।
चाॅंद को दागी बताकर, तीरगी की आड़ में
स्यार दल की जुगल बंदी, हम जुबानी देखिए।
मालियों की बेरुखी का है गुलिस्ताॅं पर असर
कैकटस के बाजुओं में रातरानी देखिए।
2.
बात नदियों से चली थी
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बात नदियों से चली थी, नालियों तक आ गई।
ये सियासत रहबरी से, गालियों तक आ गई।
इंतिहा सी हो गई है, अब तो बस कीजै हुजूर
क्यों जड़ों की बदजुबानी, डालियों तक आ गई।
आपसे शिकवे शिकायत, इल्तिज़ा भी क्या करें
आपकी दरियादिली भी, प्यालियों तक आ गई।
थी कभी गुलशन में रंगत, हर कली महफूज थी
आज फितरत वहशियाना, मालियों तक आ गई।
पायलें कंगन ज़मीनें, क़र्ज़ में होती दफ़न
हाय अब ये बेबशी भी, बालियों तक आ गई।
ध्यान, दर्शन, आस्था से, वास्ता कुछ है नहीं
अब बुतों की बंदगी भी, तालियों तक आ गई।
अब भरोसा क्या करें, मासूम से इस गांव पर
परवरिश मां बाप की भी, पारियों तक आ गई।
3.
कौन जाने कौन किसको
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कौन जाने कौन किसको, खल रहा है आजकल।
आदमी ही आदमी को, छल रहा है आजकल।
जुगनुओं की फौज काबिज, हर बड़ी दूकान पर
गांव में सूरज समोसे, तल रहा है आजकल।
नींद जो टूटी तो सारे, स्वप्न घायल हो गए
आंख के पानी में कुछ तो, जल रहा है आजकल।
सुन रही दीवार देखो, मूक बहरों की व्यथा
ऐसा ही दौर ए सियासत, चल रहा है आजकल।
एक चिंगारी पड़ी क्या, चैनों अमन के गांव में
दोस्ती का हर फ़साना, जल रहा है आजकल।
देख नागाओं के जलवे, मौज मस्ती फक्कड़ी
हर कोई तन पर भभूती, मल रहा है आजकल।
4.
हम देंगे
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माला मेडल शाल चाहिए? हम देंगे।
बस अंटी में माल लाइए, हम देंगे।
कच्ची पक्की खिचड़ी खाना छोड़ो भी
मखनी वाली दाल खाइए? हम देंगे।
दाद, तालियां, और कविता छह घंटे
सुनने वाले कान चाहिए? हम देंगे।
काव्य मनीषी,भाषा भूषण, जो चाहो
बोलो क्या वरदान चाहिए? हम देंगे।
शोध ग्रंथ भी रेडीमेड मंगा देंगे,
फिर मानद सम्मान पाइए, हम देंगे।
कवि नहीं हो, न ही कविता से नाता
मंचों पर स्थान, आइए, हम देंगे।
5.
हॅंस रही है मूर्तियाॅं
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याचनायें बढ़ गई इंसान की।
लो दुकानें खुल गई भगवान की।
आस्थाओं का तमाशा देखकर
हॅंस रही हैं मूर्तियाॅं पाषाण की।
वक्त के सैलाब में ढहने लगा
थी बहुत गहरी जड़ें ईमान की।
एक संकरी सी गली थी, प्रेम की
कब घुसी ज़ातें यहां हैवान की।
लालसा हावी हुई बैराग्य पर
स्वर्ण मृग पर रीझ बैठी जान-की।
इस दिए में तेल भी, बाती भी है
जंग होगी अब दिया तूफान की।
इस कहानी में कोई राजा नहीं
बस कबायद है ये, खींचातान की।
6.
विकास... दिख रहा है!
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विकास की नज़रें, विकास का नज़ारा।
विकास ने विकास को, विकास में उतारा।
विकास का हाथी, विकास का घोड़ा
विकास की पीठें, विकास का कोड़ा।
विकास की नदियाॅं, विकास का है नाला
विकास ही गड़बड़, विकास का घोटाला।
विकास की डाली, विकास का झूला
विकास की रोटी से, विकास ही फूला।
विकास की पोथी, विकास का पन्ना
विकसित कब होंगे, हल्कू औ धन्ना?
जनता भी फूल सी, फूली इतराती है
विकास के गीतों पर, ताली बजाती है।
7.
कागज पर
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खेत और खलिहान मिले हैं कागज पर।
मुर्दों को भी प्राण मिले हैं कागज पर।
बिजली पानी और सड़क की मांगों को
लाखों के भुगतान मिले हैं कागज पर।
बरसों पहले श्राद्ध किया था बेटों ने
उनके भी मतदान मिले हैं कागज पर।
होरी हरिया घीसा और गुलबिया को
बंगले आलीशान मिले हैं कागज पर।
दंगा दहशत वालों की अब खैर नहीं
गुंडों को फरमान मिले हैं कागज पर।
जन के धन से खूब नवाजा अपनों को
ऐसे भी कुछ दान मिले हैं कागज पर।
8.
अम्मा
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जेठ भतीजे काका ताऊ, कितने भाई भाई में।
रिश्तों में पैबंद जड़े हैं, अम्मा की तुरपाई में।
पकवानों की बात करें या, पापड़ बड़ी मुरब्बे की
अम्मा के हाथों सा जादू, कहां किसी हलवाई में।
हंसी हंसी तो कभी डांट में, सीख हमेशा दे जाती
थोड़ी मिश्री थोड़ी मिर्ची, अम्मा की गु्स्साई में।
ठोकर खाकर जब भी रोये, दवा नहीं पुचकार मिली
ऐसा लगता फ़र्क न कोई, अम्मा और दवाई में।
असमंजस के बादल हों या कोई हताशा मजबूरी
हर मुश्किल में राह मिली है अम्मा की अगुवाई में।
9.
लोकतंत्र है!
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ठोंको-पीटो, नोंचो-खाओ, लोकतंत्र है।
नंगे होकर नाचो गाओ, लोकतंत्र है।
देशभक्ति की छाप लगाकर माथे पर
हर मौके पर इसे भुनाओ, लोकतंत्र है।
घूस माॅंगते तुम्हें पकड़ ले कोई तो
रिश्वत देकर जान छुड़ाओ, लोकतंत्र है।
झूठ सजाकर ऊँचे मंचों पर रख दो
सच्चाई को धूल चटाओ, लोकतंत्र है।
अपना मत, मत 'दान' समझना भूले से
इसे बेचकर पी, खा जाओ, लोकतंत्र है।
संविधान जब हावी हो मनमर्जी पर
संसद में कानून बनाओ, लोकतंत्र है।
10.
रोशनी की बात कर
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धूप तितली फूल पानी, चांदनी की बात कर।
छोड़ ये बारूद अब तो, जिंदगी की बात कर।
शोर से जब थक गया हो, मन तेरा सुनते हुए
बांस की उस छेद वाली, बाँसुरी की बात कर।
लादकर बेताल कांधे, क्यों भटकता दर ब दर
दिल में सोये आदमी से, आदमी की बात कर।
ये घुटन क्यों हो रही, दीवारों-दर के दरमियाॅं
पूछ सारी खिड़कियों से, रोशनी की बात कर।
फेंक दे चेहरे से चेहरा, सामने आ, ऐ 'निडर'
झाँक मन के आईने में, सादगी की बात कर।
11.
ये कैसी खुद्दारी !
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चोर-चोर में यारी पक्की।
झूठों की सरदारी पक्की।
जिसके सिर इल्ज़ाम बड़े हों
उनकी दावेदारी पक्की।
गीदड़ के संग शेर जो बैठें
फितरत में मक्कारी पक्की।
कोई बने सरकार हमें क्या
अपनी हिस्सेदारी पक्की।
बहती गंगा हाथ धोये जो
उसकी गठरी भारी पक्की।
मौका मिलते ही बदलेंगे
जिनकी नातेदारी पक्की।
दान हड़प कर चंपत होना
कैसी ये खुद्दारी पक्की।
परिचय -
मनोज साहू 'निडर'
जन्म - 3 जुलाई 1971
पता- 'समर्पण' बालाजी कालोनी, माखन नगर, जिला नर्मदापुरम (मध्यप्रदेश)
पिन -461661
मोबाइल नं - 9993963425
ईमेल - manoj.nidar@gmail.com
संप्रति - मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग में कार्यरत।
बाल साहित्य पर सात किताबें प्रकाशित।
कादम्बिनी, वागर्थ, अट्टहास, दैनिक भास्कर, नवभारत, नईदुनिया समेत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साझा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन।
प्रस्तुति
वागर्थ
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