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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

धीरज श्रीवास्तव जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ



धीरज श्रीवास्तव के प्रस्तुत नवगीत आभिजात्य काव्य-शिल्प की परिधि से बाहर निकलकर सीधे समाज के अंतिम जन के जीवंत यथार्थ, दैनंदिन संघर्ष और मर्मस्पर्शी लाचारी से हमारा साक्षात् कराते हैं। 'सँवरकी' का टूटता स्वाभिमान, 'रामपाल' की बिसूरती विपन्नता और 'रिक्शे वालों' का कठोर श्रम केवल व्यथा की गाथाएँ नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता पर तीखे प्रश्नचिह्न हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन की टीस को उघाड़ता बँटवारे का दर्द हो या जिजीविषा और बेकारी के बीच झूलते जीवन के चित्र, कवि ने लोक-भाषा के सहज और जीवंत बिंबों के माध्यम से इन्हें अत्यंत प्रामाणिकता के साथ उकेरा है। सामाजिक सरोकारों की इस बहुरंगी पृष्ठभूमि के बीच विरह और प्रणय का एकांत नवगीत को एक सुकोमल, आत्मीय धरातल प्रदान करता है। बिना किसी आडंबर या कोरी भावुकता के, समय के पैरों में पड़े छालों की गवाही देते ये नवगीत अपनी गहरी प्रतिबद्धता और सजल संवेदना के बल पर पाठक के चेतना-प्रवाह में एक स्थायी कसक छोड़ जाने में पूरी तरह सफल सिद्ध होते हैं।


(1)


सँवरकी

आज अचानक हमें अचम्भित,

सुबह-सुबह कर गयी सँवरकी।

कफ़ ने जकड़ी ऐसे छाती,

खाँस-खाँस मर गयी सँवरकी।


जूठन धो-धोकर,खुद्दारी,

बच्चे दो-दो पाल रही थी।

विवश जरूरत जान बूझकर,

बीमारी को टाल रही थी।

कल ही की तो बात शाम को

ठीक-ठाक घर गयी सँवरकी।


लाचारी पी-पीकर काढ़ा

ढाँढस रही बँधाती मन को।

आशंकित थी, दीमक बनकर,

टीबी चाट रही है तन को। 

संघर्षों से हाथ छुड़ाकर

भव सागर तर गयी सँवरकी।


करवानी थी जाँच खून की,

मदद पाँच सौ माँग रही थी।

हमको लगा गरीबी शायद,

रच फिर कोई स्वाँग रही थी,

फूट-फूट कर रोई पीछे,

सम्मुख हँसकर गयी सँवरकी।


देती रही दुहाई सेवा,

कुटिल स्वार्थ ने व्यथा न जानी।

करती रही याचना झोली

अडिग रहा बटुआ अभिमानी।

वैभव के पनघट से लेकर,

खाली गागर गयी सँवरकी।


खड़ी हुई लज्जित निष्ठुरता,

शव के आगे शीश झुकाये।

पूछ रहा सामर्थ्य स्वयं से,

अब वह किससे खेद जताये।

जाते-जाते, पढ़ा प्रेम के,

ढाई आखर गयी सँवरकी।


-- धीरज श्रीवास्तव


(2)


कल्लू काका


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


घर में भूजी भाँग न बाकी 

भूखा पेट बहुत हठधर्मी।

आलस पड़ा भरे खर्राटे

गर्दन तक ओढ़े बेशर्मी।

सैर स्वप्न में करें इरादे 

लन्दन पेरिस दुबई ढाका।


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


उछल उछल लँगड़ी आशाएं

दिखा रहीं फोकट में सर्कस।

बीड़ी,जर्दा,चिलम,चुनौटी

अद्वी,पौव्वा करें चकल्लस।

पंचायत की धूर्त सियासत

लगा रही बिंदास ठहाका।


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


नाकामी गढ़ रही बहाने

कुटिल कर्ज की भौंह तनी है।

ब्याज उसे कैसे दे मोहलत

रूठी जिससे आमदनी है।

खर्च डालता मूँछ ऐंठकर,

मिट्टी की गुल्लक पर डाका।


चौराहे पर कल्लू काका।

दिन भर मारें गप्प सड़ाका।


-- धीरज श्रीवास्तव


(3)


फूट -फूटकर अम्मा रोयीं


आँगन में दीवार पड़ गयी सन्नाटा है द्वारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।


साँझ लगाती मरहम कैसे

भला भूख के कूल्हे पर !

दुख की चढ़ी पतीली हो जब

आशाओं के चूल्हे पर !


हमने ढलते आँसू देखे तुलसी के चौबारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।


तनिक दया भी नहीं दिखायी

सुख जैसे मेहमानों ने !

हृदय दुखाया पल पल जी भर

चाची के भी तानों ने !


एक एककर हवन हो गयीं सब खुशियाँ अंगारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।


भाग्य गया वनवास भोगने

हँसी उड़ायी लोगो ने !

नाव हमेशा रही भँवर में

फँसा दिया संयोगो ने !


देख देख बस हँसे जमाना बैठा सिर्फ किनारे पर।

फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर।



-- धीरज श्रीवास्तव



(4)


रिक्शे वाले


फटे पाँव हाथों में छाले।

मगर मस्त हैं रिक्शे वाले।


रोज थिरकतीं मदहोशी में,

सांझ ढले आशाएं भोली।

स्वप्न अधूरे ठर्रा पीकर,

नमक चाट कर करें ठिठोली।

फुटपाथों पर नग्न गरीबी

पड़ी अगौंछा मुँह पर डाले।


सेंक रही है बैठ विवशता

ईंटों के चूल्हे पर रोटी।

प्यासा गला ढूंढता फिरता

सड़क किनारे नल की टोटी।

भूख निगलती प्याज तोड़कर

हरी मिर्च के साथ निवाले।


अक्सर करते जाम सड़क को,

रैली ,धरने बैनर झंडे।

खिसियाई खाकी बरसाती,

रिक्शे के कूल्हों पर डंडे।

भद्दी भद्दी गाली खाकर,

अपमानों के पीते प्याले।


ठंड गिराती आसमान से,

साथ ओस के भाई-चारा।

एक फटे कम्बल में करते,

राधे-जुम्मन साथ गुजारा।

भिड़ें अजानें शंखों के सँग ,

या मस्ज़िद से लड़ें शिवाले।


--धीरज श्रीवास्तव


(5)


रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील


रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।

उसकी खुशियाँ उसके सपने वक्त गया सब लील।


बिन पानी के मछली जैसे

तड़प रहा वह आज

बिटिया अपनी ब्याहे कैसे

और बचाये लाज


संघर्षों में सूख चली है आँखों की भी झील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


शहर दिखाये ले जाकर जब

दो हजार हों पास

संगी साथी कौन दे रहा

नहीं किसी से आस

ठोक रही बीमारी माँ की छाती में बस कील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


कर्म भाग्य का नहीं संतुलन

बनी गरीबी गाज

देखे जो लाचारी इसकी

ताक लगाये बाज


व्यंग्य कसे मुस्काये अक्सर खाँस-खाँस कर चील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


फिर भी हिम्मत क्यों हारे वो

जीना है हर हाल।

पटरी पर ला देगा गाड़ी

आते-आते साल।


रोज-रोज आशाएँ दौड़ें जाने कितने मील।

रामपाल अब नहीं लगाता है कुर्ते में नील।


--  धीरज श्रीवास्तव


(6)


चूमे प्रेम निशानी मन


तड़पे,सिसके,छुए निहारे

चूमे प्रेम निशानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी,अभिमानी मन।


किया हवा ने छल बादल से,

चली छुड़ाकर हाथ अचानक।

ठहर गया बढ़ सका न आगे, 

रहा अधूरा प्रेम कथानक।

बुने उसी को साँझ सकारे,

पल पल गढ़े कहानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी, अभिमानी मन।


पलकों की चौखट पर बैठे

स्वप्न अपाहिज डाले आसन ।

लौटेगी बैसाखी लेकर , 

नींद नहीं देती आश्वासन।

उम्मीदों पर रात गुजारे

पड़े पड़े सैलानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी,अभिमानी मन।


इठलाती चंचल लहरों पर,

डाल रहा सन्नाटा डोरे।

नाम रेत पर लिखें उंगलियां

विरह वेदना सीप बटोरे।

रोज उलचता बैठ किनारे,

नम आँखों का पानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी, अभिमानी मन


बिखर गया था जहाँ प्रणय का,

रिश्ता नाज़ुक धागों वाला।

गूँथे जहाँ मौन आकुलता,

अनुबन्धों की टूटी माला।

खड़ा वहीं से तुम्हें पुकारे,

करने को अगवानी मन।

लौट न पाता पास तुम्हारे

किन्तु हठी,अभिमानी मन।


--  धीरज श्रीवास्तव


परिचय

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संक्षिप्त -परिचय


नाम-   धीरज श्रीवास्तव                                             

पिता-  स्व. रमाशंकर लाल श्रीवास्तव                                  

माता- स्व. श्रीमती शान्ती                                     

जन्मतिथि- 01-09-1974

वर्तमान पता- ए- 259, संचार विहार मनकापुर जनपद--गोण्डा (उ.प्र.)  पिन - 271308


स्थायी पता- ग्राम व पोस्ट - चिताही, जनपद- सिद्धार्थ नगर (उ.प्र.)


संपादन- मीठी सी तल्खियाँ (काव्य संग्रह), नेह के महावर (गीत संग्रह) 


प्रकाशन-  मेरे गाँव की चिनमुनकी (गीत संग्रह) 'धीरज श्रीवास्तव के गीत( डॉ.सुभाष चंद्र द्वारा संपादित) सहित अनेक साझा संग्रह एवं राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय पत्र -पत्रिकाओं, व ई पत्रिकाओं में रचनाओं का निरन्तर प्रकाशन।


संप्रति --- संस्थापक सचिव, साहित्य प्रोत्साहन संस्थान, एवं "साहित्य रागिनी" वेब पत्रिका।  मोबाइल नंबर- 8858001681

ईमेल- dheerajsrivastava228@gmail.com

आत्मकथ्य - मेरे लिए गीत केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने समय और समाज के प्रति संवेदनशील संवाद हैं। यदि मेरे शब्द किसी चेहरे की पीड़ा को आवाज और किसी मन में उम्मीद की रोशनी दे सकें, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगा।


सोमवार, 7 सितंबर 2026

डॉ मधु शुक्ला जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ

डॉ मधु शुक्ला जी के गीतों के बहाने एक प्रस्तुति टीप


   प्रस्तुति
 मनोज जैन 
   संपादक 
~।।वागर्थ।।~ 

शान्तिसुमन की परम्परा को पुष्पित पल्लवित करती मधु शुक्ला जी
__________________________

​डॉ. मधु शुक्ला के गीत भारतीय नवगीत परंपरा की उस समृद्ध धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें प्रकृति का सौंदर्य, संवेदना की सघनता और मानवीय संबंधों की तड़प आपस में एकाकार हो उठती है। डॉ. शान्तिसुमन की गीत-परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनकी रचनाधर्मिता में मिट्टी की सोंधी गंध, प्रकृति के मानवीय भाव और क्लासिकी काव्य-संस्कार (यक्ष-यक्षिणी, कबीर, मीरा के संदर्भ) सहज ही उतर आते हैं। इन गीतों में एक ओर जहाँ वर्षा और बादल के माध्यम से हृदय के उल्लास तथा प्रेम की विकलता को स्वर मिला है, वहीं दूसरी ओर बदलते समय की त्रासदी, टूटते अनुबंधों और उजड़ते ग्रामीण परिवेश की पीड़ा भी पूरी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुई है। देवदार के शांत-साधक स्वरूप से लेकर माटी के प्रति अनन्य अनुराग तक, मधु जी की भाषा अत्यंत प्रांजल, लयात्मक और दृश्यबंधों (बिंबों) से परिपूर्ण है। यह संकलन प्रकृति-प्रेम, स्मृतियों और जीवन-दर्शन का एक ऐसा समेकित संसार रचता है, जो पाठक के मन को गहराई से छू लेता है।

 (1)      
                              
(स्वप्न धानी लिख गया )

झील के किस्से,
समन्दर की कहानी लिख गया।   
एक बादल फिर
नदी की जिन्दगानी लिख गया ।  

उँगलियों से बूँद की  ,
पानी में इक   हलचल लिखी 
मौन लहरों के सुरों में,
थिरकती कलकल लिखी 
लिख गया कुछ बिजलियाँ 
कुछ आग-पानी लिख गया ।

तप्त धरती के ह्रदय के 
भाव अँकुराने लगे 
थरथराते पात तन के 
अर्थ गहराने लगे 
जर्द आँखों में धरा की
स्वप्न धानी लिख गया ।

खोलकर खिड़की
फुहारों का झकोरा आ गया  
पत्र सोंधी गंध वाले 
द्वार पर सरका गया 
भीगते मन में कई 
सुधियाँ सुहानी लिख गया ।

डोर  ले विश्वास की
मन का  पपीहा उड़ चला 
ढाई आखर के सबद
गाता कबीरा मुड़ चला 
संग मेरे नाम के
मीरा दिवानी लिख गया ।

लिख गया युग के अधूरे
प्रेम की दारुण  कथा 
यक्षिणी की पीर, 
शापित यक्ष के मन की व्यथा
फिर कथानक में नये 
बाते पुरानी लिख गया ।
एक बादल फिर नदी की 
जिंदगानी लिख गया। 
    ----‐-------

( 2)

(आओ इक पाती )

खोई- खोई सुबह लिखें 
अलसाई शाम लिखें 
आओ इक पाती रूठे 
मौसम के नाम लिखें।  

लिखे मेघ जो भेजे तुमने , 
आकर लौट गये 
प्यासे मन को  तनिक और 
तड़पाकर लौट गये 
कुछ छल गया अषाढ़ 
छल रहा कुछ  सावन-भादों 
साँस तोड़ती फसलों का 
आखिरी सलाम लिखें। 

तुम क्या रूठे, जीवन की 
सब खुशियाँ रूठ गईं 
शुभ सकुनो वाली कलशी 
हाथों से छूट गई 
सूख गयी पल में बगिया 
हरियाये सपनों की 
चुका रहे भूलों का अपनी 
क्या-क्या दाम लिखें। 

पाँव जमाकर आ बैठी है 
धूप मुंडेरों पर 
ढूँढ़े रैन बसेरा पंछी 
सूखे पेड़ो पर 
मौन हुआ संगीत तटों का
उजड़ गये मेले 
रेत-रेत होती नदिया के 
दर्द तमाम लिखें। 

कुशल क्षेम की चिट्ठी आये 
वर्षों बीत गये 
सोधी मिट्टी वाले सारे 
रिश्ते रीत गये 
राह देखते धुँधलायी 
आँखें  सीवानों की 
लौटेंगे मन के गोकुल में 
कब घनश्याम लिखें ।
आओ इक पाती रूठे 
मौसम के नाम लिखें। 
  --------‐---------

(3)

हम हो गए किनारे, सूखी हुई नदी के। 

बहती थी बीच अपने 
भावों की मौन सरिता 
लिखती थीं रोज लहरें 
पानी में प्रेम कविता 

बहकी हवाएँ ऐसी बिखरे वो छन्द सारे ,
टूटे पड़े हैं तट पर अनुबन्ध सतपदी के। 

रुख वक्त का अचानक 
कितना बदल गया है 
मुझे छोड़ कर भँवर में 
आगे निकल गया है। 

लेकर जिन्हें चले थे पलको की पालकी में 
काँटों से चुभ रहे वो सपने नयी सदी के। 

सांसो की बस्तियों में 
उड़ती है चील ऐसे।  
चुभ जाये चलते-चलते 
पावों में कील जैसे।  

घिरते ही जा रहे हैं ख़ामोशियों के साये  
सहमा हुआ समय है आँगन में त्रासदी के।      

ये दर्द कैसा मन को रह-रह
रुला रहा है 
मेरा नाम ले के जैसे कोई 
बुला रहा है।
देता नहीं दिखाई अपना ही 
अक्स अब तो,
दरका है ऐसे दर्पण,ज्यों स्वप्न द्रौपदी के। 

(4)

देवदार के वृक्ष

संत सरीखे खड़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष 
पर्वत-पर्वत,शिखर-शिखर पर 
घाटी-घाटी में बूटे जैसे जड़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

मौन पर्वतों के मन के 
कोमल उद्गारो से 
सजे हुए स्वागत में हर-पल
वंदनवारों से 
अटखेली कर रहे मेघ के 
भीगे फाहो से 
नभ के आँगन बड़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

देखा और पढ़ा था जिनको 
सिर्फ किताबों में 
आज देख प्रत्यक्ष खो गये 
जैसे  ख्वाबों में 
मंत्र मुग्ध हो गया हृदय,
निःशब्द हुई वाणी 
तस्वीरों से मढ़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

ध्यान मग्न हो खड़े हुए हैं 
निरत साधना में 
पत्र,फूल,फल,गंध चढ़ाते 
नित उपासना में 
अनुगुंजित है घाटी जिनके 
मंत्रोच्चारो से 
देवों के ज्यों गढ़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 

उभर रहे आकार कई रह-रह 
आभासो के 
पलट रहीं हैं पृष्ठ,कथायें 
फिर इतिहासो के 
कालिदास के विकल यक्ष की 
प्रेम भरी पाती 
आखर-आखर पढ़े हुए हैं 
देवदार के वृक्ष। 
   --------------------

 (5)

[जब कभी बादल]

अनगिनत सपने 
उमीदों के सजाता है ।
जब कभी बादल 
नदी के गीत गाता है ।

जाग उठती हलचलें 
सोई  उमंगों में 
गीत कल-कल के
थिरक उठते तरंगों में 
फूटते झरने खुशी के,
मौन शिखरों से
हुलसती धरती गगन 
तब मुस्कुराता है ।

देख अद्भुत दृश्य 
बादल और बिजली के 
गूँज उठते सुर मधुर 
मल्हार कजरी के 
पैग भरती है गगन तक 
राधिका मन की 
प्रीति का घनश्याम
तब मुरली बजाता है ।

इन्द्रधनु सा कौन 
सुधियों में उभरता है 
डोर बूँदों की पकड़
मन में उतरता है 
भेज कर संदेश मीठे 
मेघ के हाथों 
पर्वतों के पार से
मुझको बुलाता है। 
जब कभी बादल
नदी के गीत गाता है।

    (6)

[ सौंधी पातिया ]

भेज  सोंधी पातिया 
भीगी हवाओं से 
गाँव की पगडण्डियाँ 
मुझको बुलाती हैं I 

द्वार का वो नीम चौरा 
वो लिपा आँगन  
धूल- मिट्टी में चहकता 
फूल सा बचपन 
वो खुला आकाश, 
धरती का वो अपनापन
था वही गोकुल हमारा, 
वही वृंदावन, 
छोड़ आये थे कभी
जिस देहरी को हम 
वो अभी तक याद के 
दीपक जलाती है. 

फूलते जब कास वन 
लेते विदा बादल  
ओढ़कर आती शरद ऋतु 
रेशमी आँचल 
सिलसिले होते शुरू 
उत्सव- उछाहो के 
लौटती फिर गाँव- गलियों में 
नयी हलचल 
दमक उठती   देह 
टूटी  छत-दीवारों की 
शुभ चित्र अंकित भीतिया 
फिर जगमागाती हैं I  

धूप वाले दिन, 
वो ठंडी छाँव वाले दिन 
आस्था-  विश्वास , 
भक्ति - भाव वाले दिन 
उतरते वो पंछियो  के 
दल किनारों पर, 
तिर रही फिर से नदी में 
नाव वाले दिन I
लिपट कर इन  लहलहाते  
धान खेतों से  
ये हवाएँ  जिंदगी का 
गीत गाती  हैं I 

दूर तक फैला हुआ 
संसार माटी का 
ये जग नहीं कुछ और बस 
विस्तार माटी का 
पर्वत- शिखर, ये घाटिया 
ये खेत, ये झरने 
हर रूप में ढलता हुआ 
आकार माटी का 
उम्र भर मन भूल पाता 
है नहीं जिसको   
वो नेह का रिश्ता अमिट 
माटी बनाती है I
--------------

संक्षिप्त परिचय          
डॉ मधु शुक्ला 
जन्मस्थान- लालगंज, 
रायबरेली (उ. प्र. )
शिक्षा -एम.ए.(हिन्दी एवं संस्कृत) 
पी एच डी 
लेखन की विधा - गीत, ग़ज़ल, कहानी समीक्षायें एवं साहित्यिक आलेख ।
दो गीत पुस्तकें प्रकाशित-- "आहटें बदले समय की" एवं "कुछ मन के कुछ मौसम के "
 "आहटें बदले समय की " पुस्तक पर म. प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा दुष्यन्त सम्मान।

पूर्व - व्याख्याता (संस्कृत) 

साहित्यिक पत्रिका "पहला अंतरा" में सह सम्पादक ।
सम्पर्क ------6-साई हिल्स, कोलार रोड, 
भोपाल -462042 म. प्र. 
मोबाइल ---09893104204 
Email -----madhushukla111@gmail.com

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

हरिनारायण सिंह हरि जी के दो नवगीत प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग

 हरिनारायण सिंह 'हरि ' जी के दो नवगीत 

                       ( एक  )

दीखता धुँधला भविष्यत् आँख पर जाले हुए 
भीष्म हम हैं, द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले हुए 

सूक्ति दिनकर की हमें कब याद रहती है सखे 
द्रौपदी की साड़ियाँ फरियाद करतीं जब सखे 
हैं  हमारे  चोर  मन   तो   स्वार्थ  के  घाले हुए
 भीष्म हम हैं, द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले हुए 

पांडवों के गुण न दिखते कौरवों की गिनतियाँ 
हम नहीं सुन पा रहे हैं आर्त्तजन की विनतियाँ 
राज्य  आधे   दूर,  गउवें  पाँच  के  लाले   हुए 
भीष्म हम हैं,  द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले  हुए 

नीति-निर्धारक-नियंता  इस कदर गिर जायँगे 
जंग की ज्वाला उठेगी ,   अन्ततः जल जायँगे 
क्या  बतावें  साफ  कुरते इस  कदर काले हुए 
भीष्म हम हैं,  द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले  हुए 
                            •
                            ( दो ) 

पेड़ लगाया,  किन्तु    नहीं   फल  उसमें है दिखता 
भाग्य जनक का फीका-फीका यही भाग्य लिखता 

फले-फुले   यह   पेड़  अबाधित, अपने को झोंका
शीतलता    के   बदले   तन  पर  बड़ा-बड़ा फोंका 
पता   नहीं  था  बिना  मोल  के पिता यहाँ बिकता 

भट्ठी  हुई   आज  की  दुनिया  सिर्फ  जहाँ  तपना 
अब  आयेंगे,  अब    आयेंगे  अच्छे  दिन   जपना 
ऐसे   में   क्या   करे,   गयी  मृगतृष्णा  भी उकता

पूँजी   सारी   चली   गयी   इक  महल   बनाने में 
लेकिन   सुख   तो   पड़ा  रहा  उसके तहखाने में 
फिसलन  भरे  फर्श पर आखिर वह कैसे टिकता 
                              •

हरिनारायण सिंह 'हरि' : संक्षिप्त परिचय 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
• मूल नाम- हरिनारायण सिंह 
• जन्म- 2 जनवरी,1958 ई
• शिक्षा- एम. ए (राजनीति विज्ञान)
• केएसएस काॅलेज,मोहिउद्दीन (समस्तीपुर) के राजनीति विभागाध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त। 
•लेखन- हिन्दी व बज्जिका में।
• प्रकाशन- तीन प्रबंधकाव्य, पाँच कविता-संग्रह, 6 गीत-नवगीत संग्रह, एक गजल-संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित। एक कविता संकलन और एक लघुकथा संकलन का सम्पादन। कई पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का संपादन ।
प्रसारण- आकाशवाणी के पटना व दरभंगा तथा दूरदर्शन के पटना व मुजफ्फरपुर केन्द्र से प्रसारण। 
• मूल्यांकन-पुस्तक- डाॅ नीरज कुमार सिन्हा द्वारा संपादित मूल्यांकन-पुस्तक 'हरिनारायण सिंह हरि का गीत-काव्य' प्रकाशित। 
•पता- हरिद्वार भवन,राजपुर-जौनापुर 
          पो-जौनापुर,
          भाया-मोहिउद्दीन नगर 
          जिला-समस्तीपुर-848501
          मोबाइल नंबर-9771984355
 •ई-मेल - hindustanmohanpur@gmail.com

आदरणीय राजा अवस्थी जी के दो नवगीत प्रस्तुति ब्लॉग वागर्थ

              राजा अवस्थी जी              

नवगीत -1.   

   बहुत सुविधाएँ जुटा ली


जिन्दगी ने बहुत सुविधाएँ जुटा ली।

फटे जूते अंगौछे बिन खेत पर होंगे पिताजी 
मुरहरे में दाल अम्मा पकाती होंगी; 
हर सुबह दोपहर संध्या कोख जाये को सुमिरती यशोदा की रीति, गाती-निभाती होगी;

नहीं छूटी पिताजी की भी कुदाली।

एक तन पर शव बहुत हैं शहर है, उत्सव बहुत हैं ओढ़ना, खाना, पहनना, जर जुटाना है; 
अहर्निश ये व्यस्तताएँ, मिटाती संवेदनाएँ 
बहुत थोड़ा पा, बहुत कुछ भूल जाना है;

लोग अपने, जब मिले नजरें झुका लीं।

अब कहाँ घर-द्वार-आँगन, वहाँ की किलकारियाँ 
शहर में बस एक कमरा चीखता है; 
कहाँ दुलराना सुलाना, लोरियाँ गाना सुनाना
खीझती माँ, तनावों का घर पिता है;

यंत्रणा की नदी में क्यों नाव डाली
नवगीत -2.

 आ बैठें साथ कुछ तेरी, 
कुछ मेरी, हो जाए बात, 
आ बैठें साथ।

कितने दिन से बीड़ी-साथ नहीं पी;
बंद पड़ीं सुख-दुख की मन में सीपी;
अनुभव का सारा ही खारा गुजरात, 
आ बैठें साथ।

मालुम भी हैं कुछ घर-गाँव के हाल; 
सुनते हैं लड़कों ने बदली है चाल;
गाली मुँह में बसती छुरियों पर हाथ,
आ बैठें साथ।

संबंधों का संगम लुप्त हो चला; 
वैयक्तिकता में सौहार्द खो चला;
घर का घरवालों को हाल नहीं ज्ञात, 
आ बैठें साथ।

राजा अवस्थी 
गाटर घाट रोड, आजाद चौक 
कटनी - 483501(मध्यप्रदेश)
मोबा. 9131675401


परिचय
______________________________________
     परिचय -
नाम - राजा अवस्थी
शिक्षा - परास्नातक (हिन्दी साहित्य), शिक्षा  
           स्नातक
व्यवसाय - मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग में अध्यापन 
सम्प्रति - प्रधानाध्यापक, सांदीपनि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, झिंझरी ,कटनी 

लेखन - नवगीत एवं अन्य काव्य विधाओं के साथ 
            आलोचना-आलेख।

प्रकाशन -(1) 'जिस जगह यह नाव है' (नवगीत  
              कविता संग्रह) का अनुभव प्रकाशन, 
              गाजियाबाद से प्रकाशन सन् 2006 एवं
     (2) 'जीवन का गुणा-भाग' (नवगीत कविता 
            संग्रह) श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा, 
             प्रकाशन वर्ष - 2021
(3)कैकेयी अब बोलती (लम्बी कविता)
(4)आलोचना का ब्राह्मणवाद (आलोचना)
(5) 'समकालीन हिंदी ग़ज़ल - पांँच दशक: पाँच कदम' (संपादन)

   * विश्व हिन्दी साहित्य में राम कथा के सर्वथा   
      उपेक्षित पात्र कैकेयी पर केन्द्रित विशिष्ट काव्य 
     "कैकेयी अब बोलती" का सृजन विशेष रूप से 
      उल्लेखनीय।

   * साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित 'समकालीन  
      नवगीत संचयन' एवं डॉ ओमप्रकाश सिंह द्वारा संपादित 'नई सदी के नवगीत' में प्रमुख कवि के रूप में शामिल किए जाने के साथ शिवानंद सहयोगी जी के द्वारा संपादित ग्रंथ 'नवगीत अर्धशतक' एवं लगभग सभी महत्वपूर्ण समवेत नवगीत संकलन यथा -  
      नवगीत नई दस्तकें (संपादक - डाॅ. निर्मल 
      शुक्ल), गीत वसुधा (संपादक - नचिकेता),    
      समकालीन नवगीत कोश (संपादक     
     -नचिकेता), नवगीत के नये प्रतिमान, नवगीत 
      का लोकधर्मी सौंदर्यबोध, नवगीत का 
      मानवतावाद (संपादक - डाॅ राधेश्याम बंधु), 
      सहयात्री समय के (संपादक - डाॅ. रणजीत 
      पटेल), नई सदी के स्वर, भाग -5 (संपादक -  
      हीरालाल मिश्र 'मधुकर') सहित कई और   
      समवेत संकलनों एवं नवगीत विशेषांकों में  
       नवगीत संकलित।
      नवगीत एवं हिन्दी ग़ज़ल आलोचना पर केंद्रित  
      कुछ पुस्तकों में लेख शामिल

   * सन् 1986 से पत्र - पत्रिकाओं में कविताओं    
      एवं आलेखों का प्रकाशन

   * आकाशवाणी जबलपुर, शहडोल एवं दूरदर्शन   
      केन्द्र भोपाल के साथ स्थानीय चैनलों पर 
      कविताओं का प्रसारण


  * सम्मान - * कादम्बरी साहित्य परिषद जबलपुर का अखिल भारतीय नवगीत सम्मान - निमेष सम्मान 2006(नवगीत संग्रह जिस जगह यह नाव है 'के लिये),
* बैसवारा शोध संस्थान लालगंज, रायबरेली का नवगीत गौरव सम्मान-2018,
* प्रतिष्ठित किस्सा-कोताह नवगीत सम्मान 2020,
* साकीबा, विदिशा - भोपाल का नवकृति सम्मान 2021,इनके अतिरिक्त और भी कई संस्थाओं द्वारा सम्मान।
विशेष - यूट्यूब पर 'नवगीत धारा' श्रृंखला अंतर्गत नवगीत पर चर्चा एवं कालजयी कहानियाँ श्रृंखला के अन्तर्गत कहानी-पाठ-प्रस्तुति
ADDE KI BAAT यूट्यूब चैनल पर विविध साहित्यिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति 

सम्पर्क -
गाटरघाट रोड, आजाद चौक, कटनी
483501, मध्यप्रदेश
मोबा 9131675401
Email - raja.awasthi52@gmail.com

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बुधवार, 4 मार्च 2026

होली गीत



🌹 रंगों के त्योहार का🌹

मंजरियों  ने  आम्रकुंज  में,रचा ‌दृश्य श्रृंगार का,
मिला निमंत्रण हर पंछी को,रंगों के त्योहार का।

आओ खुलकर खेलो-खाओ।
अन्तर्मन  से   गले   लगाओ। 
भावों  की  रूठी कलियों को,
चूम-चूम कर आज  मनाओ।

सदियों  से  ही रहा हमेशा,ऋतु बसंत मनुहार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को, रंगों के त्योहार का।

कोयल  कूकी  पंचम स्वर में।
बजी बंशिका  कान्हा कर में। 
फागुन  के  आने से अनगिन,
खुशियाँ चहकीं सबके घर में।

साजन  के  आने  की चाहत,सांकल खोले द्वार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को, रंगों  के  त्योहार  का।

होली  खेले  मीरा  मन  में।
राधा  कान्हा  के आंगन में!
गोप- गोपियाँ  धूम  मचाये,
पिचकारी लेकर मधुवन में।

सब पर चढ़ा हुआ हो जैसे, नशा कृष्ण के प्यार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को,रंगों  के  त्योहार का।

लाल, गुलाबी,  नीले, पीले।
वस्त्र  हुए  सब  गीले-गीले।
सबके सब अब एक हो गये,
चाहे  हों  जितने  चमकीले।

मिलन  पर्व  का अर्थ यही है,फ़र्क मिटे संसार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को, रंगों के त्योहार का।
                     
-डाॅ०मधुसूदन साहा, 
  राउरकेला,ओड़िशा

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

मनोज जैन का एक गीत

मैं हूँ #आलोचक #प्रगतिशील 
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मैं हूँ अपने में स्वयंपूर्ण,
मैं हूँ आलोचक प्रगतिशील।

                 ईसा-मूसा का दीवाना,
            करता हूँ वार सनातन पर।
            गुण गाता हूँ नित ओशो के,
           मैं लिखता नही पुरातन पर।

वैदिक चिंतन के माथे में,
ठोका करता हूँ रोज कील।

        परिधान पहनता भारत के,
        भारत की बात नहीं करता।
        मैं अपने तर्क वितर्कों में,
        कबिरा को लाकर मन हरता।

हो परम्परा की चिड़िया तो,
बन जाता हूँ विकराल-चील।
 
        गीतों की बात करूँगा क्यों,
        इनमें नवता का नाम नही।
        हूँ अधुनातन मैं ज्ञानी हूँ,
        जड़ता का कुछ भी काम नही।

बश चलता तो आदर्शों को,
मैं कब का होता गया लील।

        पावन वेदों के सम्मुख में,
        मैं महावीर को ले आया।
        निष्पक्ष बताने मैं खुद को
        गौतम का राग सुना आया।

अन्तर्विरोध के धागे को,
रह रह कर देता रहा ढील।
     
       मनोज जैन

बुधवार, 23 जुलाई 2025

एक जिंदगी क्या कह रही है- मनोज जैन

#गीत

#ज़िंदगी_क्या_कह_रही_है 

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खूबसूरत ज़िंदगी के पल तुम्हारे पास हैं,
फिर भला क्यों तुम उदासी 
ओढ़ कर बैठे हुए हो।
 
तनिक देखो घाट के भुजपाश में,
लिपटी नदी को,
खिलखिलाकर हँस रही है जोर से।

झाँककर देखो जरा भिनसार का,
यह रूप मनहर,
बहुत प्यारा लग रहा हर ओर से।

सृष्टि की खुशियाँ तुम्हारे पास हैं,
ज़िंदगी से फिर भला
मुख मोड़ क्यों बैठे हुए हो।

उड़ चला पाखी गगन में,
धूप से कर चार बातें।
हवा मद्धिम और ठंडी वह रही है।

चूसती मकरंद तितली,
भृंग मँडराया कली पर,
सुन जरा लो, जिंदगी क्या कह रही है?

सामने सत्यं शिवम है सुंदरम है,
और तुम नाता इसी से,
तोड़कर बैठे हुए हो।

मनोज जैन 
23/7/25

मंगलवार, 21 जनवरी 2025

मनोज जैन का एक नवगीत

एक नवगीत
____________

चुहिया से भी,
शेर डरेगा,
दबे बशर्ते जमकर नस।

निर्णय करती चतुर लोमड़ी,
सचमुच सुनने लायक है।
कोयल घोषित हुई कर्कशा,
कौआ सच्चा गायक है।

बकरा थानेदार
हो गया
भिड़ा लिया उसने टिप्पस।

पाला छूकर घोड़ा लौटा,
बस थोड़ा सुस्ताया है।
मसका मारा इधर गधे ने,
ढेंचू-राग सुनाया है।

फेल हो गया,
तुरकी घोड़ा
नम्बर मिले,गधे को दस।

चंट-फंट गीदड़ के आगे,
बाघ खड़ा मुँह लटकाए।
भगवा पहना बंदरिया ने,
सारा जंगल गुण गाए।

बूला उसका,
बिका हमेशा,
जिसकी हो बातों में रस।

हंसों के आवेदन ख़ारिज,
हुए पुरस्कृत गिद्ध सभी।
परिवर्तन के नए दौर में,
जंगल बदला अभी-अभी।

उल्लू बोला
हम राजा हैं
काहे का है असमंजस।

मनोज जैन
20/01/2025

रविवार, 3 नवंबर 2024

स्व जितेन्द्र बजाड़ के चार नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ


स्व. जितेन्द्र शंकर 'बजाड़' जी के चार नवगीत
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    प्रस्तुति
~।।वागर्थ।।~
                              आप शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक थे। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी और राजस्थानी भाषा की सैंकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई। बालकों के मनोविज्ञान से जुड़े साहित्य की आपको बहुत अच्छी समझ थी । 
            बालगीत, दोहे,छंद,कहानी,ललित निबंध, साहित्यिक गीत,साक्षरता, फिल्म लेख आदि आप निरंतर लिखते रहे। साहित्य की तकरीबन हर एक विधा में आपने लेखन किया और जन-जन के लोकप्रिय व्यक्ति बने। कुछ वर्षों तक मंचों पर भी काव्यपाठ किया ।    
                आकाशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रों से भी आपकी रचनाएँ समय-समय पर प्रसारित होती रही ।

1.

मैं कवि हूँ  मैं समय के पार देखूँगा 
अंधेरे में पल रहा उजियार देखूँगा 

रात चिड़िया चहकने पर 
जी नहीं सकती 
यह अमावस उजाले को 
पी नहीं सकती 

राह में कई खाइयाँ है
बढ़ती हुई परछाइयाँ है 
मगर फिर भी मैं सुबह का द्वार देखूँगा 

ऐ ! किरण के वंशधर को 
टोकने वाले 
है बता तू कौन मुझको
रोकने वाले 

दीपक नहीं मशाल हूँ मैं 
अंधेरे का काल हूँ मैं 
आज से हरपल मैं तेरी हार देखूँगा 

अरे दानव तू ऋषि की 
साधना मत भंग कर 
रोक कविता के कदम मत
राह यूँ न तंग कर 

भागीरथी सरिता है जैसे 
रश्मिरथी कविता है वैसे 
कलम की आंखों से नव संसार देखूँगा 

2.

तुम ने डाला रंग देह पर 
भीग गया भीतर तक मनुवा 

वासंती इठलाती अखियाँ
फगुना कर कुछ हँसी लजाई
सुधियों में अनगिन सतरंगी 
छवियाँ फिर से आ बौराई 

तुम ने गाया गीत गंध का
गूँजा सप्तम स्वर तक मनुवा 

आस लिए सपने उठ जागे 
काँप उठे फिर अधर कली से 
जब भी निकली फागुन गाती 
रंग खेलती भीड़ गली से 

तुमने चाहा चुप-चुप रहना 
बात पहुँच गई घर तक मनुवा

3.

आओ थोड़ी जंग खरोंचे 
कुन्द हो रही अपनी सोचें 

पाँच साल तक तू - तू मैं -मैं 
वाली एक राष्ट्रीय खिल्ली 
सुनने की आदी बन बैठी 
बरसों से बेचारी दिल्ली 

और आँकड़ों मे उलझे हम
अपने नाक कान मुँह नोचें 

ठुमक-ठुमक कर नाच रहे हैं 
कल तक जो थे लँगड़े लूले 
बन ठन कर बैठे सदनों में 
गलियारों मे फिरते फूले 

कुल्हे कमर मटकते सबके 
ठीक हुई टखनों की मोचें 

मन्दिर-मस्जिद-गिरिजाघर और
गुरुद्वारों की इस बस्ती में 
कौए चील गिद्ध बगुले हैं 
बैठे पेड़ों पर मस्ती में 

और ठूंठ से रगड़-रगड़ कर 
पैनी करते अपनी चोंचें 

4.

आओ कोई सपना साधें 
कोई गीत लिखें
व्यथा प्रीत की कथा गीत की 
आ मनमीत लिखें 

बाँचे ढाई अक्षर पलछिन-
दिनों-महीनों-बरसों
नागफनी भी ऐसे सींचें 
जैसे पीली सरसों 

बिसराये अधरों को आँखों 
से प्रीत लिखें 

सुख की दुख की जड़ चेतन की 
परिभाषाएँ हैं 
तेरी मेरी सबकी अनगिन 
अभिलाषाएँ हैं 

अपनी और पराई तजकर 
नूतन रीत लिखें 

हारे मन का हार परायो 
को पहना दें
बांधे उर के छोर भोर सी 
मीठी यादें 

हार सकल संसार 
पलभर की जीत लिखें

परिचय

स्व. जितेंद्र शंकर बजाड़

जन्म-2 नवंबर 1957
मंदसौर जिले के नारायणगढ़ गाँव में
मृत्यु-8 सितंबर 2020
चित्तौड़गढ़ जिले के बिछोर गाँव में 

माता-बरजी देवी
पिता-प्यारे लाल गुर्जर

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

षष्ठीपूर्ति के आयोजन में : मनोज जैन

लोकप्रिय समूह वागर्थ में प्रस्तुत है एक नवगीत
प्रस्तुति 
मनोज जैन 

षष्ठीपूर्ति
_________

गाना,
जिसका मोल नहीं,
वह गाकर धन्य हुए।

षष्ठीपूर्ति
के आयोजन में,
जाकर धन्य हुए।

लघुता में भी हम विराटता!
मढ़ते चले गये।
ग्रंथ विमोचित हुआ क़सीदे,
पढ़ते चले गये।

पैग मार हम,
सघन मेघ-से,
छाकर धन्य हुए।

दया,धरम,ईमान,विधाता,
इनकी झोली में।
रस टपकाया हमने भी 
शहदीली बोली में।

प्रायोजित,
उपहार लाख का,
पाकर धन्य हुए।

तिकड़म,गुणा,भाग,विज्ञापन,
लकदक शैली है।
हमनें निर्गुन स्वच्छ कहा, पर !
चादर मैली है।

झूठ बोल हम,
कसम राम की,
खाकर धन्य हुए।

मनोज जैन 

बुधवार, 17 जुलाई 2024

मीनाक्षी ठाकुर का एक नवगीत



मीनाक्षी ठाकुर जी का एक नवगीत
प्रस्तुति
वागर्थ


मधुर गीत -नवगीत आपके, 
शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 


कभी धूप भर कर मुट्ठी में, 
पाना  ये चाहें  सूरज। 
कभी बुद्ध के आदर्शों की, 
माथे पर सज जाती रज। 


कभी भाव की एक बूँद से
 भर जाता स्वप्निल संसार। 


मधुर गीत -नवगीत आपके, 
शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 
कसे शिल्प में  बँधे छंद हैं, 
कविताओं में उजलापन।
तीखी-पैनी धार कलम की, 
लिखते केवल जन का मन। 


सदा झूठ की बाँह मरोडी, 
और किया सच का सत्कार। 


मधुर गीत -नवगीत आपके, 
शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 
पर -पीड़ा से रहे उपजते, 
मन में  जितने प्रश्न तमाम। 
नयी सोच ने लिख डाले हैं, 
उत्तर अगणित तभी ललाम। 


स्वागत करने मचल रहा है, 
आज आपको हरसिंगार। 

मधुर गीत -नवगीत आपके, 

शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 


मीनाक्षी ठाकुर, मिलन विहार
मुरादाबाद।