आज कबीर जयंती के अवसर पर उन्हें प्रणाम करते हुए मेरा एक लेख—
रांगेय राघव और कबीर के साहित्य में ज्ञान परंपरा
मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ,
निरीह पग पर काल झुके है,
क्योंकि जी रहा हूँ मैं
अब तक प्यार-भरों के प्यार में।
मानव जीवन से अटूट प्यार करने वाले साहित्य साधना के अथक रचनाकार रांगेय राघव ने साहित्याकाश में अपनी अलग विलक्षण छवि अंकित की है।
भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराणों का उनका विस्तृत अध्ययन किया था। खास तौर से पुरातत्व और इतिहास से उन्हें प्यार था। जो कि उनकी रचनाओं में भी झलकता है। रांगेय राघव की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी के लिए अपनी आख़िरी सांस तक कुर्बान रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा, संस्कृति और कला का मूल्यांकन मार्क्सवादी नज़रिए से किया। अपने लेखन से दलित, शोषित, वंचितजनों में एक नई चेतना विकसित की।हिंदी साहित्य में इस मामले में सिर्फ राहुल सांस्कृत्यायन ही उनकी जोड़ी के हैं।
उनके पौराणिक चरित्रों पर लिखे उपन्यास जैसे लोई का ताना , यशोधरा जीत गयी, देवकी का बेटा, रत्ना की बात आदि अपने आप में अद्भुत हैं ऐसा लगता है मानो ये सभी चरित्र उनके संगी साथी रहे हों ।इन चरित्रों का जीवन परिचय उनका रहनसहन , समाज व साहित्य में उनके योगदान के वे जैसे चश्मदीद गवाह रहे हों।
आज मैं रांगेय राघवजी पर यहां बात नहीं करूंगी पर उनके द्वारा संत कबीर के जीवन पर अपने विचार व्यक्त करूँगी । लेखक ने कबीर के पुत्र कमाल के माध्यम से कबीर के जीवन का खूबसूरत चित्रण इतने रोचक ढंग से किया है मानो वे स्वयं कमाल की उँगली पकड़ कदम दर कदम उनके साथ रहे हों ।
संत कबीर के लिए रांगेय जी लिखते हैं कि उनके जीवन के तथ्य बहुत तो नहीं मिलते हैं पर उनके साहित्य को पढ़कर मैं जिन निष्कर्षों पर पहुंचा उसी के आधार पर यहाँ पर उनके पुत्र कमाल के माध्यम से आपके सामने परोसने का प्रयत्न किया है । संत कबीर जाति से जुलाहे थे तथा अनपढ़ थे पर उनका ज्ञान उनकी अभिव्यक्ति जीवन की सच्चाई को उजागर करती थी वह स्वयं नहीं लिखते थे पर वे जो कहते उसे उनके संगीसाथी उनके शिष्य लिपिबद्ध कर लेते । जो कि कहीं भी बहुत अच्छे से संकलित नहीं हैं पर उनके दोहे उनकी उक्तियाँ जैसे लोगों की जबान पर अंकित हो गई थी और मन मस्तिष्क में टंकित हो गई थीं ।
कबीर निर्गुण के परे थे उन्होंने जो राह दिखाई वह मानवता को कल्याण की ओर ले जाने वाली थी वह भेदभाव वाले ब्राह्मणवाद और इस्लाम का भी विरोध करते वे कट्टरपंथ के खिलाफ थे।
कबीर ने भारत में सांस्कृतिक जन जागरण की नींव डाली उनकी भाषा में क्रांति थी उनकी भाषा में श्रंगार था ना ही लालित्य था ।वह आम जन की भाषा थी। रांगेय जी कहते हैं कबीर के चेले कबीर पंथ चलाना चाहते थे पर उनके बेटे कमाल इस पक्ष में नहीं थे उनका कहना था कि वे कबीर की शिक्षा को तोड़ मरोड़ कर पेश करना चाहते हैं कमाल की असहमति पर चेलों ने कमाल के लिए प्रसिद्ध कर दिया कि
“बूढ़ा बंस कबीर का
जब उपजा पूत कमाल “
रांगेय जी ने लोई का ताना को विभिन्न भागों में बाँट कर कबीर के जीवन का पूरा चित्र दर्शाने की कोशिश की है पुस्तक का आरंभ कबीर की मृत्यु के दृश्य से प्रारंभ है। कबीर कमाल से काम बंद कर अपने पास बुला कर कहते हैं कि मेरे जाने का समय है । कमाल डर जाता है तब वे कहते हैं -“ इस संसार में कोई भी सनातन होकर नहीं आया सब आते हैं सब चले जाते हैं । गुण निर्गुण की पहचान करने वाले हों या राम-लक्ष्मण हों या पांडव ! यहाँ तक कि रावण भी चला गया सब खाली हाथ आए थे खाली हाथ चले गए ।”
“भूला लोग कहै घर मेरा
जा घरवा में फूला डोलैं
सो घर नाहीं तेरा
हाथी घोड़ा बैल खजाना
खूब यही सब रहा धरा “
मृत्यु शैया पर लेटे पिता के मुँह से मानो अमृत बरस रहा था । उनका स्वर गूंजा -
“उठो सखी मोरी माँग सँवारो
दुलहा मोसे रूसल हो।”
यह रूठना कितना मधुर था। अंतिम क्षणों में भी जीवन के प्रति कितनी मादकता थी।
“आये जमराज पलंग चढि बैठे
नैनन आँसू टूटल हो “
कमाल कहते हैं कि उस समय वे मेरे पिता नहीं थे वरन् वहाँ मुझे अनेक शताब्दियों का ज्ञान रूपी मनुष्य की आत्मा के सच्चे दर्शन हो रहे थे।
“चारि जने मिलि खाट उठाइन
चहुं दिसि धू दू ऊठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटत हो “
उनके चेहरे पर शांति की मुस्कुराहट थी । वे तो सो गए... मैं उनका बेटा मंत्रमुग्ध सा खड़ा रह गया । उनकी मृत्यु पर हिंदू और मुसलमानों में बवाल उठा कि वे हिंदू थे कुछ कहते मुसलमान थे। तब कमाल कहता है-
"आखिर तो जो जिस दायरे में रहता है, वहाँ उससे बाहर की बात सोच भी तो नहीं सकता। हिंदू और मुसलमान दोनो अलग अलग कुएँ में पड़े हुए मेंढक थे। उनकी सारी परंपराएँ , उनके सारे फैलाव वहीं तक तो जाकर पहुँचते थे।"
कबीर की पत्नी का नाम लोई था वह भी जुलाहिन थी और कबीर की प्रेरणा भी थी। वह कबीर के नारी पर कहे दोहों पर सवाल करती और उसका निचोड़ निकलवाती। कबीर ने कहा -
“नारी की जानी परत
अंधा होत भुजंग
कबीरा जिनकी कौन गति
जो नित नारी संग “
लोई के सवाल करने पर कहते हैं -" नारी माया है पर कब ? वे जो नारी को विषय की वस्तु समझते हैं, और उसके भोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेते हैं । उनके लिए ऐसा क्यों न कहा जाए ?"
कबीर और लोई दोनों एक ही रंग में रंगे हुए थे । एक बार कबीर घर छोड़ने की बात करते हैं तब लोई कहती है - "जो लोग घर छोड़कर भागते हैं वे एक आँख से दुनिया को देखते हैं उनके जीवन में हाँ और ना के पलड़े हमेशा होड़ करते रहते हैं। एक तरफ मरघट है, योग है, त्याग है वन है, सन्यास है और दूसरी तरफ दुनिया है , लोगों का लाभ है , मदद है , पाप का पर्दाफाश करना है । दो पाँवों पर बोझ सँभाल , एक पर न चल दुख उठाकर भाग मत , यहीं रह कर सच्चाई से लड़ । मैं तेरी साथिन हूँ तेरी राह का थोड़ा नहीं ।" कबीर ने तब एक नवीन मार्ग देखा वह एक समन्वय था जो किसी प्रकार की दासता को अस्वीकार करता था ।
कबीर ने लोई के सानिध्य में प्रेम को देखा और उसकी साधना करते करते उन्होंने देखा कि सारा संसार ही प्रेम के बल पर चल रहा है।
“ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ
पंडित भया न कोय
एकै अक्षर प्रेम का
पढ़े सो पंडित होय “
कमाल अपनी माँ से पूछते हैं कि -" माँ लोग कहते हैं कि वे सब से लड़ जाया करते थे ?" तब लोई कहती हैं कि -“वे तो प्रेम के भूखे थे क्रोध नहीं था उनमें वे कहते हैं -
“जब मैं था तब गुरु नहीं
अब गुरु हैं हम नाहिं
प्रेम गली अति साँकरी
ता मैं दो न समाँहि “
बेटा प्रेम रस पीने की चाह रखने वाला कभी मान नहीं रख सकता, एक म्यान में दो खड्ग तो साथ साथ रह ही नहीं सकते।
लोई कबीर की सच्ची साथिन थी वह कबीर के कहे को कंठस्थ कर लेती और कमाल को सुनाया करती जिसके आधार पर ही कमाल कबीर के बारे में बहुत कुछ जान पाया और लिपिबद्ध करता गया । जब कबीर ने जाना कि किस तरह लोई कमाल को उनके कहे दोहों और उक्तियों को लिखवा रही है , तब उन्होंने लोई से कहा - " आज मैं मुक्त हो गया आज कोई फांस ना रही “-
“कबीरा हम गुरु रस पिया
बाकी रही न छाक
पाका कलस कुम्हार का
बहुरि न चढसी चाक “
कबीर जो देखते उसी पर कुछ न कुछ कह देते उनका कहना था कि -
“मैं कहता हूँ आँखन देखी
तू कहता कागद की देखी “
मंदिरों में भीड़ देखकर कबीर गा उठे -
“ऐसी दुनिया भई दिवानी
भक्ति भाव नहीं बूझै जी
कोई आवे तो बेटा माँगे
कोई आवे तो दौलत माँगे
कोई करावे ब्याह सगाई
साँचे का कोई गाहक नहीं “
इस पर कुछ लोग कबीर की हत्या की साजिश करने लगे तो वे निडर होकर बोले -
“जा को राखे साइयाँ मारि न सक्कै कोय
बाल न बाँका करि सकै जो जग बैरी होय
आगे कमाल कहते हैं कि मेरे पिता ने जोगियों पर कहा है कि - “ रामा, श्रंगी चमकाने से क्या होता है ? सारे बदन पर भभूत मल लेने से क्या मन का मैल जल जाता है , अगर नंगे रहने से ही योग हो जाता तो काशी के सारे ढोरों को योगी क्यों नहीं कहा जाता ?”
“मन न रँगाए , रँगाए जोगी कपरा
आसन मारि मँदिर में बैठे
नाम छाँडि पूजन लगे पथरा
कनवा फडाय जोगी जटवा
बढौले “
दाढ़ी बढाय जोगी है गैले बकरा “
आगे एक ब्राह्मण द्वारा गुजरती हुई महिलाओं को माला फेरते हुए ताकते देख कबीर बोल पड़े -
“माला फेरत जुग भया
फिरा न मन का फेर
कर का मनका डारि दे
मन का मन का फेर “
एसे ही पिंडदान के लिए लोगों को सिर मुंडवाते देख कबीर कह उठे -
मूँड मुँडाये हरि मिलैं
सब कोई लेओ मुँडाय
बार बार के मूँडते भेड़ न बैकुँठ जाय
कबीर कहते हैं -“भीड़ की भीड़ यह साधुता के नाम पर जो भिखमंगों की जमात चलती है वह क्या दूसरों की मेहनत से कमाए हुए माल को हराम में नहीं खाती उस अन्न का फल ग्रहस्थ भोगते हैं साधु उसे खाकर भगवान को पाते हैं , यह कैसे हो सकता है ? ये सब तो शून्य की आशा में वनखंड जाने वाले भटके हुए लोग हैं यह धर्म के नाम पर मुफ्त खाने वाले अधर्म कर रहे हैं ।”
कमाल कहते हैं कि जब कबीर को गुरु रामानंद ने ठुकराया तो कबीर ने कहा -"क्या राम मेरा नहीं है ।" रामानंद हतप्रभ रह गए और चिंतन में डूब गए । अगले दिन जब कबीर से सामना हुआ तो रामानंद कह उठे -"कबीर मैं अँधा हो गया था सारा ब्रह्मांड राम है यह भेद मनुष्य के बनाए हैं , वही राम तू है , वही गंगा है , राम तो सबका है ।"
कबीर को लगा जैसे वह मुक्त हो गया खुशी खुशी लोई को बताता है तब वह हंसकर कहती है -“मुझे तो तू वैसा ही लग रहा है ब्राह्मण के मना कर देने से तू राम का नहीं रहा और उसके छू देने भर से तू मुक्त हो गया यह क्या बात हुई।”
कबीर गा उठे -
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत
कह कबीर पिउ पाइए
मन ही की परतीत
कमाल कहते हैं - मेरे पिता अद्भुत थे उन्होंने कहा था -
“काल करे सो आज कर
आज करै सो अब्ब ,
पल में परलै होएगी
बहुरि करेगा कब्ब “
कर्तव्य के लिए वे देरी नहीं सह सकते थे पर मैं सचमुच कुछ न कर सका । प्रलय हो ही गई ।
कबीर को चेलों ने डुबा ही दिया , क्योंकि मठ बना , धन आया और मोह ने सत्य को ढँक लिया । पर यदि मैं कुछ नहीं करता तो क्या यह भी ना कहूँ कि मेरा बाप वह ही नहीं था जिसे शून्य-शून्य कहकर सब बखानतें हैं । वे उसे महान कह देते हैं पर उसकी उन बातों को नहीं कहते जो उसका अपना चिंतन थी । वह संस्कृति का पुनर्जागरण था दीन जनता का पहला स्पष्ट स्वस्वर निनाद था पर लोगों ने उसे दबा दिया और उसको शून्यवाद से ढँक दिया ।
रांगेय राघव जी ने कबीर पर गहन अध्ययन किया और उनके कहे हर शब्द को इस पुस्तक में लगभग समाहित किया है। कबीर अद्भुत थे जिन पर लिखने का साहस रांगेय राघव ही कर सकते थे ।
उन्हें शत शत नमन
मधूलिका श्रीवास्तव
परिचय
मेरा परिचय—
मधूलिका श्रीवास्तव
संस्थापक सदस्य व संचालिका
श्री अरविन्दो स्कूल भोपाल
जन्म - 10:5:1959
जन्म स्थान-नागपुर (महाराष्ट्र)
शिक्षा - एम .ए.संस्कृत ( स्वर्ण पदक)
एम. फ़िल.भाषा शास्त्र एवं बी. जे .
पिता:- स्व. श्री हरशरण लाल वर्मा
असिस्टेंट कमिश्नर ,सेंट्रल एक्साइज एवं कस्टम्स
माता:- स्व. श्रीमती कमल वर्मा
पति:- श्री ब्रजमोहन श्रीवास्तव
राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय सचिव
राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी,नई दिल्ली
रचनाएँ -
-अंतर्कथा (उपन्यास)(पुरस्कृत)
-मन की दहलीज़ (लघुकथा संग्रह)(पुरस्कृत)
-दस्तक (कहानी संग्रह)(पुरस्कृत)
-बचपन के संग जीवन के रंग (बाल कहानी संग्रह )पुरस्कृत
-मंत्रमुग्ध जंगल की बाल कहानियाँ व कवितायें
अंतर्मन की गूँज (कहानी संग्रह)
प्रकाशित रचनायें-
लघुकथा गवाक्ष , साझा संकलन (लघुकथा)
क्षितिज और भी हैं साझा संकलन (लघुकथा)
साझा लघुकथा संकलन (2 लघुकथा)
शैशव की गिन्नियाँ , सफ़र सुहाना (साझा संस्मरण संकलन )
सम्मान -
-रत्नावली पुरस्कार 2022
तुलसी साहित्य अकादमी
-कृति पुरस्कार 2023
हिन्दी लेखिका संघ म.प्र.भोपाल
-पुष्पलता जोशी स्मृति राष्ट्रीय बाल कहानी प्रतियोगिता 2021 तृतीय पुरस्कार
-नाटक लेखन में प्रथम स्थान
लेखिका संघ म.प्र. भोपाल 2022
- श्रीमती सुशीलादेवी केशवराम क्षत्रिय स्मृति बाल प्रतियोगिता- 2022 में द्वितीय स्थान
-कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार 2023 हिन्दी लेखिका संघ म.प्र. भोपाल
-विशिष्ट कर्मठता सम्मान 2024
हिन्दी लेखिका संघ म.प्र. भोपाल
-कृति पुरस्कार 2025
बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल म.प्र.
-सीमा अपराजिता अवॉर्ड 2026
गुफ्तगू साहित्य संस्था प्रयागराज उ.प्र.
-गंगा अधिकारी स्मृति बाल साहित्य सम्मान
पिथौरागढ़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड