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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

हरिनारायण सिंह हरि जी के दो नवगीत प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग

 हरिनारायण सिंह 'हरि ' जी के दो नवगीत 

                       ( एक  )

दीखता धुँधला भविष्यत् आँख पर जाले हुए 
भीष्म हम हैं, द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले हुए 

सूक्ति दिनकर की हमें कब याद रहती है सखे 
द्रौपदी की साड़ियाँ फरियाद करतीं जब सखे 
हैं  हमारे  चोर  मन   तो   स्वार्थ  के  घाले हुए
 भीष्म हम हैं, द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले हुए 

पांडवों के गुण न दिखते कौरवों की गिनतियाँ 
हम नहीं सुन पा रहे हैं आर्त्तजन की विनतियाँ 
राज्य  आधे   दूर,  गउवें  पाँच  के  लाले   हुए 
भीष्म हम हैं,  द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले  हुए 

नीति-निर्धारक-नियंता  इस कदर गिर जायँगे 
जंग की ज्वाला उठेगी ,   अन्ततः जल जायँगे 
क्या  बतावें  साफ  कुरते इस  कदर काले हुए 
भीष्म हम हैं,  द्रोण हम हैं , मौनव्रत पाले  हुए 
                            •
                            ( दो ) 

पेड़ लगाया,  किन्तु    नहीं   फल  उसमें है दिखता 
भाग्य जनक का फीका-फीका यही भाग्य लिखता 

फले-फुले   यह   पेड़  अबाधित, अपने को झोंका
शीतलता    के   बदले   तन  पर  बड़ा-बड़ा फोंका 
पता   नहीं  था  बिना  मोल  के पिता यहाँ बिकता 

भट्ठी  हुई   आज  की  दुनिया  सिर्फ  जहाँ  तपना 
अब  आयेंगे,  अब    आयेंगे  अच्छे  दिन   जपना 
ऐसे   में   क्या   करे,   गयी  मृगतृष्णा  भी उकता

पूँजी   सारी   चली   गयी   इक  महल   बनाने में 
लेकिन   सुख   तो   पड़ा  रहा  उसके तहखाने में 
फिसलन  भरे  फर्श पर आखिर वह कैसे टिकता 
                              •

हरिनारायण सिंह 'हरि' : संक्षिप्त परिचय 
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• मूल नाम- हरिनारायण सिंह 
• जन्म- 2 जनवरी,1958 ई
• शिक्षा- एम. ए (राजनीति विज्ञान)
• केएसएस काॅलेज,मोहिउद्दीन (समस्तीपुर) के राजनीति विभागाध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त। 
•लेखन- हिन्दी व बज्जिका में।
• प्रकाशन- तीन प्रबंधकाव्य, पाँच कविता-संग्रह, 6 गीत-नवगीत संग्रह, एक गजल-संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित। एक कविता संकलन और एक लघुकथा संकलन का सम्पादन। कई पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का संपादन ।
प्रसारण- आकाशवाणी के पटना व दरभंगा तथा दूरदर्शन के पटना व मुजफ्फरपुर केन्द्र से प्रसारण। 
• मूल्यांकन-पुस्तक- डाॅ नीरज कुमार सिन्हा द्वारा संपादित मूल्यांकन-पुस्तक 'हरिनारायण सिंह हरि का गीत-काव्य' प्रकाशित। 
•पता- हरिद्वार भवन,राजपुर-जौनापुर 
          पो-जौनापुर,
          भाया-मोहिउद्दीन नगर 
          जिला-समस्तीपुर-848501
          मोबाइल नंबर-9771984355
 •ई-मेल - hindustanmohanpur@gmail.com

साहित्य समाचार : प्रस्तुति वागर्थ ब्लॉग


समूह चित्र 

रपट साभार 
वरिष्ठ पत्रकार जगत शर्मा जी

अपने नाम विकास को सार्थक करते हैं बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ.विकास दवे - रघुनंदन शर्मा 

आदित्य संस्कृति पत्रिका के साहित्यकार डॉ.विकास दवे विशेषांक का लोकार्पण संपन्न

भोपाल | ' नाम का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है जैसे विकास नाम को सार्थक करते हैं बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ.विकास दवे वे एक अच्छे, संगठक आयोजन संपादक साहित्यकार मार्गदर्शक और सबको साथ लेकर चलने वाले अच्छे मित्र हैं | ' यह उदगार हैं पूर्व सांसद और मानस भवन के संचालक श्री रघुनंदन शर्मा के जो दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय सभागार में  ' आदित्य संस्कृति ' मासिक पत्रिका के साहित्यकार डॉ.विकास दवे विशेषांक का लोकार्पण करते हुए बोल रहे थे। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया, तत्पश्चात डॉ प्रतिभा द्विवेदी ने मां सरस्वती की वंदना की | आदित्य संस्कृति पत्रिका एवं संदर्भ प्रकाशन भोपाल द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मंचस्थ अतिथियों का स्वागत पुष्पहार और अंग वस्त्र ओढ़ाकर कर राकेश सिंह ने किया , तत्पश्चात पत्रिका के संपादक श्री भानु शर्मा ने स्वागत उद्बोधन देते हुए पत्रिका के उद्देश्य और अभी तक की यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आदित्य संस्कृति पत्रिका की यात्रा पिछले सात सालों से अनवरत जारी है। कोरोना काल में जब अन्य बड़ी बड़ी पत्रिकाओं पर संकट आया और वह बंद हो गई लेकिन आदित्य संस्कृति तब भी प्रकाशित होती रही। आज पत्रिका सबसे अधिक पूर्वोत्तर राज्यों और दिल्ली एनसीआर में लोकप्रिय है। डॉ विकास दवे जी पर विशेषांक प्रकाशित करना पत्रिका की यात्रा में एक विशेष उपलब्धि के रूप में हमेशा गिना जाएगा। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्री जगत शर्मा ने किया | इस अवसर पर पत्रिका पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार घनश्याम मैथिल अमृत ने कहा कि -' यह विशेषांक डॉ.विकास दवे की व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कई अनछुए पहलुओं को पाठकों के सामने प्रकट करता है |' लघुकथा शोध केंद्र की निदेशक श्रीमती कांता रॉय ने विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए कहा कि -' डॉ.विकास दवे के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है उनकी राष्ट्र बोध की चेतना और सभी के प्रति समभाव की भावना अनुकरणीय है | ' उर्दू अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद की निदेशक डॉ.नुसरत मेहदी ने कहा -' डॉ.दवे हम सबके मार्गदर्शक हैं वे कभी किन्हीं परिस्थिति में भी विचलित नहीं होते वे सदा सहज रहते हैं सदा मुस्कराते रहना उनके व्यक्तित्व की बड़ी विशेषता है| ' इसके साथ ही ' गीत गागर ' पत्रिका के संपादक वरिष्ठ गीतकार श्री दिनेश प्रभात ने कहा की -' डॉ.विकास दवे की उपस्थिति ही किसी आयोजन को भव्यता प्रदान करती है उनका सकारात्मक ऊर्जा से भरा व्यक्तित्व सबके लिए प्रेरणा पुंज है |' आयोजन में वरिष्ठ रंगकर्मी और ख्यात अभिनेता संजय मेहता ने भी डॉ.विकास दवे के व्यक्तित्व पर अपने विचार रखे |इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं निदेशक मुक्तिबोध सृजन पीठ ने कहा कि -' शब्द ही हमारे मित्र शब्द ही हमारे शत्रु होते हैं इसलिए शब्दों का हमें बड़े सोच समझ के प्रयोग करना चाहिए,साहित्यकार शस्त्र और शास्त्र दोनों धारण करने वाला हो , डॉ.विकास दवे ने प्रदेश ने अकादमी के निदेशक के रूप में   उल्लेखनीय कार्य किए हैं आदित्य संस्कृति ने उन पर केंद्रित विशेषांक निकाल कर महत्वपूर्ण कार्य किया है | ' कार्यक्रम के अंत में संयोजक पत्रकार श्री जगत शर्मा ने सभी का आभार प्रकट किया | इस आयोजन में श्रीमती सुनीता दवे,डॉ.संजय सक्सेना ,रामराव वामनकर,करुणा राजुरकर, कर्नल डॉ.गिरजेश सक्सेना,गोकुल सोनी, डॉ मोहन तिवारी आनंद,मनोज जैन मधुर, सुनील चतुर्वेदी, श्रीमती साधना गंगराड़े, श्रीमती सीमा शर्मा, हरिवल्लभ शर्मा , हरिओम श्रीवास्तव,जगदीश कौशल, डॉ.वीणा सिन्हा ललित व्यास,चित्रांश खरे, कपिल भार्गव,संजय पथोडकर,राजकुमार बरूआ सहित नगर के अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकार उपस्थित थे |

आदरणीय राजा अवस्थी जी के दो नवगीत प्रस्तुति ब्लॉग वागर्थ

              राजा अवस्थी जी              

नवगीत -1.   

   बहुत सुविधाएँ जुटा ली


जिन्दगी ने बहुत सुविधाएँ जुटा ली।

फटे जूते अंगौछे बिन खेत पर होंगे पिताजी 
मुरहरे में दाल अम्मा पकाती होंगी; 
हर सुबह दोपहर संध्या कोख जाये को सुमिरती यशोदा की रीति, गाती-निभाती होगी;

नहीं छूटी पिताजी की भी कुदाली।

एक तन पर शव बहुत हैं शहर है, उत्सव बहुत हैं ओढ़ना, खाना, पहनना, जर जुटाना है; 
अहर्निश ये व्यस्तताएँ, मिटाती संवेदनाएँ 
बहुत थोड़ा पा, बहुत कुछ भूल जाना है;

लोग अपने, जब मिले नजरें झुका लीं।

अब कहाँ घर-द्वार-आँगन, वहाँ की किलकारियाँ 
शहर में बस एक कमरा चीखता है; 
कहाँ दुलराना सुलाना, लोरियाँ गाना सुनाना
खीझती माँ, तनावों का घर पिता है;

यंत्रणा की नदी में क्यों नाव डाली
नवगीत -2.

 आ बैठें साथ कुछ तेरी, 
कुछ मेरी, हो जाए बात, 
आ बैठें साथ।

कितने दिन से बीड़ी-साथ नहीं पी;
बंद पड़ीं सुख-दुख की मन में सीपी;
अनुभव का सारा ही खारा गुजरात, 
आ बैठें साथ।

मालुम भी हैं कुछ घर-गाँव के हाल; 
सुनते हैं लड़कों ने बदली है चाल;
गाली मुँह में बसती छुरियों पर हाथ,
आ बैठें साथ।

संबंधों का संगम लुप्त हो चला; 
वैयक्तिकता में सौहार्द खो चला;
घर का घरवालों को हाल नहीं ज्ञात, 
आ बैठें साथ।

राजा अवस्थी 
गाटर घाट रोड, आजाद चौक 
कटनी - 483501(मध्यप्रदेश)
मोबा. 9131675401


परिचय
______________________________________
     परिचय -
नाम - राजा अवस्थी
शिक्षा - परास्नातक (हिन्दी साहित्य), शिक्षा  
           स्नातक
व्यवसाय - मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग में अध्यापन 
सम्प्रति - प्रधानाध्यापक, सांदीपनि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, झिंझरी ,कटनी 

लेखन - नवगीत एवं अन्य काव्य विधाओं के साथ 
            आलोचना-आलेख।

प्रकाशन -(1) 'जिस जगह यह नाव है' (नवगीत  
              कविता संग्रह) का अनुभव प्रकाशन, 
              गाजियाबाद से प्रकाशन सन् 2006 एवं
     (2) 'जीवन का गुणा-भाग' (नवगीत कविता 
            संग्रह) श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोयडा, 
             प्रकाशन वर्ष - 2021
(3)कैकेयी अब बोलती (लम्बी कविता)
(4)आलोचना का ब्राह्मणवाद (आलोचना)
(5) 'समकालीन हिंदी ग़ज़ल - पांँच दशक: पाँच कदम' (संपादन)

   * विश्व हिन्दी साहित्य में राम कथा के सर्वथा   
      उपेक्षित पात्र कैकेयी पर केन्द्रित विशिष्ट काव्य 
     "कैकेयी अब बोलती" का सृजन विशेष रूप से 
      उल्लेखनीय।

   * साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित 'समकालीन  
      नवगीत संचयन' एवं डॉ ओमप्रकाश सिंह द्वारा संपादित 'नई सदी के नवगीत' में प्रमुख कवि के रूप में शामिल किए जाने के साथ शिवानंद सहयोगी जी के द्वारा संपादित ग्रंथ 'नवगीत अर्धशतक' एवं लगभग सभी महत्वपूर्ण समवेत नवगीत संकलन यथा -  
      नवगीत नई दस्तकें (संपादक - डाॅ. निर्मल 
      शुक्ल), गीत वसुधा (संपादक - नचिकेता),    
      समकालीन नवगीत कोश (संपादक     
     -नचिकेता), नवगीत के नये प्रतिमान, नवगीत 
      का लोकधर्मी सौंदर्यबोध, नवगीत का 
      मानवतावाद (संपादक - डाॅ राधेश्याम बंधु), 
      सहयात्री समय के (संपादक - डाॅ. रणजीत 
      पटेल), नई सदी के स्वर, भाग -5 (संपादक -  
      हीरालाल मिश्र 'मधुकर') सहित कई और   
      समवेत संकलनों एवं नवगीत विशेषांकों में  
       नवगीत संकलित।
      नवगीत एवं हिन्दी ग़ज़ल आलोचना पर केंद्रित  
      कुछ पुस्तकों में लेख शामिल

   * सन् 1986 से पत्र - पत्रिकाओं में कविताओं    
      एवं आलेखों का प्रकाशन

   * आकाशवाणी जबलपुर, शहडोल एवं दूरदर्शन   
      केन्द्र भोपाल के साथ स्थानीय चैनलों पर 
      कविताओं का प्रसारण


  * सम्मान - * कादम्बरी साहित्य परिषद जबलपुर का अखिल भारतीय नवगीत सम्मान - निमेष सम्मान 2006(नवगीत संग्रह जिस जगह यह नाव है 'के लिये),
* बैसवारा शोध संस्थान लालगंज, रायबरेली का नवगीत गौरव सम्मान-2018,
* प्रतिष्ठित किस्सा-कोताह नवगीत सम्मान 2020,
* साकीबा, विदिशा - भोपाल का नवकृति सम्मान 2021,इनके अतिरिक्त और भी कई संस्थाओं द्वारा सम्मान।
विशेष - यूट्यूब पर 'नवगीत धारा' श्रृंखला अंतर्गत नवगीत पर चर्चा एवं कालजयी कहानियाँ श्रृंखला के अन्तर्गत कहानी-पाठ-प्रस्तुति
ADDE KI BAAT यूट्यूब चैनल पर विविध साहित्यिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति 

सम्पर्क -
गाटरघाट रोड, आजाद चौक, कटनी
483501, मध्यप्रदेश
मोबा 9131675401
Email - raja.awasthi52@gmail.com

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पंडित सुधाकर शर्मा जी के गीत प्रस्तुति वागर्थ

पं सुधाकर शर्मा जी के गीत

       कृपा दृष्टि माँ तेरी
       हर क्षण सम्बल मेरा है !

       मैं तो मूक - अशक्त 
       बोल भी कब पाता था ?
       ऍ,ऑ,ऊॅ,ओं जैसे --
       शब्दों से ही बस नाता था!
       वह भी तो था समय कि जब
       खा-पी भी कब सकता था?
       तू जब कौर खिलाती मॉ
       तब - तब मैं खा पाता था !!

       मैंने तब समझा था; तू है तो
       प्रति पल मेरा है !!

       तेरी उॅगली की इंगिति पर
       धरती पर पद धरता!
       तू उछाह भरती तो मेरा
       मन उछाह था भरता !
       मेरी किलकारी सुन-सुन कर
       तू  किलकारी भरती...
       मेरे गिर कर उठने पर...
       तेरा मन मचल-सॅवरता!

      तेरा प्रबल प्रवाह तरंगित 
      अविरल मेरा है !!

दो

   पार्थ सदृश सौभाग्य नहीं,
   जो धर्म क्षेत्र में 
   नारायण के विराटत्व को वरता!
   किंतु परम सौभाग्य कि माॅ की 
   करुणा ने बीज रूप को ममता के     
   संस्पर्श विराट दिये हैं !!

वह दुलार - वात्सल्य असीमित 
कितना है विस्तार अनन्त ?
जिसके स्नेह सिक्त ऑचल में 
स्वत: सिमट कर रहें दिगंत !!

चुम्बन से अभिषिक्त कपोलों ने रक्ताभा पायी है,
अरुणिम अधरों ने उन्नत सर्वोच्च ललाट किये हैं !!
  
माॅ के प्रति स्पंदन से ही -
स्पंदित है जीवन!
स्रोत अजस्र शक्तियों का माॅ;
स्नेह-छत्र संजीवन !!

ऊॅचे-नीचे दुर्गम पथ पर पद भर दूभर चलना;
प्रेरक शक्ति-संस्कारों ने सुपथ सपाट किये हैं !!

 तीन

मॉ जैसी बस मॉ ही होती ; 
शेष दृश्य - अदृश्य सदा   
माॅ के सम्मुख बौना है !

     अ-अनार,आ-आम और 
     क्ष, त्र, ज्ञा मॉ से सीखा!
     अन्य कोई क्या पहला गुरु 
      हो सकता मातु सरीखा !
      
 माॅ की स्नेहिलछवि से महका 
 मन का  हर कौना  है !!
      
       माॅ  के पल्लू में सिमटा -
       सहमा था शैशव मेरा !
       पल-पल प्रेरक शक्ति जगाती 
       मुझमें अलख सबेरा !!

 माॅ के अंक सदृश अप्रतिम -
 क्या कोई बिछौना है ?

        ऑखों में जीवन - संवेदन 
        माॅ ने ही दिखलाया !
        मूल्यवान नैतिक-निष्ठा का
        पग - पग पाठ पढ़ाया !!
 
सच्चाई है चोखी चाॅदी, 
साहस शुभ सौना है !!

                    
चार

माॅ तू मेरे इस अमोल -
जीवन का अथ है!
   
   जिसका अथ तू है ;
   उसका क्या कोई समापन होगा?
   गूढ़ रहस्यों के "अ " - ज्ञात का
   कैसे ज्ञापन होगा ?

तेरे वरद हस्त पा संसृति -
भला अकारथ है ?

       यह अकूत विश्वास कि 
       तू है तो स्फूर्ति है!
       मातृ तत्व से प्रकट प्रकृति ही
       सतत  पूर्ति  है  !!

" चरैवेति " की ऋचा फलित,
   तू जाग्रत रथ है !!

        अंक निरंक नहीं,
        सपने साकार सॅजोता !
        तुझे पा लिया,
        व्यर्थ रत्न-रत्नाकर- गोता !!

 मन्तव्यों - गन्तव्यों का तू 
  सुगम - सुपथ है !!

माॅ ! तू मेरे इस अमोल -
जीवन का अथ है !!

पाँच
           
सोच रहा हूॅ ....
तुम्हें क्यों करूॅ मैं सम्बोधित ?
क्यों कि तुम्हीं तो हो मेरा सारा सम्बोधन!
       
       साॅसों में विश्वास रच रहा 
       नित नूतन उत्साह!
       हुलसित हृदय भर रहा रह-रह
        उच्छल उदधि उछाह !!

सारा कथ्य ध्यान में रख
वाक्यों में नव विन्यास बूझता !
स्वगत तुम्हीं को तो करता रहता उद्बोधन !!

      हर युग में ही तो कहता -  
      आया है कवि - मन !
      फिर भी कितना रहा -
      अनकहा शब्द- समर्पन ?

साध्य - साधना मध्य रहे जो
पृष्ठ अनलिखे अनगिन,
वह रचाव ही तो माॅ है तेरा शुभ शोधन !!

        छह  
 
    तेरे हेतु असम्भव क्या माँ ?
    तू प्रतीक है हर सम्भव की!
    मैने निरखा रूप समुच्छल,
    हरिताभा तू प्रति पल्लव की !!

        दूर - दूर तक फैले खेतों में 
        तू स्वेद कणों की आभा!
        श्रम तुझसे है स्वयं प्रतिष्ठित,
        तू खलिहानों की दिव्याभा !!

  अन्नपूर्णे सर्व धान्य - धन
  पराकाष्ठा तू वैभव की !!
   तेरे हेतु असम्भव क्या माँ?
   तू प्रतीक है हर सम्भव की !!    

          रूप, गंध, रस, मिट्टी के -
          सोंधेपन का आभास तुम्हीं हो!
          धर्म - धरा, विस्तृत नीलाम्बर,
           जाग्रत जग विश्वास तुम्हीं हो !!

माँ तुम ही दर्शन - दिग्दर्शन,
तुम उत्पन्ना नव - अभिनव की !!
तेरे हेतु असम्भव क्या माँ ?
 तू प्रतीक है हरसम्भव की !!

प्रस्तुति
वागर्थ ब्लॉग

डॉ कैलाश गुप्ता सु मन जी के दो गीत प्रस्तुति ब्लॉग वागर्थ

          डॉ कैलाश गुप्ता सु मन जी


गाँव गली घर शहर देश में ,
अलख जगाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की ,
पीर सुनाता  हूँ।

मेरे मन में पाप नहीं है
किंचित भी संताप नहीं है
वेशक ढंग पुराना मेरा
किंतु किसी की छाप नहीं है

मैं स्वारथ में नहीं किसी को 
बाप बनाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की  
पीर सुनाता हूँ।

रखता महज ईश से आशा। 
नहीं आज तक मिली निराशा। 
काव्य द्रोहियों को लग सकती, 
कुछ कड़वी सी मेरी भाषा।। 


कड़वी दवा पिलाकर जड़ से 
रोग मिटाता हूँ ।
मैं अपने नगमों में जग की 
पीर सुनाता हूँ। 


नहीं  लोभ  में, मैं बिकता हूँ। 
जो दिखता है वह लिखता हूँ। 
सच कहने के कारण कुछ को, 
खलनायक सा में दिखता हूँ। ।


शब्दों के द्वारा तानों के  ,
तीर चलाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की 
पीर सुनाता हूँ।। 


प्रेम सभी से मैं  करता हूँ।
सदभावों के घट भरता हूँ ।
बेशक काल खड़ा हो सम्मुख, 
बस ईश्वर से मैं डरता हूँ। ।

श्रम से संग तोड़कर अपनी 
राह बनाता हूँ। 
मैं अपने नगमों में जग की 
पीर सुनाता हूँ।। 

दो

हम जगत पहचानने को चल दिये।
पर स्वंय को आज तक ना पढ़ सके।।

दादुरों को आज बगुले खल रहे ।
दृग पलक पर भाव ओछे पल रहे।
द्वेष की जलती मशालों से स्वंय,
व्यर्थ में ही बाँस जैसे जल रहे।।

पड़ गई आदत हमे बैशाखिंयों की
हम स्वंय के पाँव से ना बढ़ सके।

खो चुके  इंसानियत  हम ताव  में।
दानवों   को   मात   दें  दुर्भाव  में।
मर्म ना समझे कभी हम प्रीति का,
ढोर   से   बदतर   हुये   वर्ताव  में ।।

दर्प  में  बातें  करें  हम  व्योम  की
भूधरों पर आज तक ना चढ़ सके।

आज जग में झूठ सबको भा रहा। 
देखकर सिर सत्य का चकरा रहा ।
आलिमों   के  भाग  में  रोटी  नहीं, 
जाहिलों  का  दल मिठाई खा रहा।। 

किस तरह से हम जगत के गुरु बने,
जब प्रगति के संग हम ना गढ़ सके।

गीत  गजलें सब लतीफा   हो   गये।
अब   धतूरे  भी  शरीफा   हो  गये ।
जब सियासत लाभ का सौदा दिखी,
चोर  जितने  थे  खलीफा  हो  गये।। 

सत्य  पर  हावी  दिखी  तब झूठ के
हम  तमाचे  गाल पर  ना जड़ सके।

कैलाश गुप्ता (सु मन)
मुरैना मध्य प्रदेश
9826819117