पं सुधाकर शर्मा जी के गीत
कृपा दृष्टि माँ तेरी
हर क्षण सम्बल मेरा है !
मैं तो मूक - अशक्त
बोल भी कब पाता था ?
ऍ,ऑ,ऊॅ,ओं जैसे --
शब्दों से ही बस नाता था!
वह भी तो था समय कि जब
खा-पी भी कब सकता था?
तू जब कौर खिलाती मॉ
तब - तब मैं खा पाता था !!
मैंने तब समझा था; तू है तो
प्रति पल मेरा है !!
तेरी उॅगली की इंगिति पर
धरती पर पद धरता!
तू उछाह भरती तो मेरा
मन उछाह था भरता !
मेरी किलकारी सुन-सुन कर
तू किलकारी भरती...
मेरे गिर कर उठने पर...
तेरा मन मचल-सॅवरता!
तेरा प्रबल प्रवाह तरंगित
अविरल मेरा है !!
दो
पार्थ सदृश सौभाग्य नहीं,
जो धर्म क्षेत्र में
नारायण के विराटत्व को वरता!
किंतु परम सौभाग्य कि माॅ की
करुणा ने बीज रूप को ममता के
संस्पर्श विराट दिये हैं !!
वह दुलार - वात्सल्य असीमित
कितना है विस्तार अनन्त ?
जिसके स्नेह सिक्त ऑचल में
स्वत: सिमट कर रहें दिगंत !!
चुम्बन से अभिषिक्त कपोलों ने रक्ताभा पायी है,
अरुणिम अधरों ने उन्नत सर्वोच्च ललाट किये हैं !!
माॅ के प्रति स्पंदन से ही -
स्पंदित है जीवन!
स्रोत अजस्र शक्तियों का माॅ;
स्नेह-छत्र संजीवन !!
ऊॅचे-नीचे दुर्गम पथ पर पद भर दूभर चलना;
प्रेरक शक्ति-संस्कारों ने सुपथ सपाट किये हैं !!
तीन
मॉ जैसी बस मॉ ही होती ;
शेष दृश्य - अदृश्य सदा
माॅ के सम्मुख बौना है !
अ-अनार,आ-आम और
क्ष, त्र, ज्ञा मॉ से सीखा!
अन्य कोई क्या पहला गुरु
हो सकता मातु सरीखा !
माॅ की स्नेहिलछवि से महका
मन का हर कौना है !!
माॅ के पल्लू में सिमटा -
सहमा था शैशव मेरा !
पल-पल प्रेरक शक्ति जगाती
मुझमें अलख सबेरा !!
माॅ के अंक सदृश अप्रतिम -
क्या कोई बिछौना है ?
ऑखों में जीवन - संवेदन
माॅ ने ही दिखलाया !
मूल्यवान नैतिक-निष्ठा का
पग - पग पाठ पढ़ाया !!
सच्चाई है चोखी चाॅदी,
साहस शुभ सौना है !!
चार
माॅ तू मेरे इस अमोल -
जीवन का अथ है!
जिसका अथ तू है ;
उसका क्या कोई समापन होगा?
गूढ़ रहस्यों के "अ " - ज्ञात का
कैसे ज्ञापन होगा ?
तेरे वरद हस्त पा संसृति -
भला अकारथ है ?
यह अकूत विश्वास कि
तू है तो स्फूर्ति है!
मातृ तत्व से प्रकट प्रकृति ही
सतत पूर्ति है !!
" चरैवेति " की ऋचा फलित,
तू जाग्रत रथ है !!
अंक निरंक नहीं,
सपने साकार सॅजोता !
तुझे पा लिया,
व्यर्थ रत्न-रत्नाकर- गोता !!
मन्तव्यों - गन्तव्यों का तू
सुगम - सुपथ है !!
माॅ ! तू मेरे इस अमोल -
जीवन का अथ है !!
पाँच
सोच रहा हूॅ ....
तुम्हें क्यों करूॅ मैं सम्बोधित ?
क्यों कि तुम्हीं तो हो मेरा सारा सम्बोधन!
साॅसों में विश्वास रच रहा
नित नूतन उत्साह!
हुलसित हृदय भर रहा रह-रह
उच्छल उदधि उछाह !!
सारा कथ्य ध्यान में रख
वाक्यों में नव विन्यास बूझता !
स्वगत तुम्हीं को तो करता रहता उद्बोधन !!
हर युग में ही तो कहता -
आया है कवि - मन !
फिर भी कितना रहा -
अनकहा शब्द- समर्पन ?
साध्य - साधना मध्य रहे जो
पृष्ठ अनलिखे अनगिन,
वह रचाव ही तो माॅ है तेरा शुभ शोधन !!
छह
तेरे हेतु असम्भव क्या माँ ?
तू प्रतीक है हर सम्भव की!
मैने निरखा रूप समुच्छल,
हरिताभा तू प्रति पल्लव की !!
दूर - दूर तक फैले खेतों में
तू स्वेद कणों की आभा!
श्रम तुझसे है स्वयं प्रतिष्ठित,
तू खलिहानों की दिव्याभा !!
अन्नपूर्णे सर्व धान्य - धन
पराकाष्ठा तू वैभव की !!
तेरे हेतु असम्भव क्या माँ?
तू प्रतीक है हर सम्भव की !!
रूप, गंध, रस, मिट्टी के -
सोंधेपन का आभास तुम्हीं हो!
धर्म - धरा, विस्तृत नीलाम्बर,
जाग्रत जग विश्वास तुम्हीं हो !!
माँ तुम ही दर्शन - दिग्दर्शन,
तुम उत्पन्ना नव - अभिनव की !!
तेरे हेतु असम्भव क्या माँ ?
तू प्रतीक है हरसम्भव की !!
प्रस्तुति
वागर्थ ब्लॉग
साभार.....
जवाब देंहटाएंवागर्थ एवं भाई मनोज जैन मधुर।
साभार.....
जवाब देंहटाएंवागर्थ एवं भाई मनोज जैन मधुर।