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मंगलवार, 30 जून 2026

डॉ राकेश चंद्रा बच्चे होते फूल से

पुस्तक समीक्षा  
बच्चे होते फूल से-
मनोज जैन ‘मधुर'  
डाॅ. राकेश चन्द्रा 
“बच्चे होते फूल से" साहित्यकार एवं कवि मनोज जैन ‘मधुर' की प्रथम बाल कविता की पुस्तक है जिसका प्रकाशन वर्ष 2025 में विचार प्रकाशन, ग्वालियर, मध्य प्रदेश द्वारा किया गया है। 104 पृष्ठों की इस पुस्तक में पाँच बाल पहेलियों समेत 42 बाल कविताएँ संगृहीत हैं। पुस्तक का मुखपृष्ठ रंगीन है। पुस्तक के प्रारम्भ में पाँच बाल पहेलियाँ संकलित हैं जो पारंपरिक रूप में अर्थात दो या चार पंक्तियों में न होकर 12-12 पंक्तियों की कविताओं में हैं। पहेलियों में दिये गये स्पष्ट संदेश उन्हें सुलझाने में बाल पाठकों के लिये सहायक सिद्ध होंगे। पुस्तक की पहली कविता “बच्चे होते फूल से" विशेष रूप से आकर्षित करती है। बच्चों की तुलना फूलों से करते हुए कवि ने लिखा है-'बच्चे होते फूल से/आँख दिखाओ मुरझा जाते,/प्यार करो खिल जाते हैं।' शायद बच्चों की तुलना फूलों से करने से बेहतर उपमा का खोजना आसान न होगा। इसीलिये कवि ने कहा है कि इनका मन कोमल होता है और इन्हें भूल से भी डाँटना नहीं चाहिये-',बोल न इनसे ऐसे बोलो,/चुभ जाएँ जो शूल से।'  यह कविता इस संग्रह की सर्वोत्तम कविताओं में से एक है। एक अन्य कविता “सबके मंगल से जीवन में" जहाँ बच्चों को अपने आस-पास हरियाली को सहेजकर रखने का संदेश दिया गया है वहीं दूसरी ओर उनका ध्यान माली काका खट्टर जैसे लोगों के अनथक परि्श्रम व अटूट लगन की ओर भी खींचने का प्रयास किया गया है जिनके दम पर हमारे घर की बगिया और पूरे परिसर में हरियाली का साम्राज्य दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि काका जैसे लोग अब लुप्त प्रजाति के सदस्य बन चुके हैं तथापि उनके कार्यों को प्रत्येक दशा में बढ़ाया जाना आवश्यक है। तभी कवि ने बच्चों का आह्वान किया है जो कल के जागरूक नागरिक बनेंगे। 
   शैशवास्था में बच्चों को गिनती सिखाना भी दुरूह कार्य होता है पर यदि इसे कविता के माध्यम से गा-गाकर बच्चों को सुनाया जाए तो उक्त कार्य कुछ सीमा तक सरल अवश्य हो जाता है। उदाहरण के लिये कविता “मातादीन" दृष्टव्य है-’एक’ गाँव में घर ‘दो'-'तीन'/आकर ठहरे मातादीन। इनने पाले घोड़े ‘चार'/घूम लिया पूरा संसार।' सचमुच, मातादीन का चरित्र-चित्रण करते-करते बच्चों को एक से दस तक की गिनती सिखा दी है कवि ने! पर कवि यहीं पर रुका नहीं है वरन उसने अपनी एक और कविता “गिनती गीत" में फिर से एक से दस तक की गिनती बाल गीत के माध्यम से सिखाने का भरसक प्रयास किया है-'बोल मेरे मुन्ने,/एक दो तीन।/नहीं किसी के हक को छीन।' पर बात यहीं समाप्त नहीं हुई और कवि ने सरस बाल कविता “जादूगर” के माध्यम से बच्चों को पहाड़ा रटाने का भी अनूठा प्रयास किया है। इस कविता में चार के पहाड़े को कुछ इस तरह पढ़ाने का प्रयास कवि ने किया है-'भालू-बन्दर कुत्ता-बिल्ली,/’चार'-नेवले पाले।/’आठ'-कबूतर, ‘बारह'-मुर्गे,/’सोलह'-चूहे काले।' यह सच है कि यदि बच्चों को सरस कविताओं एवं गीतों के माध्यम से कुछ भी सिखाने का प्रयास किया जाए तो वे बहुत शीघ्र ही उसे सीख जाते हैं। इस माध्यम का प्रयोग वर्तमान समय में कई शिक्षण पद्धतियों में किया भी जा रहा है। 
   उनकी एक अन्य कविता “दिल्ली-पुस्तक-मेला' भी अलग कारणों से पठनीय है। इस पुस्तक में एक बाल कविता के माध्यम से कवि ने पुस्तक मेले का जो रूप प्रस्तुत किया है वह किसी से छुपा नहीं है। यह किसी भी संवेदनशील लेखक के लिये कष्टकारी है। इस कविता की अन्तिम पंक्तियाँ विशेष रूप से पठनीय हैं जो सब कुछ व्यक्त कर देती हैं-'आठ सेल्फी दस तस्वीरें,/चला साल भर नाटक।/लगा मुखौटा बिल्ली घूमी,/मिला न ढंग का पाठक।' “हमारा प्यारा भारत देश" व “पाँच लोरी गीत" भी सुन्दर बन पड़े हैं जो बाल मन पर अवश्य ही अपनी छाप छोड़ने में सफल होंगे। उनके द्वारा किया गया "एक बोध कथा का भावानुवाद" भी बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है जो प्रभावी होने के साथ-साथ संदेशपरक भी है। इनके अतिरिक्त भी कई अन्य कविताएँ इस पुस्तक को पठनीय बनाती हैं। 
   इस पुस्तक में अनेक स्थानों पर टंकण त्रुटियाँ हैं जो खटकती हैं। उदाहरणार्थ, “चौंड़े" (मातादीन), “श्वेटर” (जाओ स्वेटर लेकर आओ), “कूँदकर” (मेट्रो पकड़ी चिड़ियाघर की), “कर्पूरी”(दो गज दूरी बहुत जरूरी), “धक्का प्लेट" (“यह डलिया है उड़ने वाली”), “कूँदी”(चूहों के सरदार ने), ‘रांगोली’ (होली)आदि। इसके अतिरिक्त एक कविता “मेरी प्यारी दोस्त गिलहरी" में न तो अल्प विराम का प्रयोग किया गया है और नही पूर्ण विराम का, जबकि इस कविता में इन की आवश्यकता थी। कुछ कविताओं में तथ्यात्मक त्रुटियाँ प्रतीत होती हैं जिन्हें कवि द्वारा स्वयं परीक्षण किया जाना अभीष्ट होगा। उदाहरण के लिये कविता “मेट्रो पकड़ी चिड़ियाघर की" में ट्रेन का नाम ‘वंदे भारत' के स्थान पर ‘बंदे भारत’ लिखा है। इसी प्रकार, कविता “अल्मोड़ा" में अंतिम पंक्तियों में ‘कसौली' अंकित है जबकि अल्मोड़ा का प्रसिद्ध स्थान ‘कौसानी' है। कसौली हिमाचल प्रदेश में अवस्थित है। इनके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर उन शब्दों का प्रयोग किया गया है जो बच्चों के लिये सरलता से ग्राह्य नहीं हैं। उदाहरणार्थ, ‘परिश्रावक' (पाॅली क्लिनिक), ‘पर्याय’ (पलकों पर बैठाओ पापा)। कहीं-कहीं पर अँग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है जबकि उनके समानार्थी शब्द हिन्दी भाषा में उपलब्ध हैं जैसे-'फीवर', ‘वीक', ‘टेबिल’ (पाॅली क्लीनिक), ‘टीचर' (उत्तर देना सच्चे), ‘'रीच', 'केयर' (मैं हूँ बिल्ली चतुर सयानी), ‘प्रमोशन' (दिल्ली पुस्तक मेला) आदि। बाल साहित्यकार के लिये बच्चों में सही भाषा के संस्कार डालने की पहल करना बहुत आवश्यक है। जहाँ उपयुक्त शब्द नहीं हैं वहाँ भी समानार्थी हिन्दी भाषा के शब्द गढ़ना भी समय की आवश्यकता है। 
   पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सभी कविताओं को अत्यंत सरल शब्दों व प्रवहमान शैली में लिखा गया है। गेयता इनका मुख्य आकर्षण है जो बच्चों को सहज ही आकर्षित करता है। विषयों में भी विविधता है। आशा की जा सकती है कि कवि की भविष्य में प्रकाशित होने वाली रचनाएँ भी बच्चों के लिये मनभावन, संदेशपरक व संस्कारों के बीज रोपित करने में सक्षम होंगी।

परिचय
राकेश चन्द्र संक्षिप्त परिचय
नाम: डॉ. राकेश चन्द्र
प्रशासनिक अधिकारी (विशेष सचिव गृह, उत्तर प्रदेश शासन के पद से सेवानिवृत्त)
शिक्षा: एम.ए. (इतिहास), एल.एल.एम., पी.एच.डी. (लॉ), लखनऊ विश्वविद्यालय।