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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

नवगीत

समकालीनता का पर्याय: नवगीत
                                                                                                                                          - मधुकर अष्ठाना
          संवेदना जब अभिनव प्रतीक-बिम्बों को सहज रूप से सटीक प्रयोग कर अपने समय की विविध सामाजिक समस्याओं एवं विषम परिस्थितियों से जूझती साधारण जन के जटिल जीवन संघर्ष को न्यूनतम शब्दों में छान्दसिक गेयता के साथ मार्मिक रूप में परिणत होती है तो नवगीत की सृष्टि होती है। नवगीत की कुछ मुख्य शर्तें हैं, जिनमें गीत का पारम्परिक छान्दसिक शब्द संयोजन, सहज-सम्प्रेषणीय प्रतीक-बिंब योजना, कम से कम छोटे छन्दों में और दो या तीन बन्दों में विशिष्ट कहन के साथ कथ्य का प्रस्तुतिकरण एवं लोक संवेदना के प्रति निष्ठा, नवगीत में लोक-संस्कृति, लोक व्यवहार, पूँजीवाद समर्थक व्यवस्था के प्रति गंभीर आक्रोश, प्रशासन में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता, विषमता एवं विसंगति उत्पन्न करते रहने की साजिश, धार्मिक कट्टरता, शोषित-उत्पीड़ित आम आदमी की पीड़ा बेकारी, रोजी-रोटी की समस्या, मानवाधिकारों की उपेक्षा, आत्महत्या करते किसानों की व्यथा-कथा, महिलाओं की दयनीय दशा आदि वर्तमान अनुत्तरित प्रश्नों को समाहित करते हुए जो अभूत पूर्व कथ्य आज के नवगीतकार प्रस्तुत कर रहे हैं, वह लोक संवेदना का ही काव्य है, जनसाधारण की पीड़ा की सम्प्रेषणीयता हेतु ही नवगीत में आंचलिक संस्पर्श की रंगिमा एवं मिथकों की भंगिमा ने इसे नयी ऊँचाई प्रदान की। वर्तमान में ऐसी स्थिति आ गयी है कि नवगीत के सम्मुख काव्य की समस्त विधाएँ बौनी लगती हैं और नवगीत मुख्य धारा में अर्द्धशती यात्रा कर, लोक संवेदना का प्रमुख प्रवक्ता सिद्ध हो रहा है। प्रत्येक रचनाकार अपनी रागात्मक अनुभूतियों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का मार्ग स्वतः तलाश करता और स्वतः मार्ग प्रशस्त करता है जो उसकी मौलिक प्रवृत्ति का परिचायक होता है, यों तो लीक से हटकर चलना सरल नहीं है, किन्तु वास्तविक नवगीतकार तो वही है जो समतल-सुव्यवस्थित राजपथ का परित्याग कर वनांचल की कँटीली झाड़ियों से होता हुआ अपने दुर्गम पथ का स्वयं निर्माण करता है। यद्यपि छंदात्मक गीत की लयात्मक सर्जना के सोपानों पर चढ़ते हुए ही नवगीत की शिखरीय साधना सम्पन्न हो पाती है, किन्तु युग सापेक्ष सोद्देश्य चिन्तन की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ‘‘किसी भी उत्कृष्ट कला की तरह नवगीत भी अस्तित्व का साक्षात्कार कराता है। हमारा शरीर, हमारी आत्मा, हमारे स्वप्न, हमारी मृत्यु भी हमारे विचारों को प्रभावित करते हैं और नवगीत का एक-एक शब्द, एक-एक बिम्ब उसकी प्रतिच्छाया है।’’
          प्रत्येक दृष्य में एक विशिष्ट वातावरण का सृजन होता है, हम अपने नेत्रों से दिन-प्रति-दिन उन दृश्यों को देखते हैं और बार-बार दृष्टि पड़ने से उनका सूक्ष्म प्रभाव अन्तर्मन पर पड़ता है। उन दृश्यों द्वारा मुखरित भावनाओं, स्थितियों, मुद्राओं के अनुसार ही हमारे मन में बिम्ब उभरते हैं और वैसी ही मनस्थितियों में उसी के अनुरूप भावनाएँ प्रकट होती हैं, मनुष्य का मन कैमरे के सूक्ष्मदर्शी लेन्स की भाँति होता है। कुछ कैमरों की शक्ति भी अधिक होती है और लेन्स भी उच्चकोटि का लगा रहता है कि उनमें स्पष्ट और यथार्थ बिंब बोलते प्रतीत होते हैं। वाह्य दृष्यों से उत्पन्न वातावरण के प्रभाव से प्रकट दृश्य हमारे हृदय में तो निगेटिव रूप में आकार ग्रहण करता है जिसे पाजिटिव रूप में बिम्बों के माध्यम से उतारने पर प्रभावित विचार एवं संदेश स्पष्ट होते हैं। बिम्ब संबंधित दृश्य को न्यूनतम शब्दों में व्यक्त करने की ऐसी कला है जो शिल्प
की गुणवत्ता एवं वास्तविकता को विश्वसनीयता प्रदान करती है, साथ ही संश्लिष्ट भावनाओं को भी सहज एवं बोधगम्य बना देती है। एक निष्ठावान, ईमानदार अभिव्यक्ति के लिये प्रतिश्रुत रचनाकार को इसीलिये आवश्यकता है अपनी दृष्टि को उच्च गुणवत्तायुक्त लेन्स की तरह प्रयोग करने की क्षमता का
विकास करने की जिससे वास्तविक बिम्बों का सृजन कर सके, किन्तु आज का रचनाकार गहन अध्ययन एवं काव्य-साधना के बगैर काव्य-सिन्धु में छलाँग लगा रहा है, फिर उसकी नियति क्या होगी ? यों भी वर्तमान में नवगीत को विकृत करने की साजिश भी उसे गंभीर क्षति पहुँचा रही है। नवगीत से छान्दसिकता का लोप करने तथा नयी कविता की भाँति मुक्त काव्य बना देने को प्रयत्नशील कुछ रचनाकार न जाने किसी आदर्श से प्रेरित है। कुछ नवगीतकार नयी कविता और नवगीत दोनों विधाओं में समान रूप से सृजन कर रहे हैं जिससे प्रतीत होता है कि नवगीत के विशिष्ट अधुनातन रूप में स्वयं की अनुभूतियों को व्यक्त नहीं कर पाते और इतिवृत्तात्मकता, वायवीयता एवं काल्पनिकता से ही उन्हें संतुष्टि मिल पाती है या नवगीत के प्रति निष्ठा और आत्म विश्वास के अभाव का आग्रह उन्हें अन्य विधा को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने हेतु प्रेरित करता है। नवगीत, एक ही बिम्ब से विस्तृत और गंभीर कथ्य प्रस्तुत करने की विशिष्ट शैली का नाम है, जिसमें न्यूनतम शब्दों का प्रयोग अनिवार्य है। परम्परागत गीतकारों अथवा नयी कविता से संतुष्टि प्राप्त करने वाले रचनाकारों को नवगीत रास नहीं आता, किन्तु किसी लोकप्रिय विधा को जान-बूझ कर विरूपित करने की चेष्टा करना उचित नहीं कहा जा सकता, छान्दसिकता के अभाव में नवगीत की गेयता आहत होती है और न वह नवगीत कही जा सकती, न ही नयी कविता, इसके साथ ही यह तथ्य है कि नवगीत लोक संवेदना का काव्य है लेकिन गेयता के अभाव में वह जन-साधारण से दूर हो जायेगी, जिसकी पीड़ा को सम्प्रेषित करने के लिये सृजन किया जाय, उसी की जबान पर न चढ़े तो वह रचना उद्देश्यहीन हो जायेगी, अतः यदि नवगीत को जन-जन तक व्यापक बनाना है तो गेयता एवं सहजता अनिवार्य तत्त्वों को दर किनार नहीं किया जा सकता है। जहाँ तक दोहा तथा ग़ज़ल का प्रश्न है, ये नवगीत की सहयोगी विधाएँ हैं जिनसे इसे कोई क्षति पहुँचनेवाली नहीं प्रतीत होती है। नवगीत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं चर्चित आचार्य प्रो० देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' भी दोहा तथा गजल को नवगीत की सहयोगी विधा मानते हैं और स्वयं भी प्रतिष्ठित दोहाकार एवं श्रेष्ठ गजलकार हैं।
          वर्तमान युग में नवगीत काव्य-संसार एवं समकालीनता का पर्याय बन चुका है और इसको पृथक कर अपने युग की पहचान असंभव प्रतीत होती है| जीवन की आपाधापी में एक ऐसी लक्ष्यहीन दौड़ चल रही है जिसका अंत अंतिम साँस के ही साथ होता है। विखण्डन, बिखराव, विसंगति, विषमता की परिधि में जीवन की उन्मुक्त सहजता एवं स्वाभाविकता जो उसकी स्वभावगत विशेषता है, चिन्ताओं एवं समस्याओं में उलझ कर तार-तार हो चुकी है और प्रत्येक व्यक्ति एक बनावटी जीवन जीने को विवश है, जिसमें मन रोता है, किन्तु अधरों पर मुस्कान रहती है। संवेदनाहीन व्यवस्था के प्रति प्रत्येक हृदय में आक्रोश एवं प्रतिरोध का सागर भरा है। मानव की स्वाभाविक सहनशक्ति को निर्मम परिवेश ने सोख लिया है और जिजीविषा के पथ में त्रासदी बढ़ती जा रही है, ऐसी जटिल परिस्थिति में नवगीत ही पाखण्ड को खण्ड-खण्ड करता हुआ, अँधेरे को छिन्न-भिन्न कर, छल-छद्म के पर्त दर पर्त छिलके उतारता, मानवीय अस्मिता को जीवन्त बनाने को सफल प्रयास कर रहा है, निश्चय ही नवगीत ने मानवता को नूतन जीवनशक्ति प्रदान की है और समय की आवश्यकता के अनुरूप अभिव्यक्ति में जन साधारण की त्रासदियों एवं कुण्ठाओं को पूरी ईमानदारी के साथ यथार्थ रूप में चित्रित करते हुए पाठकों को इस दिशा में चिन्तन करने हेतु प्रेरित किया है जिसके दूरगामी परिणाम निकलने की प्रबल संभावना है। समय की धारा अविच्छिन्न रूप से निरन्तर आगे बढ़ती रहती है, किन्तु धारा की गति के साथ तटवर्ती दृष्य भी परिवर्तित होते रहते है और यही परिवर्तन तत्सम्बन्धी अनुभूतियों एवं भावनाओं के कारण हमारी अभिव्यक्ति की प्रवृत्तियों में भी बदलाव लाता है तथा परम्परागत रूढ़िग्रस्त विचारों में भी नूतन दृष्टिकोण से परिपूर्ण अभिनव चेतना जाग्रत कर देता है। भौतिक जगत की अपेक्षा साहित्य जगत में परिवर्तन की प्रक्रिया अधिक तीव्र होती है और इसमें शीघ्र परिलक्षित होने लगता है। जिसके परिणाम स्वरूप समयानुकूल तथा आवश्यकतानुरूप जनाकांक्षाओं की अपेक्षा में सक्षम साहित्य का सृजन होता है, जिसमें युगबोधी समकालीन परिवेश के साथ भाव-शिल्प-शब्द विन्यास प्रतीक-बिम्ब कथ्य एवं कहन का विकसित एवं नूतन स्वरूप स्वतः प्रकट होने लगता है जिसकी काल सापेक्षता, प्रासंगिकता तथा अभिनव प्रयोगशीलता टटकेपन का एहसास कराने में सक्षम होती है तथा जन-जन की संवेदनाओं से जोड़ती है। परिष्कृत, सुसंस्कृत, न्यूनतम शब्दों की संरचना, परस्पर व्यवहार में प्रयुक्त सहज एवं बोधगम्य प्रवाहपूर्ण भाषा और अभिव्यक्ति में सत्यनिष्ठा, छान्दसिक लयबद्धता प्रवाहपूर्ण भाषा और अभिव्यक्ति में सत्यनिष्टा, छान्दसिक लयबद्धता के साथ लोकमानस की निकटता सामाजिक चेतना के विविध आयामों को व्यापक बनाती है जिसकी सामर्थ्य एक मात्र नवगीत में ही दिखाई पड़ती है।
          युग परिवर्तन के साथ, वैयक्तिक स्थापनाओं के साथ, तात्कालिक समस्याओं तथा आस्था विश्वासों के साथ और संस्कृति एवं मानव मूल्यों के क्षरण के साथ, इनके अतिरिक्त अनेक अपरिहार्य विसंगतियों तथा हर क्षेत्र में अव्यवस्थाओं के फल स्वरूप गीत कब नवगीत में परिवर्तित हो गया, इसे तो डॉ० शंभुनाथ सिंह ने पहचाना और सामयिक आवश्यकता के अनुरूप नयी कविता के समकक्ष नवगीत नाम से अविहित किया, जो अब तक किसी भी कालखण्ड में अप्रासंगिक नहीं घोषित किया जा सका, जबकि इसके विपरीत अनेक विधाएँ एक आंदोलन की तरह आई और अपनी क्षणिक चमक दिखा कर समय के गर्त में विलीन हो गईं। नवगीत की रचनात्मक प्रवृत्ति में अनेक गुणात्मक उपलब्धियाँ, उसके कलेवर, शब्द-विन्यास, भाव एवं कथ्य के संरचनात्मक धरातल पर अभिनव शिल्प में परिलक्षित हुई, जिनमें तीक्ष्ण धार है, अपूर्व तेवर है और ऐसी मारक क्षमता है, जो प्रत्येक मन में संवेदना उत्पन्न कर पाषाण को भी पानी-पानी कर देती है। अनेक नवगीत के विद्वानों ने अपने व्यक्तिगत अहम की संतुष्टि हेतु अलग-अलग नामकरण करने का प्रयास किया, किन्तु उन्हें पाठकों ने नकार दिया और अन्ततः नवगीत शब्द ही आरूढ़ हो गया जो आधी शताब्दी की यात्रा पूर्ण करते हुए वर्ष बहुआयामी हो चुका है और वर्तमान समय में काव्य की मुख्यधारा बन चुका है, नया गीत, आज के गीत, ऐंटीगीत, ताजागीत, टटके गीत, प्रतिबद्ध गीत, जनबोधी गीत, जनवादी गीत, जनगीत, परागीत, पुनर्नवगीत, समकालीन गीत, नवान्तर गीत आदि नाम नवगीत के सम्मुख अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर सके| उक्त नामधारी स्वरूपों रंग-प्रभाव-आचरण-संबोधन-बुनावट कसावट एवं समस्त आनुषंगिक परिवर्तन संपूर्णता के जिस बिन्दु पर एकाकार होकर एकाग्र एकात्मता ग्रहण करते हैं, वहीं वास्तविक नवगीत की संज्ञा सार्थक करता है| अनेक रूपों में भी गीत की आत्मा, उसका शाश्वत भाव, उसका चिन्तन, उसकी संवेदना चेतना को प्रभावित एवं सकारात्मक चिन्तन की प्रेरणा देती है। नवगीत की तथ्यपरकता, समसामयिक संवेदनशीलता उसकी प्रासंगिकता एवं सम्प्रेषणीयता के गुणत्व का बोध कराती है, जब हम हिन्दी काव्य के गत आधी शताब्दी से चली आ रही धारा का अनुशीलन एवं मंथन करते हैं तो नवगीत के अतिरिक्त अन्य कोई विधा इतनी भाव-प्रवणता से लोक संवेदना का साक्षात्कार नहीं कराती है, जिसमें जनसाधारण के दुख-सुख और समाज में व्याप्त विसंगतियों का जीता- जागता चित्रण हो, मानव मूल्यों के क्षरण की पीड़ा हो, भूख-प्यास, शोषण उत्पीड़न का यथार्थ चित्रण हो, जिसमें राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक भ्रष्टाचार-विषमता छल-छद्म-पाखण्ड और कुरीतियों का कच्चा चिट्ठा हो और प्रतिरोध एवं आक्रोश का तेवर हो। नवगीत आम जनता के जीवन से जुड़ा उनकी परिधि के हर पहलू का कालजयी गायन है जिसका युग बोधीय समकालीन प्रदेय शब्दातीत है।
           सर्व प्रथम गीति रचनाओं में नूतनता का समावेश हमे वर्ष 1952 में अज्ञेय के सम्पादन में प्रकाशित द्वितीय तारसप्तक में दिखाई पड़ता है जिसकी प्रखर पुनरावृत्ति वर्ष 1958 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा सम्पादित संकलन (गीतांगिनी) में प्रकाशित गीतों में होती है, जिन्हें सर्वप्रथम नवगीत अथवा नये गीत की संज्ञा दी गयी। तत्कालीन परिवेश में उक्त काव्य संकलन ने इतना प्रभावित किया कि अनेक पत्रिकाओं ने वैसे ही गीतों के विशेषांक प्रकाशित किये और उस नये प्रवर्तन के तथा गीतों के समसामयिक युग बोधक अभिनव कायाकल्प के सम्बन्ध में आचार्यों, विद्वानों एवं गीतकारों में चर्चा-परिचर्चा का स्वरूप सबको आंदोलित कर गया। पूरे भारत के हिन्दी काव्य जगत में स्थान-स्थान पर गोष्ठियों का आयोजन होने लगा, जिसमें नागार्जुन, धर्मवीर भारती, वीरेन्द्र मिश्र, डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, रमेश रंजक, नईम, देवेन्द्र कुमार, प्रो० देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, गुलाब सिंह, उमाकांत मालवीय, रवीन्द्र भ्रमर, किशन सरोज़ आदि गीतकार सर्वाधिक प्रख्यात हुए, जिन्होंने गीतों को नयी दिशा देकर नवगीत का बीज साहित्य की उर्वर धरती पर बोया, जो आज विशाल वट-वृक्ष हो गया है, जिसकी छाया में साधना कर कितने रचनाकार बोधिसत्व होते जा रहे हैं। बोधिसत्व होने का अर्थ है अभिव्यक्ति की इयत्ता में निजी अस्मिता को विलीन कर समष्टि को समर्पित हो जाना, जिसकी विशिष्ट प्रविधि का आविष्कार कर तत्कालीन गीत महर्षियों ने अभिनव सौंदर्यबोध की सृष्टि की जो नवगीत की प्रमुख विशेषता है। वर्तमान नवगीत मन एवं मस्तिष्क का समन्वय है जिसमें यथार्थ एवं शिल्प के प्रतीकात्मक बिम्ब अपनी आनुभूतिक, विश्वसनीय, तार्किक अभिव्यक्ति से रचनाकारों ने संवेदना के प्रतिमान स्थापित कर, काव्य-जगत को नूतन आयाम दिया।
          प्रारम्भ में जो नवगीत रागात्मक आंचलिकता से परिपूर्ण था, कालान्तर में विकास के द्वितीय चरण में नगरीय विसंगतियों, समसामयिक समस्याओं से जूझता अनास्थावादी हो गया जिसमें वर्ग संघर्ष, पूँजीवादी व्यवस्था में शोषण उत्पीड़न, रूढ़ियों पाखण्डों के विरुद्ध आक्रोश एवं जुझारू भाव व्यक्त होने लगते हैं| इस क्रम में सोम ठाकुर, उमाकान्त मालवीय, प्रो० देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, माहेश्वर तिवारी, देवेन्द्र कुमार, शलभ श्री राम सिंह, शांतिसुमन तथा नचिकेता आदि ने पुनः नवगीत में अस्तित्ववादी वैचारिकी को प्रतिष्ठित किया और सौन्दर्यबोध में भी विचारधारा के परिवर्तन से जिसके अंतर्गत ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ (वर्ष 1969) का प्रकाशन चन्द्रदेव सिंह के संपादन में हुआ जिसे नए मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है, जिसमें सम्पादक के अनुसार वर्ष 1941 से 1961 के मध्य सृजित एवं प्रकाशित ऐसे गीतकारों को प्रस्तुत किया गया है, जिसमें उस कालखण्ड की मानुषी मनस्थिति का स्पष्ट दर्शन मिलता है। इस संकलन में निराला और माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं के साथ डॉ०शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रामचन्द्र 'चन्द्रभूषण', चन्द्र देव सिंह, सोम ठाकुर, सूर्य प्रताप सिंह, रवीन्द्र ‘भ्रमर’, केदार नाथ सिंह, देवेन्द्र कुमार, अमरनाथ, नईम, माहेश्वर तिवारी आदि चालीस रचनाकारों का प्रतिनिधित्व हुआ है। डॉ० राजेन्द्र गौतम के अनुसार नवगीत आज अपने समय की जिह्वा है, वह युगबोध को समग्रता से व्यक्त कर रहा है, काव्य-तत्त्व को अक्षुण्ण रखकर समय के सत्य को उद्घाटित करने का महत्वपूर्ण कर्म नवगीत कर रहा है। ( उत्तरशती का गीत-नवगीत) वर्ष 1950 से 1965 की अवधि में लोक संवेदना नवगीत की प्रमुख प्रवृत्ति बन गया और उसके उपरान्त नवगीत कथ्य-शिल्प की दृष्टि से लोक संवेदना के नये आयाम प्रस्तुत करता वर्ष 1980 तक ठाकुर प्रसाद सिंह की परम्परा का अनुगामी बन कर लीक-बद्ध यात्रा करता रहा, किन्तु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं रह सकी। नवगीत में पुनः परिवर्तन के लक्षण दिखाई पड़ने लगे और वह अपनी नूतन आभा से काव्य जगत को प्रभासित करने लगा, उक्त अवधि में 'नवगीत दशक' ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई 1982, 83, 84 में लगातार डॉ० शम्भुनाथ सिंह के सम्पादन में प्रकाशित इन संकलनों में तीस नवगीतकारों के प्रतिनिधि गीत संकलित हैं जिसने नवगीत को समूह-मन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, फलस्वरूप नवगीत को नयी दिशा मिली जिसने नवगीत का निखरा रूप प्रस्तुत किया, इसके अतिरिक्त 'अर्धशती' भी प्रकाशित हुई जिससे नवगीत को नयी प्रतिष्ठा के साथ सुदृढ़ आधार मिला| इसमें 81 नवगीतकारों का प्रतिनिधित्व है।
          इसी प्रकार 'कविता-64' संपादक ओम प्रभाकर तथा ‘यात्रा में साथ-साथ’ जिसके संपादक प्रो. देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र‘ हैं और ‘नवगीत एकादश’ जिसका संपादन डॉ० भारतेन्दु मिश्र ने किया है आदि संकलन नवगीत की प्रमुख प्रवृत्तियों को भली-भाँति दर्शाते हैं। उपर्युक्त नवगीत संकलनों में तत्कालीन चर्चित नवगीतकारों की प्रतिनिधि रचनायें संकलित हैं, जो नवगीत को नूतन स्वरूप में परिभाषित करने में सक्षम हैं। ऐसे श्रेष्ठ रचनाकारों में डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, उमाकान्त मालवीय, रवीन्द्र भ्रमर, वीरेन्द्र मिश्र, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, श्री कृष्ण तिवारी, नईम, ओम प्रभाकर, मुकुट सक्सेना, रामचन्द्र 'चन्द्रभूषण', किशोर काबरा, अवध बिहारी श्रीवास्तव, अनूप अशेष, नचिकेता, राम सेंगर, विजय किशोर ‘मानव’, मयंक श्रीवास्तव, इसाक ‘अश्क’, कुअँर बेचैन, विनोद निगम, शांति सुमन, जहीर कुरेशी, योगेन्द्र दत्त शर्मा, अश्वघोष, श्याम नारायण मिश्र, कौशलेन्द्र, गुलाब सिंह, उमाशंकर तिवारी, नीलम श्रीवास्तव, कैलाश गौतम, दिनेश सिंह, कुमार रवीन्द्र, राधेश्याम शुक्ल, बुद्धिनाथ मिश्र, डॉ० राजेन्द्र गौतम आदि प्रमुख रूप से उभर कर सामने आये, जिन्होंने नवगीत की अनवरत यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया। नवगीत की विकास यात्रा में अनेक परिवर्तनों के साथ अवरोधों की झड़ी लगती रही, किन्तु इसका प्रवाह और वेग अप्रतिहत रहा। अन्य विधाओं, परम्परावादियों एवं नयी कविता के विद्वानों के श्रृंखलाबद्ध आक्रमण भी उसे आतंकित नहीं कर सके और हर संघर्ष के उपरान्त वह और भी वेग एवं पराक्रम से अग्रसर होकर दिन प्रतिदिन निखरता रहा। नवगीत की विकास यात्रा के सहयात्री सुप्रसिद्ध साहित्यकार और श्रेष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से नवगीत की संरचना, विविधता और विशिष्टता की पहचान कर लिखा है। ‘नवगीत का वैविध्य अपने संसार में उपस्थित है, जीवन्त है, विधाओं के विकास में कोई भी चीज मरती नहीं इसी प्रकार नवगीत को भी अमरत्व प्राप्त हुआ है। पहले कुछ वर्षों के कालखण्ड में गीत के कथ्य, उसकी कहन, उसके शिल्प, सभी में बदलाव आया है। गीत की कहन अधिक सहज हो चुकी हैं। यह इक्कीसवीं सदी का नवगीत है, जो कई पड़ावों से होता हुआ चौथे पड़ाव पर है’, यह स्थिति अब साफ हो चुकी है कि वर्तमान समवर्ती विधायें जो नवगीत के 'उत्तरायण' ऊपर आक्रामक हैं, उसे पकड़ पाने में नितान्त असमर्थ हैं और उनका महत्व भी दिनोदिन हास की ओर पतनोन्मुख है। अब साहित्य मर्मज्ञ यह पहचान चुके हैं और महसूस भी कर रहे हैं, कि वर्तमान तो नवगीत का है ही, भविष्य भी उसी का है। नवगीत जीवन के समस्त आयामों को आत्मसात कर चुका है और इससे हटकर काव्य-सृजन की कल्पना भी असंभव लगती है। यद्यपि पूर्व में भी नवगीत में नये-नये हस्ताक्षरों का स्वागत योग्य पदार्पण होता रहा, किन्तु वर्तमान में नवगीतकारों की पूरी फौज ही काव्य जगत में नये कथ्य, नये शिल्प और नयी कहन के साथ प्रत्येक चुनौती को तैयार है जिसमें शीलेन्द्र कुमार सिंह ‘चौहान’, राधेश्याम ‘बन्धु’, भारतेन्दु मिश्र, महेश अनघ, ओमप्रकाश सिंह, जगदीश श्रीवास्तव, अशोक गीते, मधुकर अष्ठाना, हरीश निगम, वीरेन्द्र आस्तिक, यश मालवीय, निर्मल शुक्ल, गणेश गम्भीर, सुधांशु उपाध्याय, ब्रजनाथ श्रीवास्तव, रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’, विनय भदौरिया, मृदुल शर्मा, मधुसूदन साहा, श्याम निर्मम, रविशंकर पाण्डेय, विनोद श्रीवास्तव, जयकृष्ण राय ‘तुषार’, कुमार शिव, रामबाबू रस्तोगी, जय चक्रवर्ती, राजेन्द्र वर्मा, सुरेश श्रीवास्तव, जवाहर ‘इन्दु’, रमाकान्त, सुश्री शरद सिंह, कृष्ण वक्षी,अतुल ‘कनक’, विष्णु विराट, सत्य नारायण, डॉ० देवेन्द्र, विश्वनाथ पाण्डेय, लालसा लाल ‘तरंग’, हरीश सक्सेना, अश्वघोष, रमेश पन्त आदि सैकड़ों रचनाकार निरन्तर सृजन में संलग्न हैं और प्रतिवर्ष प्रकाशित हो रही नवगीत कृतियों की गणना भी संभव नहीं रह गयी है। नवगीत कोई आंदोलन नहीं, बल्कि गीत का क्रमिक विकास है जो समयानुकूल परिवर्तनशील और सर्वदा समकालीन अभिनव सौन्दर्यबोध का जीवन्त रूप है, जिसमें परम्परा नवता और गेयता का अपूर्व सामंजस्य है और कथ्य को न्यूनतम शब्दों में प्रतीकों बिम्बों और मिथकों के माध्यम से हर कथ्य को नयी शिल्पिता में नयी कहन की रंगिमा-भंगिमा में मुहावरों लोकोक्तियों तथा देशज शब्दों के प्रयोग से नये शब्द विन्यास में, सहज रूप से प्रस्तुत करने की क्षमता है जो जन-साधारण के निकट, उन्हीं की अनुभूतिक यथार्थ गाथा है।
          नवगीत के संदर्भ अब शोध ग्रन्थों एवं संदर्भ का अभाव नहीं है। अनेक विश्व विद्यालयों में नवगीत के सम्बन्ध में शोध हुए हैं और संदर्भ ग्रन्थों के रूप में 'नवगीत का युगबोध' ( राधेश्याम ‘बन्धु’) तथा ‘शब्दपदी’ (निर्मल शुक्ल) अद्यतन प्रकाशित ग्रन्थ हैं जिनकी साहित्य जगत में व्यापक सराहना हुई है। डॉ० राजेन्द्र गौतम का मानना है कि- जब हम समकालीन कविता के संदर्भ में नवगीत के समग्र आकलन की बात करते हैं तो हमारा मानना यह भी है कि नवगीत मूल्य संस्थापक कविता है, मूल्य स्थापना की दिशा में 'गीत नवान्तर' पाँच खण्ड (मधुकर गौड़), ‘नये-पुराने’ (दिनेश सिंह) तथा (निर्मल शुक्ल) के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं ने अभूतपूर्व कार्य किया और नवगीत के साथ-साथ नवगीतकारों को भी उचित स्थान देकर गरिमामण्डित किया। वर्तमान में तो कतिपय पूर्वाग्रही पत्रिकाओं को छोड़कर हर पत्रिका नवगीत विशेषांक निकालने की दौड़ में प्रयासरत हैं। इन सभी पत्रिकाओं में वर्तमान में 'अपरिहार्य' भाग १, भाग-२ नवगीत विशेषांक (मधुकर अष्ठाना) मानक रूप में सराहना एवं प्रसंशा का पात्र सिद्ध हुआ है जिसमें भारत के सर्वाधिक विद्वानों के आलेख एवं नवगीत संचयित हैं| इसके अतिरिक्त भोपाल से प्रकाशित ‘प्रेसमेन’ (साहित्य संपादक मयंक श्रीवास्तव) ने नवगीतकारों को प्रस्तुत कर, आलोचना एवं समीक्षा के क्षेत्र में अभिनव क्रांति का बिगुल बजाया है, जिसकी पूरे देश में सराहना की जा रही है| दूर-दूर बसे हुए, परस्पर अपरिचित नवगीतकारों के चित्र, परिचय एवं प्रतिनिधि नवगीत प्रकाशित कर पूरे भारत की नवगीतीय नूतन मेधा को जागरुक सृजन की नयी दिशा का बोध कराया है| भौतिकवादी वर्तमान सभ्यता में संवेदना का नितान्त अभाव है और संवेदनात्मक संरचना का पुनर्निर्माण ही नवगीत का मुख्य उद्देश्य है। नवगीत के मर्मज्ञ, आलोचक, समीक्षक श्री कुमार रवीन्द्र के शब्दों में -'आज का नवगीत वर्तमान सभ्यता की विकृतियों से जूझते हुए मानव जिजीविषा के उन शाश्वत स्रोतों की खोज में है, जिनकी बदली परिस्थितियों में नये जीवन-मूल्यों और मानव अस्मिता की नयी कसौटियाँ भी गढ़ी जा सकें, पुरातन और नवीन के संधि-स्थल पर खड़े आज के गीत में पुरातन के प्रति मोह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और जो होना भी नहीं चाहिये| किंतु नवगीत के प्रति जो आशंका का भाव अभी कुछ समय पहले तक उसमें प्रमुखता से उपस्थित था, कम हुआ है| नया गीत एक ऐसी भाव-भूमि पर खड़ा है, जहाँ मानव मन के उत्सवी क्षणों का पुनरुत्थान संभव है|' भौतिकवादी सभ्यता के नकारात्मक प्रभाव को शून्य करने का संकल्प नवगीत के क्रांतिकारी अभियान के व्यापक आधार देता है जिसमें मानव मूल्यों के प्रति प्रबल आस्था एवं विश्वास है| प्रो० देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' भी इस भावना को निम्न रूप से व्यक्त किया है- “संस्कृतियों के नंदन में हास और विघटन होता है, वैसा सृष्टि की सहज सामान्य विकास प्रक्रिया के दौरान नहीं| इस तथ्य को एक या दो सहस्त्राब्दियों के इतिहास में ही नहीं प्रत्युत सुदूर प्रागैतिहासिक युगों के घटनाचक्र में भी हमको देखना होगा| जब मानव मूल्यों पर आघात होता है, तब चेतना का प्रवाह भी वामपन्थी हो जाया करता है, जिसके फलस्वरूप हमारे भीतर निषेध का नाशकारी वासुकि अपने असंख्य फणों से गरल के फूत्कार पूर्ण स्फीत-फेन के अग्निल समुद्र का उद्वमन करता है|' इसीलिये वर्तमान मशीनी सभ्यता की संवेदन-शून्यता के विनाश हेतु नवगीत जन-जन में सांस्कृतिक चेतना और मानव मूल्य के उत्सवी क्षणों की पुनर्स्थापना के लिये संघर्षरत हैं| नवगीत निषेधात्मकता के विरूद्ध वह शंखनाद है जिसकी प्रतिध्वनि बहुआयामी एवं दूरगामी है| यह सकारात्मक अन्तश्चेतना की आनुभूतिक रागात्मक पदार्थ का सामान है जो जनसाधारण की जीवन पद्धति से संगति दाता उन्हें उन्हीं की भाषा में संवाद का आमंत्रण देता है।
          वर्तमान नवगीत लोक-जीवन, लोक-संस्कृति, लोकभाषा और लोक तत्त्वों के यथार्थ को बिम्बित करता हुआ गहरी पैठ बना चुका है, चारणों, भाँटों एवं विदूषकों की मंडली मंचों तक ही सीमित हो गयी है। जनचेतना से दूर आर्थिक लोभ में जो साहित्य को विकृत करने के प्रयास में निरन्तर संलग्न हैं उन्हें साहित्य कभी क्षमा नहीं करेगा। नवगीत के प्रति समाज में एक साकारात्मक आश्वस्ति की भावना विकसित हुई है, जो नवगीतकारों को प्रेरणा देकर नवीन आशा का संचार कर रही है। इन परिस्थितियों से भलीभांति अवगत और नवगीत समर्थ विवेचक की दृष्टि में “समग्रतः हम कह सकते हैं कि आज का नवगीत रागात्मक अन्तश्चेतना के प्रवाह से उपजा एक ऐसा काव्य रूप है, जिसमें विचार और भाव-संज्ञाएँ एकात्म होकर प्रस्तुत हुई हैं| नया गीत चिंतनपरक तो है पर इसमें अनुभूति और चिंतन का अधिक प्रीड रूप में परिपाक हुआ है, साथ ही इसकी कथ्यात्मक और भाषिक संरचना में व्यापकता अधिक है। आंचलिक शब्द इसमें सहज होकर आते हैं, उनका आग्रह भी नहीं है। इधर के गीतों में बिस्वाग्रह और प्रतीक-कथन भी कम हुआ है और सहज प्रवाहमय बातचीत की शैली और भाषा की और रुझान बढ़ा है। नवगीत की ये विशेषतायें और प्रवृत्तियाँ जहाँ उसे व्यापक बनाती हैं वहीं सम्प्रेषणीय भी| नवगीत के साठवर्षीय विकास का परिवर्तनशीलता का, समकालीनता एवं युग-बोध का लोक- जीवन के समस्त आयामों को व्यक्त करने की आनूभूतिक यथार्थपरक रचना-प्रक्रिया, सहज संवादशैली, न्यूनतम शब्द-विन्यास में चिन्तन से उपजी विचारशीलता आदि ऐसे विशिष्ट उपादान है जो उसे सम्प्रेपणीच ही नहीं, कालजयी भी बनाते हैं, छायावादोत्तर गीत के क्षीर-सिन्धु-मंथन से उपजा नवगीत ही अब काव्य की मुख्य धारा है और अन्य अल्पकालिक विद्याओं की अपेक्षा इसका योगदान भी सर्वाधिक ही नहीं असीमित एवं शब्दातीत है और अभी तो इब्तिदाये इश्क है नवगीत के सम्मुख अनन्त आकाश है और सामर्थ्य भी जो संभावनाओं के प्रति आश्वस्त करती है।

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