हरिनारायण सिंह हरि के दस प्रतिनिधि नवगीत
[ एक ]
सच्चा कौन,कौन है झूठा
पता नहीं लगता
प्रजातंत्र का तंत्र अनूठा
पता नहीं लगता
राजतंत्र के बीत गये दिन
सेवक के आये
बंदर के कर मिला तराजू
बिल्ली मुँह बाये
किसने कैसे कब क्या लूटा
पता नहीं लगता
पगडंडी अब राजमार्ग बन
इतराती फिरती
नदियाँ नाले में व्याकुल हो
रक्षा को गिरती
किसका भाग्य कहाँ जा फूटा
पता नहीं लगता
गाली दे-दे बढ़ा रहे वे
कुनबे को आगे
संकोची मन रहे हाथ मल
भाग्य नहीं जागे
किस पर कौन कहाँ पर टूटा
पता नहीं लगता
•
[ तीन ]
बच्चे हो!
तुम नहीं जानते
दुनियादारी
सिस्टम से लड़ने चलते हो
भरत तिवारी!
भ्रम रक्खा है पाल
कि हम आजाद हो गये
सत्ता से अब सुलभ
सभी संवाद हो गये
बाहों में श्रम
आँखों में खिलती फुलवारी
भरत तिवारी !
पावन कब उद्देश्य रहे
कब नैतिक राहें
सत्ता के मन कहाँ रहीं
जन की परवाहें
मद में वे तो चूर
बने हाकिम सरकारी
भरत तिवारी!
हस्र वही होगा
होते जो अबतक आया
संविधान-कानून
सभी उनकी है माया
पता नहीं किसकी कब
आ जायेगी बारी
भरत तिवारी!
•
[ चार ]
धनानंद मदहोश तख्त पर, अब चाणक्य जगो
मगध रसातल ओर अग्रसर,अब चाणक्य जगो
छल-छद्मों का जोर-जबर है, हुआ कठिन जीना
कमर प्रजा की टूट रही है , नृप ताने सीना
दबा हुआ है विद्रोही स्वर , अब चाणक्य जगो
नहीं रहा दायित्व-बोध, खुदगर्ज हुआ राजा
भीतर क्रंदन ऊपर से बज रहा शांति-बाजा
ताँक-झाँक कर रहा सिकंदर,अब चाणक्य जगो
चन्द्रगुप्त को खोज निकालो, कहाँ छिपा वह है
कबतक नहीं शिखा बाँधोगे, पीड़ा दुस्सह है
मन के अंदर तपन भयंकर, अब चाणक्य जगो
•
[ पाँच ]
दिनभर समय कटेगा कैसे? बोलो अरे समय!
जड़ अवसाद हटेगा कैसे? बोलो अरे समय!
एकाकीपन काट रहा है ,वय को कुतर-कुतर
ऊँचा मन अब सोच रहा है नीचे उतर-उतर
दृग के सन्मुख अँधियारे की परतें घनी हुईं
कुहरा घना छँटेगा कैसे? बोलो अरे समय!
लाठी का जब काम हुआ तब लाठी चली गयी
अरमानों की दुनिया अक्सर यों ही छली गयी
जर्जर नइया,विकट तरंगें,नाविक विवश खड़ा
साहस सिर्फ डँटेगा कैसे ? बोलो अरे समय!
यह विकास-पथ, दौड़ रहे इसपर मूँदे आँखें
संपाती औंधे मुँह लुढ़का, झुलस गयी पाँखें
दंश समय का बहुत असह है,पीड़ा हुई घनी
बढ़ता दर्द घटेगा कैसे ? बोलो अरे समय !
•
[ छह ]
एक पिता के चार पुत्र हैं
चारों चार शहर में
पिता गाँव में रहता है
लेकिन मन चार शहर में
यही आज की सच्चाई है
यही वंश का बढ़ना
यही वृक्ष-फैलाव गगन तक
यही तुंग पर चढ़ना
गाँव बेचकर शहर आ गये
घर-परिवार शहर में
बीस कोस का वृत्त घुमाकर
जिसको जान रहा था
गली , मुहल्ला, गाँव ,डगर
हर घर पहचान रहा था
वही भीड़ में अनजाना-सा
अब झख मार शहर में
एक शहर में कभी
कभी वे दूजे में आ जाते
और तीसरे-चौथे घुमकर
अपना समय बिताते
मन तो लगा गाँव में रहता
तन लाचार शहर में
ग्रुऽप वीडिओकाॅलिंग करके
यदा-कदा बतिआते
भरापुरा परिवार हमारा
ऊपर से इतराते
छुटे लँगोटिया यार
बने अब शहरी यार शहर में
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[ सात ]
भीड़ बहुत है अफरातफरी,
कठिन राह है
सबसे आगे बढ़ जाने की
मलिन चाह है
नील गगन में बादल
छाना चाह रहे हैं
कौए छल के बल पर
गाना चाह रहे हैं
गोरैया पिट रही,
चील की वाह-वाह है
वट-पीपल ओझल आँखों से,
तने बबूलें
चलो आज हम भी इनका
ज्योनार कबूलें
अनय-विनय का फर्क मिटा
उफ्! बहुत धाह है
दस कविताएँ लिखकर
मंचासीन फकीरा
दृश्य देखकर यह,
दिखता गमगीन कबीरा
चलो यहाँ से सच-सच कहना
अब गुनाह है
•
[ सात ]
कउए अक्सर
हंस-अंश को खा जाते हैं
जो जुगाड़ में माहिर
वे नर छा जाते है
शुक-कोयल
मीठी बोली के रहे भरोसे
चापलूस कउए को
भोजन मिले परोसे
ऊपर वाले को
ऐसे ही भा जाते हैं
बैर-बबूल चढ़े ऊपर,
बट-पीपल नीचे
लोकतंत्र में गुणी पेड़ को
क्योंकर सींचे
गिनती के बल पर
जब सत्ता पा जाते हैं
मौन रहो, देखो तिकड़म
कितने दिन चलते
अधिक समय तक
बिना तेल के दीपक जलते ?
लेकिन ये तो बार-बार
भरमा जाते हैं
•
[ आठ ]
बजे मदारी की डुगडुग्गी
उछल रहा है बंदर
कठपुतली सम नाच रहा वह
सूत्रधार है अंदर
एक इशारे पर चढ़ता है
तापमान ऊपर को
सिंहासन पर बैठा देता
झटके में शूकर को
धनानंद के बदले केवल
राजा बना सिकंदर
रामभरोसे खेल रहा है
परिवर्तन का खेला
जितने छाँटे गये गगन से
तारे, उनका मेला
गोटी अबकी लाल करेगा
बेटा यही धुरंधर
चढ़कर रहना थिर नभ ऊपर
कोई इससे सीखे
उठा-पटक के अपनाने होते
हैं सुघर सलीके
बिलावजह के उठा रहे हो
मित्रो! आज बवंडर !
•
[ नौ ]
मेघ! गगन चढ़ इठलाते हो
इतराते हो !
जनम-जनम का नेह धरा से
झुठलाते हो!
धूल फाँकती गोरइया
मनुहार कर रही
धूप धरा से दुश्मन-सा
व्यवहार कर रही
उतर भूमि पर इनको
क्यों ना समझाते हो!
छाया भी अब हुई अगन-सी
पेड़ों वाली
ताल-तलैया जीवन-रस अब
खोनेवाली
रूठ गयीं ये इन्हें न काहे
दुलराते हो!
आओ, उतरो मेघ!
नेह की बरसा लेकर
रूठ गये मुझसे
वैरी के उकसाने पर
भूखी-प्यासी प्रेयसी से
क्यों कतराते हो
•
[ दस ]
क्यों अँधेरी घाटियों में घूमते हो मन !
तम प्रभाती गा रहा तुम ऊँघते हो मन!
नहीं केवल खार, जीवन में बहुत उज्ज्वल
कंटकों को देख मन! क्यों रो रहे विह्वल
तृप्ति तज परिताप को क्यों चूमते हो मन!
गर नहीं वनवास होता, राम कब होते
राज्य को कंधे चढ़ाकर, जिंदगी ढोते
भूल राघव को दशानन पूजते हो मन !
मन! उबर अवसाद से, पथ गंध का धर लो
जिंदगी के पल बचे जो, रंग से भर लो
पा सकोगे वह जिसे तुम ढूँढ़ते हो मन!
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हरिनारायण सिंह 'हरि' : संक्षिप्त परिचय
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• मूल नाम- हरिनारायण सिंह
• जन्म- 2 जनवरी,1958 ई
• शिक्षा- एम. ए (राजनीति विज्ञान)
• केएसएस काॅलेज,मोहिउद्दीन (समस्तीपुर) के राजनीति विभागाध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त।
•लेखन- हिन्दी व बज्जिका में।
• प्रकाशन- तीन प्रबंधकाव्य, पाँच कविता-संग्रह, 6 गीत-नवगीत संग्रह, एक गजल-संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित। एक कविता संकलन और एक लघुकथा संकलन का सम्पादन। कई पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का संपादन ।
प्रसारण- आकाशवाणी के पटना व दरभंगा तथा दूरदर्शन के पटना व मुजफ्फरपुर केन्द्र से प्रसारण।
• मूल्यांकन-पुस्तक- डाॅ नीरज कुमार सिन्हा द्वारा संपादित मूल्यांकन-पुस्तक 'हरिनारायण सिंह हरि का गीत-काव्य' प्रकाशित।
•पता- हरिद्वार भवन,राजपुर-जौनापुर
पो-जौनापुर,
भाया-मोहिउद्दीन नगर
जिला-समस्तीपुर-848501
मोबाइल नंबर-9771984355
•ई-मेल - hindustanmohanpur@gmail.com
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