डॉ मधु शुक्ला जी के गीतों के बहाने एक प्रस्तुति टीप
प्रस्तुति
मनोज जैन
संपादक
~।।वागर्थ।।~
शान्तिसुमन की परम्परा को पुष्पित पल्लवित करती मधु शुक्ला जी
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डॉ. मधु शुक्ला के गीत भारतीय नवगीत परंपरा की उस समृद्ध धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें प्रकृति का सौंदर्य, संवेदना की सघनता और मानवीय संबंधों की तड़प आपस में एकाकार हो उठती है। डॉ. शान्तिसुमन की गीत-परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनकी रचनाधर्मिता में मिट्टी की सोंधी गंध, प्रकृति के मानवीय भाव और क्लासिकी काव्य-संस्कार (यक्ष-यक्षिणी, कबीर, मीरा के संदर्भ) सहज ही उतर आते हैं। इन गीतों में एक ओर जहाँ वर्षा और बादल के माध्यम से हृदय के उल्लास तथा प्रेम की विकलता को स्वर मिला है, वहीं दूसरी ओर बदलते समय की त्रासदी, टूटते अनुबंधों और उजड़ते ग्रामीण परिवेश की पीड़ा भी पूरी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुई है। देवदार के शांत-साधक स्वरूप से लेकर माटी के प्रति अनन्य अनुराग तक, मधु जी की भाषा अत्यंत प्रांजल, लयात्मक और दृश्यबंधों (बिंबों) से परिपूर्ण है। यह संकलन प्रकृति-प्रेम, स्मृतियों और जीवन-दर्शन का एक ऐसा समेकित संसार रचता है, जो पाठक के मन को गहराई से छू लेता है।
(1)
(स्वप्न धानी लिख गया )
झील के किस्से,
समन्दर की कहानी लिख गया।
एक बादल फिर
नदी की जिन्दगानी लिख गया ।
उँगलियों से बूँद की ,
पानी में इक हलचल लिखी
मौन लहरों के सुरों में,
थिरकती कलकल लिखी
लिख गया कुछ बिजलियाँ
कुछ आग-पानी लिख गया ।
तप्त धरती के ह्रदय के
भाव अँकुराने लगे
थरथराते पात तन के
अर्थ गहराने लगे
जर्द आँखों में धरा की
स्वप्न धानी लिख गया ।
खोलकर खिड़की
फुहारों का झकोरा आ गया
पत्र सोंधी गंध वाले
द्वार पर सरका गया
भीगते मन में कई
सुधियाँ सुहानी लिख गया ।
डोर ले विश्वास की
मन का पपीहा उड़ चला
ढाई आखर के सबद
गाता कबीरा मुड़ चला
संग मेरे नाम के
मीरा दिवानी लिख गया ।
लिख गया युग के अधूरे
प्रेम की दारुण कथा
यक्षिणी की पीर,
शापित यक्ष के मन की व्यथा
फिर कथानक में नये
बाते पुरानी लिख गया ।
एक बादल फिर नदी की
जिंदगानी लिख गया।
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( 2)
(आओ इक पाती )
खोई- खोई सुबह लिखें
अलसाई शाम लिखें
आओ इक पाती रूठे
मौसम के नाम लिखें।
लिखे मेघ जो भेजे तुमने ,
आकर लौट गये
प्यासे मन को तनिक और
तड़पाकर लौट गये
कुछ छल गया अषाढ़
छल रहा कुछ सावन-भादों
साँस तोड़ती फसलों का
आखिरी सलाम लिखें।
तुम क्या रूठे, जीवन की
सब खुशियाँ रूठ गईं
शुभ सकुनो वाली कलशी
हाथों से छूट गई
सूख गयी पल में बगिया
हरियाये सपनों की
चुका रहे भूलों का अपनी
क्या-क्या दाम लिखें।
पाँव जमाकर आ बैठी है
धूप मुंडेरों पर
ढूँढ़े रैन बसेरा पंछी
सूखे पेड़ो पर
मौन हुआ संगीत तटों का
उजड़ गये मेले
रेत-रेत होती नदिया के
दर्द तमाम लिखें।
कुशल क्षेम की चिट्ठी आये
वर्षों बीत गये
सोधी मिट्टी वाले सारे
रिश्ते रीत गये
राह देखते धुँधलायी
आँखें सीवानों की
लौटेंगे मन के गोकुल में
कब घनश्याम लिखें ।
आओ इक पाती रूठे
मौसम के नाम लिखें।
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(3)
हम हो गए किनारे, सूखी हुई नदी के।
बहती थी बीच अपने
भावों की मौन सरिता
लिखती थीं रोज लहरें
पानी में प्रेम कविता
बहकी हवाएँ ऐसी बिखरे वो छन्द सारे ,
टूटे पड़े हैं तट पर अनुबन्ध सतपदी के।
रुख वक्त का अचानक
कितना बदल गया है
मुझे छोड़ कर भँवर में
आगे निकल गया है।
लेकर जिन्हें चले थे पलको की पालकी में
काँटों से चुभ रहे वो सपने नयी सदी के।
सांसो की बस्तियों में
उड़ती है चील ऐसे।
चुभ जाये चलते-चलते
पावों में कील जैसे।
घिरते ही जा रहे हैं ख़ामोशियों के साये
सहमा हुआ समय है आँगन में त्रासदी के।
ये दर्द कैसा मन को रह-रह
रुला रहा है
मेरा नाम ले के जैसे कोई
बुला रहा है।
देता नहीं दिखाई अपना ही
अक्स अब तो,
दरका है ऐसे दर्पण,ज्यों स्वप्न द्रौपदी के।
(4)
देवदार के वृक्ष
संत सरीखे खड़े हुए हैं
देवदार के वृक्ष
पर्वत-पर्वत,शिखर-शिखर पर
घाटी-घाटी में बूटे जैसे जड़े हुए हैं
देवदार के वृक्ष।
मौन पर्वतों के मन के
कोमल उद्गारो से
सजे हुए स्वागत में हर-पल
वंदनवारों से
अटखेली कर रहे मेघ के
भीगे फाहो से
नभ के आँगन बड़े हुए हैं
देवदार के वृक्ष।
देखा और पढ़ा था जिनको
सिर्फ किताबों में
आज देख प्रत्यक्ष खो गये
जैसे ख्वाबों में
मंत्र मुग्ध हो गया हृदय,
निःशब्द हुई वाणी
तस्वीरों से मढ़े हुए हैं
देवदार के वृक्ष।
ध्यान मग्न हो खड़े हुए हैं
निरत साधना में
पत्र,फूल,फल,गंध चढ़ाते
नित उपासना में
अनुगुंजित है घाटी जिनके
मंत्रोच्चारो से
देवों के ज्यों गढ़े हुए हैं
देवदार के वृक्ष।
उभर रहे आकार कई रह-रह
आभासो के
पलट रहीं हैं पृष्ठ,कथायें
फिर इतिहासो के
कालिदास के विकल यक्ष की
प्रेम भरी पाती
आखर-आखर पढ़े हुए हैं
देवदार के वृक्ष।
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(5)
[जब कभी बादल]
अनगिनत सपने
उमीदों के सजाता है ।
जब कभी बादल
नदी के गीत गाता है ।
जाग उठती हलचलें
सोई उमंगों में
गीत कल-कल के
थिरक उठते तरंगों में
फूटते झरने खुशी के,
मौन शिखरों से
हुलसती धरती गगन
तब मुस्कुराता है ।
देख अद्भुत दृश्य
बादल और बिजली के
गूँज उठते सुर मधुर
मल्हार कजरी के
पैग भरती है गगन तक
राधिका मन की
प्रीति का घनश्याम
तब मुरली बजाता है ।
इन्द्रधनु सा कौन
सुधियों में उभरता है
डोर बूँदों की पकड़
मन में उतरता है
भेज कर संदेश मीठे
मेघ के हाथों
पर्वतों के पार से
मुझको बुलाता है।
जब कभी बादल
नदी के गीत गाता है।
(6)
[ सौंधी पातिया ]
भेज सोंधी पातिया
भीगी हवाओं से
गाँव की पगडण्डियाँ
मुझको बुलाती हैं I
द्वार का वो नीम चौरा
वो लिपा आँगन
धूल- मिट्टी में चहकता
फूल सा बचपन
वो खुला आकाश,
धरती का वो अपनापन
था वही गोकुल हमारा,
वही वृंदावन,
छोड़ आये थे कभी
जिस देहरी को हम
वो अभी तक याद के
दीपक जलाती है.
फूलते जब कास वन
लेते विदा बादल
ओढ़कर आती शरद ऋतु
रेशमी आँचल
सिलसिले होते शुरू
उत्सव- उछाहो के
लौटती फिर गाँव- गलियों में
नयी हलचल
दमक उठती देह
टूटी छत-दीवारों की
शुभ चित्र अंकित भीतिया
फिर जगमागाती हैं I
धूप वाले दिन,
वो ठंडी छाँव वाले दिन
आस्था- विश्वास ,
भक्ति - भाव वाले दिन
उतरते वो पंछियो के
दल किनारों पर,
तिर रही फिर से नदी में
नाव वाले दिन I
लिपट कर इन लहलहाते
धान खेतों से
ये हवाएँ जिंदगी का
गीत गाती हैं I
दूर तक फैला हुआ
संसार माटी का
ये जग नहीं कुछ और बस
विस्तार माटी का
पर्वत- शिखर, ये घाटिया
ये खेत, ये झरने
हर रूप में ढलता हुआ
आकार माटी का
उम्र भर मन भूल पाता
है नहीं जिसको
वो नेह का रिश्ता अमिट
माटी बनाती है I
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संक्षिप्त परिचय
डॉ मधु शुक्ला
जन्मस्थान- लालगंज,
रायबरेली (उ. प्र. )
शिक्षा -एम.ए.(हिन्दी एवं संस्कृत)
पी एच डी
लेखन की विधा - गीत, ग़ज़ल, कहानी समीक्षायें एवं साहित्यिक आलेख ।
दो गीत पुस्तकें प्रकाशित-- "आहटें बदले समय की" एवं "कुछ मन के कुछ मौसम के "
"आहटें बदले समय की " पुस्तक पर म. प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा दुष्यन्त सम्मान।
पूर्व - व्याख्याता (संस्कृत)
साहित्यिक पत्रिका "पहला अंतरा" में सह सम्पादक ।
सम्पर्क ------6-साई हिल्स, कोलार रोड,
भोपाल -462042 म. प्र.
मोबाइल ---09893104204
Email -----madhushukla111@gmail.com
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