गुरुवार, 25 अगस्त 2022

कवि धनञ्जय सिंह जी के नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ ब्लॉग

  धनञ्जय सिंह जी के गीत : प्रस्तुति वागर्थ
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संक्षिप्त जीवन परिचय 


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जन्म : 29 अक्टूबर, 1945 ई0।
ग्राम : अरनिया, जनपद बुलंदशहर [उत्तर प्रदेश]
शिक्षा : एम.ए. हिन्दी, पी-एच.डी।
माँ : स्व.श्रीमती प्रेमवती देवी।
पिता : स्व.श्री अमरसिंह आर्य 'पथिक'।

व्यवसाय : पत्रकारिता एवं लेखन। पूर्व  मुख्य कॉपी सम्पादक 'कादम्बिनी' अब स्वतंत्र लेखन।

प्रकाशित कृतियाँ : [1] 'पलाश दहके हैं' 1997 शुभम् प्रकाशन, दिल्ली। [2] 'दिन क्यों बीत गये' 2017 अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद, दिल्ली।

अन्य प्रकाशन : साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कादम्बिनी, सारिका, कल्पना, लहर, उत्कर्ष, मधुमती, हिमप्रस्थ, शीराजा,  आजकल, उत्तर प्रदेश, गीत गागर, सरस्वती सुमन, रविवारीय हिन्दुस्तान आदि अनेक प्रतिष्ठित एवं स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। नवगीत अर्द्धशती, श्रेष्ठ हिन्दी नवगीत, हिन्दी के लोकप्रिय गीतकार आदि लगभग दो दर्जन समवेत संकलनों में गीत संकलित एवं प्रकाशित। लगभग साठ काव्य-संकलनों का सम्पादन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अतिरिक्त देश-विदेश के काव्य-मंचों  से काव्य-पाठ। 

अन्य गतिविधियाँ : प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के आजीवन सदस्य। ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के आजीवन सदस्य। अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान [अंतर्राष्ट्रीय] के संस्थापक-अध्यक्ष। लगभग बीस देशों की साहित्यिक यात्राएँ। दिल्ली हिन्दी अकादमी की संचालन समिति के सदस्य [1998 से 2008 तक] एवं इंडियन जनर्लिस्ट यूनियन के आजीवन सदस्य। जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्य।

साहित्यिक गतिविधियाँ : अमृता प्रीतम, कालिन्दीचरण पाणिग्रही, विष्णु प्रभाकर, वारान्निकोव एवं हमजुल गमजातोव रूसी लेखक के साक्षात्कार लिये। दूरदर्शन के राष्ट्रीय कवि सम्मेलन 'चेतना के स्वर' का 1980 से 2011 तक संयोजन। दूरदर्शन के आर्काइव्ज विभाग में दो वर्ष संपादन कार्य किया।

सम्मान पुरस्कार : 'साहित्य भूषण' सहित अनेकानेक सम्मान पुरस्कारों से अलंकृत समादृत। विशेष : फीचर फिल्म 'अन्तहीन' में गीतकार। 

सम्पर्क सूत्र : 1084 विवेकानंद नगर, गाज़ियाबाद - 201002 [उत्तरप्रदेश] चलभाष : 098106-85549

[एक]
मौन की चादर 
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आज पहली बार मैंने
मौन की चादर बुनी है
काट दो, यदि काट पाओ तार कोई!

एक युग से
ज़िन्दगी के घोल को मैं
एक मीठा विष समझकर पी रहा हूँ
आदमी
घबरा न जाए
मुश्किलों से
इसलिये मुस्कान बनकर जी रहा हूँ

और यों
अविराम गति से बढ़ रहा हूँ
रुक न जाए राह में, मन हार कोई!

बहुत दिन पहले
कभी जब रौशनी थी
चाँदनी ने था मुझे तब भी बुलाया
नाम चाहे जो इसे
तुम आज दो पर
कोष आँसू का नहीं मैंने लुटाया

तुम
किनारे पर खड़े आवाज़ मत दो
खींचती मुझको इधर मँझधार कोई!

एक झिलमिल -सा
कवच जो देखते हो
आवरण है यह उतारूँगा इसे भी
जो अँधेरा
दीपकों की आँख में है
एक दिन मैं ही उजारूँगा उसे भी

यों प्रकाशित
दिव्यता होगी हृदय की
है न जिसके द्वार बन्दनवार कोई!

नित्य ही होता
हृदयगत भाव का संयत प्रकाशन
किन्तु मैं अनुवाद कर पाता नहीं हूँ
जो स्वयं ही
हाथ से छूटे छिटककर
उन क्षणों को याद कर पाता नहीं हूँ

यों लिये वीणा
सदा फिरता रहा हूँ
बाँध ले शायद तुम्हें झनकार कोई!
                  •••
   
 [दो]
फिर घिर आई शाम 
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पिघला सोना लिये
तटों पर
फिर घिर आई शाम !

खड़े हुए
सागर के तीरे
देख रहे हम
धीरे-धीरे

अँधियारे से लड़
सूरज का
होते काम तमाम !

अब
चमकेंगे
नभ में तारे
छिपे रहे
जो दिन भर
सारे

इनके बल पर
रजनी की छवि
होगी ललित-ललाम !

फिर से
नभ में
तौल परों को
लगे
लौटने
विहग घरों को

बाँट-बाँट
खुशियाँ आपस में
होंगे सब उपराम !
       •••
  
[तीन]
मूर्च्छाओं से 
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निकल आये हम
गहन अंधी गुफाओं से।

था न जिनका
रोशनी से
नाम भर नाता
शब्द भूले से
नहीं कोई जहाँ जाता

जहाँ केवल घुटन
मिलती थी हवाओं से।

भावनाओं का
नहीं था
ज्वार या भाटा
हर दिशा में
गूँजता था एक सन्नाटा

विष जहाँ विद्वेष
रखते थे दवाओं से।

नहीं कोई
छुअन तन-मन को
जगा पाती
चाह कोई भी न मन में
सुगबुगा पाती

था घिरा जीवन
जहाँ बस वर्जनाओं से।

साँप-बिच्छू-गोजरों 
का वास था
चतुर्दिक बस
मरघटी एहसास था

प्राण-स्पंदन
घिरा था मूर्च्छाओं से।
                      •••
          
[चार]
अब डर लग रहा है 
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सीटियाँ
देने लगी है रात
अब डर लग रहा है !

एक जंगल
आग में जलता हुआ
एक पर्वत का
शिखर गलता हुआ
बीच में से
कारवाँ चलता हुआ

एक पल में
बीस उल्कापात
अब डर लग रहा है !

एक सूरज का
बदन काला हुआ
ताप किरणों का
जमा पाला हुआ
हर शहर में
एक 'चसनाला' हुआ

भृगु-चरण का
वक्ष पर आघात
अब डर लग रहा है !

अश्वत्थामा के
व्रणों का स्राव
ले रहा
दिक्काल में फैलाव
शून्य में
चीत्कार का बिखराव

खड़खड़ाते
शुष्क पीपल पात
अब डर लग रहा है !
           •••
      ■ धनञ्जय सिंह

 [पाँच]
।। उग आई नागफनी ।।
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हमने कलमें
गुलाब की रोपी थीं
पर गमलों में
उग आई नागफनी !

जीवन
ऐसे मोड़ों तक आ पहुँचा
आ जहाँ
हृदय को सपने छोड़ गये
मरघट की
सूनी पगडंडी तक ज्यों
कंधा दे
शव को अपने छोड़ गये

सावन-भादौं के
मेघों के जैसा
मन भर-भर आया
पीड़ा हुई घनी !

आशा के सुमन
महक तो जाते पर
मुसकानों वाले
भ्रम ने मार दिया
पतझर को तो
बदनामी व्यर्थ मिली
हमको
मादक मौसम ने मार दिया

पूजन से तो
इनकार नहीं था पर
अपने घर की
मन्दिर से नहीं बनी !

रंगों - गंधों में
रहा नहाता पर
अपनापन
इस पर भी मजबूरी है
कीर्तन में चाहे
जितना चिल्लाएँ
मन की ईश्वर से
फिर भी दूरी है

सौगंधों में
अनुबन्ध रहे बँधते
पर मन में कोई
चुभती रही अनी !

समझौतों के
गुब्बारे बहुत उड़े
उड़ते ही सबकी
डोरी छूट गई
विश्वास किसे
क्या कह कर बहलाते
जब नींद
लोरियाँ सुनकर टूट गई

सम्बन्धों से
हम जुड़े रहे यों ही
ज्यों जुड़ी
वृक्ष से हो टूटी टहनी !
           •••
      
 [छः]
नहीं धूप की गर्मी ......
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कैसी अजब
शिशिर ऋतु आयी 
गहन कुहासा है।

ओढ़े कम्बल रोज़ 
देर तक 
सूरज सोता है 
भीड़ भरी
राहों पर भी 
सन्नाटा होता है 

सर्द हवाओं का
डर भी तो 
अच्छा-ख़ासा है।

फिर-फिर
बजें अलार्म 
किन्तु
हम सोये रहते हैं 
सपनों की
उड़ान भर 
नभ में खोये रहते हैं 

उजियारा
अँधियारे में घिर 
हुआ रुआँसा है।

रेलें ठहरी हैं 
विमान की रुकीं
उड़ानें हैं 
इधर घोंसलों में
बंदी कलरव की तानें हैं 

नहीं धूप की
गर्मी फिर भी
मन क्यों प्यासा है ?
                •••
       ■ धनञ्जय सिंह.

 [सात]
।। दिन क्यों बीत गये ।।
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कौन, किसे
समझा पाया
लिख-लिख गीत नये
दिन क्यों बीत गये।

चौबारे पर
दीपक धर कर
बैठ गई संध्या
एक-एक कर
तारे डूबे
रात रही बन्ध्या

यों स्वर्णाभ-
किरण-मंगल घट
तट पर रीत गये।

छप-छप करती
नाव हो गई
बालू का कछुआ
दूर किनारे पर
जा बैठा
वंशीधर मछुआ

फिर
मछली के मन पर काँटे
क्या-क्या चीत गये।
         •••
    
 [आठ]
 नींदों के सिमट गये माप...
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गीतों के
मधुमय आलाप
यादों में जड़े रह गये 
बहुत दूर
डूबी पदचाप
चौराहे पड़े रह गये।

देख-भाल
लाल-हरी बत्तियाँ
तुमने सब रास्ते चुने
झरने को झरीं
बहुत पत्तियाँ
मौसम आरोप क्यों सुने

वृक्ष देख
डाल का विलाप
लज्जा से गड़े रह गये।

तुमने दिनमानों के
साथ-साथ 
बदली हैं केवल तारीखें
पर बदली घड़ियों का
व्याकरण हम
किस महाजन से सीखें

बिजली के
खम्भे से आप
एक जगह खड़े रह गये।

वह देखो
नदियों ने बाँट दिया 
पोखर के
गड्ढों को जल
चमड़े के
टुकड़े बिन प्यासा है
आँगन-चौबारे का नल 

नींदों के
सिमट गये माप
सपने ही बड़े रह गये!
                 •••
             ■ धनञ्जय सिंह
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