मंगलवार, 31 जनवरी 2023

संवेदनात्मक आलोक पटल पर चर्चा : प्रस्तुति : ब्लॉग वागर्थ


लोकप्रिय पटल
संवेदनात्मक आलोक समूह के सदस्यों द्वारा मनोज जैन मधुर के दो नवगीतों पर हुई चर्चा की एक विनम्र प्रस्तुति।

प्रस्तुति
ब्लॉग वागर्थ

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 || महत्वपूर्ण सूचना ||
--------------------------
आज रविवार को इस पटल का 109 विशेषांक दिया जाना था। कुछ तकनीकी कारणों से हम अंक प्रकाशित नहीं कर पा रहे हैं इसका हमें खेद है।

        रविवार एवं बुधवार दो नवगीतों के विमर्श क्रम में इस बार भोपाल मध्य प्रदेश से देश का प्रतिनिधित्व कर रहे लोकप्रिय कवि एवं 'वागर्थ' फेसबुक समूह के एडमिन मनोज जैन 'मधुर' जी के दो नवगीतों पर विमर्श हो रहा है। 

       आपकी बेबाक समीक्षात्मक टिप्पणियों/प्रतिक्रियाओं की हमें बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी। पटल के लिए किया गया आपका किंचित सहयोग नवगीत के संवर्धन में सहायक होगा। 
सादर।


          🌍📚🖋️🌹🛐
      संयोजक/संस्थापक सदस्य
        'संवेदनात्मक आलोक'
   विश्व नवगीत साहित्य विचार मंच


 विमर्श हेतु : दो नवगीत
【1】
|| बम-बम भोले ||
----------------------

                 - मनोज जैन 'मधुर'

धूनी रमा प्रेम से बंदे !
बोल जोर से 
बम - बम भोले ।

पूँजीपतियों के
हाथों की 
कठपुतली है देश हमारा
इनके ही सारे
संसाधन 
आम आदमी है बेचारा

निजीकरण में 
जीवन नैया
खाने लगी रोज हिचकोले ।

सपनों की झाँकी
में खुद को
राज कुँवर जैसा पाते हैं
सपने तो हैं 
काँच सरीखे
टूटे और बिखर जाते हैं

वह आवाज़ 
दबा दी जाती 
जो विरुद्ध सत्ता के बोले ।

कदम-कदम पर
नफरत बोते 
हमने कुत्सित मन को देखा
रौंद रहे हैं 
प्रतिमानों को
मिटा रहे हैं निर्मित रेखा

मारा करते 
शान्ति दूत को 
बदल-बदल नफरत के चोले ।
           •••

    【2】
|| उगने लगे अखाड़े ||
--------------------------

चुप्पी ओढ़े रात खड़ी है
सन्नाटे दिन बुनता
हुआ यंत्रवत 
यहाँ आदमी
नहीं किसी की सुनता 

सबके पास
समय का टोटा
किससे !
अपना सुख - दुख  बाँटें
दिन पहाड़ से कैसे काटें !

बात-बात में
टकराहट है
यहाँ नहीं दिल मिलते
ताले जड़े हुए 
होठों पर
हाँ ना में सिर हिलते

पीढ़ीगत इस 
अंतराल की
खाई को अब कैसे  पाटें!
दिन पहाड़ से कैसे काटें !

पीर बदलते
हाल देखकर
पढ़ने लगी पहाड़े
तोड़ रहा दम 
ढाई आखर
उगने लगे अखाड़े

मन में रहे 
कुहासे गहरे
इन बातों से  कैसे  छाँटें !
दिन पहाड़ से कैसे काटें !
             •••

निवास : 106, विट्ठलनगर, गुफामन्दिर रोड,
    भोपाल- 462 030 [मध्य प्रदेश]
     मोबाइल 9301337806


 मनोज जैन के दोनों गीत अच्छे। सरल सहज शब्दों में अपनी बात कहते हुए।
बहुत बधाई।

जय चक्रवर्ती
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सरल शब्दों में विडम्बनाओं विसंगतियों को स्वर दिये हैं मनोजजी जैन ने। हार्दिक बधाई ।

कुँवर उदय सिंह अनुज
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 इस तरह के सुझाव देने से बचें... सुझाव की ये पंक्तियाँ नवगीत के अनुरूप नहीं हैं... नवगीत में लय और प्रवाह बहुत आवश्यक है... नवगीत के लिए लम्बी साधना की आवश्यकता होती है तब कहीं नवगीत सध पाता है.... मनोज मधुर के नवगीत  प्रायः बहुत सधे हुए होते हैं... उस्मानी जी आप भी नवगीत को इस समूह से सीखकर लिखने का अभ्यास कर सकते हैं... नवगीत के शिल्प में अभी सलाह देने से परहेज करें... 

-डा० जगदीश व्योम
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आदाब आदरणीय मंच।

नवगीत के स्थापित कवि महोदय की दोनों रचनायें पीड़ाओं और विडंबनाओं से परिपूर्ण हैं।

पहली रचना

दूसरी रचना के जैसा दमदार शीर्षक पहली रचना माँग रही है । पहली रचना का शीर्षक *नफ़रत के चोले* या *आज के हिचकोले* जैसा कुछ हो सकता है मेरे विचार से।

आगे के सभी बंध बेबाक टिप्पणियाँ हैं परिस्थितियों पर। आम आदमी की जद्दोजहद है पूँजीपतियों से, निजीकरण से, सपनों और यथार्थ से, सत्ता से, नफ़रतों और वर्जनाओं से, अशान्ति-दानवों से।  विचारोत्तेजक सृजन। हार्दिक बधाई रचनाकार महोदय को।

*दूसरी रचना* -  बढ़िया शीर्षक। ऐसा ही दमदार शीर्षक पहली रचना माँग रही है । 

इस दूसरी रचना में भी वैश्वीकरण,विकास और भौतिकता की तथाकथित दौड़ और होड़ में आम आदमी और रिश्तों के साथ जीवनशैली की बिगड़ी तस्वीर शाब्दिक व चित्रित की गई है।

पहाड़/पहाड़े, आखर/अखाड़े,  चुप्पी/सन्नाटे, खाई आदि का बेहतरीन प्रयोग।

तुकान्त में बाँटे/काटें ,  छाँटे/काटें  पर तो विशेषज्ञ ही मार्गदर्शन प्रदान कर सकेंगे। 

बेहतरीन विचारोत्तेजक नवगीतों हेतु. हार्दिक बधाई आदरणीय मधुर जैन 'मधुर' जी। 
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय मंच संचालक महोदय।
शेख़ शहज़ाद उस्मानी
शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

पहला नवगीत सत्ता का यथार्थ प्रतिबिंबित करता है। सत्ता और पूँजीपतियों की साँठगाँठ से आम आदमी कैसे ठगा जाता है, दृष्टव्य है-

सपनों की झाँकी 
में खुद को 
राज कुँवर जैसा पाते हैं
सपने तो हैं 
काँच सरीखे
टूटे और बिखर जाते हैं

भौतिकता और अर्थवाद के पाटे में आदमी किस तरह एकाकी, यंत्रवत रहने को विवश हुआ है, उसकी बड़ी सुंदर झाँकी है दूसरे नवगीत की इन पंक्तियों में-

चुप्पी ओढ़े रात खड़ी है
सन्नाटे दिन बुनता
हुआ यंत्रवत 
यहाँ आदमी
नहीं किसी की सुनता

दोनों बेजोड़, अपनी बात कहने में सफल नवगीत। आदरणीय मनोज जैन जी को बहुत-बहुत बधाई। 


   -नंदन पंडित 
गोण्डा- उत्तर प्रदेश

आदरणीय मनोज जैन जी  नवगीत के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं।नवगीत के संदर्भ में उनका कार्य और लेखन अनूठा तथा उल्लेखनीय है।प्रस्तुत दोनों नवगीतों में समय की विडंबना ,राजनीतिक- धार्मिक पाखंड और विसंगतियों की बेबाक अभिव्यक्ति हुई है, और ऐसा लेखन समय की जरूरत भी है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से दोनों नवगीत सशक्त हैं ।इनमें कमियां देखना हमारा दृष्टि दोष ही होगा।
   सादर आभार सहित.

रघुवीर शर्मा
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 आज विमर्श हेतु मनोज जैन जी के दोनों ही नवगीत सामयिक हैं । पहले गीत में आजकल के सियासी दौर को गीत  के माध्यम से शब्द दिए हैं तथा दूसरे नवगीत  में आमजन के बढ़ते एकाकीपन  का चित्रण ।
दोनों ही लाजवाब नवगीत । जैन जी को हार्दिक बधाई ।
आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी को चयन हेतु हार्दिक बधाई ।

नवगीत विमर्श में आज प्रिय बंधु मनोज मधुर जी के नवगीत प्रस्तुत किए गए हैं।
मनोज भाई को पढ़ना, व्यंग्य की तीक्ष्ण धार को, गहनतम परतों में महसूस करना है। पहले नवगीत का मुखड़ा ही, कबीर की उलटबांसियों की याद दिला देता है।
निजीकरण में जीवन नैया,
आज के हालात और आम व्यक्ति की पीड़ा का मिला-जुला लेखा है।
सपनों का बिखरना उनकी नियति है ।


उगने लगे अखाड़े

आदमी यंत्रवत ही है क्योंकि, कल का एक अर्थ मशीनों से वाबस्ता है। दिल नहीं मिलने के समीकरण तो शाश्वत हैं।
जिनके संतुलन के लिए प्रयास भी नहीं किए जाते हैं।
खूबसूरत गीतों के लिए मनोज भाई को साधुवाद

और आदरणीय दाहिया जी के इस सतत् श्रम और साहित्य-समर्पण के लिए उन्हें बेहद बधाई।
 मैं उस्मानी साहेब की बात से सहमत हूँ।
तुकांत परिमार्जनीय हैं।
उम्मीद करता हूँ मनोज भाई इसका संज्ञान लेंगें

ब्रजेश शर्मा विफल
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 नवगीत के इस विश्व विख्यात पटल पर आज नवगीत के जाने माने हस्ताक्षर प्रिय बंधु मनोज जी के दो नवगीत विमर्श हेतु प्रेषित किये गये हैं। दोनों ही नवगीत बेजोड़ हैं। निम्न विशेष --

मारा करते
शांति दूत को
बदल-बदल नफरत के चोले।

एवं

तोड रहा दम
ढाई आखर
उगने लगे अखाड़े

बहुत सुंदर कहन हैं, जो विचारने को उकसाते हैं। बंधु मनोज जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


बृजेश सिंह
गाजियाबाद

 नवगीत के अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर आज आदरणीय श्री मनोज जैन के दोनों नवगीत अनुपम भावाभिव्यक्ति के प्रतीक हैं । पहले नवगीत में वर्तमान राजनीतिक परिवेश में पूँजीपतियों की भूमिका और निजीकरण द्वारा उनके पोषण का सशक्त चित्रण किया गया है । ऐसे वातावरण में आमजन के -
सपने तो हैं , काँच सरीखे /टूटे और बिखर जातें हैं... ।
द्वितीय नवगीत - उगने लगे अखाड़े - में आज के दौर में  अन्तर्मन का द्वन्द्व बाहर निकल कर टकराहट के रूप में सामने आ रहा है । झूठे दिखावे की व्यस्तता में लोगों को  स्वार्थ की आँखों से दूसरे की पीड़ा नही दिखती है । लोगों की विवशता है कि -
होठों पर हाँ ना में सिर हिलते....
दोनों नवगीत भावपक्ष और कलापक्ष की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं प्रभावशाली  हैं । 


-महेन्द्र नारायण 
कांधला , शामली
उ०प्र०
 मनोज जैन जी से मेरी मुलाक़ात ,भारत भवन,भोपाल में हुई थी ।वे बहुत ही सरल हृदय गीतकार है। यहाँ प्रस्तुत दोनों गीत अति सुंदर हैं ।उन्हें बधाई पर मैं इस बात का पक्षधर हूँ कि यदि एक रचनाकार किसी दूसरी भाषा के शब्द का प्रयोग कर रहा हो तो उच्चारण के स्तर पर वह शुद्ध रहे तो अच्छा जैसे रोज़,ख़ुद, कांच,क़दम क़दम,नफ़रत आदि ।पर यह एक सुझाव मात्र है ।

मुकुट सक्सेना

मनोज जी के नवगीतों की सहज संप्रेषणीयता
लुभाती है।
राज्य की कल्याणकारी अवधारणा को ख़ारिज करते हुए जनतंत्र में जो पूंजीवाद की घुसपैठ सरकार के माध्यम से हो रही है,उसी की पड़ताल करता है नवगीत,,बम बम भोले।
निजीकरण और यांत्रिकता के इस दौर में
मनुष्य की निजता पूंजीपति के यहां गिरवी है।ऐसी स्थिती में व्यक्ति से व्यक्ति की ,समाज से समाज की मुलाकातें और संवाद क्षीण हो चले हैं,,,।रोजी रोटी की व्यवस्था जुटाने में ही समय लग जाता है,सबके पास समय का टोटा है ।परस्पर प्रेम बीज का अंकुरण भी बाधित है।कुछ ऐसे ही कुहासे के संजाल में फंसे आदमियों की सुचिंतित अभिव्यक्ति है,यह नवगीत उगने लगे अखाड़े।
सुंदर गीतों के लिए मनोज जैन जी को बधाई। दाहिया सर को साधुवाद।


अरुण सातले

 आदरणीय बन्धु मनोज जैन जी के दोनों नवगीत सामयिक विषमता और जीवन की दुरूहता के जीवन्त उदाहरण हैं. "बम-बम भोले" का उद्घोष जहां कम में जीवनयापन की प्रेरणा देता है वहीं पूंजीवाद और सत्ता की दुरभि संधियों को भी रेखांकित करता है. बांकी है- इन दोनों के बीच पिस रहा आम आदमी.

दूसरा गीत जीवन की आपाधापी को संजीदगी से बयान करता है. 

मनोज जैन जी को इन जनपक्षधर गीतों के स्रजन लिए हार्दिक बधाई. 

सादर 

अशोक शर्मा 'कटेठिया'
कानपुर/जयपुर.
 वागर्थ पर मनोज भाई के दोनों गीत पढ़ चुका हूँ।दोनों समय से मुठभेड़ करते, सुंदर नवगीत हैं।बधाई।

श्यामसुंदर तिवारी
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 मनोज जैन 'मधुर' जी के दोनों नवगीत प्रभावशाली हैं... कथ्य, शिल्प, लय और प्रवाह की दृष्टि से उत्तम नवगीत हैं...  मनोज जी को हार्दिक बधाई.


-डा० जगदीश व्योम

भक्ति पद से शुरू कर राजनीतिक व्यंग्य मिश्रित यह पहली रचना वास्ता में दो विधाओं को मिलाकर सृजित नया प्रयोग माना जा सकता है। पुर्वांचन में गाए जाने वाले फगुआ गीतों में प्रयास ऐसे मिश्रित विषय का प्रयोग खूब देखा जाता है पर वह क्षेत्र विशेष और सीमित समय के लिए होता है पर मनोज जी का यह  प्रयोग काफी अच्छा और हर मौसम के मिजाज को जमता हैं।

 मनोज भाई के इस नवगीत में तीखा व्यंग।बम ..बम भोले, चाहे कोई कुछ भी बोल कर भोली भाली जनता को बेवकूफ बनालें ।ढोंगी साधू ,बाबा ही नहीं इसमें तो राजनेता भी शामिल हैंजोझूठे वादे करके दिवा स्वप्न दिखलाते हैं । सत्य को आईना दिखलाती रचना।लैक गीतों में प्राय:इस शब्दावली का प्रयोग किमा जाता है एक सम्बोधन के रूप में । भक्ति के मुखड़े का व्यंग विधा में नया प्रयोग क्षेत्र विशेष में प्रयोग की जाने वाली उक्ति का नवगीत के मुखड़े के रूप में प्रयोग । धन्यवाद मनोज भाई आपकी कल्पना शीलता के लिये बधाई ‌
दूसरा गीत :-
उगने लगे अखाड़े
चुनाव रूपी युद्ध की प्रक्रिया प्रारम्भ जिसमें उन्हीं के शब्दों में :-चुप्पी ओढ़े रात खड़ी है /
सन्नाटे दिन बुनता/हुआ यंत्रवत्
यहाँ आदमी/नहीं किसी की सुनता ।*
आज का व्यक्ति य़त्रवत् मशीन हो गया है ।अपने कार्य से ही उसे फुर्सत नहीं । इसलिये कोई किसी की नहीं सुनता समय का टोटा सबके पास है ।अपने सुख दुख स्वयं सहो और दु:ख भरे पहाड़ से दिन काटो । विचारों में मतभेद और सोच में अंतर होने से बात बात पर टकराहटें हैं ।लैगों में सामंजस्य और समन्वय की भावना न होने से सहभागिता नही होती ।आज का मनुष्य नि:स्वार।थ भाव त्याग कर स्वार्थी होगया है। अपनी स्वार्थ गत भावना के कारण वह अकेला पड़ गया ।पहले ऐसा नहीथा सब मिलजुल कर रहते और कार्य करते थे परंतु नई पीढ़ी नये विचार के साथ अहम् का भावयह अऔतर होने से वह स्वयं एकाकी हो गया ।अब प्रश्न है कि इस खाई को कैसे पाटा जाये सभी की पीर पहाड़े पढ़ने लगी परंतु मूल ढाई आखर प्रेम का भूल गई ।जब तक यह धुंध नही छंटती कुहासे और गहरे होते जायेंगे ।आवश्यकता है इस स्वार्थ की धुंध को समाप्त कर ढाई आखर प्रेम का पढ़ने ।प्रकृति का नियम आपका किया ही आपको प्रतिक्रिया के रूप में सामने आयेगा । धन्यवाद मनोज भाई एवं दहिया जी इन गीतों को फिर से मंच पर डालने के लिये ।

समझदार हो गया है इसीलिये अब वह किसी की नहीं सुनता ।


उषा सक्सेना
प्रिय भाई मनोज जैन मधुर जी आपकी यह टिप्पणी कई मायनों में उल्लेखनीय है। व्यक्ति में दृष्टि सम्पन्नता कविता से ज्यादा महत्वपूर्ण है और इस समय आप में दिखाई देती है। डॉक्टर जगदीश व्योम साहब ठीक ही कहते हैं कि आपकी वैचारिकी में अमूलचूल बदलाव हुआ है। मेरी ओर से और पटल संचालन टीम की ओर से भी साधुवाद।
                     

           रामकिशोर दाहिया
                    कटनी

 

 आदरणीय मनोज जैन ‘मधुर’ जी नवगीत की दुनिया के एक जाने-माने हस्ताक्षर हैं। अपेक्षानुसार उनके दोनों ही नवगीत सामयिक व्यवस्था पर धारदार व्यंग्यात्मक् टिप्पणी है। 
प्रथम नवगीत में देश के संसाधनों के निजीकरण तथा नीतप्रति नफ़रत को बढ़ावा देती राजनीतिक वातावरण में जनता को ‘धूनी रमाने’ व ‘बम-बम भोले’ बोलने का रोचक व्यंग्य है। दूसरे नवगीत में “ढाई आखर” की कबीरयत मरणासन्न स्तिथि से जुड़ी पीर है। ये गीत पीढ़ीयों से चलती दूरियाँ व द्वेष की खाई कैसे पाटी जाए पर एक गंभीर प्रश्न पूछता है। मधुर जी को हार्दिक बधाई व दाहिया जी का आभार। 

राय कूकणा आस्ट्रेलिया


 संवेदनात्मक आलोक के पटल पर प्रस्तुत मनोज जैन मधुर के दो बहुत स्तरीय गीत पढ़े,  मनोज   मधुर स्थापित नवगीत कार है,  और उन्होंने  नवगीतो में अपनी अलग पहचान बनाई है,  यहां प्रस्तुत दोनों गीत भी अपनी अलग धार और लहजे के कारण सहज ही आकृष्ट करते हैं। 
पहले गीत में उन्होंने समाज में धर्म के नाम नकली मुखौटे लगा कर जनता को ठगने वाले एवं पूंजीपतियों और सत्ता धारियों के  हाथों ठगी जाती शोषित, पीड़ित जनता की वेदना  को व्यंगात्मक लहजे में व्यक्त किया है, वहीं दूसरे गीत " दिन पहाड़ से  कैसे काटे " में इस जटिल समय और जीवन की विसंगतियों से उत्पन्न अवसाद जनित पीड़ा को बहुत मार्मिकता से अभिव्यक्त किया है।  भाषा, शिल्प और प्रवाह की दृष्टि से दोनों ही गीत  सहज सम्प्रेषणीय और प्रभावी बन पड़े हैं। मनोज जी  को दोनों  सुंदर गीतों के लिए बहुत-बहुत बधाई। एवं आ दहिया जी को इस प्रस्तुति हेतु साधुवाद!

मधु शुक्ला, भोपाल।
भाई मनोज के गीतों से रूबरू हों और उस पर कुछ कहा न जाय यह संभव नही । हम जिसे समकालीन युगबोध कहते हैं उससे जुडे़ रहना मनोज जी के नवगीतों की सबसे बडी़ विशेषता है , गीत लिखते हुए उन्हे एक अरसा हो गया है अतः स्वाभाविक रूप से उनकी अपनी एक अलग शैली विकसित हो चुकी है जिससे वह अपनी बात को प्रभावी तरीके से कह लेते हैं । प्रस्तुत दोनो गीत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैंं । 
  बहुत  कुछ लिखना चाहता हूँ परंतु स्वास्थ्यगत कारणों से नही लिख पा रहा । भाई मनोज और आपको बहुत बहुत साधुवाद ।


डॉ अजय पाठक
बहुत बहुत शानदार गीत! अधिक क्या कहें! जिनके नवगीत पढ़कर लिखना शुरु किया! उनमें से कुछ की बानगी के रूप में पटल प्रस्तोता दाहिया जी ने पटल पर रखे। आदरणीय मनोज भाईसाब को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं! आपकी लेखनी से ऐसे ही समसामयिक समस्याओं और आडम्बरों की सच्चाई लिखी जाती रहे! 

गणतंत्र ओजस्वी, आगर


 वर्तमान राजनैतिक व सामाजिक परिदृश्य को रेखांकित करते हुए दोनों नवगीत प्रासंगिक हैं। जब कलम सीधे संवाद करते हुए आगे बढ़ती है, तब उसकी महत्ता स्वतः ही बढ़ जाती। समर्थ लेखनी व रचनाकार को हार्दिक बधाई।

राम नरेश रमन, मोठ(झाँसी)
 मनोज जी के गीत वर्तमान को जिस लय में गा रहे हैं वह लय इन गीतों को कालजयी संगीत की संगत दे रही है ।
इन गीतों के प्रतीक सुंगम संगीत को शास्त्रीय संगीत का प्रतिरूप देने के लिए प्रतिबद्ध हैं कथ्य की कसाबट तबले के ताल का संगत आभास देते हुए दोनों गीतों को न केवल मधुरता प्रदान कर रही है बल्कि वर्तमान के सभी कलुष और कटु अनुभवों को जिस ढंग से अभिव्यक्त कर रही है उसमें मेघ-मल्हार और भैरवी का अनूठा संगम एक साथ तालबद्ध हुआ है कवि का कर्तव्य है कि वह समस्याओं को उजागर भी करे और समस्या उत्पन्न करने बाली हमारी लचर राजनीतिक व्यवस्था को फटकार भी लगाए जोकि मनोज जी उक्त दोनों गीतों में पूरी सफलता के साथ कर रहे हैं ।
हार्दिक बधाई ।
दादा दाहिया जी का आभार ।

              -- ईश्वर दयाल गोस्वामी
                 छिरारी (रहली),सागर
                 मध्यप्रदेश ।
                 मो.- 8463884927

 मनोज जैन जी एक सशक्त नवगीतकार हैं। समय की पदचाप को पहचानते हैं ।पहले नवगीत में वे वर्तमान की यथार्थ स्थितियों से रूबरू होते हैं और सच कहने से हिचकते नहीं हैं। इसी तरह दूसरे गीत में कठिन दिनचर्या, जटिल परिस्थितियाँ किस तरह हमारे जीवन बोध को समाप्त करती जा रही हैं, को बड़ी प्रभावी रूप  से कवि व्यक्त करता है।


रमेश गौतम 
रायबरेली
आदरणीय मनोज जैन मधुर जी का प्रथम नवगीत बम बम भोले* सत्ता के केन्द्रीकरण का कटु सत्य उजागर कर रही साथ ही  पूंजीपतियों की सत्ताधारियों से सांठगांठ के मध्य आम जनता के शोषण की गाथा को सशक्तता एंव सटीकता से प्रस्तुत कर रही है । सर्वप्रथम तो शानदार नवगीत की रचना हेतु आदरणीय मनोज जैन जी को बधाई । यह नवगीत आम इंसान की तकलीफों को दर्शाने के साथ ही विकास और खुशहाली के ढांचे का ताना-बाना बुनती झूठी कहानी की सत्यता दिखा रहा । समाज को और सत्ता को जगाती उत्कृष्ट रचना 

बम-बम भोले

धूनी रमा प्रेम से बंदे !
बोल जोर से 
बम - बम भोले ।

ईश्वर को भी अपने कुकृत्यों में शामिल  करने की नाकाम कोशिश करते ढोगीं लोगो पर सटीक व्यंग 

पूँजीपतियों के
हाथों की 
कठपुतली है देश हमारा
इनके ही सारे
संसाधन 
आम आदमी है बेचारा

निजीकरण में 
जीवन नैया
खाने लगी रोज हिचकोले ।

प्रगति और विकास की झांकी दिखाती रचना (किसकी प्रगति हो रही और कौन तकलीफ पा रहा )

सपनों की झाँकी
में खुद को
राज कुँवर जैसा पाते हैं
सपने तो हैं 
काँच सरीखे
टूटे और बिखर जाते हैं

खुशहाली का सुन्दर सपना देखता आम आदमी गढ्ढे में कैसे गिराया गया है यह हकीकत दर्शा रहा यह नवगीत

वह आवाज़ 
दबा दी जाती 
जो विरुद्ध सत्ता के बोले ।

न कहकर भी सब कुछ कहती रचना बस मौन रहो आँखे मींचे ।

कदम-कदम पर
नफरत बोते 
हमने कुत्सित मन को देखा
रौंद रहे हैं 
प्रतिमानों को
मिटा रहे हैं निर्मित रेखा

अनेकता में एकता को भुला कितनी सारी रेखायें सभी के मन में खींचीं गई और खींचती जा रही सब कुछ कह गई यह रचना

मारा करते 
शान्ति दूत को 
बदल-बदल नफरत के चोले 
 
मर्मस्पर्शी पंक्तियां सत्य को कितनी दफा मारा जायेगा ।
निशब्द हूं! अहिंसा और सत्य के पुजारी को हम सब  आज भी सुकून नही दे सके 

आदरणीय दहिया जी एव संवेदनात्मक आलोक पटल के संचालकों  को असीम आभार  मर्मस्पर्शी नवगीत की प्रस्तुति के लिये


अँजना वाजपेई
जगदलपुर

 आज पटल पर मनोज जैन "मधुर" के 2 नवगीत पढ़े।पहला नवगीत "बम-बम भोले" देश की वर्तमान स्थितियों की विवेचना बड़ी ही खूबसूरती से  कर रहा है ।व्यंग में भी माधुर्य है।
सपनों की झांकी में/खुद को राजकुंवर जैसा पाते हैं।
पर सपने तो सपने ही हैं।काँच की तरह टूट बिखर जाते हैं एक आम आदमी की पीड़ा  का चित्रण मन को उद्वेलित करता है।जो जिम्मेदार हैं वेअपने मद में चूर हैं। 
दूसरा गीत  राजनीति की ओर इंगित करता प्रतीत हो रहा है जो समाज को जोड़ने के स्थान पर तोड़ रही है ---तोड़ रहा दम ढाई आखर /उगने लगे अखाड़े । कवि की पीड़ा सामाजिक स्थितियों को लेकर भी है पीढ़ियों में जो विचारों का अन्तर आ गया है जो दूरियों को और बढ़ा रहा वह कैसे दूर हो ।कम शब्दों में गहन अर्थ समेटे सशक्त नवगीतों  के लिये मनोज जैन बधाई के पात्र हैं


मधु प्रधान जी

 जैसा कि समस्त सम्मानित साहित्यकारों ने  ' वागर्थ ' संचालक आदरणीय मनोज जैन जी के प्रस्तुत गीतों पर अपनी सराहनीय और ऊर्जादायी उपस्थिति दर्ज़ की है ,हमारी प्रतिक्रिया भी आप सभी से इतर नहीं है । कहना यह भी है कि इधर  आपके गीतों का स्वर और बोल्ड और निस्पक्ष हुआ है । धर्म के नाम पर जो पाखण्ड समाज में फल-फूल रहा है , उस पर आपने अपने गीतों के जरिए आक्रामक रुख अपनाया है ।  इस स्वर का , इस मुखरता का स्वागत है । सत्ता प्रतिष्ठानों की कारगुजारियाँ किसी से छिपी नहीं है , यह बात और है कि उनको अपने लेखन में अनावृत्त करने , लानत -मलानत करने का काम हर साहित्यकार नहीं कर पा रहा है । प्रसन्नता है कि मनोज जी
लिख पा रहे हैं -

कदम -कदम पर 
नफरत बोते
हमने कुत्सित मन को देखा 

रौंद रहे हैं प्रतिमानों को
मिटा रहे हैं 
निर्मित रेखा ।

मारा करते 
शान्ति दूत को
बदल-बदल नफरत के चोले ।

प्रतिरोधी स्वर के समानान्तर ही आप अपने गीतों में सामाजिक , मानवीय , वैयक्तिक असंगतियों पर अपनी वाज़िब चिंता दर्ज़ कराते रहते हैं, ' उगने लगे अखाड़े ' उसी कड़ी को आगे बढ़ाता है । अच्छे गीतों हेतु आपको हार्दिक बधाई। भविष्य में आपका यह स्वर और मुखर और दृढ़ हो , इस हेतु सादर शुभकामनाएँ ।

          ' संवेदनात्मक आलोक ' पटल पर आपके गीतों की प्रस्तुति निश्चित ही सराहनीय है , इस हेतु आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी विशेष धन्यवाद के पात्र हैं।

-अनामिका सिंह
शिकोहाबाद
फिरोजाबाद
(283135)

प्रस्तुति
ब्लॉग वागर्थ
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