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मंगलवार, 30 जून 2026

डॉ राकेश चंद्रा जी की समीक्षा "बच्चे होते फूल से"

पुस्तक समीक्षा  
बच्चे होते फूल से-
मनोज जैन ‘मधुर'  
डाॅ. राकेश चन्द्रा 
“बच्चे होते फूल से" साहित्यकार एवं कवि मनोज जैन ‘मधुर' की प्रथम बाल कविता की पुस्तक है जिसका प्रकाशन वर्ष 2025 में विचार प्रकाशन, ग्वालियर, मध्य प्रदेश द्वारा किया गया है। 104 पृष्ठों की इस पुस्तक में पाँच बाल पहेलियों समेत 42 बाल कविताएँ संगृहीत हैं। पुस्तक का मुखपृष्ठ रंगीन है। पुस्तक के प्रारम्भ में पाँच बाल पहेलियाँ संकलित हैं जो पारंपरिक रूप में अर्थात दो या चार पंक्तियों में न होकर 12-12 पंक्तियों की कविताओं में हैं। पहेलियों में दिये गये स्पष्ट संदेश उन्हें सुलझाने में बाल पाठकों के लिये सहायक सिद्ध होंगे। पुस्तक की पहली कविता “बच्चे होते फूल से" विशेष रूप से आकर्षित करती है। बच्चों की तुलना फूलों से करते हुए कवि ने लिखा है-'बच्चे होते फूल से/आँख दिखाओ मुरझा जाते,/प्यार करो खिल जाते हैं।' शायद बच्चों की तुलना फूलों से करने से बेहतर उपमा का खोजना आसान न होगा। इसीलिये कवि ने कहा है कि इनका मन कोमल होता है और इन्हें भूल से भी डाँटना नहीं चाहिये-',बोल न इनसे ऐसे बोलो,/चुभ जाएँ जो शूल से।'  यह कविता इस संग्रह की सर्वोत्तम कविताओं में से एक है। एक अन्य कविता “सबके मंगल से जीवन में" जहाँ बच्चों को अपने आस-पास हरियाली को सहेजकर रखने का संदेश दिया गया है वहीं दूसरी ओर उनका ध्यान माली काका खट्टर जैसे लोगों के अनथक परि्श्रम व अटूट लगन की ओर भी खींचने का प्रयास किया गया है जिनके दम पर हमारे घर की बगिया और पूरे परिसर में हरियाली का साम्राज्य दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि काका जैसे लोग अब लुप्त प्रजाति के सदस्य बन चुके हैं तथापि उनके कार्यों को प्रत्येक दशा में बढ़ाया जाना आवश्यक है। तभी कवि ने बच्चों का आह्वान किया है जो कल के जागरूक नागरिक बनेंगे। 
   शैशवास्था में बच्चों को गिनती सिखाना भी दुरूह कार्य होता है पर यदि इसे कविता के माध्यम से गा-गाकर बच्चों को सुनाया जाए तो उक्त कार्य कुछ सीमा तक सरल अवश्य हो जाता है। उदाहरण के लिये कविता “मातादीन" दृष्टव्य है-’एक’ गाँव में घर ‘दो'-'तीन'/आकर ठहरे मातादीन। इनने पाले घोड़े ‘चार'/घूम लिया पूरा संसार।' सचमुच, मातादीन का चरित्र-चित्रण करते-करते बच्चों को एक से दस तक की गिनती सिखा दी है कवि ने! पर कवि यहीं पर रुका नहीं है वरन उसने अपनी एक और कविता “गिनती गीत" में फिर से एक से दस तक की गिनती बाल गीत के माध्यम से सिखाने का भरसक प्रयास किया है-'बोल मेरे मुन्ने,/एक दो तीन।/नहीं किसी के हक को छीन।' पर बात यहीं समाप्त नहीं हुई और कवि ने सरस बाल कविता “जादूगर” के माध्यम से बच्चों को पहाड़ा रटाने का भी अनूठा प्रयास किया है। इस कविता में चार के पहाड़े को कुछ इस तरह पढ़ाने का प्रयास कवि ने किया है-'भालू-बन्दर कुत्ता-बिल्ली,/’चार'-नेवले पाले।/’आठ'-कबूतर, ‘बारह'-मुर्गे,/’सोलह'-चूहे काले।' यह सच है कि यदि बच्चों को सरस कविताओं एवं गीतों के माध्यम से कुछ भी सिखाने का प्रयास किया जाए तो वे बहुत शीघ्र ही उसे सीख जाते हैं। इस माध्यम का प्रयोग वर्तमान समय में कई शिक्षण पद्धतियों में किया भी जा रहा है। 
   उनकी एक अन्य कविता “दिल्ली-पुस्तक-मेला' भी अलग कारणों से पठनीय है। इस पुस्तक में एक बाल कविता के माध्यम से कवि ने पुस्तक मेले का जो रूप प्रस्तुत किया है वह किसी से छुपा नहीं है। यह किसी भी संवेदनशील लेखक के लिये कष्टकारी है। इस कविता की अन्तिम पंक्तियाँ विशेष रूप से पठनीय हैं जो सब कुछ व्यक्त कर देती हैं-'आठ सेल्फी दस तस्वीरें,/चला साल भर नाटक।/लगा मुखौटा बिल्ली घूमी,/मिला न ढंग का पाठक।' “हमारा प्यारा भारत देश" व “पाँच लोरी गीत" भी सुन्दर बन पड़े हैं जो बाल मन पर अवश्य ही अपनी छाप छोड़ने में सफल होंगे। उनके द्वारा किया गया "एक बोध कथा का भावानुवाद" भी बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है जो प्रभावी होने के साथ-साथ संदेशपरक भी है। इनके अतिरिक्त भी कई अन्य कविताएँ इस पुस्तक को पठनीय बनाती हैं। 
   इस पुस्तक में अनेक स्थानों पर टंकण त्रुटियाँ हैं जो खटकती हैं। उदाहरणार्थ, “चौंड़े" (मातादीन), “श्वेटर” (जाओ स्वेटर लेकर आओ), “कूँदकर” (मेट्रो पकड़ी चिड़ियाघर की), “कर्पूरी”(दो गज दूरी बहुत जरूरी), “धक्का प्लेट" (“यह डलिया है उड़ने वाली”), “कूँदी”(चूहों के सरदार ने), ‘रांगोली’ (होली)आदि। इसके अतिरिक्त एक कविता “मेरी प्यारी दोस्त गिलहरी" में न तो अल्प विराम का प्रयोग किया गया है और नही पूर्ण विराम का, जबकि इस कविता में इन की आवश्यकता थी। कुछ कविताओं में तथ्यात्मक त्रुटियाँ प्रतीत होती हैं जिन्हें कवि द्वारा स्वयं परीक्षण किया जाना अभीष्ट होगा। उदाहरण के लिये कविता “मेट्रो पकड़ी चिड़ियाघर की" में ट्रेन का नाम ‘वंदे भारत' के स्थान पर ‘बंदे भारत’ लिखा है। इसी प्रकार, कविता “अल्मोड़ा" में अंतिम पंक्तियों में ‘कसौली' अंकित है जबकि अल्मोड़ा का प्रसिद्ध स्थान ‘कौसानी' है। कसौली हिमाचल प्रदेश में अवस्थित है। इनके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर उन शब्दों का प्रयोग किया गया है जो बच्चों के लिये सरलता से ग्राह्य नहीं हैं। उदाहरणार्थ, ‘परिश्रावक' (पाॅली क्लिनिक), ‘पर्याय’ (पलकों पर बैठाओ पापा)। कहीं-कहीं पर अँग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है जबकि उनके समानार्थी शब्द हिन्दी भाषा में उपलब्ध हैं जैसे-'फीवर', ‘वीक', ‘टेबिल’ (पाॅली क्लीनिक), ‘टीचर' (उत्तर देना सच्चे), ‘'रीच', 'केयर' (मैं हूँ बिल्ली चतुर सयानी), ‘प्रमोशन' (दिल्ली पुस्तक मेला) आदि। बाल साहित्यकार के लिये बच्चों में सही भाषा के संस्कार डालने की पहल करना बहुत आवश्यक है। जहाँ उपयुक्त शब्द नहीं हैं वहाँ भी समानार्थी हिन्दी भाषा के शब्द गढ़ना भी समय की आवश्यकता है। 
   पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सभी कविताओं को अत्यंत सरल शब्दों व प्रवहमान शैली में लिखा गया है। गेयता इनका मुख्य आकर्षण है जो बच्चों को सहज ही आकर्षित करता है। विषयों में भी विविधता है। आशा की जा सकती है कि कवि की भविष्य में प्रकाशित होने वाली रचनाएँ भी बच्चों के लिये मनभावन, संदेशपरक व संस्कारों के बीज रोपित करने में सक्षम होंगी।

परिचय
राकेश चन्द्र संक्षिप्त परिचय
नाम: डॉ. राकेश चन्द्र
प्रशासनिक अधिकारी (विशेष सचिव गृह, उत्तर प्रदेश शासन के पद से सेवानिवृत्त)
शिक्षा: एम.ए. (इतिहास), एल.एल.एम., पी.एच.डी. (लॉ), लखनऊ विश्वविद्यालय।



संस्मरण आलेख

आज हिंदी के जन कवि नागार्जुन का जन्मदिन है. ( ज्येष्ठ पूर्णिमा ) उनकी स्मृति में यह आलेख प्रस्तुत है 

 जनकवि नागार्जुन का आभामण्डल 
   स्वप्निल श्रीवास्तव 

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 हिन्दी में राष्ट्रकवि भी  हुए है लेकिन नागार्जुन की ख्याति जनकवि के रूप में बनी रही | उन्हें किसी संस्था –प्रतिष्ठान ने इस पद से उन्हें विभूषित नही किया था | जनता के कवि का ताज जनता ने उन्हें पहनाया था |  हिन्दी में जो  भी राष्ट्रकवि हुये है वे सत्ता के करीब थे | इस श्रेणी में मैथिली शरण गुप्त और रामधारी सिंह का नाम लिया जाता है | इन दोनों कवियों के काव्य विवेक पर किसी तरह संदेह नही है , उन्होंने हिन्दी कविता में अपूर्व योगदान दिया | कौन मैथिली शरण गुप्त की कृति साकेत और भरत भारती को भूल सकता है ? दिनकर ने ओजपूर्ण कवितायें लिखी है ,उनकी कविताओं को सम्मान के साथ याद किया जाता है | दिनकर राष्ट्रवादी कवि थे ,उनकी प्रमुख पुस्तक ,कुरुक्षेत्र ,रश्मिरथी और उर्वशी थी ,इसके अतिरिक्त उन्होंने गद्य में संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक लिखी है | वे मूलत : वीर रस के कवि थे | इन दोनों कवियों के काव्य भूमि सांस्कृतिक थी  ,इसलिये वे देश में बहुत लोकप्रिय हुये | वे बड़े पदों पर आसीन रहे , उन्हें सरकार ने पद्मभूषण से विभूषित किया |उन्हें जीवन में किसी तरह के अभाव का सामना नही करना पड़ा | इन दोनों राष्ट्रकवियों की कविता में जीवन और समाज के तत्व थे लेकिन वे व्यवस्था के आलोचक नही थे |

 नागार्जुन की प्रकृति ठीक इससे उलट थी.जीवन भर उन्होंने सत्ता का विरोध किया |  उनको  जो हासिल होना चाहिए ,उससे भी वे वंचित रहे था वह भी नही मिला | उन्हें हिन्दी में नही मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ पर साहित्य अकादमी मिला | उनके समकालीन शमशेर और त्रिलोचन ,केदारनाथ अग्रवाल को इस सम्मान से नवाजा गया था , लेकिन जनता ने उन्हें जनकवि की उपाधि से अलंकृत किया और अपने समय के कवियों से ज्यादा लोकप्रिय हुये | उनकी कविताएं जनता कि जुबान पर हैं | जन कवि के लिये जिस यातना का वरण करना पड़ता है ,वह उन्होंने जीवन भर किया ,अभाव का जीवन जीते हुये अपने कवि कर्म के प्रति समर्पित रहे | वे जनता के बीच रहे और उनकी भाषा में लिखते रहे | उन्होंने जो कुछ लिखा और कहा , वह निडर होकर कहा | वे खुद कहते हैं –
  जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊ 
  जनकवि हूँ साफ कहूँगा क्या हकलाऊ 
  उनके काव्य लोक से गुजर जाइये उसमें किसी तरह की हकलाहट नही मिलेगी ,सब कुछ उन्होंने साफ गोई के साथ लिखा है और अपने स्टैंड पर कायम रहे | जो भी सता आयी उसकी आलोचना की , वे उनके व्यंग – बाण के निशाने पर रहे |     

   वे कैसे वैद्य नाथ मिश्र से यात्री और यात्री से नागार्जुन बने | इसकी कथा रोचक होने के साथ दारुण है | नागार्जुन 11 जून 1911 को पैदा हुये , उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माँ का नाम उमादेवी था | उनके जन्म के पहले तीन भाई असमय काल –कवलित हो चुके थे |  यह परिवार के लिये चिंताजनक स्थिति थी |उनके लिये वैद्यनाथ धाम ( देवघर ) में उनके लिये मनौती मानी गयी और उनका जन्म हुआ ,उनके बचपन का नाम ठक्कन था | उनका पैतृक  गाँव तरैनी था उस समय के दरभंगा जनपद का भाग था लेकिन जन्मस्थान सतलखा था जो उनका ननिहाल था | यहाँ यह याद किया जाना चाहिये कि राहुल जी का जन्म उनके पैतृक गाव कनैला में नही उनके ननिहाल पंदहा आजमगढ़ मे हुआ था | उन दिनों यह परंपरा थी कि संतान का जन्म ननिहाल में हो | कभी कभी साम्यता अचरज में डाल देती है | ये  दोनों लेखक बौद्ध धर्म के समर्थक थे अत: कालांतर में अपना मूल नाम त्याग कर क्रमश : राहुल और नागार्जुन हुये  | राजकुमार गौतम का जन्म उनके ननिहाल देवदह मे होना था लेकिन उनका जनस्थान लुम्बिनी बना |  क्या पता था कि आगे चलकर ये दोनों कवि बौद्ध धर्म के पथिक बनेगे | मनुष्य अपने जन्म के बाद जगह जगह भटकता है , कोई रोजी की खोज में कोई अपनी महत्वाकांक्षाओ की पूर्ति के लिए अनेकों युगत करता है |

 नागार्जुन का जीवन आसान नही था , उनके पिता उत्तराधिकार में तीन कट्ठा जमीन छोड़ कर गये थे | इस  विरासत से जीवन नही चल सकता था इसलियें  उन्हें अपने जीवन यापन के लिये संघर्ष करना पड़ा | यहीं संघर्ष उनकी मूल पूंजी थी ,जिससे उनकी रचनात्मकता  को शब्द मिल रहे थे | अगर वे सम्पन्न परिवार में पैदा हुये होते तो उनके जीवन की दिशा अलग होती तब संभवत : वे बड़े कवि नही बन पाते | उन्हें संस्कृत विद्यालय में संस्कृत की प्रारम्भिक शिक्षा मिली लेकिन उनके जीवन में बदलाव तब आया जब वे लंका पहुंचे और वहाँ बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और बौद्ध धर्म को स्वीकार किया | उनका नामकरण संस्कार हुआ और उन्हें नागार्जुन नाम दिया गया | इसके पूर्व में भी नागार्जुन हुये हैं जो बौद्ध दर्शन के दार्शनिक थे ,उन्होंने शून्यवाद की स्थापना की | जिसका मुख्य आशय यह था कि कोई भी बस्तु स्वतंत्र नही होती ,उसका निर्धारण वस्तुओं के आपसी संबंधों से  होता है ,उन्होनें मध्यमार्ग पर बल दिया | 

  यात्री नाम से नागार्जुन नाम की यात्रा तक उनकी जीवन यात्रा विभिन्न पड़ावों से होकर गयी | इस तरह हिन्दी कविता में नागार्जुन का नाम स्थापित हो गया | नागार्जुन का लेखन केवल लिखने तक सीमित नही था ,उसके कई आयाम थे | उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था , वे किसान आंदोलन में शामिल हुये | उन्हें जेल की सजा मिली | जीवन की इन घटनाओं नें उनके लेखन को सजग और समृद्ध किया | इस तरह वे क्रांतिधर्मी कवि के रूप में ख्यात हुये | वे निरंतर जन आंदोलनों में भाग लेते रहे और जनता के साथ जुड़े रहे |  आजादी के बाद बहुत से लेखकों ने सत्ता के पास अपनी जगह बना ली थी लेकिन वे सत्ता के विरुद्ध रहे ,उन्हे इसका खामियाजा उठाना पड़ा था | उनका परिवार क्षत –विक्षत होता गया ,उन्होनें परिवार की परिवार की प्रवाह नही की | वे घुमंतू कवि बने रहे ,उन्होंने राहुल के साथ तिब्बत की यात्रा की और देश के सुदूर क्षेत्रों में विचरण करते रहे | उनका सतत जनता से जुड़े रहे | उनका रहन –सहन मामूली था , वे देखने में जनता के प्रतिनिधि लगते थे | अपने जीवन के अंतिम दिनों तक उनकी यह भूमिका बनी रही | आपात कल में जे पी आंदोलन में उनकी भागीदारी थी , वे बिहार के चौराहों और नुक्कड़ों पर कविता पाठ करते रहे | लेकिन जब उन्हें लगा कि यह सचमुच का जन आंदोलन नही है तो वे उससे अलग हो गये | वे अपने शर्तों और प्रतिबद्धता के साथ अपने लेखन कर्म का निर्वाह किया |

     ***
 लंबे संघर्ष के बाद आजादी मिली लेकिन आजादी के पहले धर्म के आधार पर देश का विभाजन हुआ ,हिंदुस्तान का एक हिस्सा पाकिस्तान बना | इस त्रासदी की तस्वीरे इतिहास और साहित्य में दर्ज हैं ,इस प्रकरण को बहुत दुख से साथ किया जाता रहा | हिन्दू मुसलमान को केंद्र में रख कर राजनीति की जाती रही ,इससे देश का काफी नुकसान हुआ | आज यह राजनीति काफी मुखर हो गयी है ,इस मुद्दे से देश के मुख्य मुद्दे बहस से बाहर होते रहे | 15 अगस्त 1947 देश की आजादी की तारीख थी | 26 जनवरी 1950 को देश का सविधान बना | यह अद्भुत संविधान था जिसमें हर नागरिक को बराबर का दर्जा दिया गया , उसमें धर्म के आधार पर कोई विभेद नही किया गया था | इसमें धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की गयी थी ,जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे , वे राजनेता के साथ प्रख्यात लेखक थे , उन्होंने भारत की खोज , विश्व इतिहास की झलक , पुत्री के नाम पिता का पत्र जैसी मशहूर किताबें लिखी | नेहरू ने देश में अनेक संस्थाएं और उद्योगों की स्थापना की थी ,इसके लिये उन्हें श्रेय दिया जाता रहा है | देश के विकास को लेकर उनकी गांधी जी से मतभेद थे | गांधी चाहते थे कि देश में कुटीर उद्योगों का भी विकास हो ताकि शहर और गाँव की साथ – साथ उन्नति हो सके | इसी बीच गांधी की हत्या कर दी गयी ,30 जनवरी 1948 इतिहास की रक्तरंजित तिथि थी | यह हत्या चरमवादी हिन्दू ने की थी |

  जैसे देश में सत्ता की स्थापना हुई ,देश के अनेक लेखकों और कवियों को इस सत्ता का सान्निध्य मिला लेकिन नागार्जुन सत्ता के दूसरी तरफ थे , उन्होंने अपनी कविता में सत्ता की आलोचना की < वे आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के विरुद्ध रहे और जब देश आजाद हुआ तो व्यवस्था के खिलाफ रहे | उनके इस रूप को देखना हो ,उनका कविता संग्रह –खिचड़ी विप्लव देखा हमने को पढा जा सकता है | नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के शासन काल में उन्होंने उनके विरुद्ध कविताएं लिखी | उनकी यह कविता देखे –
  आओ रानी कम ढोएगे पालकी 
 यही हुई है राय जवाहर लाल की 
रफ़ू करेगे फटे –पुराने जाल की 
यही हुई है राय जवाहर लाल की 
आओ रानी हम ढोएगे पालकी | 

  यह कविता उस समय लिखी गयी थी  जब इंग्लैंड की महारानी क्वीन एलिजाबेथ का हिंदुस्तान में आगमन हुआ था | धीरे - धीरे उनकी कविताओं का स्वर तल्ख होता गया  | उन्होंने देश के राजनीतिक हाल पर कविताएं लिखी है | जैसा हम जानते है कि आजादी के बाद देश की राजनीति बदलने लगी ,संवित सरकारों की शुरुवात हो गयी थी | राजनेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए दल बदलने लगे थे ,देश के प्रति उनकी निष्ठा संदिग्ध होने लगी थी  | राजनेताओं ने आजादी की जंग में जो मूल्य अर्जित किये थे , वे टूट रहे थे | गांधी का दर्शन अप्रसंगिक हो रहा था , 1969  में लिखी उनकी कविता का अंश देखे –

 बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर गांधी के 
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के |
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के 
दानी निकले ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के |
जल थल गगन विहारी निकले तीनों बंदर बापू के 
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के |
< सेठों के हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के 
 युग के प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के |

  यह लंबी कविता है जिसमें उन्होंने राजनीति के बदलाव की आलोचना की थी | समय के साथ जिस तरह से राजनीति की संस्कृति बदल रही थी ,उसे इस कविता में स्पष्ट दिखाई देता है | जैसे जैसे आजादी का पहिया बढ् रहा था ,उसके नीचे मूल्य रौदे जा रहे थे | नागार्जुन ने नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के कार्यकाल के राजनीतिक कदाचार का वर्णन उनकी कविता में मिलते हैं | आगे चल कर  चुनाव में टिकट बटवारे का खेल भी बदल गया था ,जो वास्तव में हकदार थे उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था | राजनीति में ऐसे लोग सम्मिलित हो रहे थे जिनका देश के प्रति कोई निष्ठा नही थी | राजनीति उनके लिये राष्ट्र की सेवा नही ,एक व्यवसाय बन रहा था | टिकट के बटवारे की प्राथमिकता बदल रही थी | यह स्थिति इंदिरा काल में ज्यादा मुखर रूप में सामने थी | उनकी कविता आये दिन बाहर के – में इस दृश्य को देखा जा सकता है –
 श्वेत श्याम रतनार अँखियाँ निहार के 
सिंडकेटी प्रभुओं की पद धूर झार के |
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के 
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के |
आये दिन बहार के !

  इस कविता को पढ़कर पाठक  जान सकते है कि यह कविता इंदिरा गांधी के शासन काल में लिखी गयी थी –जब कांग्रेस का इंडीकेट और सिंडीकेट में विभाजन हुआ था | नागार्जुन  प्रचलित लोक –रूप में कविताएं  लिख रहे थे ताकि वह पाठकों तक आसानी से पहुँच सके | नागार्जुन हिन्दी के अकेले कवि हैं जिन्होंने राजनीति को कविता का विषय बनाया है | अगर कोई नेहरू और इंदिरा गांधी के समय के राजनीतिक घटनाओं का विवरण चाहता हो तो नागार्जुन की कविताएं जरूर पढ़नी चाहिए | यह हिम्मत हिन्दी के कम  कवियों के पास है , लोग इस तरह की कविताओं लिखने से बचते है | नागार्जुन के बाद इस तरह की कविताएं लिखने की रवायत खत्म हो गयी है । कोई लिखने का खतरा नही उठाता  लेखक बच बच लिखते है ,मुझे धूमिल की कविता पटकथा के अंश याद आ गयी  उन्होंने लिखा है –
  एक पूंजी वादी दिमाग है / जो परिवर्तन तो चाहता है / मगर आहिस्ता – आहिस्ता / कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बची रहे / कुछ इस तरह की काँख भी ढँकी रहे  / और विरोध में उठे हुये हाथ की / मुट्ठी भी तनी रहे |
   यहाँ दाग देहलवी  के  शेर को याद करे जिसकी पंक्ति है ,खूब पर्दा है चिलमन से लगे बैठे हैं / साफ छुपते भी नही सामने आते भी नही | 
   नागार्जुन की कविता में कोई परदेदारी नही थी | उन्होंने आपातकाल के विरोध में कविताएं लिखी और इंदिरा गांधी को केंद्र में रखकर उन्होंने लिखा –
  क्या हुआ आपको ? /
 क्या हुआ आपको ? 
  सत्ता की मस्ती में 
 भूल गयी बाप को ?
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
बेटे को तार दिया बोर दिया बाप को 

   इस तरह उनके संग्रह  में अनेक कविताएं सहज मिल जाएगी | इस कविता के साथ मेरी भी स्मृति जुड़ी हुई है | वे कहने पर कविताएं नही  सुनाते थे , यह सब उनके मूड पर निर्भर करता था | हापुड़ प्रवास में उनके साथ हम लोग घूमने गये तो एक चौराहे पर रुक कर अपनी यह कविता नाच नाच कर सुनाने लगे | थोड़ी देर में उनके आसपास भीड़ इकट्ठा हो गयी | यह था उनकी कविता का प्रभाव , वह कहते थे कि कवियों को छंद  कविताएं जरूर लिखनी चाहिये | मुझे भी लगा कि जिस समाज में छंदहीन  कविताएं स्वीकृत नही है अत : कवि को छंद की ओर लौटना चाहिये | छटे –सातवे दशक में कवियों के गीत बहुत लोकप्रिय थे , वे कवि सम्मेलनों के मंचों पर खूब सुने जाते थे | उस समय बच्चन , शिवमंगल सिंह सुमन ,शंभु नाथ सिंह प्रमुख  कवि थे , वे मंचों पर नही हिन्दी की मुख्यधारा में भी शामिल थे | अब यह समीकरण टूट गया था ,साहित्य और कवि मंच अलग हो गया है | मंच व्यवसायिक हो गये है ,उनके भीतर से कवित्व गायब हो चुका है नागार्जुन की कविता कवियों के लिये पाठशाला है | उनके यहाँ कविता के अनेक रूप हैं |

  उदाहरण के लिये उनकी लंबी कविता नेवला है , यह कविता उन्होंने जेल में लिखी थी | नेवले का नाम मोतिया था ,इस कविता में उसके कौतुक का वर्णन करते हैं | दो भुने हुए भुटठे , नीम की दो टहनियाँ या सूअर , कटहल कविता का विषय हो सकती है | ऐसा तभी संभव होता है जब कवि अनुभव सम्पन्न हो | नागार्जुन घुमंतू कवि थे देश के विभिन्न इलाकों में घूमते रहते थे | जीवन की छोटी – छोटी घटनाओं पर उनकी नजर होती थी | नागार्जुन अभिजात के कवि नही थे , वे जनता और संघर्षरत मजदूरों के कवि थे | उनके पास उनके चित्रण के लिये समर्थ भाषा थी | उनकी कविता खुरदुरे  पैर और घिन नही आती है ? घिन तो नही आती ? कविता की इन पंक्तियों को पढे –
  पूरी स्पीड में है ट्राम / खाती है दचके पर दचका /सटता है बदन से बदन /पसीने  से लथपथ 
  छूती है निगाहों को /कत्थई दांतों की मोती मुस्कान /बेतरतीब मूँछों की थिरकन / सच सच बतलाओं 
  घिन तो नही आती ? जी तो नही चिढ़ता 
   यह कविता भद्र जनों पर व्यंग की कविता है | यह पंक्ति – घिन तो नही आती / जी तो नही चिढ़ता ,उपेक्षितों के प्रति उनकी उनकी प्रतिबद्धता को दिखाती है | उनकी आँख उन दृश्यों पर जाती है जो कवियों की दृष्टि से छूट जाती है | यहाँ उनकी लंबी कविता – हरिजन गाथा की चर्चा कर ली जाए जो उनकी जरूरी कविता है | बिहार के बेल्छी कांड में कई हरिजनों की हत्या हुई थी , यह कविता इस दुर्घटना पर आधारित है | कुछ पंक्तियाँ –
  ऐसा तो कभी नही हुआ था कि / एक नही , दो नहीं / तीन नहीं / तेरह के तेरह अभागे –
 अकिंचन मनुपुत्र / जिंदा झोक दिये गये हो / प्रचंड अग्नि के बिकरल लपटों में 
 साधन सम्पन्न ऊंची जातिवाले / सौ सौ मनपुत्रों द्वारा | 
   देश की आजादी के बाद  दलितों के साथ बहुत से अत्याचार हुये है , इसे शमन करने के बजाय उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है | इन दिनों यह प्रवृति बहुत तेज हो गयी है | किसी घटना को धर्म और जाति के आधार पर देखा जाता है ,उसे स्वतंत्र रूप से नही देखा जाता है | यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दलितों को जगह दी और उन्हें कथा –वस्तु बनाया | नागार्जुन की कविता की दुनिया में इस रूप को देख सकते हैं 
  नागार्जुन क्रातिकारी चेतना के कवि है ,उनकी यह अभिव्यक्ति उनकी कविताओं में देखी जा सकती है | क्रांति उनके लिये वायवी नही है , वे उसमें शामिल भी होते हैं  | जैसा पूर्व में बताया गया है कि वे स्वतंत्रता संग्राम में नही , जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में भी सम्मिलित हुये थे | जहां भी अनाचार होता है ,उसके विरुद्ध वे आवाज उठाते है | उनकी कविता भोजपुर  में उनकी आवाज को देखे –
  यही धुआँ मैं ढूंढ रहा था / यही आग मैं खोज रहा था /यही गंध थी मुझे चाहिये 
  बारूदी छर्रों की खुशबू ! / ठहरो ठहरो इन नथनों में भर लूँ / बारूदी छर्रों की खुशबू |  
    क्रांतिकारी कवि के भीतर भी कोमल भाव होते है , उनके भीतर प्रेम उपस्थित  रहता है | वे घर से हमेशा दूर रहे लेकिन घर उनके साथ चलता था < इस संबंध में उनकी दो कविताओं का संदर्भ दिया जा सकता है –पहली कविता का नाम है – सिंदूर तिलकित भाल ,इस कविता की कुछ मार्मिक पंक्तियाँ देखे -
  घोर निर्जन में परिस्थिति में दिया है डाल ! /याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल 
  कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिये नही समाज / कौन है वह एक जिसको नही पड़ता एक दूसरे से काज / 
 ,, तभी तो याद आती हो प्राण 
   हो गया हूँ मैं नही पाषाण | 
    क्या इस कविता को कवि की आत्मस्वीकृति मानी जाय ? देश और साहित्य की सेवा करते हुये जीवन में बहुत सी जगहें छूट जाती हैं इसे समाज नही जान पाता | इस बिडम्बना का सबसे पहले परिवार शिकार होता है | कठोर पहाड़ों से प्रपात झरते हैं | उनकी दूसरी कविता है कालिदास –
 कालिदास ,सच - सच बतलाना ! / इंदुमती के मृत्यु शोक से / अज रोया था या तुम रोये थे ?
 कालिदास , सच –सच बतलाना ,,,/ अमल –धवल गिरि के शिखरों पर / प्रियवर ,तुम कब सोये थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे ? कालिदास , सच – सच बतलाना ? 
  इस कविता को पढ़ते हुये लगता है कि नागार्जुन कालिदास की वेदना के साथ है | किसी अन्य पर कविताएँ लिखते हुए कवि स्वयं : को भी अभिव्यक्त करता है | कालिदास बादल को माध्यम बना कर अपनी दारुण प्रेम कथा को याद करते हैं | कवि के लिये प्रकृति में  तमाम उपदान हैं जिसका प्रयोग कवि अपनी कविता में करता है ,उसकी आभा हर जगह हर बस्तु में मौजूद है | यही कवि के अनुभव की व्यापकता है | उन्होंने अपने कवि मित्रों पर कविता लिखी है लेकिन राजकमल चौधरी पर लिखी उनकी कविता –अच्छा किया ,उठ गये हो दुष्ट , लंबी कविता है | यह कविता राजकमल के जीवन चरित्र को बताती है , वे मूल रूप से अराजक चरित्र के थे | उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं | उनका पुकारने का नाम फूल बाबू था |इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं –
  लेकिन तुम तो बीच में ही / दगा दे गये हो दुष्ट ! / अच्छा किया ,उठ गये हो दुष्ट ! 
  खूब रहा ,, ! / पा गये हो छुटकारा भवसागर के थपेड़ों से ! अपन तो भाई थेथर हैं 
 निर्लज्ज , बेहया , कठजीव / मरेगे नही जल्दी | 

  नागार्जुन की भाषा का क्षेत्र विस्तृत है , उनकी मूल भूमि मिथिला है | इसके अलावा वे संस्कृत और बांग्ला के भी जानकर है | उनकी भाषा कें अनेक भाषा के शब्द आते हैं | वह जनता की भाषा में लिखते है | उन्हें पढ़ते हुये कबीर की याद आती है ,कबीर की भाषा को खिचड़ी भाषा कहा जाता है | नामवर सिंह नें उन्हें आधुनिक कबीर कहा था | हजारी प्रसाद दिवेदी  ने कबीर को नये रूप में प्रस्तुत किया था ,उनका कथन है कि नागार्जुन भाषा के डिक्टेटर थे , वे जैसा चाहते थे भाषा से कहलवा देते थे “
  कहा जाए कि नागार्जुन ने  भाषा को सिद्ध कर लिया था | उनकी भाषा में व्यंग था , वे किसी को माफ नही करते थे | उन्हें पढ़ते हुये मुझे अक्सर हरिशंकर परसाई की याद आती है | जिस तरह परसाई जी अपने आप पर व्यंग करते थे ,उसी तरह नागार्जुन भी खुद पर व्यंग बाण चलाते थे | उनके निशाने पर सत्ता और सत्ताधीश अक्सर आते रहते थे | उनकी विचारधारा स्पष्ट थी , वे जनता के पक्षधर थे | कभी कभी लगता है कि उनकी कविता मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध की कविताओं का तर्जुमा है | मुक्तिबोध ने  जनता का पक्ष चुना था लेकिन वे जनता में लोकप्रिय कवि नही थे | नागार्जुन की कविता को जनता में स्वीकृति मिल चुकी है  |इसका मूल कारण यह है कि वे सतत जनता के बीच रहते थे ,उन्ही की भाषा में कविता लिखते हैं  | किसी कवि का महत्व इस बात में है कि वह वर्तमान समय में कितना प्रसंगिक है , इसी बात को ध्यान में रखकर उसका  मूल्यांकन होता है | इस पंक्ति में वे कबीर ,निराला ,मुक्तिबोध के साथ शामिल हैं |  उन्हें इसलिये याद किया जाता है कि उनके पास सत्ता के विरुद्ध लिखने का साहस था , वह आज के समय में किसी कवि के पास नही है | 

  नागार्जुन के जीवन का कथानक उपन्यास की तरह है ,उसमें कई मोड़ ,रहस्य रोमांच ,पल पल संघर्ष है | एक बार मैनें उनके बड़े बेटे शोभाकांत जी से कहा कि आपको गर्व होना चाहिये कि नागार्जुन जैसे बड़े कवि के बेटे है | इस बात के जबाब में उन्होंने कहा कि पूरे परिवार ने इसकी कीमत चुकायी है | मुझे याद आया कि बड़े लोगों के बेटों को जीवन में बहुत यंत्रणाएं सहनी पड़ती हैं | मुझे विश्व प्रसिद्ध लेखक हेमिग्वे के बेटे ग्रेगरी हेमिग्वे की अपने पिता पर लिखी किताब पापा की याद आ गयी जिसमें हेमिग्वे के जीवन के संघर्ष ,मानसिक उद्वेलन और परिवार के क्षत –विक्षत होने की कथा है | 
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सोमवार, 29 जून 2026

मधूलिका श्रीवास्तव जी का आलेख


आज कबीर जयंती के अवसर पर उन्हें प्रणाम करते हुए मेरा एक लेख—

रांगेय राघव और कबीर के साहित्य में ज्ञान परंपरा

मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ,
निरीह पग पर काल झुके है,
क्योंकि जी रहा हूँ मैं
अब तक प्यार-भरों के प्यार में।
        मानव जीवन से अटूट प्यार करने वाले साहित्य साधना के अथक रचनाकार रांगेय  राघव ने साहित्याकाश में अपनी अलग विलक्षण छवि अंकित की है।
     भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराणों का उनका विस्तृत अध्ययन किया था। खास तौर से पुरातत्व और इतिहास से उन्हें प्यार था। जो कि उनकी रचनाओं में भी झलकता है। रांगेय राघव की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी के लिए अपनी आख़िरी सांस तक कुर्बान रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा, संस्कृति और कला का मूल्यांकन मार्क्सवादी नज़रिए से किया। अपने लेखन से दलित, शोषित, वंचितजनों में एक नई चेतना विकसित की।हिंदी साहित्य में इस मामले में सिर्फ राहुल सांस्कृत्यायन ही उनकी जोड़ी के हैं। 
      उनके पौराणिक चरित्रों पर लिखे उपन्यास जैसे लोई का ताना , यशोधरा जीत गयी, देवकी का बेटा, रत्ना की बात आदि अपने आप में अद्भुत हैं ऐसा लगता है मानो ये सभी चरित्र उनके संगी साथी रहे हों ।इन चरित्रों का जीवन परिचय उनका रहनसहन , समाज व साहित्य में उनके योगदान के वे जैसे चश्मदीद गवाह रहे हों।
    आज मैं रांगेय राघवजी पर यहां बात नहीं करूंगी पर उनके द्वारा संत कबीर के जीवन पर अपने विचार व्यक्त करूँगी । लेखक ने कबीर के पुत्र कमाल के माध्यम से कबीर के जीवन का खूबसूरत चित्रण इतने रोचक ढंग से किया है मानो वे स्वयं कमाल की उँगली पकड़ कदम दर कदम उनके साथ रहे हों ।
    संत कबीर के लिए रांगेय जी लिखते हैं कि उनके जीवन के तथ्य बहुत तो नहीं मिलते हैं पर उनके साहित्य को पढ़कर मैं जिन निष्कर्षों पर पहुंचा उसी के आधार पर  यहाँ पर उनके पुत्र कमाल के माध्यम से आपके सामने परोसने का प्रयत्न किया है । संत कबीर जाति से जुलाहे थे तथा अनपढ़ थे पर उनका ज्ञान उनकी अभिव्यक्ति जीवन की सच्चाई को उजागर करती थी वह स्वयं नहीं लिखते थे पर वे जो कहते उसे उनके संगीसाथी उनके शिष्य लिपिबद्ध  कर लेते । जो कि कहीं भी बहुत अच्छे से संकलित नहीं हैं पर उनके दोहे उनकी उक्तियाँ जैसे लोगों की जबान पर अंकित हो गई थी और मन मस्तिष्क में टंकित हो गई थीं ।
    कबीर निर्गुण के परे थे उन्होंने जो राह दिखाई वह  मानवता को कल्याण  की ओर ले जाने वाली थी वह भेदभाव वाले ब्राह्मणवाद और इस्लाम का भी विरोध करते वे कट्टरपंथ के खिलाफ थे।
      कबीर ने भारत में सांस्कृतिक जन जागरण की नींव डाली उनकी भाषा में क्रांति थी  उनकी भाषा में श्रंगार था ना ही लालित्य था ।वह आम जन की भाषा थी। रांगेय जी कहते हैं कबीर के चेले कबीर पंथ चलाना चाहते थे पर उनके बेटे कमाल इस पक्ष में नहीं थे उनका कहना था कि वे कबीर की शिक्षा को तोड़ मरोड़ कर पेश करना चाहते हैं कमाल की असहमति पर  चेलों ने कमाल के लिए प्रसिद्ध कर दिया कि 
    “बूढ़ा बंस  कबीर का 
     जब उपजा पूत कमाल “
     रांगेय जी ने लोई का ताना को विभिन्न भागों में बाँट कर कबीर के जीवन का पूरा चित्र दर्शाने की कोशिश की है पुस्तक का आरंभ कबीर की मृत्यु के दृश्य से प्रारंभ है। कबीर कमाल से काम बंद कर अपने पास बुला कर कहते हैं कि मेरे जाने का समय है । कमाल डर जाता है तब वे कहते हैं -“ इस संसार में कोई भी सनातन होकर नहीं आया सब आते हैं सब चले जाते हैं । गुण निर्गुण की पहचान करने वाले हों  या  राम-लक्ष्मण हों या पांडव !  यहाँ तक कि रावण भी चला गया सब खाली हाथ आए थे खाली हाथ चले गए ।”
    “भूला लोग कहै घर मेरा 
     जा घरवा में फूला डोलैं
     सो घर नाहीं तेरा 
     हाथी घोड़ा  बैल खजाना 
     खूब यही सब रहा धरा “
           मृत्यु शैया पर लेटे पिता के मुँह से मानो अमृत बरस रहा था । उनका स्वर गूंजा -
“उठो सखी मोरी माँग सँवारो
दुलहा मोसे रूसल हो।”
      यह रूठना कितना मधुर था। अंतिम क्षणों में भी जीवन के प्रति कितनी मादकता थी।
“आये जमराज पलंग चढि बैठे
  नैनन आँसू टूटल हो “
     कमाल कहते हैं कि उस समय वे मेरे पिता नहीं थे वरन् वहाँ मुझे अनेक शताब्दियों का ज्ञान रूपी मनुष्य की आत्मा के सच्चे दर्शन हो रहे थे।
  “चारि जने मिलि खाट उठाइन 
   चहुं दिसि  धू दू ऊठल हो 
   कहत कबीर सुनो भाई साधो 
   जग से नाता छूटत हो “
       उनके चेहरे पर शांति की मुस्कुराहट थी । वे तो सो गए... मैं उनका बेटा मंत्रमुग्ध सा खड़ा रह गया । उनकी मृत्यु पर हिंदू और मुसलमानों में बवाल उठा कि वे हिंदू थे कुछ कहते मुसलमान थे। तब कमाल कहता है-
     "आखिर तो जो जिस दायरे में रहता है, वहाँ उससे बाहर की बात सोच भी तो नहीं सकता। हिंदू और मुसलमान दोनो अलग अलग कुएँ में पड़े हुए मेंढक थे। उनकी सारी परंपराएँ , उनके सारे फैलाव वहीं तक तो जाकर पहुँचते थे।"
        कबीर की पत्नी का नाम लोई था वह भी जुलाहिन थी और कबीर की प्रेरणा भी थी। वह कबीर के नारी पर कहे दोहों पर सवाल करती और उसका निचोड़ निकलवाती। कबीर ने कहा -
   “नारी की जानी परत
   अंधा होत भुजंग
   कबीरा जिनकी कौन गति
   जो नित नारी संग “
       लोई के सवाल करने पर कहते हैं -" नारी माया है पर कब ? वे जो नारी को विषय की वस्तु समझते हैं, और उसके भोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेते हैं । उनके लिए ऐसा क्यों न कहा जाए ?"
       कबीर और लोई दोनों एक ही रंग में रंगे हुए थे । एक बार कबीर घर छोड़ने की बात करते हैं तब लोई कहती है - "जो लोग घर छोड़कर भागते हैं वे एक आँख से दुनिया को देखते हैं उनके जीवन में हाँ और ना के पलड़े हमेशा होड़ करते रहते हैं। एक तरफ मरघट है, योग है, त्याग है वन है, सन्यास है और दूसरी तरफ दुनिया है , लोगों का लाभ है , मदद है , पाप का पर्दाफाश करना है । दो पाँवों पर बोझ सँभाल , एक पर न चल दुख उठाकर भाग मत , यहीं रह कर सच्चाई से लड़ । मैं तेरी साथिन हूँ तेरी राह का थोड़ा नहीं ।" कबीर ने तब एक नवीन मार्ग देखा वह एक समन्वय था जो किसी प्रकार की दासता को अस्वीकार करता था ।
         कबीर ने लोई के सानिध्य में प्रेम को देखा और उसकी साधना करते करते उन्होंने देखा कि सारा संसार ही प्रेम के बल पर चल रहा है।
   “ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ 
     पंडित भया न कोय
    एकै अक्षर प्रेम का 
     पढ़े सो पंडित होय “
  कमाल अपनी माँ से पूछते हैं कि -" माँ लोग कहते हैं कि वे सब से लड़ जाया करते थे ?" तब लोई कहती हैं कि -“वे तो प्रेम के भूखे थे क्रोध नहीं था उनमें वे कहते हैं -
  “जब मैं था तब गुरु नहीं
   अब गुरु हैं हम नाहिं
   प्रेम गली अति साँकरी
   ता मैं दो न समाँहि “
     बेटा प्रेम रस पीने की चाह रखने वाला कभी मान नहीं रख सकता, एक म्यान में दो खड्ग तो साथ साथ रह ही नहीं सकते।
       लोई कबीर की सच्ची साथिन थी वह कबीर के कहे को कंठस्थ कर लेती और कमाल को सुनाया करती जिसके आधार पर ही कमाल कबीर के बारे में बहुत कुछ जान पाया और लिपिबद्ध करता गया । जब कबीर ने जाना कि किस तरह लोई कमाल को उनके कहे दोहों और उक्तियों को  लिखवा रही है , तब उन्होंने लोई  से कहा - " आज मैं मुक्त हो गया आज कोई फांस ना रही “-
   “कबीरा हम गुरु रस पिया 
     बाकी रही न छाक
    पाका कलस कुम्हार का 
    बहुरि न चढसी चाक “
       कबीर जो देखते उसी पर कुछ न कुछ कह देते उनका कहना था कि -   
    “मैं कहता हूँ आँखन देखी
    तू कहता कागद की देखी “
    मंदिरों में भीड़ देखकर कबीर गा उठे -
   “ऐसी दुनिया भई दिवानी
    भक्ति भाव नहीं बूझै जी
     कोई आवे तो बेटा माँगे
    कोई आवे तो दौलत माँगे
    कोई करावे ब्याह सगाई
    साँचे का कोई गाहक नहीं “
         इस पर कुछ लोग कबीर की हत्या की साजिश करने लगे तो वे निडर होकर बोले -
 “जा को राखे साइयाँ मारि न सक्कै कोय
 बाल न बाँका करि सकै जो जग बैरी होय
      आगे कमाल कहते हैं कि मेरे पिता ने जोगियों पर कहा है कि - “ रामा, श्रंगी चमकाने से क्या होता है ? सारे बदन पर भभूत मल लेने से क्या मन का मैल जल जाता है , अगर नंगे रहने से ही योग हो जाता तो काशी के सारे ढोरों को योगी क्यों नहीं कहा जाता ?”
    “मन न रँगाए , रँगाए जोगी कपरा
   आसन मारि मँदिर में बैठे
   नाम छाँडि पूजन लगे पथरा
   कनवा फडाय जोगी जटवा  
बढौले “
  दाढ़ी बढाय जोगी है गैले बकरा “
     आगे एक ब्राह्मण द्वारा गुजरती हुई महिलाओं को  माला फेरते हुए ताकते देख कबीर बोल पड़े -
   “माला फेरत जुग भया 
    फिरा न मन का फेर
    कर का मनका डारि दे 
    मन का मन का फेर “
   एसे ही पिंडदान के लिए लोगों को सिर मुंडवाते देख कबीर कह उठे -
  मूँड मुँडाये हरि मिलैं 
 सब कोई लेओ मुँडाय
 बार बार के मूँडते भेड़ न बैकुँठ जाय
      कबीर कहते हैं -“भीड़ की भीड़ यह साधुता के नाम पर जो भिखमंगों की जमात चलती है वह क्या दूसरों की मेहनत से कमाए हुए माल को हराम में नहीं खाती उस अन्न का फल ग्रहस्थ भोगते हैं साधु उसे  खाकर भगवान को पाते हैं , यह कैसे हो सकता है ? ये सब तो शून्य की आशा में  वनखंड जाने वाले भटके हुए लोग हैं यह धर्म के नाम पर मुफ्त खाने वाले अधर्म कर रहे हैं ।”
      कमाल कहते हैं कि जब कबीर को गुरु रामानंद ने ठुकराया तो कबीर ने कहा -"क्या राम मेरा नहीं है ।" रामानंद हतप्रभ रह गए और चिंतन में डूब गए । अगले दिन जब कबीर से सामना हुआ तो रामानंद कह उठे -"कबीर मैं अँधा हो गया था सारा ब्रह्मांड  राम है यह भेद  मनुष्य के बनाए हैं , वही राम तू है , वही गंगा है , राम तो सबका है ।" 
      कबीर को लगा जैसे वह मुक्त हो गया खुशी खुशी लोई को बताता है तब वह हंसकर कहती है -“मुझे तो तू वैसा ही लग रहा है ब्राह्मण के मना कर देने से तू राम का नहीं रहा और उसके छू देने भर से तू मुक्त हो गया यह क्या बात हुई।”
कबीर गा उठे -
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत
कह कबीर पिउ पाइए
मन ही की परतीत
    कमाल कहते हैं - मेरे पिता अद्भुत थे उन्होंने कहा था -
“काल करे सो आज कर 
आज करै सो अब्ब , 
पल में परलै होएगी 
बहुरि करेगा कब्ब “
     कर्तव्य के लिए वे देरी नहीं सह सकते थे पर मैं सचमुच कुछ न कर सका । प्रलय हो ही गई ।
     कबीर को चेलों ने डुबा ही दिया , क्योंकि मठ बना , धन आया और मोह ने सत्य को ढँक लिया । पर यदि मैं कुछ नहीं करता तो क्या यह भी ना कहूँ कि मेरा बाप वह ही नहीं था जिसे शून्य-शून्य कहकर सब बखानतें हैं । वे उसे महान कह देते हैं पर उसकी उन बातों को नहीं कहते जो उसका अपना चिंतन थी । वह संस्कृति का पुनर्जागरण था दीन जनता का पहला स्पष्ट स्वस्वर निनाद था पर लोगों ने उसे दबा दिया और उसको शून्यवाद से ढँक दिया ।
       रांगेय राघव जी ने कबीर पर गहन अध्ययन किया और उनके कहे हर शब्द को इस पुस्तक में लगभग समाहित किया है। कबीर अद्भुत थे जिन पर लिखने का साहस रांगेय राघव ही कर सकते थे ।

उन्हें शत शत नमन
मधूलिका श्रीवास्तव

परिचय

मेरा परिचय—

मधूलिका श्रीवास्तव 
संस्थापक सदस्य व संचालिका 
श्री अरविन्दो स्कूल भोपाल
जन्म - 10:5:1959
जन्म स्थान-नागपुर (महाराष्ट्र)
शिक्षा - एम .ए.संस्कृत ( स्वर्ण पदक)
  एम. फ़िल.भाषा शास्त्र एवं बी. जे .
पिता:- स्व. श्री हरशरण लाल वर्मा 
असिस्टेंट कमिश्नर ,सेंट्रल एक्साइज एवं कस्टम्स 
माता:- स्व. श्रीमती कमल वर्मा 
पति:- श्री ब्रजमोहन श्रीवास्तव 
राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय सचिव 
राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी,नई दिल्ली
रचनाएँ - 
-अंतर्कथा (उपन्यास)(पुरस्कृत)
-मन की दहलीज़ (लघुकथा संग्रह)(पुरस्कृत)
-दस्तक (कहानी संग्रह)(पुरस्कृत)
-बचपन के संग जीवन के रंग (बाल कहानी संग्रह )पुरस्कृत 
-मंत्रमुग्ध जंगल की बाल कहानियाँ व कवितायें
अंतर्मन की गूँज (कहानी संग्रह)
प्रकाशित रचनायें-
लघुकथा गवाक्ष , साझा संकलन (लघुकथा)
क्षितिज और भी हैं साझा संकलन (लघुकथा)
साझा लघुकथा संकलन (2 लघुकथा)
शैशव की गिन्नियाँ , सफ़र सुहाना (साझा संस्मरण संकलन )     
सम्मान - 
-रत्नावली पुरस्कार 2022
तुलसी साहित्य अकादमी  
-कृति पुरस्कार 2023
हिन्दी लेखिका संघ म.प्र.भोपाल 
-पुष्पलता जोशी स्मृति राष्ट्रीय बाल कहानी प्रतियोगिता 2021 तृतीय पुरस्कार 
 -नाटक लेखन में प्रथम स्थान 
लेखिका संघ म.प्र. भोपाल 2022
- श्रीमती सुशीलादेवी केशवराम क्षत्रिय स्मृति बाल प्रतियोगिता- 2022 में द्वितीय स्थान 
-कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार 2023 हिन्दी लेखिका संघ म.प्र. भोपाल
-विशिष्ट कर्मठता सम्मान 2024
हिन्दी लेखिका संघ म.प्र. भोपाल
-कृति पुरस्कार 2025
बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल म.प्र.
-सीमा अपराजिता अवॉर्ड 2026
गुफ्तगू  साहित्य संस्था प्रयागराज उ.प्र.
-गंगा अधिकारी स्मृति बाल साहित्य सम्मान 
पिथौरागढ़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड

शुक्रवार, 26 जून 2026

समाचार

आलेख गूगल से साभार

कविता, गीत या नवगीत में मात्रा गणना का बड़ा महत्व है। बिना मात्रा के समन्वयन के आप लय तो साध ही नहीं सकते और न रचना लय पा सकती है। नवगीत में मात्रा गणना की थोड़ी-सी छूट है। वह भी इसलिए कि किसी शब्द को न रखने से आपकी संवेदना प्रभावित हो रही हो और एक-दो मात्रा की घट-बढ़ हो रही हो, लेकिन लय की लयात्मकता एकदम ठीक बैठ रही हो। पढ़ें मात्रिक गणना।
'सहयोगी'



*हिंदी काव्य लेखन में मात्रा गणना*

हिंदी काव्य लेखन में मात्रा गणना
परिचय
काव्य की दुनिया में मात्रा गणना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कला है। जब हम कोई सुंदर दोहा या चौपाई सुनते हैं तो उसमें एक विशेष लय होती है, एक मधुरता होती है — यह सब मात्राओं के सही संयोजन से आती है। मात्रा वह समय है जो किसी वर्ण के उच्चारण में लगता है, और छंद शास्त्र में इसकी सही गणना ही काव्य को संगीत जैसी मधुरता प्रदान करती है।

छंद आधारित कविता में मात्रा गणना का महत्व इसलिए है क्योंकि यह किसी भी काव्य रचना की आधारशिला होती है। चाहे वह तुलसीदास जी की रामायण हो या बिहारी के दोहे, सभी में मात्राओं की गणना का कठोर अनुशासन दिखता है। अगर एक भी मात्रा कम या ज्यादा हो जाए तो छंद की संरचना टूट जाती है और काव्य अपनी मधुरता खो देता है।

रिसाइटेशन और काव्य पाठ में भी मात्रा गणना की समझ अत्यंत आवश्यक है। जब आप किसी दोहे या चौपाई का पाठ करते हैं तो मात्राओं की सही गिनती से ही उसकी वास्तविक लय और ताल का अनुभव होता है। उदाहरण के लिए, "श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार" में प्रथम पंक्ति में 13 मात्राएँ और द्वितीय में 11 मात्राएँ हैं — यही दोहा छंद की पहचान है।


बुनियादी परिभाषाएँ
वर्ण भाषा की सबसे छोटी ध्वनि इकाई है। स्वर वे वर्ण हैं जो बिना किसी सहायता के उच्चारित होते हैं (जैसे अ, आ, इ), जबकि व्यंजन स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं (जैसे क्, ख्, ग्)।
मात्रा का सीधा अर्थ है — किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाला समय। छंदशास्त्र में यह समय दो प्रकार का होता है: ह्रस्व (कम समय) और दीर्घ (अधिक समय)।
ह्रस्व स्वर वे हैं जिनके उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है। ये केवल चार हैं: अ, इ, उ, ऋ।
दीर्घ स्वर वे हैं जिनके उच्चारण में दो मात्रा का समय लगता है: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः।

स्वर मात्रा तालिका
स्वर मात्रा_संख्या प्रकार चिह्न उदाहरण
अ 1 ह्रस्व । कम
इ 1 ह्रस्व । किशोर
उ 1 ह्रस्व । कुमार
ऋ 1 ह्रस्व । कृष्ण
आ 2 दीर्घ ऽ काम
ई 2 दीर्घ ऽ कील
ऊ 2 दीर्घ ऽ कूप
ए 2 दीर्घ ऽ केश
ऐ 2 दीर्घ ऽ कैलाश
ओ 2 दीर्घ ऽ कोमल
औ 2 दीर्घ ऽ कौशल
अं 2 दीर्घ ऽ अंक
अः 2 दीर्घ ऽ कः

 
संपूर्ण नियम विवरण
स्वर संबंधी नियम
मूल सिद्धांत: केवल स्वर की मात्रा गिनी जाती है, व्यंजन की नहीं।

ह्रस्व स्वर (1 मात्रा): अ, इ, उ, ऋ
उदाहरण: कब (क्+अ, ब्+अ) = 1+1 = 2 मात्रा

दीर्घ स्वर (2 मात्रा): आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
उदाहरण: काम (क्+आ, म्+अ) = 2+1 = 3 मात्रा

अनुस्वार और विसर्ग का नियम
अनुस्वार (ं): जिस भी स्वर पर अनुस्वार लगता है, वह स्वर दीर्घ (2 मात्रा) हो जाता है।

गंगा = गं + गा = 2 + 2 = 4 मात्रा

कंठ = कं + ठ = 2 + 1 = 3 मात्रा

संग = सं + ग = 2 + 1 = 3 मात्रा

विसर्ग (ः): अनुस्वार की तरह ही विसर्ग भी अपने स्वर को दीर्घ बना देता है।

रामः = रा + मः = 2 + 2 = 4 मात्रा

देवः = दे + वः = 2 + 2 = 4 मात्रा


चन्द्रबिन्दु का नियम
चन्द्रबिन्दु (अँ): यह स्वर की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं करता।

गाँव = गाँ + व = 2 + 1 = 3 मात्रा (गा = 2 ही रहेगा)

आँख = आँ + ख = 2 + 1 = 3 मात्रा


संयुक्ताक्षर और हलन्त के नियम
संयुक्ताक्षर की गणना: संयुक्ताक्षर में केवल स्वर की मात्रा गिनी जाती है।

प्रेम = प्रे (ए) + म(अ) = 2 + 1 = 3 मात्रा

स्वर = स्व (अ) + र(अ) = 1 + 1 = 2 मात्रा
 

संयुक्ताक्षर का पूर्ववर्ती प्रभाव: यदि संयुक्ताक्षर से पहले कोई ह्रस्व स्वर हो तो वह दीर्घ हो जाता है।

सत्य = स + त्य = 2 + 1 = 3 मात्रा 

वत्स = व + त्स = 2 + 1 = 3 मात्रा

कर्म = क + र्म = 2 + 1 = 3 मात्रा


संयुक्ताक्षर से पहले दीर्घ स्वर: अगर संयुक्ताक्षर से पहले दीर्घ स्वर है तो वह अपरिवर्तित रहता है।

वाद्य = वा + द्य = 2 + 1 = 3 मात्रा

हास्य = हा + स्य = 2 + 1 = 3 मात्रा

हलन्त का नियम: हलन्त चिह्न (्) लगे व्यंजन की गणना नहीं होती।

जगत् - 1+1 = 2 मात्रा (हलंत वाले शब्द में स्वर नहीं है इसलिए)


अपवाद और विशेष स्थितियाँ
ह्-संयुक्त अपवाद: जब किसी व्यंजन के साथ 'ह्' जुड़कर संयुक्ताक्षर बनता है, तो कभी-कभी पूर्ववर्ती लघु वर्ण दीर्घ नहीं होता।

तुम्हारा = तु + म्हा + रा = 1 + 2 + 2 = 5 मात्रा

कन्हाई = क + न्हाई = 1 + 3 = 4 मात्रा


द्विलघु = एक दीर्घ का नियम
नियम का विवरण:
जब दो लघु वर्ण (ह्रस्व स्वर वाले) लगातार आएँ तो छंद की गति और लय बनाए रखने के लिए उन्हें एक दीर्घ वर्ण (गुरु मात्रा) माना जा सकता है।
छंद की गणना में—

दो लघु (। ।) = एक दीर्घ (ऽ)
यानि, दो लघु मात्रा की जोड़ी को एक दीर्घ मात्रा के बराबर माना जाता है.


क्यों ज़रूरी है:
कभी छंद-विधान या पद्य की गति में प्रवाह साधने के लिए या छंद की निर्धारित मात्रा/वर्ण-क्रम (गण) मिलाने हेतु यह बदलाव किया जाता है।
यह छंद-पिंगल, संस्कृत छंदों और हिंदी वर्णिक छंदों में महत्वपूर्ण माना जाता है—विशेषकर तब जब पाठ/गायन आदि में लय बनाना हो.उदाहरण

'शपथ' शब्द में
श + प + थ = श(1) +[ प(1) + थ (2) = पथ (2) = 1+2 = 3


परंपरागत उच्चारण आधारित अपवाद: कुछ शब्दों में व्यावहारिक उच्चारण के अनुसार मात्रा गिनी जाती है।
तेज गति उच्चारण में मात्रा परिवर्तन (मात्रापतन)
वाचिक भार की अवधारणा
छंद शास्त्र में मात्रा गणना के दो मुख्य आधार हैं: वर्णिक भार और वाचिक भार। वर्णिक भार में प्रत्येक वर्ण की निर्धारित मात्रा यथावत मानी जाती है, जबकि वाचिक भार में वास्तविक उच्चारण के अनुसार मात्रा की गणना होती है।


मुख्य सिद्धांत: जब छंद का गायन या तीव्र गति से पाठ किया जाता है, तो कई बार दीर्घ स्वरों का उच्चारण संक्षिप्त हो जाता है और उनकी मात्रा 2 के स्थान पर 1 गिनी जाती है।


मात्रापतन के मुख्य नियम
नियम 1: गायन में दीर्घ का लघुकरण
गायन के समय यदि छंद की संरचना के लिए आवश्यक हो तो दीर्घ स्वर को लघु की भांति उच्चारित किया जा सकता है।

उदाहरण:

कबीरा खड़ा बाज़ार में - यहाँ 'कबीरा' का उच्चारण 'कबिरा' और 'बाज़ार' का उच्चारण 'बज़ार' किया गया है 

कबीरा - क(1) + बी(1) + रा(2) (बी का मात्राभार 1 लिया गया है)

बाज़ार - बा(1) + ज़ा (2) +र (1) (बा का मात्राभार 1लिया गया है)


नियम 2: तीव्र गति में स्वर संक्षेपण
जब कविता का पाठ तीव्र गति से किया जाता है, तो दीर्घ स्वर स्वाभाविक रूप से संक्षिप्त हो जाते हैं।

उदाहरण:

"मैं" (2 मात्रा) → "मैं" (1 मात्रा) तेज गति में

"कहीं" (1+2 = 3) → "कहिं" (1+1 = 2) शीघ्र उच्चारण में

"गाँव" (2+1 = 3) → "गंव" (1+1 = 2) तीव्रता से बोलने पर

कुल मत्रा - कबीरा(1+1+2) खड़ा (1+2) बाज़ार (1+2+1) में (2) = कुल 13 मात्रा


नियम 3: लय सामंजस्य हेतु मात्रा समायोजन
छंद की लय बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार दीर्घ मात्रा को लघु माना जा सकता है।

उदाहरण:

"अपनी भगतिया सतगुरु साहब" में "अपनी" को "अपनि" के रूप में उच्चारित करना


अपवाद और सीमाएं
अपवाद 1: अनुस्वार/विसर्ग के साथ
अनुस्वार और विसर्ग युक्त स्वर सामान्यतः तेज गति में भी दीर्घ ही रहते हैं।

गंगा = गं(2) + गा(2) = 4 (अपरिवर्तित)

नमः = न(1) + मः(2) = 3 (अपरिवर्तित)


अपवाद 2: संयुक्ताक्षर प्रभाव
संयुक्ताक्षर के कारण दीर्घ हुआ पूर्ववर्ती स्वर तेज गति में भी प्रायः दीर्घ ही रहता है।

सत्य = स(2) + त्य(1) = 3 (सामान्यतः अपरिवर्तित)


सीमा 1: काव्य की गुणवत्ता
मात्रापतन का अत्यधिक प्रयोग काव्य की मधुरता को हानि पहुँचा सकता है।


सीमा 2: क्षेत्रीय भिन्नता
विभिन्न क्षेत्रों में उच्चारण की भिन्नता के कारण मात्रापतन के नियम अलग हो सकते हैं


मात्रापतन के व्यावहारिक सुझाव
सुझाव 1: संयम से प्रयोग
मात्रापतन का प्रयोग केवल वहीं करें जहाँ छंद की संरचना के लिए अत्यंत आवश्यक हो।

सुझाव 2: स्वाभाविकता बनाए रखें
कृत्रिम रूप से मात्रा बदलने से बचें। केवल प्राकृतिक उच्चारण के अनुसार ही परिवर्तन करें।

सुझाव 3: संदर्भ का महत्व
भक्ति काव्य, लोक गीत, और शास्त्रीय छंद में मात्रापतन के नियम भिन्न हो सकते हैं।

सुझाव 4: श्रोता की सुविधा
गायन या पाठ के समय श्रोता की समझ में कमी न आए, इस बात का ध्यान रखें।


व्यावहारिक उदाहरण (Step-by-step विश्लेषण)
सरल शब्द उदाहरण
उदाहरण 1: "राधा"

रा = र् + आ = 2 मात्रा

धा = ध् + आ = 2 मात्रा

कुल = 2 + 2 = 4 मात्रा


उदाहरण 2: "गंगा"

गं = ग् + अं = 2 मात्रा (अनुस्वार के कारण)

गा = ग् + आ = 2 मात्रा

कुल = 2 + 2 = 4 मात्रा


जटिल पंक्ति उदाहरण
उदाहरण 3: "श्री गुरु चरण सरोज रज"

श्री = श्र् + ई = 2 मात्रा

गु = ग् + उ = 1 मात्रा

रु = र् + उ = 1 मात्रा

च = च् + अ = 1 मात्रा

रण = र् + अ + ण् + अ = 1 + 1 = 2 मात्रा

स = स् + अ = 1 मात्रा

रो = र् + ओ = 2 मात्रा

ज = ज् + अ = 1 मात्रा

र = र् + अ = 1 मात्रा

ज = ज् + अ = 1 मात्रा
कुल = 2+1+1+1+2+1+2+1+1+1 = 13 मात्रा

उदाहरण 4: "बड़ा भया तो क्या भया"

बड़ा = ब् + अ + ड़् + आ = 1 + 2 = 3 मात्रा

भया = भ् + अ + य् + आ = 1 + 2 = 3 मात्रा

तो = त् + ओ = 2 मात्रा

क्या = क्य् + आ = 2 मात्रा

भया = भ् + अ + य् + आ = 1 + 2 = 3 मात्रा
कुल = 3+3+2+2+3 = 13 मात्रा


संयुक्ताक्षर के साथ उदाहरण
उदाहरण 5: "सत्य और न्याय"

सत्य = स + त्य = 2 + 1 = 3 मात्रा (स् + अ दीर्घ हो गया)

और = औ + र = 2 + 1 = 3 मात्रा

न्याय = न्या + य = 2 + 1 = 3 मात्रा
कुल = 3+3+3 = 9 मात्रा


दोहा छंद का पूर्ण उदाहरण
उदाहरण 6: पूरा दोहा विश्लेषण

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं, फल लागैं अति दूर॥"

प्रथम पंक्ति: "बड़ा हुआ तो क्या हुआ"

बड़ा = 1+2 = 3

हुआ = 1+2 = 3

तो = 2

क्या = 2

हुआ = 1+2 = 3
कुल = 3+3+2+2+3 = 13 मात्रा

द्वितीय पंक्ति: "जैसे पेड़ खजूर"

जै = 2

से = 2

पे = 2

ड़ = 1

ख = 1

जू = 2

र = 1
कुल = 2+2+2+1+1+2+1 = 11 मात्रा

यह दोहा छंद का सही उदाहरण है (13+11 मात्रा पैटर्न)।


आम गलतियाँ और उनसे बचने के तरीके
गलती 1: व्यंजन की मात्रा गिनना
गलत: क्, ख्, ग् की अलग से मात्रा गिनना
सही: केवल स्वर की मात्रा गिनें — क = क्+अ = 1 मात्रा

गलती 2: अनुस्वार/विसर्ग की गलत गणना
गलत: गंगा = गं(1) + गा(2) = 3 मात्रा
सही: गंगा = गं(2) + गा(2) = 4 मात्रा

गलती 3: संयुक्ताक्षर का गलत प्रभाव
गलत: सत्य = स(1) + त्य(1) = 2 मात्रा
सही: सत्य = स(2) + त्य(1) = 3 मात्रा

गलती 4: चन्द्रबिन्दु की गलत गणना
गलत: गाँव = गाँ(3) + व(1) = 4 मात्रा
सही: गाँव = गाँ(2) + व(1) = 3 मात्रा

गलती 5: हलन्त की गणना करना
'श्रीमान्'
श् + री (2) + मा + आ (2) + न् (हलन्त, 0)
मात्रा: री (2) + मा (2); न् (हलन्त) = 0
कुल मात्रा = 2 + 2 = 4

 
मात्रा गिनने की व्यवस्थित प्रक्रिया
चरण-दर-चरण विधि
चरण 1: पंक्ति को शब्दों में बाँटिए
उदाहरण: "राम गया घर" → राम + गया + घर


चरण 2: प्रत्येक शब्द में स्वरों की पहचान करिए

राम = रा (आ) + म (अ) = 2 + 1 = 3 मात्रा

गया = ग (अ) + या (आ) = 1 + 2 = 3 मात्रा

घर = घ (अ) + र (अ) = 1 + 1 = 2 मात्रा


चरण 3: प्रत्येक स्वर की मात्रा लगाइए (नियमानुसार)
ह्रस्व = 1, दीर्घ = 2, अनुस्वार/विसर्ग = 2


चरण 4: विशेष स्थितियों की जाँच करिए

संयुक्ताक्षर का प्रभाव

अनुस्वार/विसर्ग की उपस्थिति

हलन्त की स्थिति


चरण 5: कुल मात्रा जोड़िए
राम गया घर = 3 + 3 + 2 = 8 मात्रा


संक्षेप/निष्कर्ष
मुख्य बिंदु
मूल सिद्धांत: केवल स्वर की मात्रा गिनी जाती है, व्यंजन की नहीं

ह्रस्व स्वर: अ, इ, उ, ऋ = 1 मात्रा

दीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ = 2 मात्रा

अनुस्वार/विसर्ग: हमेशा स्वर को दीर्घ (2 मात्रा) बनाते हैं

चन्द्रबिन्दु: स्वर की मात्रा अपरिवर्तित रखता है

संयुक्ताक्षर: पूर्ववर्ती लघु को दीर्घ बना देता है

हलन्त: गणना में शामिल नहीं होता

व्यावहारिक उच्चारण: कुछ अपवादों में परंपरागत उच्चारण के अनुसार मात्रा गिनी जाती है


रचनाकार के लिए त्वरित चेकलिस्ट
स्वर पहचान: प्रत्येक अक्षर में स्वर की पहचान करें
 ह्रस्व-दीर्घ वर्गीकरण: अ,इ,उ,ऋ = 1; बाकी = 2
 अनुस्वार/विसर्ग जाँच: ं/ः वाले स्वर = 2 मात्रा
 संयुक्ताक्षर प्रभाव: पूर्ववर्ती का दीर्घीकरण जांचें
 चन्द्रबिन्दु उपेक्षा: अँ में केवल आधार स्वर गिनें
 हलन्त निकालें: अंतिम हलन्त को हटा दें
 कुल गणना: सभी मात्राएँ जोड़कर पुष्टि करें
 छंद मिलान: दोहा(13-11), चौपाई(16) आदि से मिलान करें


यदि किसी नियम पर मतभेद हो तो सामान्य रचनाकार को सरल और व्यावहारिक नियमों को अपनाना चाहिए जो इस लेख में प्रस्तुत किए गए हैं। जटिल अपवादों के लिए किसी छंद गुरु से सलाह लेना उत्तम होगा।

मात्रा गणना एक कला है जो अभ्यास से सिद्ध होती है। नियमित अभ्यास और धैर्य के साथ कोई भी व्यक्ति इसमें दक्षता प्राप्त कर सकता है और सुंदर छंदबद्ध काव्य रच सकता है।

गूगल से साभार

गुरुवार, 25 जून 2026

रविंद्र श्रीवास्तव जी का एक संस्मरण



कबीर के पद हमने अपने गांव के जोगियों के
मुख से सुने थे । वे सारंगी और खझड़ी के साथ जिस तरह डूंब कर कबीर के पदों का गायन करते थे तो लगता था कि साक्षात कबीर उतर आए हो। 
 कबीर की तरह उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी थी , वे यदा कदा  गांजे का दम लगाया करते थे । ताड़ी आदि का सेवन करते थे । वे गेरूआ ड्रेस में रहते थे और अलग से दिखाई देते थे । उनके पास विचित्र किस्म के बैल होते थे ,किसी के पास पांचवा पैर होता तो किसी के पास दो दो पूंछ होती थी । उनकी पीठ पर कौड़ियों से सुसज्जित आवरण होता था ।
  उन्हें लोकजीवन से कंठ मिला था ,एकदम ठेठ और दिल से भीतर तक उनकी आवाज उतर आती थी । उनका गायन किसी श्रेष्ठ गायक से कम प्रभावशाली नही था । हम न मरिहैं मरिहैं संसारा या देख तमाशा लकड़ी का ,उनके प्रिय पद थे । बचपन में हमें कबीर की उलटवाँसी समझ में नही आती थी लेकिन जैसे जैसे बड़ा होता उनके अर्थ खुलते गए ,आज वे मेरे इष्ट कवि है  । कुमार गन्धर्व ने कबीर के पदों का अद्भुत गायन किया है उनके गायन में लोकतत्व और शास्त्रीयता थी ।
  कबीर के पदों का ज्यादा ज्ञान मुझे रामलखन साधू से मिला ,उनका गृहस्थ जीवन से मोहभंग हो गया था और वे साधुआ गए थे । बहुत दिन तक भटकने के बाद उन्होंने गांव के पास की बुद्धा नदी के पास अपनी कुटी बनाई । यह नदी निर्जनता में बहती थी ,पास में घना और डरावना जंगल था । लोग वहां दिन में जाने से डरते थे लेकिन साधु कबीर के पद के सहारे रात के भय को पराजित करते थे ।
  साधु की यह कुटी हम दोस्तो का ठिकाना बन गयी थी । हम उनका रामरस खाते पीते और कबीर का पद खझड़ी के साथ सुनते थे । वे प्रायः कबीर के पद करुण रस में गाते थे , गाते समय उनकी आंखें बंद हो जाती थी । कभी कभी अश्रुधार बहने लगती थी । उनका प्रिय भजन - माया महाठगिनी हम जानी -था
  वे बताते थे कि तिरिया भी एक माया है , वह हमें कई तरह की नाँच नचाती है । उसी के चलते ही साधु के रूप में उनका रूपांतरण हुआ था ,उन्हें भरी जवानी में सन्यास ग्रहण करना पड़ा । वे कबीर के बारे में अनेक प्रचलित कहानियां सुनाते थे -झीनी झीनी बीनी चदरिया का मतलब विस्तार से बताते थे । उन्होंने मेरी जीवन दृष्टि को बदलने का काम किया  ।
 जब देवरिया या गोरखपुर से गांव जाना होता था तो मगहर मेरे रास्ते मे पड़ता था ,वहां उतर कर करघे की आवाज सुनता था  । वहां से हम 
 अंगोछा या लुंगी खरीदते थे । कबीर ने हमें बुनने के साथ गाने का हुनर सिखाया है  । नौकरी में भदोही और मऊ जैसी जगहों पर पदास्थापित हुआ ,वहां बुनकरों के कारनामे देखे ।
   साधु की कुटी वीरान हो गयी है ,उनके बाद एक दो पीढ़ी उनकी परम्परा का निर्वाह कर सकी है । यह एक कठिन पथ है , सूरमा ही उस योग्य हैं । अब भी वहां जाता हूँ और वहां उनके होने के अहसास को अनुभव करता हूँ । गांव के जोगी बूढ़े हो गए है ,उनके कंठ थक गए है । उनके बेटों को जोगी बनना कुबूल नही था ,उनके लिए गीत से ज्यादा जरूरी चीज पूंजी थी ।
  कबीर को याद करने के पहले मैं रामलखन साधु को याद करना चाहूंगा , वे मेरे लिए पहले कबीर थे जिन्होंने मेरा कबीर से परिचय कराया ।
पहली बंदिगी साधु को फिर कबीर की स्मृति को
प्रणाम ।
   रिपोस्ट

बुधवार, 24 जून 2026

कवि त्रिलोचन : यादों के झरोखे से अनिल जनविजय प्रस्तुति : वागर्थ



कवि त्रिलोचन : यादों के झरोखे से
 अनिल जनविजय

वागर्थ समूह में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं हिन्दी साहित्य के वरिष्ठतम कवियों में से एक, त्रिलोचन  जी को समर्पित यह संस्मरणात्मक लेख, जिसे भावपूर्ण शैली में लिखा है प्रवासी हिन्दी साहित्यकार अनिल जनविजय ने।

                               यह संस्मरण एक कवि की स्मृति संघर्ष, ल्यआत्मीयता और सच्चे रचनाकार के जीवन-संघर्षों की मार्मिक झांकी है। भूख की पीड़ा, मित्रता की गर्माहट,साहित्यिक सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं के इन क्षणों को अनिल जी ने जिस आत्मीयता और गहराई से साझा किया है,वह हमारे समय के कवियों और पाठकों के लिए एक अमूल्य दस्तावेज है।
        त्रिलोचन जी की फक्कड़ी, बतरस की मिठास और कविताई की गरिमा सब कुछ इस रचना में जीवंत हो उठता है। यह आलेख हमें यह भी याद दिलाता है कि सच्चा कवि वही होता है जो जीवन की सच्चाइयों से गहराई से जुड़ा हो।
            वागर्थ समूह में यह प्रस्तुति साहित्य की आत्मा को स्पर्श करने का एक विनम्र प्रयास है। हम अनिल जनविजय जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं कि उन्होंने इन अनमोल स्मृतियों को साहित्य-समाज के साथ साझा किया।

प्रस्तुति टीप
 मनोज जैन 
संस्थापक, वागर्थ समूह

कवि त्रिलोचन : यादों के झरोखे से 
अनिल जनविजय

          आदरणीय त्रिलोचन जी का निधन हो गया, यह जानकर मैं बहुत उद्वेलित हुआ हूं. त्रिलोचन जी से कभी मेरी बहुत गहरी दोस्ती थी. तब मैं सिर्फ बीस-इक्कीस साल का था और त्रिलोचन जी साठ-इकसठ के. उनके साथ मेरी खूब घुटती थी. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ता था. और उन्हीं की तरह फक्कड़ था. उनसे मेरी मुलाकात बाबा नागार्जुन ने कराई थी. त्रिलोचन जी दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू-हिन्दी शब्दकोश की किसी परियोजना में काम कर रहे थे. बस, मैं रोज़ सवेरे उनके दफ्तर पहुंच जाता और देर शाम तक उन्हीं के साथ रहता. कितनी ही बार ऐसा हुआ कि मुझे चाय तक त्रिलोचन जी पिलाते थे क्योंकि उन दिनों मेरे पास चाय तक के पैसे नहीं होते थे. जब उनके पास भी पैसे नहीं होते थे, तो वे मुझे देख कर बड़े बेचैन हो जाते थे. उनकी वह बेचैनी मुझ से देखी नहीं जाती थी. लेकिन उनकी बातों का रस ही मेरा पेट भरने के लिए काफी होता था.

एक बार मैं दो दिन का भूखा था. पता नहीं कैसे यह बात त्रिलोचन जी भांप गए थे. उस दिन उन्होंने मुझे अपने साथ चलने और खाना खाने का निमंत्रण दिया. त्रिलोचन जी उन दिनों दिल्ली में मॉडल टाऊन में एक मकान के तिमंजिले पर किराए पर रहते थे. दो छोटे-छोटे कमरे थे, जिनमें से एक कमरा बहुत छोटा-सा था, जिसमें अम्मा (त्रिलोचन जी की पत्नी, जिन्हें मैं अम्मा कहकर ही पुकारता था) ने रसोई बना रखी थी. तो उस दिन हम दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय से पैदल चलकर जब त्रिलोचन जी के घर मॉडल टाऊन में पहुंचे तब-तक अंधेरा हो चुका था. समय होगा यही कोई आठ बजे का. अम्मा त्रिलोचन जी को देख कर कुछ बुड़बुड़ाने लगी थीं. त्रिलोचन जी ने पहले खुद अपने हाथ और मुंह धोया और फिर मुझ से हाथ-मुंह धोने को कहा. मैं हाथ-मुंह धो ही रहा था कि तब तक त्रिलोचन जी ने अम्मा को यह बता दिया —

‘अनिल भी आज हमारे साथ ही खाना खाएंगे’.

बस अम्मा का गुस्सा सातवें आसमान पर था. अम्मा जोर-जोर से त्रिलोचन जी को डांटने लगीं. पता यह लगा कि त्रिलोचन जी एक दिन पहले शाम को घर से यह कहकर निकले थे कि वे आटा लेने जा रहे हैं और उसके बाद फिर अगले दिन मेरे साथ ही घर में घुसे थे. वे भूल गए थे कि आटा भी लाना है. अम्मा दो दिन से भूखी थीं. और खुद त्रिलोचन जी भी. त्रिलोचन जी ने मुझे बताया कि बात यह नहीं है. उनका ख़याल था कि इतना आटा तो घर में था ही कि तीन चार दिन निकल जाए. इसलिए उन्होंने चिन्ता नहीं की. लेकिन अब क्या हो? न आटा ही घर में था और न ही जेब में कानी-कौड़ी. कुछ देर तक त्रिलोचन जी अम्मा से बहस करते रहे. फिर मुझे लेकर निकल पड़े. बोले — चलो, तुम्हें खाना खिलाकर लाता हूं. मैं मना करता रहा पर उन्होंने मेरी एक न सुनी. हम अजय सिंह के घर पहुंचे. रात के दस बज रहे थे. उन दिनों शमशेर जी अजय सिंह के साथ रहते थे. अजय सिंह भी वहीं माडल टाऊन में रहा करते थे. जब हम अजय जी के घर पहुंचे तो देखा कि उनके घर में सिर्फ एक ही कमरे की बत्ती जल रही है. त्रिलोचन जी ने डरते-डरते दरवाजा खटखटाया. एक बार कुंडी खड़खड़ाने पर ही तुरन्त ही दरवाजा खुल गया. दरवाजे पर अजय जी थे. त्रिलोचन जी को देखकर आश्चर्यचकित हुए और कहा—

‘अरे आप? इतनी देर से? क्या हो गया? सब ठीक तो है न?’

त्रिलोचन जी ने कहा- ‘हां, सब ठीक-ठाक है. शमशेर जी हैं क्या? जाग रहे हैं या सो रहे हैं? बस, उनसे मिलने का मन हुआ और हम चले आए. इनसे मिलिए. इन्हें जानते हैं? ये अनिल हैं. ये भी कविता लिखते हैं.’

अजय जी ने हमें अन्दर आने को कहा और शमशेर जी को बुलाने चले गए. शमशेर जी तब तक लेट चुके थे. लेकिन यह पता लगने पर कि त्रिलोचन जी मिलने आए हैं तुरन्त उठकर आए और पूछा —‘क्या बात है, सब ठीक तो है न’

त्रिलोचन जी ने कहा — ‘हां, सब ठीक है. ये अनिल हैं.कविता लिखते हैं. आप से मिलना चाहते थे, इसलिए आपसे मिलवाने के लिए ले आया. फिर कुछ देर इधर-उधर की बातें होती रहीं.

त्रिलोचन जी ने पूछा —  ‘खाना-वाना हो गया.’

अजय जी ने बताया — हां, सर्दियों के दिन हैं, इसलिए जल्दी ही खा लेते हैं. उसके बाद उन्होंने तुरन्त ही पूछा- और आप लोगों ने खाना खा लिया.

त्रिलोचन जी ने कहा — ‘हां, हमने भी जल्दी ही खा लिया था. इनका पता नहीं. इनसे पूछ लीजिए.’

मैंने भी यही बताया कि मैं खाना खा चुका हूं. हालांकि त्रिलोचन जी ने दो बार कहा मुझसे — ‘नहीं खाया हो तो खा लो.’

लेकिन मैंने दोनों बार यही कहा कि मैं खाना खा चुका हूं. थोड़ी देर और बैठ कर हम लोग वहां से निकल पड़े. बाहर निकलकर त्रिलोचन जी ने मुझ से कहा — ‘आप तो खा ही सकते थे.’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैंने कहा — ‘और आप भूखे रहते. घर पर अम्मा भी तो भूखी हैं’.

इस पर त्रिलोचन जी ने कहा — ‘तो क्या हुआ.’ और फिर मौन धारण कर लिया.’

रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे. त्रिलोचन जी के घर तक हम दोनों एकदम मौन लौटे. घर पहुंचे तो अम्मा जाग रही थीं.मुझे देखकर वे अपनी खाट से उठीं और रसोई में सोने के लिए चली गईं. रसोई में कोई चारपाई नहीं थी. उन्होंने जमीन पर ही अपनी दरी बिछा ली थी. यह देखकर मैं त्रिलोचन जी से कहता रहा कि मैं अपने घर चला जाऊंगा आप लोग सोइए. लेकिन त्रिलोचन जी ने मुझे नहीं लौटने दिया. कहा कि सवेरे चाय पी कर जाना. फिर मैंने कहा कि मैं जमीन पर दरी बिछा कर सो जाता हूं. चारपाई पर अम्मा सो जाएं. मेरी इस बात पर त्रिलोचन जी ने अपनी चारपाई अम्मा के लिए रसोई में बिछा दी. और अपनी दरी जमीन पर बिछा ली. फिर मेरे बार-बार कहने के बावजूद वे जमीन पर ही सोए. रात भर हम तीनों में से कोई नहीं सोया. कभी अम्मा उठतीं, कभी त्रिलोचन जी. मैं तो करवटें बदल ही रहा था. सुबह होते ही त्रिलोचन जी ने अम्मा से चाय बनाने को कहा. अम्मा ने बताया कि खांड नहीं है और दूध भी. लेकिन फिर भी अम्मा ने बिना चीनी और दूध की चाय मुझे पीने के लिए दी. मैंने वह चाय पी. सच मानिए उससे मीठी चाय मैंने आज तक नहीं पी है. उसमें स्नेह की जो मिठास घुली हुई थी, उस मिठास के लिए आज तक मन तरसता है. आज मैं पच्चीस बरस से मास्को में हूं. तब मैं मास्को भी त्रिलोचन जी की बात मानकर ही आया था. अगर तब यहां न आया होता तो न जाने आज कहां होता?

प्रेम, बतरस और कविताई

त्रिलोचन जी नहीं रहे. यह खबर इंटरनेट से ही मिली. मैं बेहद उद्विग्न और बेचैन हो गया. मुझे वे पुराने दिन याद आ रहे थे, जब मैं करीब-करीब रोज ही उनके पास जाकर बैठता था. बतरस का जो मजा त्रिलोचन जी के साथ आता था, वह बात मैंने किसी और कवि के साथ कभी महसूस नहीं की.

त्रिलोचन जी से बड़ा गप्पबाज भी नहीं देखा. गप्प को सच बना कर कहना और इतने यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत करना कि उसे लोग सच मान लें, त्रिलोचन को ही आता था. नामवर जी त्रिलोचन के गहरे मित्र थे. वे उनकी युवावस्था के मित्र थे, इसलिए उनकी ज्यादातर गप्पों के नायक भी वे ही होते थे. शुरू-शुरू में जब उनसे मुलाकात हुई थी तो मैं उनकी बातों को सच मानता था लेकिन बाद में पता लगा कि ये सब उनकी कपोल-कल्पनाएं थीं.बाद में मैं भी उन्हें ऐसी ही कहानियां और किस्से बना-बना कर सुनाने लगा. हिन्दी के चर्चित कवियों, लेखकों और आलोचकों को लेकर वे किस्से होते थे. जिनमें दस से पन्द्रह प्रतिशत यथार्थ का अंश रहता था, बाकी कल्पना की उड़ान. बस, इसी बात पर मेरी उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और हम दोस्त हो गए.

वे मुझ से पूरे चालीस साल बड़े थे. लेकिन उनका व्यवहार मुझ से हमेशा ऐसा रहा, मानों मैं ही उनसे बड़ा हूं. उन दिनों आदरणीय अशोक वाजपेयी मध्यप्रदेश सरकार में संस्कृति सचिव थे और यह समझिए कि भारत भर के कवियों, चित्रकारों, नाटककारों, नर्तकों, संगीतकारों सभी की मौज हो गई थी. जिन्हें भारत के सरकारी हल्कों में कोई टके को नहीं पूछता था, हिन्दी के उन लेखकों को, प्रतिष्ठित लेखकों को और कलाकारों को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा मान-सम्मान दिया जाने लगा. भोपाल में कलाओं के केन्द्र के रूप में अशोक वाजपेयी भारत-भवन का निर्माण करा रहे थे. तभी वाजपेयी जी ने एक आंदोलन-सा चलाया ‘कविता की वापसी’. मध्यप्रदेश का पूरा सरकारी संस्कृति विभाग कविता को वापिस लाने में जुट गया. वाजपेयी जी ने मध्यप्रदेश के हिन्दी के कवियों और हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों के कविता- संग्रहों की सौ-सौ प्रतियां खरीदने की घोषणा कर दी. बस, फिर क्या था. प्रकाशकों की बन आई. प्रकाशकों ने मध्यप्रदेश के कवियों को ढूंढ़ना शुरू किया और हर छोटे-बड़े कवि का कविता-संग्रह छप कर बाजार में आ गया. लेकिन ‘कविता की वापसी’ का फायदा यह हुआ कि हिन्दी के उन बड़े-बड़े कवियों के संग्रह भी छपे, जो मध्यप्रदेश सरकार द्वारा की जाने वाली उस खरीद में आ सकते थे. संभावना प्रकाशन, हापुड़ ने भी बहुत से कवियों को छापने की योजना बनाई. उन्हीं में बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन जी के कविता-संग्रह भी थे. मैं उन दिनों हिन्दी में एम.ए. कर रहा था और बेरोजगार था. संभावना प्रकाशन के मालिक और हिन्दी के बेहद अच्छे और प्रसिद्ध कहानीकार भाई अशोक अग्रवाल ने मेरी मदद करने के लिए पांच कविता-संग्रहों के प्रोडक्शन की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी. उनमें त्रिलोचन जी का कविता-संग्रह ‘ताप के ताये हुए दिन’ और बाबा नागार्जुन का कविता-संग्रह ‘खिचड़ी-विप्लव देखा हमने’ भी शामिल थे. त्रिलोचन जी का कविता संग्रह करीब तेईस साल बाद आ रहा था. इससे पहले 1957 में उनका ‘दिगंत’ छपा था. 1957 मेरा जन्म-वर्ष भी है. संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जिस दिन त्रिलोचन जी का कविता-संग्रह छप कर आया उस दिन मेरा जन्मदिन था. तो मैं बाइन्डर के यहां से ‘ताप के ताये हुए दिन’ की पहली प्रति लेकर त्रिलोचन जी के पास पहुंचा. किताब अभी गीली थी और उसकी बाइन्डिंग पूरी तरह से सूखी नहीं थी.

त्रिलोचन जी पुस्तक देखकर प्रसन्न हुए. उनके मुख पर मुस्कराहट छा गई. बड़ी देर तक वे अपने उस संग्रह को उलटते-पलटते रहे. फिर बोले — ‘पूरे तेईस साल बाद आई है किताब. मैंने कहा — ‘जी हां, मैं भी तेईस साल का हूं. आज ही मेरा जन्मदिन है. मेरे जन्मदिवस पर आपको मिला है यह उपहार.लेकिन आपका जन्मदिन भी तो आने वाला है जल्दी ही. यह समझिए कि आपके जन्मदिवस पर आपको यह उपहार मिला है. त्रिलोचन जी हंसे अपनी मोहक, लुभावनी हंसी. फिर बोले —‘चलिए, इस खुशी में आपको पान खिलाते हैं. एक पंथ दो काज हो जाएंगे. आपका जन्मदिन भी मना लेंगे और इस किताब के आगमन की खुशी भी मना लेंगे.’

हम लोग पान वाले के ठीये पर पहुंचे. पान खाया. उन्होंने कुछ देर पान वाले से गप्प लड़ाई. उसके भाई का, बच्चों का और घरैतन का हाल-चाल पूछा. उसके बाद हम लोगों ने वहीं पास के दूसरे ठीये पर जाकर चाय पी. चाय पीने के बाद हम दोनों उनके दफ्तर में वापिस लौट आए. शाम को मुझे किताबों का बंडल लेकर हापुड़ जाना था. मैं जरा जल्दी में था. मैंने त्रिलोचन जी से विदा मांगी. त्रिलोचन जी ने कहा — ‘एक मिनट रुकिए. उसके बाद उन्होंने ‘ताप के ताये हुए दिन’ की वह पहली प्रति उठाई और उस पर लिखा — ‘अनिल जनविजय को, जो कवि तो हैं ही, बतरस के अच्छे साथी भी हैं.’ त्रिलोचन जी का वह कविता-संग्रह इस समय भी जब मैं उन्हें स्मरण कर रहा हूं, मेरे सामने रखा हुआ है. उस संग्रह पर सबसे अंतिम पृष्ठ पर मेरी लिखावट में छह पंक्तियां लिखी हुई हैं. उन्हीं दिनों कभी लिखी थीं मैंने. वे काव्य-पंक्तियां इस प्रकार हैं :

हिन्दी के संपादक से मेरी बस यही लड़ाई
वो कहता है मुझ से, तुम कवि नहीं हो भाई
तुम्हारी कविता में कोई दम नहीं है
जनता की पीड़ा नहीं है, जन नहीं है
इसमें तो बिल्कुल भी अपनापन नहीं है
नागार्जुन तो है, पर त्रिलोचन नहीं है.

Anil Janvijay

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बुधवार, 17 जून 2026

रविवार, 14 जून 2026

डॉ.भावना की सात ग़ज़लें प्रस्तुति वागर्थ

 डॉ.भावना की सात ग़ज़लें
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समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की सशक्त हस्ताक्षर डॉ.भावना जी की सात ग़ज़लें लोकप्रिय समूह "वागर्थ" में प्रस्तुत हैं। डॉ.भावना की इन ग़ज़लों में रोज़मर्रा के विषयों और सामाजिक समस्याओं पर व्यंग्य के साथ-साथ गहरी चिंता भी व्यक्त हुई है। आजकल बच्चियों पर होते हमले, हिजाब, माँ, नदी, गाँव, चिड़िया आदि विषयों पर उन्होंने अत्यंत संवेदनशील ढंग से अपनी बात कही है।
ग़ज़लों की भाषा अत्यंत सहज, सरल और बोधगम्य है, जो सामान्य पाठक और श्रोता की समझ के भीतर रहती है। डॉ.भावना के अब तक छह ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जो व्यापक रूप से चर्चित रहे हैं। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य विधाओं की कृतियाँ भी देशभर में चर्चा का विषय रही हैं। उन्हें देश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है।
उनकी एक ग़ज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत हैं, जिनमें सच्चाई और मर्म की गहरी अनुभूति है—

कभी महलों की रानी थी 
कभी महफ़िल की थी रौनक,
ग़ज़ल निर्धन के कंधों पर 
ही अब आसीन लगती है।

हमेशा घर की बहुओं में 
हज़ारों दोष होते हैं,
हमेशा अपनी बेटी ही, 
हमें शालीन लगती है।

अमीरों को मुबारक हों 
बड़े सोफ़े, नरम गद्दे,
हमारी ये चटाई ही 
हमें कालीन लगती है।

संवेदनशील और चर्चित ग़ज़लकारा डॉ.भावना की इन ग़ज़लों को पढ़िए, उन पर चिंतन कीजिए और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए।
प्रस्तुति टीप
सुनील चतुर्वेदी

एक
अजब-सा दर्द सहती है 
किसी से कह नहीं पाती

समय की तेज धारा में 
हकीकत बह नहीं पाती

मरीजों को भला वो किस 
तरह कर पायेगी चंगा

चिकित्सक बन के बेटी 
जब सुरक्षित रह नहीं पाती

कभी ताने कभी छींटाकशी 
के बढ़ते फैशन में

मेरी बिटिया बहुत नादान है 
सब सह नहीं पाती

जो खुशियों के सरोवर में 
मचल कर पाँव रखती हो

उसे कहते हो दुख की पोटली 
क्यों तह नहीं पाती

समुन्दर हो तो कोशिश करके 
वो चाहे तो मह भी ले

सरोवर को तरीके से वो 
अक्सर मह नहीं पाती

दो

लौटा है गांव कलुआ 
कमाने के बाद फिर

हासिल हुआ है प्रेम 
घर आने के बाद फिर

ऐसा नहीं वो शख़्स जो 
हारे तो चुप रहे

चट्टान बन खड़ा है 
दबाने के बाद फिर

बंधन बना था जिसका, 
उस आँगन का हर उसूल

वह लौट आया रास-
रचाने के बाद फिर

इक बार सुन लिया था 
मगर कितनी बार और

दोहरा रहा है बात 
बताने के बाद फिर

उसका भी घर जलेगा ही 
बस्ती अगर जली

पछता रहा है आग 
लगाने के बाद फिर

ओढ़े नकाब बैठा था 
घर में ही वो अमीर

चौकस हुये हैं लोग 
सताने के बाद फिर

जब तक चला वो 'केस',
रहा उससे बेदखल

वापस मिली ज़मीन 
हराने के बाद फिर

तीन
कभी झुकती है धीरे से 
कभी झटके से तनती है

हमारी जिन्दगी भी इक 
पहेली रोज बनती है

तवे पर फूलती रोटी 
गवाही दे रही उसकी

कठौती में जो आटे की 
मुलायम लोई सनती है

जिसे अपने ख्यालों में 
बसाया है मुहब्बत से

उसी को देखकर हर रोज 
अपनी ईद मनती है

कई सदमें जनम लेते 
यकीनन दोस्तों उस पल

किसी की रूह से जब रूह 
टकराती है, ठनती है

निकल आता है सच का 
सूर्य बिल्कुल उस तरह ही तो

किसी चलनी में कोई चीज
जैसे खुद ही छनती है

चार

किसी के ख़्वाब में वह 
इस क़दर तल्लीन लगती है

नदी वह गाँव वाली आज-
कल ग़मगीन लगती है

कभी महलों की रानी थी 
कभी महफ़िल की थी रौनक

ग़ज़ल निर्धन के कंधों पर 
ही अब आसीन लगती है

भरोसा है जिन्हें अपनी 
कठिन-सी साधनाओं पर

जुगाड़ों की कोई चर्चा 
उन्हें तौहीन लगती है

हमेशा घर की बहुओं में 
हज़ारों दोष होते हैं

हमेशा अपनी बेटी ही 
हमें शालीन लगती है

अमीरों को मुबारक हों 
बड़े सोफे , नरम गद्दे

हमारी ये चटाई ही 
हमें कालीन लगती है

अकड़ कुछ ऐसी दौलत की 
लगे हर शै बिकाऊ है

हमें दुनिया की नीयत तो 
अलोपीदीन लगती है

पाँच

कुछ दिन का एकान्त हुआ है 
सहना मुश्किल

माँ की पीर घनी थी कितनी 
कहना मुश्किल

जैसे जल बिन मीन,दिया है 
बिन बाती का

वैसे पल भर दूर हुआ है
रहना मुश्किल

जल,जीवन,हरियाली नारे 
खूब हैं लेकिन

दलदल में तब्दील नदी का 
बहना मुश्किल

एक हिजाब ने शांत हवा को 
उग्र बना दी

ऐसे रूढ़ विचारों का क्यों 
ढहना मुश्किल

सोने के लालच में वो न 
फँसे भी कैसे

बनना है पीतल से असली 
गहना मुश्किल

इक बक्से में खूब जमा कर 
रख भी दूँ पर

दुख की लम्बी-चौड़ी चादर 
तहना मुश्किल

छह

बड़ी उल्टी कहानी 
कर रही हूँ
मैं अब भी बदजुबानी 
कर रही हूँ

गयी हूँ माँ पे सब 
कहने लगे हैं

वही बातें पुरानी 
कर रही हूँ

बिना गलती ही शर्मिन्दा 
बहुत हूँ 
मैं खुद को पानी-पानी 
कर रही हूँ

तुम्हारे वास्ते है झूठ 
पर मैं किसी 
का हक बयानी कर रही हूँ

तुम्हें हरियालियों से 
प्रेम है तो लो
मैं अपना रंग धानी कर रही हूँ

सात

मुसीबत में भी तनती जा रही हूँ
मैं अपनी माँ-सी बनती जा रही हूँ

समझ लो बस कि मैं बहती नदी हूँ
मैं अपने आप छनती जा रही हूँ

बना कर माँ गई जीवन की मूरत
उसी मिट्टी में सनती जा रही हूँ

ये दर्पण साथ मेरा दे, नहीं दे
मैं बनती और ठनती जा रही हूँ

उधर बस रूठने का सिलसिला है
इधर मैं सिर्फ़ मनती जा रही हूँ

गई हो सौंप कर तुम वस्त्र सुख के 
मगर मैं दुःख पहनती जा रही हूँ

तुम्हें तो बेटियाँ भाती रही माँ
ग़ज़ल मैं रोज जनती जा रही हूँ

परिचय
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डॉ.भावना का जन्म 20 फरवरी को बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ। प्रारम्भ से ही अध्ययन, संवेदना और साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि रही। उन्होंने रसायन-शास्त्र में एम.एस.सी. तथा पीएच-डी. की उपाधि प्राप्त की। इसके अतिरिक्त डी.एन.एच.ई. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा भी ग्रहण की। विज्ञान और साहित्य; दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय रहते हुए उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान निर्मित की है। वर्तमान में वे बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के रसायन शास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
डॉ. भावना समकालीन हिन्दी ग़ज़ल, कविता, आलोचना तथा बज्जिका साहित्य की महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। उनके प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रहों में ‘अक्स कोई तुम-सा’, ‘शब्दों की कीमत’, ‘चुप्पियों के बीच’, ‘मेरी माँ में बसी है ’, ‘धुंध में धूप’ तथा ‘चिड़ियों की दावेदारी’ विशेष रूप से चर्चित हैं। ‘सपनों को मरने मत देना’ उनका महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह है। आलोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। ‘हिन्दी ग़ज़ल के बढ़ते आयाम’, ‘हिन्दी ग़ज़ल भाषा और मूल्यांकन’, ‘कसौटी पर कृतियाँ’, ‘बदलते परिवेश में हिन्दी ग़ज़ल’ तथा ‘हिन्दी ग़ज़ल दृष्टि और संकल्पनाएँ’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल की आलोचनात्मक परम्परा को समृद्ध किया है। बज्जिका भाषा में उनका कविता-संग्रह ‘हम्मर लेहु तोहर देह’ तथा उपन्यास ‘लाडो’ भी अत्यंत चर्चित रहे हैं। रसायन-शास्त्र विषय पर उनकी पुस्तक ‘Some Complexes of Benzothiazole Derivative’ भी प्रकाशित है।
संपर्क : आद्या हॉस्पिटल, जीरोमाइल, सीतामढ़ी रोड, मुजफ्फरपुर
ई-मेल : bhavna.201120@gmail.com