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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

हरिनारायण सिंह हरि जी के दो नवगीत प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग

 हरिनारायण सिंह 'हरि ' जी के दो नवगीत 

                       ( एक  )

दीखता धुँधला भविष्यत् आँख पर जाले हुए 
भीष्म हम हैं, द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले हुए 

सूक्ति दिनकर की हमें कब याद रहती है सखे 
द्रौपदी की साड़ियाँ फरियाद करतीं जब सखे 
हैं  हमारे  चोर  मन   तो   स्वार्थ  के  घाले हुए
 भीष्म हम हैं, द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले हुए 

पांडवों के गुण न दिखते कौरवों की गिनतियाँ 
हम नहीं सुन पा रहे हैं आर्त्तजन की विनतियाँ 
राज्य  आधे   दूर,  गउवें  पाँच  के  लाले   हुए 
भीष्म हम हैं,  द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले  हुए 

नीति-निर्धारक-नियंता  इस कदर गिर जायँगे 
जंग की ज्वाला उठेगी ,   अन्ततः जल जायँगे 
क्या  बतावें  साफ  कुरते इस  कदर काले हुए 
भीष्म हम हैं,  द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले  हुए 
                            •
                            ( दो ) 

पेड़ लगाया,  किन्तु    नहीं   फल  उसमें है दिखता 
भाग्य जनक का फीका-फीका यही भाग्य लिखता 

फले-फुले   यह   पेड़  अबाधित, अपने को झोंका
शीतलता    के   बदले   तन  पर  बड़ा-बड़ा फोंका 
पता   नहीं  था  बिना  मोल  के पिता यहाँ बिकता 

भट्ठी  हुई   आज  की  दुनिया  सिर्फ  जहाँ  तपना 
अब  आयेंगे,  अब    आयेंगे  अच्छे  दिन   जपना 
ऐसे   में   क्या   करे,   गयी  मृगतृष्णा  भी उकता

पूँजी   सारी   चली   गयी   इक  महल   बनाने में 
लेकिन   सुख   तो   पड़ा  रहा  उसके तहखाने में 
फिसलन  भरे  फर्श पर आखिर वह कैसे टिकता 
                              •

हरिनारायण सिंह 'हरि' : संक्षिप्त परिचय 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
• मूल नाम- हरिनारायण सिंह 
• जन्म- 2 जनवरी,1958 ई
• शिक्षा- एम. ए (राजनीति विज्ञान)
• केएसएस काॅलेज,मोहिउद्दीन (समस्तीपुर) के राजनीति विभागाध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त। 
•लेखन- हिन्दी व बज्जिका में।
• प्रकाशन- तीन प्रबंधकाव्य, पाँच कविता-संग्रह, 6 गीत-नवगीत संग्रह, एक गजल-संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित। एक कविता संकलन और एक लघुकथा संकलन का सम्पादन। कई पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का संपादन ।
प्रसारण- आकाशवाणी के पटना व दरभंगा तथा दूरदर्शन के पटना व मुजफ्फरपुर केन्द्र से प्रसारण। 
• मूल्यांकन-पुस्तक- डाॅ नीरज कुमार सिन्हा द्वारा संपादित मूल्यांकन-पुस्तक 'हरिनारायण सिंह हरि का गीत-काव्य' प्रकाशित। 
•पता- हरिद्वार भवन,राजपुर-जौनापुर 
          पो-जौनापुर,
          भाया-मोहिउद्दीन नगर 
          जिला-समस्तीपुर-848501
          मोबाइल नंबर-9771984355
 •ई-मेल - hindustanmohanpur@gmail.com

आदरणीय राजा अवस्थी जी के दो नवगीत प्रस्तुति ब्लॉग वागर्थ

              राजा अवस्थी जी              

नवगीत -1.   

   बहुत सुविधाएँ जुटा ली


जिन्दगी ने बहुत सुविधाएँ जुटा ली।

फटे जूते अंगौछे बिन खेत पर होंगे पिताजी 
मुरहरे में दाल अम्मा पकाती होंगी; 
हर सुबह दोपहर संध्या कोख जाये को सुमिरती यशोदा की रीति, गाती-निभाती होगी;

नहीं छूटी पिताजी की भी कुदाली।

एक तन पर शव बहुत हैं शहर है, उत्सव बहुत हैं ओढ़ना, खाना, पहनना, जर जुटाना है; 
अहर्निश ये व्यस्तताएँ, मिटाती संवेदनाएँ 
बहुत थोड़ा पा, बहुत कुछ भूल जाना है;

लोग अपने, जब मिले नजरें झुका लीं।

अब कहाँ घर-द्वार-आँगन, वहाँ की किलकारियाँ 
शहर में बस एक कमरा चीखता है; 
कहाँ दुलराना सुलाना, लोरियाँ गाना सुनाना
खीझती माँ, तनावों का घर पिता है;

यंत्रणा की नदी में क्यों नाव डाली
नवगीत -2.

 आ बैठें साथ कुछ तेरी, 
कुछ मेरी, हो जाए बात, 
आ बैठें साथ।

कितने दिन से बीड़ी-साथ नहीं पी;
बंद पड़ीं सुख-दुख की मन में सीपी;
अनुभव का सारा ही खारा गुजरात, 
आ बैठें साथ।

मालुम भी हैं कुछ घर-गाँव के हाल; 
सुनते हैं लड़कों ने बदली है चाल;
गाली मुँह में बसती छुरियों पर हाथ,
आ बैठें साथ।

संबंधों का संगम लुप्त हो चला; 
वैयक्तिकता में सौहार्द खो चला;
घर का घरवालों को हाल नहीं ज्ञात, 
आ बैठें साथ।

राजा अवस्थी 
गाटर घाट रोड, आजाद चौक 
कटनी - 483501(मध्यप्रदेश)
मोबा. 9131675401


परिचय
______________________________________
     परिचय -
नाम - राजा अवस्थी
शिक्षा - परास्नातक (हिन्दी साहित्य), शिक्षा  
           स्नातक
व्यवसाय - मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग में अध्यापन 
सम्प्रति - प्रधानाध्यापक, सांदीपनि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, झिंझरी ,कटनी 

लेखन - नवगीत एवं अन्य काव्य विधाओं के साथ 
            आलोचना-आलेख।

प्रकाशन -(1) 'जिस जगह यह नाव है' (नवगीत  
              कविता संग्रह) का अनुभव प्रकाशन, 
              गाजियाबाद से प्रकाशन सन् 2006 एवं
     (2) 'जीवन का गुणा-भाग' (नवगीत कविता 
            संग्रह) श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा, 
             प्रकाशन वर्ष - 2021
(3)कैकेयी अब बोलती (लम्बी कविता)
(4)आलोचना का ब्राह्मणवाद (आलोचना)
(5) 'समकालीन हिंदी ग़ज़ल - पांँच दशक: पाँच कदम' (संपादन)

   * विश्व हिन्दी साहित्य में राम कथा के सर्वथा   
      उपेक्षित पात्र कैकेयी पर केन्द्रित विशिष्ट काव्य 
     "कैकेयी अब बोलती" का सृजन विशेष रूप से 
      उल्लेखनीय।

   * साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित 'समकालीन  
      नवगीत संचयन' एवं डॉ ओमप्रकाश सिंह द्वारा संपादित 'नई सदी के नवगीत' में प्रमुख कवि के रूप में शामिल किए जाने के साथ शिवानंद सहयोगी जी के द्वारा संपादित ग्रंथ 'नवगीत अर्धशतक' एवं लगभग सभी महत्वपूर्ण समवेत नवगीत संकलन यथा -  
      नवगीत नई दस्तकें (संपादक - डाॅ. निर्मल 
      शुक्ल), गीत वसुधा (संपादक - नचिकेता),    
      समकालीन नवगीत कोश (संपादक     
     -नचिकेता), नवगीत के नये प्रतिमान, नवगीत 
      का लोकधर्मी सौंदर्यबोध, नवगीत का 
      मानवतावाद (संपादक - डाॅ राधेश्याम बंधु), 
      सहयात्री समय के (संपादक - डाॅ. रणजीत 
      पटेल), नई सदी के स्वर, भाग -5 (संपादक -  
      हीरालाल मिश्र 'मधुकर') सहित कई और   
      समवेत संकलनों एवं नवगीत विशेषांकों में  
       नवगीत संकलित।
      नवगीत एवं हिन्दी ग़ज़ल आलोचना पर केंद्रित  
      कुछ पुस्तकों में लेख शामिल

   * सन् 1986 से पत्र - पत्रिकाओं में कविताओं    
      एवं आलेखों का प्रकाशन

   * आकाशवाणी जबलपुर, शहडोल एवं दूरदर्शन   
      केन्द्र भोपाल के साथ स्थानीय चैनलों पर 
      कविताओं का प्रसारण


  * सम्मान - * कादम्बरी साहित्य परिषद जबलपुर का अखिल भारतीय नवगीत सम्मान - निमेष सम्मान 2006(नवगीत संग्रह जिस जगह यह नाव है 'के लिये),
* बैसवारा शोध संस्थान लालगंज, रायबरेली का नवगीत गौरव सम्मान-2018,
* प्रतिष्ठित किस्सा-कोताह नवगीत सम्मान 2020,
* साकीबा, विदिशा - भोपाल का नवकृति सम्मान 2021,इनके अतिरिक्त और भी कई संस्थाओं द्वारा सम्मान।
विशेष - यूट्यूब पर 'नवगीत धारा' श्रृंखला अंतर्गत नवगीत पर चर्चा एवं कालजयी कहानियाँ श्रृंखला के अन्तर्गत कहानी-पाठ-प्रस्तुति
ADDE KI BAAT यूट्यूब चैनल पर विविध साहित्यिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति 

सम्पर्क -
गाटरघाट रोड, आजाद चौक, कटनी
483501, मध्यप्रदेश
मोबा 9131675401
Email - raja.awasthi52@gmail.com

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बुधवार, 4 मार्च 2026

होली गीत



🌹 रंगों के त्योहार का🌹

मंजरियों  ने  आम्रकुंज  में,रचा ‌दृश्य श्रृंगार का,
मिला निमंत्रण हर पंछी को,रंगों के त्योहार का।

आओ खुलकर खेलो-खाओ।
अन्तर्मन  से   गले   लगाओ। 
भावों  की  रूठी कलियों को,
चूम-चूम कर आज  मनाओ।

सदियों  से  ही रहा हमेशा,ऋतु बसंत मनुहार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को, रंगों के त्योहार का।

कोयल  कूकी  पंचम स्वर में।
बजी बंशिका  कान्हा कर में। 
फागुन  के  आने से अनगिन,
खुशियाँ चहकीं सबके घर में।

साजन  के  आने  की चाहत,सांकल खोले द्वार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को, रंगों  के  त्योहार  का।

होली  खेले  मीरा  मन  में।
राधा  कान्हा  के आंगन में!
गोप- गोपियाँ  धूम  मचाये,
पिचकारी लेकर मधुवन में।

सब पर चढ़ा हुआ हो जैसे, नशा कृष्ण के प्यार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को,रंगों  के  त्योहार का।

लाल, गुलाबी,  नीले, पीले।
वस्त्र  हुए  सब  गीले-गीले।
सबके सब अब एक हो गये,
चाहे  हों  जितने  चमकीले।

मिलन  पर्व  का अर्थ यही है,फ़र्क मिटे संसार का,
मिला निमंत्रण गली-गली को, रंगों के त्योहार का।
                     
-डाॅ०मधुसूदन साहा, 
  राउरकेला,ओड़िशा

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

मनोज जैन का एक गीत

मैं हूँ #आलोचक #प्रगतिशील 
_________________________________

मैं हूँ अपने में स्वयंपूर्ण,
मैं हूँ आलोचक प्रगतिशील।

                 ईसा-मूसा का दीवाना,
            करता हूँ वार सनातन पर।
            गुण गाता हूँ नित ओशो के,
           मैं लिखता नही पुरातन पर।

वैदिक चिंतन के माथे में,
ठोका करता हूँ रोज कील।

        परिधान पहनता भारत के,
        भारत की बात नहीं करता।
        मैं अपने तर्क वितर्कों में,
        कबिरा को लाकर मन हरता।

हो परम्परा की चिड़िया तो,
बन जाता हूँ विकराल-चील।
 
        गीतों की बात करूँगा क्यों,
        इनमें नवता का नाम नही।
        हूँ अधुनातन मैं ज्ञानी हूँ,
        जड़ता का कुछ भी काम नही।

बश चलता तो आदर्शों को,
मैं कब का होता गया लील।

        पावन वेदों के सम्मुख में,
        मैं महावीर को ले आया।
        निष्पक्ष बताने मैं खुद को
        गौतम का राग सुना आया।

अन्तर्विरोध के धागे को,
रह रह कर देता रहा ढील।
     
       मनोज जैन

बुधवार, 23 जुलाई 2025

एक जिंदगी क्या कह रही है- मनोज जैन

#गीत

#ज़िंदगी_क्या_कह_रही_है 

____________________

खूबसूरत ज़िंदगी के पल तुम्हारे पास हैं,
फिर भला क्यों तुम उदासी 
ओढ़ कर बैठे हुए हो।
 
तनिक देखो घाट के भुजपाश में,
लिपटी नदी को,
खिलखिलाकर हँस रही है जोर से।

झाँककर देखो जरा भिनसार का,
यह रूप मनहर,
बहुत प्यारा लग रहा हर ओर से।

सृष्टि की खुशियाँ तुम्हारे पास हैं,
ज़िंदगी से फिर भला
मुख मोड़ क्यों बैठे हुए हो।

उड़ चला पाखी गगन में,
धूप से कर चार बातें।
हवा मद्धिम और ठंडी वह रही है।

चूसती मकरंद तितली,
भृंग मँडराया कली पर,
सुन जरा लो, जिंदगी क्या कह रही है?

सामने सत्यं शिवम है सुंदरम है,
और तुम नाता इसी से,
तोड़कर बैठे हुए हो।

मनोज जैन 
23/7/25

मंगलवार, 21 जनवरी 2025

मनोज जैन का एक नवगीत

एक नवगीत
____________

चुहिया से भी,
शेर डरेगा,
दबे बशर्ते जमकर नस।

निर्णय करती चतुर लोमड़ी,
सचमुच सुनने लायक है।
कोयल घोषित हुई कर्कशा,
कौआ सच्चा गायक है।

बकरा थानेदार
हो गया
भिड़ा लिया उसने टिप्पस।

पाला छूकर घोड़ा लौटा,
बस थोड़ा सुस्ताया है।
मसका मारा इधर गधे ने,
ढेंचू-राग सुनाया है।

फेल हो गया,
तुरकी घोड़ा
नम्बर मिले,गधे को दस।

चंट-फंट गीदड़ के आगे,
बाघ खड़ा मुँह लटकाए।
भगवा पहना बंदरिया ने,
सारा जंगल गुण गाए।

बूला उसका,
बिका हमेशा,
जिसकी हो बातों में रस।

हंसों के आवेदन ख़ारिज,
हुए पुरस्कृत गिद्ध सभी।
परिवर्तन के नए दौर में,
जंगल बदला अभी-अभी।

उल्लू बोला
हम राजा हैं
काहे का है असमंजस।

मनोज जैन
20/01/2025

रविवार, 3 नवंबर 2024

स्व जितेन्द्र बजाड़ के चार नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ


स्व. जितेन्द्र शंकर 'बजाड़' जी के चार नवगीत
_______________________________________________

    प्रस्तुति
~।।वागर्थ।।~
                              आप शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक थे। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी और राजस्थानी भाषा की सैंकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई। बालकों के मनोविज्ञान से जुड़े साहित्य की आपको बहुत अच्छी समझ थी । 
            बालगीत, दोहे,छंद,कहानी,ललित निबंध, साहित्यिक गीत,साक्षरता, फिल्म लेख आदि आप निरंतर लिखते रहे। साहित्य की तकरीबन हर एक विधा में आपने लेखन किया और जन-जन के लोकप्रिय व्यक्ति बने। कुछ वर्षों तक मंचों पर भी काव्यपाठ किया ।    
                आकाशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रों से भी आपकी रचनाएँ समय-समय पर प्रसारित होती रही ।

1.

मैं कवि हूँ  मैं समय के पार देखूँगा 
अंधेरे में पल रहा उजियार देखूँगा 

रात चिड़िया चहकने पर 
जी नहीं सकती 
यह अमावस उजाले को 
पी नहीं सकती 

राह में कई खाइयाँ है
बढ़ती हुई परछाइयाँ है 
मगर फिर भी मैं सुबह का द्वार देखूँगा 

ऐ ! किरण के वंशधर को 
टोकने वाले 
है बता तू कौन मुझको
रोकने वाले 

दीपक नहीं मशाल हूँ मैं 
अंधेरे का काल हूँ मैं 
आज से हरपल मैं तेरी हार देखूँगा 

अरे दानव तू ऋषि की 
साधना मत भंग कर 
रोक कविता के कदम मत
राह यूँ न तंग कर 

भागीरथी सरिता है जैसे 
रश्मिरथी कविता है वैसे 
कलम की आंखों से नव संसार देखूँगा 

2.

तुम ने डाला रंग देह पर 
भीग गया भीतर तक मनुवा 

वासंती इठलाती अखियाँ
फगुना कर कुछ हँसी लजाई
सुधियों में अनगिन सतरंगी 
छवियाँ फिर से आ बौराई 

तुम ने गाया गीत गंध का
गूँजा सप्तम स्वर तक मनुवा 

आस लिए सपने उठ जागे 
काँप उठे फिर अधर कली से 
जब भी निकली फागुन गाती 
रंग खेलती भीड़ गली से 

तुमने चाहा चुप-चुप रहना 
बात पहुँच गई घर तक मनुवा

3.

आओ थोड़ी जंग खरोंचे 
कुन्द हो रही अपनी सोचें 

पाँच साल तक तू - तू मैं -मैं 
वाली एक राष्ट्रीय खिल्ली 
सुनने की आदी बन बैठी 
बरसों से बेचारी दिल्ली 

और आँकड़ों मे उलझे हम
अपने नाक कान मुँह नोचें 

ठुमक-ठुमक कर नाच रहे हैं 
कल तक जो थे लँगड़े लूले 
बन ठन कर बैठे सदनों में 
गलियारों मे फिरते फूले 

कुल्हे कमर मटकते सबके 
ठीक हुई टखनों की मोचें 

मन्दिर-मस्जिद-गिरिजाघर और
गुरुद्वारों की इस बस्ती में 
कौए चील गिद्ध बगुले हैं 
बैठे पेड़ों पर मस्ती में 

और ठूंठ से रगड़-रगड़ कर 
पैनी करते अपनी चोंचें 

4.

आओ कोई सपना साधें 
कोई गीत लिखें
व्यथा प्रीत की कथा गीत की 
आ मनमीत लिखें 

बाँचे ढाई अक्षर पलछिन-
दिनों-महीनों-बरसों
नागफनी भी ऐसे सींचें 
जैसे पीली सरसों 

बिसराये अधरों को आँखों 
से प्रीत लिखें 

सुख की दुख की जड़ चेतन की 
परिभाषाएँ हैं 
तेरी मेरी सबकी अनगिन 
अभिलाषाएँ हैं 

अपनी और पराई तजकर 
नूतन रीत लिखें 

हारे मन का हार परायो 
को पहना दें
बांधे उर के छोर भोर सी 
मीठी यादें 

हार सकल संसार 
पलभर की जीत लिखें

परिचय

स्व. जितेंद्र शंकर बजाड़

जन्म-2 नवंबर 1957
मंदसौर जिले के नारायणगढ़ गाँव में
मृत्यु-8 सितंबर 2020
चित्तौड़गढ़ जिले के बिछोर गाँव में 

माता-बरजी देवी
पिता-प्यारे लाल गुर्जर

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

षष्ठीपूर्ति के आयोजन में : मनोज जैन

लोकप्रिय समूह वागर्थ में प्रस्तुत है एक नवगीत
प्रस्तुति 
मनोज जैन 

षष्ठीपूर्ति
_________

गाना,
जिसका मोल नहीं,
वह गाकर धन्य हुए।

षष्ठीपूर्ति
के आयोजन में,
जाकर धन्य हुए।

लघुता में भी हम विराटता!
मढ़ते चले गये।
ग्रंथ विमोचित हुआ क़सीदे,
पढ़ते चले गये।

पैग मार हम,
सघन मेघ-से,
छाकर धन्य हुए।

दया,धरम,ईमान,विधाता,
इनकी झोली में।
रस टपकाया हमने भी 
शहदीली बोली में।

प्रायोजित,
उपहार लाख का,
पाकर धन्य हुए।

तिकड़म,गुणा,भाग,विज्ञापन,
लकदक शैली है।
हमनें निर्गुन स्वच्छ कहा, पर !
चादर मैली है।

झूठ बोल हम,
कसम राम की,
खाकर धन्य हुए।

मनोज जैन 

बुधवार, 17 जुलाई 2024

मीनाक्षी ठाकुर का एक नवगीत



मीनाक्षी ठाकुर जी का एक नवगीत
प्रस्तुति
वागर्थ


मधुर गीत -नवगीत आपके, 
शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 


कभी धूप भर कर मुट्ठी में, 
पाना  ये चाहें  सूरज। 
कभी बुद्ध के आदर्शों की, 
माथे पर सज जाती रज। 


कभी भाव की एक बूँद से
 भर जाता स्वप्निल संसार। 


मधुर गीत -नवगीत आपके, 
शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 
कसे शिल्प में  बँधे छंद हैं, 
कविताओं में उजलापन।
तीखी-पैनी धार कलम की, 
लिखते केवल जन का मन। 


सदा झूठ की बाँह मरोडी, 
और किया सच का सत्कार। 


मधुर गीत -नवगीत आपके, 
शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 
पर -पीड़ा से रहे उपजते, 
मन में  जितने प्रश्न तमाम। 
नयी सोच ने लिख डाले हैं, 
उत्तर अगणित तभी ललाम। 


स्वागत करने मचल रहा है, 
आज आपको हरसिंगार। 

मधुर गीत -नवगीत आपके, 

शब्द अनूठे, बिंब हज़ार। 


मीनाक्षी ठाकुर, मिलन विहार
मुरादाबाद।