बुधवार, 3 मार्च 2021

श्रीकृष्ण शर्मा जी की समीक्षा एक बूँद हम पर



'एक बूंद हम' एक नवोदित नवगीत-नक्षत्र का रश्मि-कलश श्रीकृष्ण शर्मा -
'हमें हमारी निष्ठा ही/ परिभाषित करती है
 कवि को तो/बस कविता ही प्रामाणिक करती है। (पृष्ठ 86) उपर्युक्त गीतांश द्वारा अपनी कविता को ही अपने कवि-कर्म की प्रामाणिकता का निकष बताने वाले गीत-कवि मनोज जैन 'मधुर' यों तो उम्र  के लिहाज से अभी मात्र छत्तीस वर्ष के ही हैं, तथापि वे अनेक वरिष्ठ गीतकारों को भी अपनी गीत-संवेदना के सम्मोहक पाश में बाँध चुके हैं।
  यह ज्ञातव्य तथ्य है कि लम्बे समय से नये रचनाकार नवगीत की ओर आकृष्ट नहीं हो रहे थे, किन्तु लगभग विगत एक दशक से अनेक युवा रचनाकारों ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी दस्तक दी है, उन्हीं में से एक नवोदित जाज्वल्यमान नक्षत्र का नाम है- मनोज जैन 'मधुर' उनका कहना है कि  गीत उनके साथ जन्म से ही है। मनोज के शब्दों में ही देखिये-“गीत से मेरा सम्बन्ध तो उस समय से ही है, जब से मैंने प्राणवायु लेनाशुरू किया पिताजी  ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर प्रतिदिन भक्ति गीतों का सस्वर पाठ किया करते थे। तब मेरी उम्र पाँच-छ वर्ष की रही होगी।उन सस्वर पाठों की गुनगुनाहट से मुझमें गीतों की गेयता और उनकी लयबद्धता से लय का जो राग जागा, वही संवेदना की सुरभि मेरे भीतर के छन्द को बाहर लाने को अकुलाने लगी थी"(निवेदन है कि पृष्ठ १९)
            अभी हाल में ही मनोज का प्रथम नवगीत संग्रह प्रकाशित हुआ है 'एक बूँद हम' मेरी दृष्टि में यह शीर्षक व्यंजनापूर्ण है। क्योंकि सम्भवतः यह एक बूँद आँसू (रुदन) की भी हो सकती है और 'ओस' (हास) की भी। रुदन "और हास दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक के बिना दूसरे के महत्व की कल्पना नहीं की जा सकती। दोनों ही मानव जीवन के शृंगार हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो इस सृष्टि-रूपी महासिन्धु की वस्तुतः हम एक बूँद मात्र हैं। तुलसी बाबा भी लिख गये हैं कि' ईश्वर अंश जीव अविनाशी' अर्थात जीव (मनुष्य उस ईश्वर का एक अंश मात्र है। किन्तु कागज उलटकर जब मैंने पहला गीत देखा (जिसके आधार पर संग्रह का नामकरण किया गया है )तो उसका प्रथम बन्ध था-

"शहद हुए एक बूँद हम/ हित साधन सिद्ध मक्खियाँ/ आस- पास घूमने लगीं/ परजीवी चतुर चींटियाँ/मुख अपना चूमने लगीं/ दर्द नहीं हो पाया कम" (पृष्ठ 23 )
              इससे स्पष्ट है कि गीतकार का मूल संकेत समाज में व्याप्त स्वार्थपरता की ओर है, जिसका भुक्तभोगी होने के कारण वह स्वयं दुखी है। फिर भी वह अपने मानुषी धर्म को नहीं छोड़ता-  "सब कुछ भी/ जानबूझकर /बाँट रहे सिर्फ प्यार को बाती से दीप में जले/मेट रहे अंधकार को " (पृष्ठ 23)  

 खैर, 'एक बूँद हम' इस समय मेरे हाथों में है।  संग्रह में कुल 52 गीत हैं। मनोज के अनुसार-“ये गीत किसी वायवीय समाज या संसार के गीत नहीं हैं। मैंने इन्हें सामाजिक परिवेश से ही उठाया है । (पृष्ठ -१९) और- चूँकि कवि ग्राम्याचल में जन्मा और बड़ा हुआ है, इसलिए उसके इन गीतों में वहीं का निकट से देखा और जाना-पहचाना ग्राम्य-बोध मुखर है। किन्तु आगे चल कर शिक्षा व नौकरी आदि के सिलसिले में नगर व महानगरों में रहते हुए वहाँ की विभिन्न दैनन्दिन समस्याओं और दिनों-दिन प्रदूषित होते परिवेश से  गुजरा है । फलस्वरूप उनके इन गीतों में उस अनुभव की बेबाक अभिव्यक्ति है। 
उनके शब्दों में ही देखिये :-
"लोक अंचल की विविधता/ को संजो कर बन्द में  ग्राम-नागर इनमें /झाँकता हर वर्ण में।" "साथ ही इन गीतों का वैशिष्ट्य है कि ये- धरती से सदा रहते जुड़े।” (पृष्ठ 44)  
अपनी रचनाधर्मिता की पड़ताल करते हुए मनोज का यह कथन द्रष्टव्य है कि- "गीत रचने के लिए पहले गीत हो जाना पड़ता है, गीत को जीना पड़ता है। बिना गीत के अस्तित्व को अपने भीतर उतारे गीत रचना सहज नहीं है। मैंने पहले गीतों की दुनिया को अपने में भी तरह जिया है। (पृष्ठ 20)"
 यथा-मीत हमारे प्राण /गीत के तन में रमते हैं। (पृष्ठ 85) अपनी पूरी अनुभूति की मुक्तावस्था से उसे सम्पृक्त किया है ('पृष्ट २०), तभी पीड़ा ने गीत रचने की प्रेरणा दी है :
जब पीर पिघलती है मन की तब गीत नया मैं गाता हूँ।' (पृष्ठ 110) और आनुभूतिक  संवेदना के कारण.  *भावना के सिन्धु को हम रोज मथते हैं
 शब्द लय में बाँध कर हम छन्द रचते हैं। (पृष्ठ 43)
  कवि ने निम्नलिखित गीताँश के माध्यम से न केवल गीत को ही व्याख्यायित किया है अपितु उसकी शक्ति और सामर्थ्य को भी रेखांकित किया है- 
'गीत धरा का संस्कार है/ गीत विश्व की आशा/
 गीत शक्ति का तेजपुंज है /गीत हदय की भाषा/  
गीत हमारे अन्तर्मन का कल्मष धोते हैं (पृष्ठ 39) और-  

गीत मेरे कवि हृदय को पाँव देते हैं।' (पृष्ठ42) यहाँ 'पाँव देने' का कितना अनूठा और मौलिक प्रयोग है। बचपन में देखा हुआ गांव कवि की सुधियों में बसा हुआ है। वह उसके आकर्षण से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता और अपने मन पाँखी से आग्रह करता है कि-  'मन पाँखी उड़ चल रे / सुधियों के गांव 
जहाँ 'पिहू-पिहू पपीहा मस्ती में गाए  
सावन की बूँदों में तन-मन सरसाए। 
अमुआ की डाली पर/ झूल रही बाला /
मनचाहे छू लेना / मेघों की माला । 
पायल की झनन-झनन कर रही ठिठोली /
पनघट भी बोल रहा रसभीनी बोली/
 टेर रही पियराये महुआ की छाँव/(पृष्ठ 107)  या प्रस्तुत गीत में गांव के जीवन, उसकी संस्कृति और प्रकृति का कितना मोहक और रसभीना चित्रण है। किन्तु अतीत की मधुर स्मृतियों से बाहर आकर यथार्थ के ठोस धरातल पर  अपने पाँव रखने पर गीतकार पाता है कि---
 "नेह के इस गाँव का दूषित दुआ वातावरण। (पृष्ठ-७० ) क्योंकि यहाँ पाश्चात्य अपसंस्कृति अंगद जैसा पांव जमाये है "(पृष्ठ ६२), जिसकी  चकाचौंध में पुरानी मान्यतायें बदल रही हैं। हम अपनी जड़ों , (संस्कृति) से कट गए हैं। (पृष्ठ २५) और अपनी अस्मिता खोते जा रहे हैं। (पृष्ठ ६२) फलस्वरूप-  'बिसरी अपनी बोली बानी बिसरा सम्बोधन  बंसी,मादल, सोन मछरिया/ बिसर रहा गोधन (पृष्ठ ५५) स्वार्थपरता हावी है, जिसके कारण "टूट रहे हैं रिश्ते- नाते"(पृष्ठ 74) और "द्वार दरपन में झलकता है परायापन" (पृष्ठ६०)। इस स्थिति को देख कर गीतकार क्षुब्ध मन से कहता है कि - खोखले आदर्श के हमने मुकुट धारण किये/ बेच कर हम सभ्यता के कीमती गहने जिये/ कद भले अपने बड़े हों / पर वजन में घट गये। (पृष्ठ २५) 

संवेदनहीनता इतनी बढ़ चुकी है कि 'मरघट भी हम कब पहुँचाते ! मरे पड़ोसी को ।'(पृष्ठ ६९)  विकास के नाम पर जारी अन्धी दौड़ से भौतिकवादी प्रवृत्तियाँ पनप रहीं हैं। फलस्वरूप-  * हुआ यंत्रवत आदमी /सबके पास समय का टोटा! (पृष्ठ ४८) 'छल छद्म कर रहे गठजोड़ ( पृष्ठ ७१), जिसकी वजह से 'उगने लगे अखाड़े (पृष्ठ ४९) वहीं दूसरी ओर वैश्वीकरण और आर्थिक उदारवाद देश को विदेशी बाजार बनाने पर तुले हैं और उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। इन्हीं सब कारणों से-

१) महँगाई की मार कमर को जमकर तोड़ रही ? (पृष्ठ-५८)
२)-हर चौखट पर टंगी हुई है। भूख प्यार की फर्द 
धीरे-धीरे डूब रहे हैं । यहाँ कर्ज में खेत (पृष्ठ-७३)
3) विश्न ग्राम से ग्रामलोक की / देह रही है छिल (पृष्ठ-५५)
 विज्ञापन के प्रेत की माया कितनी जबरदस्त है , देखिये-  लोहे को सोना/ राई को/ पर्वत करता है। (पृष्ठ -५८)
  शोषण का तो कहना ही क्या 'मेहनत के क्षण / बाजारों की/ बलि चढ़ जाते हैं
  खाली हाथ सदा/ हिस्से में/ अपने आते हैं।' (पृष्ठ ५९) फलस्वरूप गांव के हालात अब इतने बुरे हो गये हैं (पृष्ठ-७३) कि- *पहले था गरदन पर फंदा / अब गरदन पर आरी है (पृष्ठ ७५) 

 'बचपन में ही भक्ति गीत और जैन दर्शन के प्रवचन सुनते रहने के कारण (पृष्ठ १९) मनोज के मन में आध्यात्मिकता का पुट भी मौजूद है। वे मानते हैं कि मनुष्य के जीवन की डोरी काल के हाथों में है- 'काल के हाथों कि/ प्रत्यंचा हमारी प्राण के शर देह धनु से/ छूट जायेंगे काँच के घट हम/ किसी दिन फूट जायेंगे (पृष्ठ ८३) प्रत्येक मनुष्य जानता है कि मृत्यु निश्चित है। फिर भी सांसारिक प्रपंचों में उलझकर मनुष्योचित कर्तव्यों को करना भूल जाता है। जिसकी वजह से अन्त समय में उसके पास पश्चाताप के सिवाय और कुछ नहीं बचता।
 पाती जब-जब मिली मौत की रोया बहुत हिया/ जीवन को जैसा जीना था/ वैसा नहीं जिया। (पृष्ठ-८९)  
आज समाज व राष्ट्र में व्याप्त विडम्बनायें और विसंगतियाँ प्रगति व सुख-शान्ति के लिए नासूर बन गयी हैं। लोगों की कथनी करनी में एक्य नहीं है। उनका दो मुँहा भ्रष्ट आचरण तमाम बुराइयों की जड़ है जिसे देख कर वह क्षुब्ध स्वर में कहता है-  'जस का तस दिखता कोई नहीं/ सबके सब दो मुख वाले हैं। (पृष्ठ १०३) 
वह नेताओं को जनतंत्र का शोषक मानता है। (पृष्ठ-१०६) जो- 'वकुल वृत्ति को ढाँके तन में / दीख रहे हैं सब पैगम्बर ।' (पृष्ठ ९२) 
और-  हथियाया है शिखर इन्होंने सबको मिला कुआँ (पृष्ठ ९३)  अमृत आप पिया करते / विष सबको पीना है। (पृष्ठ ९४) अपराधियों के समक्ष न्याय नतमस्तक है- मुकदमे फौजदारी के/लगे  थे सैकड़ों जिस पर वही सठ न्याय के हाथों हमेशा जेल से छूटा (पृष्ठ १०५) 

साधु-सन्तों का चित्र प्रस्तुत है। इसमें प्रयुक्त अजगर' शब्द उनके आज के चरित्र को व्यंजित कर रहा है- 
कुछ बाने पहने सन्तों के /पर मन में अजगर पाले हैं। (पृष्ठ 103  गीतों में कहीं-कहीं प्रकृति के रंग-रेशे भी मिलते हैं। वर्षा ऋतु के दो मोहक चित्र-बिम्ब द्रष्टव्य हैं-  (१)झरर झरर मेघों से/फूट पड़ा नेह  
सीपी में कैद हुआ मोती-सा मेह(पृष्ठ ११२) '
(२) घूम रहे सूरज के घोड़े और ऐरावत  /
फैल गया झितिजों तक / सतरंगी जाल /
घरती ने गोदे हैं/धानी के गोदने /
जादू सा डाल गया /अन्तस का मोद /
सावन की झड़ियों ने /पनघट की मांग भरी
 नदिया की भर दी है/सूनी सी गोद।  (पृष्ठ ४१)  
कवि प्रकृति व पर्यावरण के महत्व को रेखांकित करता है
 है-
 (१)जल है प्राणाधार हमारा | (पृष्ठ 108) 
(२)आने वाली नस्लों की है/ पर्यावरण धरोहर (पृष्ठ१०९) उसे जीवन और जगत के भविष्य की चिंता है। इसलिए वह चाहता है कि- 
रहे प्रदूषण मुक्त धरा यह और गगन यह अपना (पृष्ठ १०९) वह जानता है कि जल ही जीवन है। उसके बचे रहने पर ही भविष्य का सुरक्षित रह पाना सम्भव है। इसलिए वह लोगों को पानी बचाने का सन्देश देता है। 'अगर सहेजी आज बूँद तो /बचा रहेगा कल 
नदियाँ भी हो पोखर भी हो/कहीं न हो मृगजल
(पृष्ठ 33-34)  
         कवि सरल व सात्विक प्रकृति का है | 'वह स्वयं की कीर्ति नहीं चाहता।( पृष्ठ ८५ )उसे डलिया भर सुख के बजाय चुटकी भर खुशबू की चाह है, "जिसमें वह अपने सुख-दुखों को बो सके'(पृष्ठ 45)पर उसकी ऑखें पर्वत जैसे  स्वपन देखती हैं। (पृष्ठ68), जो माँ की पीर पिता की चिन्ता और नौंन तेल लकड़ी के चक्कर में दम तोड़ रहे है'
पृष्ठ(54), किन्तु वह निराशावादी नहीं है।उसे पूर्ण विश्वास है कि एक न एक दिन अवश्य
 'कट जायेगी रात सवेरा निश्चित आएगा (पृष्ठ२७) और उसके साथ 'बड़ी-बड़ी आएँगीं खुशियाँ ।। पृष्ठ(२१) परन्तु वह ये बताना नहीं भूलता कि.. "हासिल हुआ यहाँ कब किसको /बिना किये कुछ बतला दे ४ (पृष्ठ२१) इसलिए वह 'सपने साकार करने की दृष्टि से'(पृष्ठ 30पर कहता है कि आलस्य छोड़कर  कर्म की ध्वजा उठा'(पृष्ठ २१) सतत कर्मशील रहने पर ही...

मंजिल तेरे खुद चरणों को /आकर चूमेगी 
कर्म मथानी से सपनों को रोज विनोया कर (पृष्ठ २८)  संवेदना में पगे कुछ मर्मस्पर्शी गीतांश पाठकों के अवलोकनार्थ  प्रस्तुत हैं
1*पतझड़ का हम थामे दामन / मंद-मंद मुस्काए 
सावन और बसंत हमारे । मीत नहीं बन पाए  
बस खोना ही नियति हमारी/पाया कभी नहीं (पृष्ठ 80) (२)'चले गए बाबूजी / घर में दुनिया भर का दर्द छोड़कर  शूल सरीखी नजर बहू की बोली लगती नदी लहू की
 बेटा नाजुक हाल देख कर चल देता है दृष्टि मोड़कर। ताने सुनती कैसे कैसे /अम्मा शिलाखण्ड हो जैसे 
लिए गोद में कुंठा बैठी/अपने दोनों हाथ जोड़ कर । 
गहन दासी अम्मा ओढ़े /शायद ही अब चुप्पी तोड़े 
चिड़िया सी उड़ जाना चाहे/तन पिंजरे के तार तोड़कर (पृष्ठ 66)  

(3) एक पंख पाँखी का /तोड़ा है। 
उड़ने को दुनिया ने छोड़ा है (पृष्ठ४५)  
                                  भाषा सरल सहज और प्रांजल है,तथा उसमें वस्तुपरक सौन्दर्य है। होठों पर ताले जडना' (48).फूटी आँख न सुहाना (१०), चकिया का पाट होना (६०), टाँका भिड़ाना (१०२) आदि मुहावरों का सुष्ठु प्रयोग है।धानी के गोदने (४१),अक्षरों के पाँव (७८) चौखट की आँख (56), कर्जे का मुँह (७५) जैसे अनूठे प्रतीक और रावण को अन्तर में पाले (५६) नई फसल की आँखों में है बॉलीवुड की चाल (50 जैसेअनेक सटीक व सार्थक मिथकीय विम्बों की योजना है | 'डढेल (११९), लागर' (९७) जैसे विरल देशज शब्द भाषायी शक्ति को बढ़ाते हैं। 'ओ बरगदों (97-98) गीत और 'घर का बूढ़ा बरगद झेले एकाकी अवसाद (७३) गीतांश कबीर की उलटबांसियों की याद दिलाते हैं।
समिष्टतः मनोज में सृजनात्मकत प्रतिभा और सजग दृष्टि है। गीत के प्रति उनकी निष्ठा ही उनका आत्मबल और सृजन की प्रेरणा है। उनके गीत स्वतः स्फूर्त और विविधवर्णी हैं। उनका कथ्य समकालीन त्रासद यथार्थ का मुखर चित्र है, जो अपनी निहित संवेदना से पाठक के मन-मस्तिष्क को झकझोरता है । कतिपय प्रयोग इनकी मौलिक उद्भावना के परिचायक हैं। छन्द और लय सधे हुए हैं। गीत आनुभूतिक संवेदना से दीप्त, रससिक्त और मर्मस्पर्शी हैं,तथा कवि की सम्भावनाओं के प्रति आश्वस्ति प्रदान करते हैं। माँ भारती  से मेरी कामना है कि मनोज जैन 'मधुर की गीत. साधना में अबाध निरन्तरता बनी रहे और इन्हें यशः कीर्ति प्राप्त हो।

श्रीकृष्ण शर्मा
सुकरी चर्च के पास, जुन्नारदेव
जिला छिंदवाड़ा मप्र 480551
मोबाइल नम्बर
09977564868
 कृति. एक बूँद हम  (नवगीत संग्रह)

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