मंगलवार, 2 मार्च 2021

एक बूँद हम की सविस्तार समीक्षा डॉ सुरेश गौतम

बाज-तार का मोहन विज्ञान : मनोज जैन ‘मधुर‘
डॉ सुरेश गौतम
 गीत जीवन की आत्मकथा है, मस्तिष्क-हृदय का अनुशासन पर्व । इस अनुशासन पर्व को साधने और आत्मकथा को गांधी बनाने के लिए तट छोड़ बहुत गहरे जलधि में उतारना पड़ता है । गीतकार की यही दृष्टि है - 
”तट पर मत कर शोर
जलधि में उतर
डूब कर मोती ला ।“
 यही उसकी ‘कर्म ध्वजा‘ तथा ‘कर्म-मथानी‘ है । गीत-डगर पर चलते हुए इस विचार-चिंतन की समाधि-योग स्थित प्रज्ञता देने के लिए तीन दृष्टियां चाहिए । ये त्रिक् दृष्टियां हैं -1- शिरोमूला 2-पादमूला और 3 चक्षुर्मूला।सूक्ष्म से स्थूल की ओर यात्रा शिरोमूला दृष्टि है, इसे ज्ञान दृष्टि या संचार दृष्टि के रूप में भी स्वीकार किया जाता है । स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा अर्थात् स्थूल प्रतीकों के माध्यम से सूक्ष्म अर्थो में प्रवेश पाना पादमूला दृष्टि है । इसे संप्रेषगीयता, संचार क्रम अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी कहते हैं । स्थूल ओैर सूक्ष्म अथवा ज्ञान या विज्ञान दोनों को घुलनशील बनाकर... सामंजस्यमूलक समन्वय समरसता चक्षुर्मूला दृष्टि । इस रसमूलक चक्षुर्मूला दृष्टि को ही ‘गीता‘ में ज्ञान-विज्ञान समन्वित दृष्टि कहा गया है । यही अन्तभविलोक और बाहृयजगत का सौन्दर्य-संतुलन है । शब्द-सौन्दर्य और अर्थ-सौन्दर्य दोनों पति-पत्नि की तरह जब एक दूसरे में अन्तर्गमन कर एकरूप् हो जाते हैं, उसी समन्वित रूप को वागर्थ सम्पृच्म उदात्त आदर्श रूप कात्य कहा जाता है । ‘अग्निपुराण के अनुसार गीत (काव्य) की यही ‘गुणयुक्त अर्थगर्भित वाणी है । अन्य विद्धान-दृष्टियों से हटकर मैं इस ‘त्रिक् कसौटी और ‘तुलादंड‘ पर मनोज जैन मधुर के गीत-कद को नापना तौलना चाहता हूं । 
 प्रथम पंक्ति विद्धानों की सार्थक अर्थपूर्ण टिप्पणियों ने मुझे अपनी बात कहने के लिए अतिरिक्त सावधान कर दिया है । आचार्य डॉ. विमल यदि मनोज जैन मधुर के गीतों में एक नव्य आंदोलन के रूप में ‘वैचारिकता का पुनसृर्जन‘ देख रहे हैं तो श्रेष्ठ कवि एवं सुधी समीक्षक श्री दिवाकर वर्मा इनके गीतों में पदे-पदे कबीर की साखी, सबद, रमैनी और उलटवाँसियों का ‘नटराज नर्तन‘ अनुभव कर रहे हैं । त्रिभुज के तीसरे कोण पर अपनी विस्तृत संग्रह भूमिका में युवा गीत नेतृत्व तक श्री वीरेन्द्र आस्तिक की दृष्टि में मनोज जैन मधुर ”कबीर के साथ एक और रचनाकार कफन बांधकर साहित्य की जमीन पर...आत्मसंवाद के रूप में प्रतिसंचार रच रहा है ।‘ उनके अनुसार-‘...शब्द ही विचारों में बदलते हैं...।“ ‘शब्द‘ को लेकर मैं यहां वीरेन्द्र आस्तिक के सद्य प्रकाशित गीत संग्रह ‘दिन क्या बुरे थे‘ (विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पित, 28 फरवरी 2012) से एक गीत का सूर्यांश देना चाहता हूं । ‘शब्दों ने मधुमक्खी की तरह फूल (विरासत) को बिना क्षति पहुंचाए सारी खुशबु खींच ली है । अद्भुत है यह ‘शब्द रश्मि बिंब -”शब्द !
मुझे चौंका दे
जैसे बीज धारा के भीतर
अंधकार को चौंकाता है ....।“
 इसी प्रकार मनोज जैन मधुर के मानस-गर्भ में निरंतर तप मंज रही ‘शब्दों‘ की अप्रतिम ‘बीज-शक्ति‘ को देंखे -
 ”शब्दों में होता सम्मोहन/शब्दों में होता में होती गहराई/रचता शब्दों का जादूगर/शब्दों से सच्ची कतिताई/शब्दों की पावन गंगा में/जो भी उतरा वह हुआ अमर/शब्दों ने रच दी रामायण/शब्दों ने छेड़ा महासागर/हमने चाहा कुछ गीत लिखें/पर छंद नहीं सध पाता है/मन बोला ऐसा होता है/जब भावों का, अभिषेक न हो ।“
 ‘शब्द‘ दहकता हुआ अंगारा होता है । मनुष्य ने सदियों के परिश्रम और अनुभव के बाद इस जीभ पर रखना सीखा है । जीभ से हलक तक उतारने में महारत हासिल की है । वाणी का रसायन भाषा (शब्द) की ऋत भूमिका से जब हमें जोड़ता है तभी हम मनुष्य रूप में सार्थक होते हैं । इसीलिए दंडी ने ‘शब्द‘ की सूत्र व्याख्या करते हुए कहा-
”इदमंधंतमः कृत्स्नं जायते भुवनत्रयम्“ ।
यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते ।।
 अर्थात् यह त्रिभुवन घोर अंधकार में निमग्न हो जाता यदि सृष्टि के आरंभ में शब्द (भाषा) की ज्योति न जलती होती ।
 कबीर ने इसीलिए कहा था -”सबद संभारे बोलिए, सबद के हाथ न पांव,
   एक सबद करे दोस्ती एक सबद करे घाव ।“
 शब्द-रचना में रस, भाव, वृत्ति या प्रवृत्ति इनमें से कोई भी अकेला नही आता, इनका रचना में विर्मद होना चाहिए, उसी से रचना में राग आता है-
 ”न होकरसजं कात्यं किचिंदस्ति प्रयोगतः ।
 भावो कपि रसों वापि प्रवृतिवृत्तिरेवक ।।
 ”न होकरसजं काव्यनैक भावेकवृत्तिकम् ।
 विमर्दे रागमायाति प्रयुक्तं हि प्रयत्नत्ः ।।
 -नाट्यशास्त्र, अध्याय-7, श्लोक 119
 ‘भावों का अभिषेक‘ (पृ.88) तभी होगा जब इस विमर्द या परस्पर संश्लेष किंवा जीवन की परिपूर्णता के अंगीकार के करण रचना का राग महाराग बनता है, नहीं तो वह क्षणिक रंजन या बहकावे में स्खलित होकर रह जाता है । शब्द ही हमें बांधते हैं, छलते भी हैं और बहलाते भी हैं, और वे ही हमारी मुक्ति का द्वार भी खोलते हैं । ‘शब्द‘ को प्रमाण मानने वाली परम्परा उसे वाग्रूप या प्रतिमात्मक, नित्य या विभू तथा आविष्कारक या आरम्भक भी स्वीकार करती है । ‘सिद्धान्त कौमुदी’ में तो ‘शब्द‘ का एक अर्थ ही आविष्कारक दिया गया है- 
”शब्द उपसर्गादाविष्कारेचाद् भाषणे ।“
 यदि ‘शब्द’ स्खलन और उन्नयन दोनों की ओर ले जाता है, तो उस सन्धिस्थल को पहचाना जाना चाहिए, जहां से स्खलन और उन्नयन दोनों की भूमियां फूटती हैं । ‘शब्द’ तो वे ही होते हैं, उनके पीछे अन्तर्निहित दृष्टि अलग-अलग इन भूमियों का उद्घात करती हैं । जो दृष्टि समग्र का अंगीकार करती है, वह उन्नयन की ओर ले जाती है । यही भारतीय सांस्कृतिक मूल्य-बोध का वैशिष्ट्य रहा है । (दृष्टव्य : डॉ सुरेश-वीणा गौतमः भारतीय साहित्य कोश, खंड -4, पृ.449-50) । मनोज जैन मधुर के ‘गीत-शब्दों’ में यही भारतीय आलोक है । 
 मनोज जैन मधुर के वैभवपूर्ण गीत-परिसर के केन्द्र में प्रवेश से पहले मैं एक बात और विशेष रूप से कहना चाहता हूॅ कि आज भी गीत के साथ अघोषित संगठित छल बंद नहीं हुआ है । इसमें जितने नई कवितावादी शामिल है उससे अधिक हमारे गीतकार (तथाकथित) भी सम्मिलित हैं । पुराने गीतकार जहां चुकते जा रहे हैं, नया नहीं दे पा रहे, अपने आपको दोहरा अधिक रहे हैं, वहीं अनेक युवा गीतकार पूरी शक्ति से इन गीत विरोधियों के अघोषित संगठित छल को अपनी रचनात्मकता के द्वारा बीच धारा से विखण्डित कर रहे हैं । इनमें एक नाम जो लगातार गीत केन्द्र की ओर बढ़ रहा है, वह है मनोज जैन ‘मधुर’ । अपने आपको अग्रणी मानने वाले अनेक गीतकारों ने वामपंथियों की कृपाकांक्षा के लिए उनके समक्ष समर्पण कर दिया है । ऐसे गणेश परिक्रमी मानसिक गुलाम कालिदासों की संख्या इधर राजधानी में बढ़ती ही जा रही है । अनेक गीतकार ऐसे भी हैं जो कुलालोचक तो हैं ही, भूमिका व्यवसायी भी हो गए हैं । उन्हें लगता है गीत में कुछ नया तो जोड़ नहीं पा रहे यश वृद्धि के लिए भूमिकाएं फ्लैप टिप्पणियां ही सही । आस पास कुछ शिष्य तिलचिट्टे भी हैं जिनका कोई वजूद नहीं लेकिन ये सुनियोजित भुमजाल रचने में पूरी तरह सिद्धहस्त और मुस्तैद रहते हैं । बहरहाल गीत के नाम पर इनकी खींची गई धुंधली रेखा के समक्ष मनोज जैन ‘मधुर’ ने ताल ठोंक दी है । मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि विचारधारा के बंजरपन और वैचारिक मूर्च्छा के भूमंडलीकृत समकालीन परिहश्य में मनोज जैन ‘मधुर’ के गीत एक रचनात्मक हस्तक्षेप है । उभरते हुए इस युक्त गीतकार के चिंतन में प्रतिरोध का नया सौन्दर्यशास्त्र, हर क्षेत्र में हो रही बौद्धिक हिंसा की बुनावट को शिद्धत से समझना और समझाना चाहता है । 
 मैंने ‘मधुर’ के गीतों को अनेक बार पढ़ा । पहली बार एक सामान्य पाठक बनकर रसिक रस के लिए, दूसरी बार सावधानी से अर्थ-संगुंफनों की तलहटी में जाने के लिए, तीसरी बार एक टिप्पणी के रूप में प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए, चौथी बार ध्यान से एक समालोचकीय नज़रिये से, फिर पांचवी, छठी, सांतवी बार काया से आत्म-काया में प्रवेश के लिए, संतुष्टि मिली लेकिन बेचैनी, व्यग्रता बढ़ गई । तीन चार बार पुनः अनेक गीतों की अन्तर्वीथियों में प्रवेश करने के लिए लगभग युद्ध करना पड़ा । गीत जितने सीधे, सरल और संप्रषणीय हैं उससे कही अधिक गहरे, ‘देखने में छोटे लगे, घाव करे गंभीर‘ मुद्रा में ‘सतसैंया के दोहरे’ जैसे हैं । अभिधा मूलक लाक्षणिक अभिव्यंजना में मनुष्य-मन की अन्तर्वर्ती परतों का रसतम द्रव । द्रव बिंब इतने नुकीले और अर्थ सापेक्ष हैं कि गीतों में व्याप्त लालित्य विधान जीवन को कहीं एकांकी बना देता है, कहीं कहानी-उपन्यास तो कही महाकाव्य । ललित निबंधात्मक गीतों की काया-कलश में शब्दों की गूंज-प्रतिगूंज, छंदों का जीवन ले (पृ.110) ‘जवारी’ की स्थिति निर्मित कर देती हैं - 

(क) ”जब पीट पिघलती है मन की 
तब गीत नया मैं गाता हॅू .... ।“
(ख) ”वेदना की कोख से/जन्मा हुआ मैं गीत हॅूं
देख लेना एक दिन/मुझको जमाना गायेगा । “ं
(ग) ”कंठ से जन्मा हुआ मैं 
सत्य का संगीत हॅू ....।“
 अध्यात्म की दुर्लभ स्थिति है गायन में ‘जवारी’ । हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इस शब्द का प्रयोग आवाज के लिए और ‘बाज के तार’ के लिए किया जाता है- सुर का वह बारीक से बारीक कण, जहॉ से पूरा संगीत अलौकिक हो उठता है । इस ‘सत्य-संगीत’ की ओर बढ़ते मनोज जैन ‘मधुर’ के गीतों में अध्यात्म की यह स्थिति और परिकल्पना बेशक अभी न हो लेकिन मन के अन्तस को भेदकर जीवन के संश्लेष रंगों तक पहुंचने की ‘जवारी तड़प’ उसमें विद्यमान है । पिघलती पीट के साथ गीतों में ‘जवारी’ स्थिति तक न पहुंच कर भी अपनी अंतरधारा में वह जद्दोजहद करता हुआ खुलकर बहने लगता है । इनके गीतों की ध्वनि तरंगों में बहती गूंज प्रतिगूंज ‘जवारी’ पीड़ा का अन्तर्नाद है । अंतस्थ विराजित उन्मत्त गति ऐसे क्षणों में ‘गीत लय में ढल जाती है- 

(क) ”.....देह में लय को समेटे/सत्य कालातीत हूॅ 
गुनगुनाएॅगे अधर तो/साँस को महकायेगा । “

(ख) ”.....गीत की लय में परम-सुख/खोज लेता हॅू/
स्वर्ग से सुख का घर पर/मैं विजेता हॅू/
गीत मेरे तप्त मनको/छांव देते है... । “
 संपूर्ण सृष्टि ‘लय‘ ‘नाद‘ और ‘वाक’ के अधीन है । ‘गीता‘ में उल्लेख है - ‘वेदानां सामवेदो-डस्मि ।‘ ‘साम’ साक्षात परमात्मा का ही स्वरूप माना जाता है जिसकी आधार शिला है - ‘नाद ।’ नाद (ध्वनि) से वर्ण, वर्ण से पद, पद से वाक्य, वाक्यों से भाषा की उत्पति होती है जिससे जगत का व्यवहार चलता है । अतएव संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में गीत नाद है । विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि सृष्टि-चक्र ध्वनि और गीत पर अश्रित है । मुनिवर मतंग कहते हैं -
”न नादेन बिना गीतं, न नादेन बिना स्वराः 
न नादेन बिना नृत्तं, तस्मान्नादात्मकं जगत । “
 अर्थात् नाद के बिना ना स्वर, ना गीत और ना ही नृत्य है इसीलिए संपूर्ण जगत नाद के अधीन है । दूसरे शब्दों में पंडित शारंग देव भी यही कहते हैं - 
”नादेन व्यंजते वर्ण, वर्णात् पदाद्वचः
वचसा व्यवहारोडयं, नादाधनीमतो जगत । “
 ‘स्वर्ग’ और ‘धरा’ के नाद-चक्र के ‘कालातीत सत्य‘ की लय में ही मनोज जैन का गीतकार मन ‘परम सुख’ खोज रहा है । नाद-लय ही नर-नारयण का संधि सूत्र है । इन संधि सूत्रों की खोज में लगा मनोज जैन ‘मधुर‘ अन्तसतल विलय की भूमिका बना रहा              है । 
(क) ” गीत के तुम को/मिलेंगे ठॉव/साधना के सिंधु में/गोते लगाओ तो/
 कलरबों में लय धुली है/गीत, उड़ती तितलियों में/पवन, बदली, चाँद, सूरज/
तार सप्तक बिजलियों में/जग उठेंगे गोपियों के गाँव/बांसुरी कान्हा सरीखी/तुम बजाओ तो/
जड़, तना, फल, फूल, पत्तों/सहित इनको ढॅूढ लाओ/गंध सौंधी, नदी पनघट/
खेत की इनमें मिलाओ/चल पड़ेंगे अक्षरों के पाँव/हाथ में तुम गीत का/परचम उठातो तो/
खनक, रूनझुन, गुनगुनाहट/भ्रमर के अनुराग में है/गीत, मौसम, कूल, पर्वत/
नदी झरने बाग में है/गीत ही देगा सुनहरी छाँव/होंठ पर तुम गीत की/सरगम सजाओ तो/
गीत रमते शंख, वीणा/बाँसुरी, शहनाइयों में/गीत अन्तर्चेतना की/जा बसे गहराइयों में/
हों विफल हमलावरों के दाँव/गीत को तुम शीश पर/अपने बिठाओ तो ।“
 (ख) ”गीत भी गाने लगे नवगीत“
 नव कलेवर, नयी भाषा
 पुष्टता ले छंद में
 लोक अँचल की विविधता
 को संजोकर बंद में
 कंठ को भाने लगे नवगीत ....।“
मुझे लगता है नदी की कोरव मं समुद्र का नर्तन है मनोज जैन ‘मधुर‘, जीवन का रस-षास्त्र, वैचारिक संगी की लयधर्मी विरासत का एक ठोस गीत-चरण। मिट्टी छंद में रसस्नात कबीर धारा का उत्तराधिकारी। पाषाण के भीतर से गीत धार खींचने वाली अनुवांषिक संरचना के मूलाधार चक्र को साधने वाला गतिषील वारिस। स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म में सूक्ष्मता की ओर जाने वाला मोहन विज्ञान। गीत-मन का ऐसा वाद्य यंत्र जो शब्द-साधना में बजते-बजते आकंठ डूबकर ‘नंदन विज्ञान‘ बन जाता है। गीत में विलयित होकर एकतार होना ‘नंदन विज्ञान‘ है तो दुःख आनंदातिरेक की पीर भूमि जो मन को स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्मता की ओर गतिषील कर गीत के अन्तसतम में घोल दे ‘मोहन विज्ञान‘ है। दूसरे शब्दों में - 
विचार भाव की समाधि -अवस्था का ‘सम-भाव‘, प्रकृति‘-पुरूष के विलयन का विस्मृत आत्मबोध ‘मोहन विज्ञान‘ की अवस्था है। इस मोहन विज्ञान के नाभि तंत्र की षिल्प चितकों मनोज जैन मधुर में कितनी मोहक है - ‘‘ सारे गीत मेरी आत्मा की आवाज ही तो है। रचने को पहले गीत हो जाना पड़ता है। बिना गीत के अस्तित्व के अपने भीतर उतारे गीत रचना सहज नहीं है‘‘। मनोज जैन ‘मधुर‘ समर्पित भाव से इसी ओर बढ़ नहीं पहुंच पाए जिसे मनोज जैन ‘मधुर‘ अपने गीतों में जी रहा है। बिना विलयन के क्या गीत को समझा जा सकता है ? मैं इस प्रष्न से पिछले चालीस वर्षों से लगातार जूझ रहा हूॅ। इसके बावजूद शोध-पथ में हूॅ, मैं नहीं जानता अंतिम निष्कर्ष कब हाथ लगेगा। जैसे हर अंधा दूसरे का रास्ता दिखाने के लिए उतावला रहता है उसी प्रकार आज ऐसे कई वरिष्ठ गीतकार हैं जो अपने ही असंप्रेषणीय प्रतीकों, बिंबो में बुरी तरह उलझे होने के बावजूद नवगीतकारों को रास्ता दिखा रहे हैं। उन्हें न तो गीत के ‘नंदन विज्ञान‘ का पता है और ही ‘मोहन विज्ञान‘ का, विलयन का तो प्रष्न ही नहीं। मनोज जैन ‘मधुर‘ के विलयन बिंब स्तब्धकारी हैं -

(क) ‘‘गीत हमारे साथ हमेषा/हंसते-रोते हैं/सर्जक हैं हम कभी नहीं/
 एकाकी होते हैं ....../वेद ऋचाओं की भाषा में/झली गीत की बोली/
 ................गीत धरा का संस्कार है/गत विष्व की आषा/गीत शक्ति ? 
 का तेज पुंज है/ गीत हृदय की भाषा/ गीत हमारे अंतर्गत का/
 कल्मष धोते हैं। 
(ख) ‘‘भावना के सिंधु को हम/ रोज मथते हैं/शब्द लय
 में बांध कर हम/छंद रचते हैं/गीत दुख के पार जाकर/ ठांव देते हैं। 

लंबे अरसे बाद किसी गीतकार के गीतों में वैष्विक बोध को जीने का मन किया हैं इनके गीत इन विज्ञानों से निरंतर जूझ रहे हैं और एक निष्चित संदेष दे रहे हैं कि गीत के विरूद्ध अधोषित संगठित छल के बावजूद गीत का भविष्य उज्जवल है। अतः ‘मोहन विज्ञान‘ को जीना ओर पिघलना ही गीत है। मुझे नहीं लगता कि बिना घुले-पिघले, मोमबत्ती में पड़ा जलता धागा बने गीत को समझा जा सकता है। ताल लयबद्ध मनोज जैन ‘मधुर‘ का भावजगत छांदसिक हैं बाहरी जगत में हलचलें, काल-मुद्राओं का नर्तन, छटपटाहट नागमंडल से घिरी कराहटों में अंगुलीमाल सिसकियां और दर्द है, कुंए-खाई स्थिति में फंसी मानवीय अस्मिता है, न जमीन अपनी है न आसमान, हर तरफ रेंगता धूंआ है, प्रजातंत्र के नाम पर क्रूर सत्ता ‘लिव इन रिलेषन‘ की तरह जीवन के कोम अनुबंधों, सूत्रों, मर्यादाओं से चूहे-बिल्ली का खेल, खेल रही है, इधर भी और उधर भी। तनाव-घुटन जीवन की बुनावट में बुन दिए गए हैं। संस्कार मूल्य, आत्मीय रिष्ते जिस प्रकार काल व्याकरण में उलझते जा रहे हैं, विनाष के कगार की ओर बढ़ते हमारे चरण लगातार प्रकृति पर्यावरण को कलंकित कर रहे हैं, विवष भाव की एक सुलगन है जो गीली लकड़ी की तरह भीतर ही भीतर सुलग रही है। जो न पूरी तरह बुझती है और न सुलती है। अंदर बाहर ऐसी विवष घुटन जो न जीने देती है न मरने। ऐसे में इस अग्नि पीर को मथकर कोई नवोदित गीतकार हमसे सीधे संदल-संवाद करने लगे और प्राण वृक्ष पर लिपटे नागों को अपनी गीत फुनगी पर नचाने लगे तो कैसा लगेगा। मन-बुद्धि को छंद-संतुलन से महकाने लगे, गीत-चंदन घिसकर हर अंग पर लगाने लगे तो शंख-बांसुरी के स्वर फूटेंगे ही। यही होता है काल-आंख में अंजन लगाना। बांसुरी से न सधे तो शंख-आचरण से हिलाना-डुलाना। 
चंदन-वचनों, अग्नि-सूत्रों को गीत का अंतर्गत बनाकर बौद्धिक कुचालों के सर्पनृत्य को नील-कंठ मोर का आखेट बनाना। इधर के गीत परिदृष्य में ऐसी गीत उठान मेरे देखने में नहीं आई। शब्द-गर्भ में बहती नीर धाराएं मन-उदगम् से निकल कर अपनी यात्रा में हालांकि अनेक जगह गंगोत्री की तरह उद्गम् से चलकर हरिद्वार तक मटमैली और हुगली तक बिल्कुल गंदली हो जाती है, उन्हें वैचारिक जमीन पर उतार कर शोधित-परिषोधित कर, संस्कार-संस्कारित कर जीवन का कंठ राग बनाना ही तो गीतकार का कार्य है। सागर-मंथन की तरह अपने को मथकर मनोज जैन ‘मधुर‘ ने यह कार्य बखूबी किया है। 
मनुष्य का अंतर्मन चहुंदिषाओं में अपना प्रसार कर अनन्त आकाष में विचरणा चाहता है। मनुष्य-प्राणों में छंदमय स्पंदन की जो छलक-छलकन व्याप्त है। वही उसे मानवतावाद की ओर आकर्षित करती है। यही यह आकर्षण-चक्र है जिससे बंध-बिद्ध कर रचनाकार मनकी अग्नि को विचारों के यज्ञ कुंड में रखता है और गीत-समिधाओं से उसे पूर्ण सम्पन्न करता है। इसी सत्ता-बोध को वह समग्र ब्रहांड में फैलाने के लिए अपने संपूर्णत्व को गीत रूप में सार्थक कर सूर्य से आंखे चार करता है। मनोज जैन ‘मधुर‘ के गीतों में यही ताप है जिसकी प्रचंडता में चांदनी का आसव घुला है। मनुष्य-मन की यही सर्वश्रेष्ठ भाव-संपदा है जो चिर-पालकी में बैठकर नववधू की तरह अनेक रिष्तों में बंटकर सृजनधर्मा होती है। संपूर्ण ब्रह्यंड में अंतर्प्रवेष कर यही भावसंपदा उसके अंग बन जाते हैं और नव्य मानवतावाद की व्याख्या-परिभाषा करता गीतकार अपनी योगभूमि के नयी अर्थवत्ताओं, संदर्भों, संधानों, लक्ष्यों, संकल्पों, दृढ़ प्रतिज्ञाओं से बंधकर एक ऐसी संघर्षषील मनुष्य-अस्मिता को गढ़ता है जो जीवट-निजीविषा का पर्याय बन अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करें। ‘मधुर‘ गीतों की उठान, संधान-यात्रा इसी दिषा में गंभीरता से साहित्य में अपनी जगह बना रही है। ज्ञान और संवेदना के बल पर जीवन-जगत की यही पुनर्रचना है। पुनर्रचना का यह इतिहास गीत-गर्भ में आदि से आज तक का सत्य-संधान है। 
कर्म मानव जीवन को पवित्र, अहिंसक और पूर्ण बनाता हैं कर्मयोग के इस सजग चिंतन को मथकर गीतकार अर्क की तरह निचोड़ता है। मनुष्य को यह उसके सत्य से परिचित करवाता है। ‘सबरि उपर मानुष सत्य‘ में उसकी पूर्ण आस्था है। इसीलिए वह कर्म-ध्वजा को उठाने का आह्वान करता है- उठा कर्म की ध्वजा हाथ में ...........
‘गीता‘ कहती है - ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्......‘ गीता गीत ही है, उस का रसायन लेकर मनोज जैन ‘मधुर‘ कर्म-मथानी से धरती-गर्भ में अपने गीत-बीज बोता है। उसका लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है। वह अप्रतिम उत्साह और साहस के साथ लक्ष्य-चिड़िया की आंख भेदने के लिए अर्जुन-संधान करता है। उत्साह आनंद से कर्तव्य की उत्तेजना होती है। और जो आनंद कर्म के साथ बराबर चलता है, उसी का नाम उत्साह है। कर्म के मार्ग पर चलने वाला उत्साही व्यक्ति ओर सदैव प्रसन्न और संतुष्ट रहता है। उसके मन की स्थिति कर्म न करने वाले की अपेक्षा अधिकतर अवस्थाओं में अच्छी रहती है। इस प्रकार यदि हमारा चित्त किसी विषय में उत्साहित रहता है तो हम अन्य विषयां में भी अपना उत्साह प्रकट करते हैं। हमारा मन उत्साहित रहता है जो हम निष्काम आपसे बहुत से कार्य प्रसन्नतापूर्वक करते हैं। गीतकार का प्रसन्न दृष्टि सम्पन्न उत्साह बिंब हमें उत्कर्ष की ओर ले जाती है-
‘‘छोटी छोटी बातों में मत
धीरज खोया कर
अपने सुख की चाहत में मत
आंख भिगोया कर......।‘‘
‘धीरज‘ शब्द यहां गीता का आधार शास्त्र है, व्याष्टि से समाष्टि की ओर प्रयाण है। गीत के अंत में आकर गीतकार अपना विस्तार कर प्रतिदिन-प्रतिक्षण कर्म-मंथन में पूर्ण व्यक्त करता है इतना ही नहीं उसकी चारू कर्मषीलता नट साधित मुद्रा में ‘गीता‘ को अपने भीतर उतारने के लिए योग-नृत्य करने पर उतारू है -
‘‘धीरज, साहस, दृढ़ता के/छट जायेंगे, बादल मन से/संषय जड़ता के/
सबको सुख दे, दुनिया आगे/पीछे घूमेगी/मंजिल तेरे खुद चरणों को/
आकर चूमेगी/कर्म-मथानी से सपनों को/
रोज बिलोया कर।‘‘
‘योग वषिष्ठ‘ में लिखा है- 
 ‘‘अनुद्वेगः श्रियः मूलम्।
 न स्वधैर्यादृते् कष्चिद्भ्युद्धरति सड्.कटात्।
अर्थात् धैर्य ही समृद्धि का मूल एवं सभी सकंटों से मनुष्य का उद्वार करता है। जीवन की कर्म-यात्रा में गीतकार इसी पर जोर दे रहा है कि ‘छोटी-छोटी बातों में मत/धीरज खोया कर‘‘। ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों मार्गों में धैर्य का अत्यंत महत्व है। बिना धीरज के कोई व्यक्ति् अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता। धीर व्यक्ति निष्छल मन वाला होता है-
 ‘‘चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः।
 कृच्छेऽपि न चलत्येव धीराणां निष्चलं मनः।।

 युगान्तकारी वायु के आघात से चाहे पर्वत गतिमान हो जाएं, पर धीर पुरूष कठिन परिस्थितियों में भी निष्छल मन वाले रहते हैं। वे तनिक भी विचलित नहीं होते। धैर्यवान वही होता है, जो कठिनाई में विचलित न हो- ‘त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि काले। बहुत विपरीत परिस्थिति में भी जो धीरज रखकर कार्य करे, उतावला न हो, वही वास्तव में यष का भागी होता है। मैं पुनः मनोज जैन ‘मधुर‘ के गीत कर्म-मथानी से की प्रारम्भिक पंक्तियां दोहराना चाहता हूॅ-
 ‘‘छोटी छोटी बातों में मत
 धीरत खोया कर
 अपने सुख की चाहत में मत
 आंख भिगोया कर........।‘‘
‘धीरज‘ का यह सहज बिंब सिर चढ़कर बोलता है। गीतकार के ‘धीरज‘ के साथ उसका आत्म विष्वास भी देखिए-
 ‘‘कट जायेगी रात,/सबेरा निष्चित आयेगा/जो जितनी मेहनत करता/
 तभी मिलेंगी नई दिषायें/आगे बढ़ने की/मनके धागे में आषा के/
 मोती पोया कर.....।‘‘

यही ‘गीता‘ का निष्काम कर्मयोग है। कर्म करो लेकिन फल समय पर छोड़ दो। कर्म-फ में उसी आस्था है। जब उसका समय आएगा तब जरूर मिलेगा लेकिन उसकी इच्छा माना छलावा है।

इसी के समांतर एक ओर गीत है-
कांच के घट हम। काल-कंठ का व्यक्त वाक्,
काल-वेद का बीज गीत। भर्तृहरि ने कहा है- ‘कालो न यातो, वयमेव याता।‘ सही नहीं गुजरता हम ही गुजर जाते हैं। जीवन के सत्यमूलक इस गीत में क्षण भंगुर जीवन का सुंदर भाष्य है। गीतकार जानता है व्यक्ति को अमरत्व प्रदान करने वाली वस्तु उसका आत्मज्ञान है, उसके अंदर का आंनद है। इसलिए वह काल-गति को सहज भाव से स्वीकार करता है। प्राण-आत्मा की इस देह काठी में जो लय अन्तर्धारा रूप में प्रवाहित है। वही जीवन का ईष्वरगीत है, शेष पंचभूत तत्वों से निर्मित मिट्टी गीत । इस गीत में अध्यात्म-चिंतन की पृष्ठभूमि के आदि तत्वों के संकेताक्षर है। जब कोई झुकता है तो समझना चाहिए कि वह उंचाई की तरफ जा रहा है।
 सांख्य शास्त्र में महर्षि कपित कहते हैं कि - ‘राग-विरागयोर्योगः सृष्टि- राग-द्वेष के संयोग का नाम ही संसार है। ‘श्रीमद् भगवद्गीता‘ में इस संसार को ‘म ममाया दुख्यया‘ कहा गया है। यह मायामय जगत बड़ा ही दुस्तर हे। यह मायाबद्ध जगत पथरीली नदी की तरह है। यह जीवन भी कुछ ऐसा ही है, जिसमें जल थोड़ा है, श्वासों की पूंजी सीमित है, परंतु गति, प्रवाह, वेग बहुत अधिक है। इस पथरीली नदी में पांव रखना या टिका पाना कठिन है। पानी की तेज धार पांव को स्थित नहीं होने देती। सतत् गिरने का डर बना रहता है। काल-आरी हमारी देह काठी को निरंतर काट रही है। कांच के घट के टूटने की ताह हमारा प्राण-पंछी कभी भी छूमंतर हो सकता है। इसलिए यह क्षणभंगुर देह काल की अमानत है। काम, क्रोध, मद लोभ, मोह, अहंकार से ग्रस्त यह जीव यदि परमात्मा को स्वयं को समर्पित कर दे तो उसकी कृपा से निष्चित ही इस पथरीली नदी को पार करने में वह सफल हो जाता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही गीता-मंत्र दिया था और अन्ततः यही काल मुक्ति मंत्र है जिसे थाती के रूप में गीतकार हमें सौंप रहा है -
‘‘ तेरा जीवन नदिया की धारा, की लय है
किंतु सफर में रोड़े मिलना, भी तो तय है
स्मय एक छन्नी है
गहले सार और
थोथे को दफना।‘‘
काल-छन्नी सबको निर्ममता से छानती है। इस छनन प्रक्रिया में जो सार को ग्रहण कर थोथे को उड़ा देता है वही अर्जुन है और ‘काल-मित्र‘ भी। यही जीवन का अंतिम रहस्य है। हालांकि काल गति बड़ी सूक्ष्म और अबूझ है लेकिन जो निसंगभाव से काल............ से आंखे चार कर उसे जीवन के अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करते है।, वे ही पार्थ-काया में जीते हैं। संकल्प और दृढ़ आस्था का यही कृष्ण-पथ है। यही कारण है सपने हमें जिंदा रखते हैं और काल-सत्य के बावजूद चुनौतियां जीवन को जीने लायक बनाती है। क्योंकि दीपक की ‘लौ‘ अपना अंग जलाकर ही प्रकाष उत्पन्न करती है। महर्षि योगानंद ने अपने ग्रंथ ‘मेन्स इंटरनल क्वेस्ट‘ का गीत-पथ संकल्प और दृढ़ आस्था का ‘माध्व-अध्याय‘ हो या न हो लेकिन उसमें अर्जुन लक्ष्यों के साथ काल को छानने का उत्साह और साहस मौजूद है। 
‘‘खुली चुनौती दे अम्बर को
आगे बढ़कर साहस से
सोना कर दे, छू कर दुनिया
ते दृढ़ता के पारस से
कर सपने साकार दृष्टि में
विजय श्री की चोटी ला।‘‘
कला एवं साहित्य गीत में अद्भुत अनष्वर अहिंसा होती है। साहित्य के हाथों न किसी चिड़िया का घोंसला उजड़ता है, न कोई नदी सूखती है, न वृक्ष मरते हैं। कला तो प्रकृति से ‘अ-क्षर‘ प्रकृति की सुंदरता छीनकर उस सौन्दर्य को अमर बनाती है, जैसे ‘सबरि उपर मानुष सत्य‘ के सौन्दर्य के शब्दों में जीवंत कर साहित्यकार अपने साहित्य में वंचक काल को बंध लेता है। यही है सौन्दर्य को काल की कैद से रिहा करना। कला और साहित्य इस दृष्टि से सौन्दर्य को उसकी क्षण भंगुरता से मुक्त करता है। अपनी जिस सुंदरता को प्रकृति खुद काल के हाथों बचाकर संरक्षित नहीं कर पाती, साहित्य और कलाएं उसे बचाती हैं। इसीलिए गीत पानी और पत्थर का खूबसूरत संवाद है। मनोज जैन के गीतों में ऐसे संवादों के विविधमुखी स्तर औेर स्वर हैं।
इसलिए ‘कांच के घट हम‘ मृत्युगीत नहीं जीवनगीत है। गीत अनन्त है। मृत्यु बीच में आती जाती संवाद करती इस गीत को गाती रहती है। आदि-अंत की इस शाष्वत कथा में जन्म जीवन-संगीत है तो मृत्यु काल-गीत। काल-लय का रूपान्तरण। जन्म-मृत्यु के बीच गीत जीवन-संगीत है तो मृत्यु काल-गीत। काल-लय का रूपान्तरण। जन्म-मृत्यु के बीच गीत ‘काल-सेतु‘ है। ऐसे कालसेतु गीत का सत्य का संधान और आत्मा का नीलकंठी द्रव है। दो गहरे समुद्रों का मिलन बिंदु, विलय-लय । एक ऐसी अदृष्य उजा्र जो प्रत्येक मन में व्याप्त है। ‘काल-पुण्य‘ के इस अग्नि-कुंड में ‘पंच तात्विक‘ छांदसिक वर्णमाला वस्तुतः जीन की तापसी समालोचना है, जिसकी व्याख्या-परिभाषा । मनोज जैन ‘मधुर‘ का यह काल गीत- ‘कांच के घट हम‘ । इसलिए यह गीतबद्ध जीवन का अंतिम सौन्दर्य (अमृत, संधान, मृत्यु) नहीं आदि कथा (जन्म, संघर्ष) है।
 विद्रूप समय में एकाकार होकर गीताकर अपने गीत-बीज जिस बंजर में बो रहा है उसके नील विस्तार में एकाकीपन के साथ निष्चित रूप से निराषा-हताषा की सरगम है लेकिन जीवन की आकाष गंगा के प्रवाह में अथह उत्साह और विष्वास भी है। बंधक मन का दर्द यदि दुख का कारण है तो सूर्यपुत्र गीत मनुष्य अभीप्साओं के नवरस गतिषील मौन में रच-बसकर, वृक्ष-जड़ का संगीत बन माटी के भीतर अपनी राह बनाता जाता है -
 ‘‘कुछ भी सीखा
 नहीं बावरे
 पेड़ों से तूने.......।‘‘
प्रकृति गीत खिलखिला कर सुरभि के साथ कंटकों को गले लगाते हे तो सागर की ओर दौड़ते जल प्रपात अज्ञात क्षितिजों के रहस्यों का घूंघट उठाने को कृत-संकल्प लगते है। नदिया बिंब की धार लय देखने वाली हे। दीपक से प्रतिज्ञाबद्ध गीतकार घोषणा करता है-
‘‘जब तक सांसे है इस तन में
दीपक जैसा जल
रहा सदा संघर्ष दिये का
घोर अंधेरो से.................
निर्झर कहां रूका करते हैं/गति अवरोधो से/
हिम्म्त वाले कब घबराते/सतत विरोधों से
संषय की आंधी से डिगता कब/विष्वास अटल ?
देववृक्ष ‘बरगद‘ भातीय लोक संस्कृति का कलात्मक रस प्रती है, जिस पर भारतीय लोक साहित्य की नीड़-षाखाएं अपना कल्प प्रसार करती हैं। इसके अतिरिक्त वैदिक दार्षनिकों ने तो वृक्ष को विष्वरूप एवं विष्वपुरूष के रूप में देखा है/था- ‘‘वृक्ष इन स्तब्धों दिवि तिष्त्येकः तेनेंद पूर्ण पुरूषम सर्वम्।
श्वेताष्वर उपनिषद् : 3/1

लेकिन मनोज जैन मधुर की दृष्टि मे ‘बरगद‘ शोषक पूंजीपति कू्रर सत्ता का प्रतीक है जो अपने नीचे किसी को नहीं पनपने देता। गीतकार ही यह नितांत नव्य परिकल्पना हैं लेकिन इसके प्रतीक बिंब न नुकीले है और न ही लेकिन माओं की तालीबाली गोली अंगारों को चिमटी से पकड़ना चाहता है, नंगी हथेलियों पर नहीं रखना चाहता। उसका आक्रोष् प्रतरोधक होते हुए भी कार्यान्वयन स्तरपर दम तोड़ देता है। इस प्रकार की वैचारिक क्रांति के लिए शब्द भी संखिया, तेजाबगंधी मुक्तिबोधीय चाहिए जो मनोज जैन ‘मधुर‘ के पास नहीं है। भविष्य संरचना में नफासत लखनवी गाली जैसी लगती है, शोषकों की वीभत्स कार्यप्रणाली को सामने नहीं लाती। चांदनी से झुलसाना आत्मप्रवंचना है इसके लिए शब्दों के अन्तरगर्भ में ग्रीष्म का प्रचण्ड मध्याक सूर्य चाहिए जिसमें चिकनी मिट्टी के खेत भी फट जाएं। शब्द- पठारों की दरारों में कैद अग्निकुंड से निकली अग्निम तरलता ज्वालामुखी लावे की तरह शोषकों को भस्मीसात कर नवनिर्माण की भूमिका का बायस बने। शोषण-त्रासदी की विद्युत थरथराहटों को ऐसे शब्दों की बैसाखी नहीं चाहिए जो लक्ष्य की ओैर दौड़ भी न सके। तांडव के लिए लास्य भाषा वर्जित है, शब्दों में डमरू बजने चाहिए, ओसामा आंतक होना चाहिए। ष्
 गांव और शहर को लेकर जो संत्रास मयंक श्रीवास्तव के गीतों में है, मनोज जैन ‘मधुर‘ में उसी का विस्तार है। इनमें भी वही आदि भाव और लयरोग है जिसे मयंक अपने गीतों में जीते हैं। वीरेन्द्र आस्तिक भी ऐसा ही साबुत बचा गांव खोज रहे है... ‘‘खोजूं/आदिम गांव कहीं हो साबुत बचा हुआ सा/ खोलूं/संस्मृति की गठरी/महसूस पुनर्जन्म-सा‘‘ - दिन क्या बुरे थे। 
नियति ने मषीनीयन यान्त्रिकता से विक्षुब्ध नगरबोध को कोरे गंवई प्राण-ग्रंथ पर नागदंष वर्तिनी में अंकित कर दिया है। उसे धूप-लिपि बनाकर लोक मन से जोड़कर ही इसका प्रतिकार किया जा सकता है। नागफलक का यही तोड़ है -
 ‘‘इस महानाष में
 नव संवेदन
 मुझको रचना होगा......।‘‘
इन तीनों गीतकारों की अन्तर्धरती पर लगता है जैसे कृषक-पांव धंसे हैं, टपकती खपरैल बूंदों में लोकगीतों का प्राण-रसायन शब्द-गर्भ में पलकर ऋषि करवटें ले रहा है। ‘मर्त्य मानव‘ के इस आत्म संयम में व्यथा अनुभव धान-चाव की तरह अन्तर्ग्रथित हैं। गांव-पगडंडियों पर उल्लसित नहीं पांव शहर आकर बोझिल पंगे से हो जाते हैं। झूमती गेहूं-सरसों के आलिंगन, ईख का नमक रस, खलिहान में नृत्य करते दाने, घर आंगन में फुदकती चिरैया, जीवन की हरितिमा-सभी कंकरीट-संवाद में सिमटकर भीतर स्मृति बाण से गढ़े रहते है। शापग्रस्त मौन में तब्दील जीवन की रस-छवियां तीज-त्यौहारों में ज्यादा कसकती हैं। आम्र मंजरियों की अंगड़ाई लेती कुहुक-खुषबू, हिंडोलों पर छाई सावन बदरिया के विरहिणी आंसू मनको भिगोते कम है, सोखते ज्यादा है। रक्तबीज विषादग्रस्त पीर अंग-अंग दुखाती है। खेत-खलिहान, टुनटुनाती घंटियां, रहट-गीत, भोजी-बहुरियां संवाद दम तोड़ देते हैं और जीवन कोल्हू का बैल बना शहर की यांत्रिक घनघनाहट को विवष भाव से जीता रहता है। यह क्रम कितना दुखदायी है जो निरंतर जड़ों पर प्रहार कर रहा है और हम अनाम रिष्तों की भीड़ में अपने अस्तित्व को खोजते नित नई जद्दोजहद में उलझते सक्रिय होकर भी मन से निष्क्रिय बने रहते हैं। कदम-कदम दर्पीले लोगों के बीच यह पीड़ा बिंब कितना नुकीला है-
 ‘‘हम जड़ों से कट गए
 नेट के वातास की हमने/कलाई मोड़ दी/प्यार वाली
 घाव हमने/गांव में ही छोड़ दी/मन लगा महसूस ने / हम
 दो घड़ों में बंट गए/ओर रिष्तों की नए/वातावरण सी हो गई/
 थामने वाली जमीं हमसे/कहीं पर खो गई.................।
कैसी कू्रर नियति है। एक तरफ सत्ताका विद्रू ‘लगे राम सा किंतु चरित रावण का जीता है‘ दूसरी तरफ ‘विष्वग्राम से ग्रामलोक की, देह रही है घिल‘ उपर से कोड़े फटकारती कैक्टस महंगाई के साथ ‘पहाड़ के दिन‘ - ‘दिन पहाड़ से कैसे काटें/चुप्पी ओढ़े रात बीतती है‘.... ऐसे में ‘अस्मिता खोते‘ गांवो का निमंत्रण भी अभिषाप हो जाती है - ‘गांव जाने से/मुकुरता है/हमारा मन....1 छल- प्रपंचों के बीचे रहते हुए अंग-अंग में। मरूस्थल उग आया है, नसों में नागफनी रक्त स्वर विक्षिप्त और घायल कर रहे हैं। जीवन के षिखंडी सत्य कितने वीभत्स और वंचक हैं -
 ‘‘किस कदर मिथ्याचरण/हमने लिए है। ओढ़/
 सत्य दर्षन के सभी/षीषे दिए हैं तोड़...........।
विषाक्त वातावरण के कारण ‘पुरखे गांव‘ जीवित शव बन गए हैं, चौपाल की पीपल छांव डराने लगी है। ‘नयी फसल‘ पर पाष्चात्य चिंतन की टिड्डियो ने सीधा हमला बोल दिया है मन मानस को यह टिड्डिया पूरी तरह बाहर भीतर से धीरे धीरे कुतर रही है। रिष्ते खिसक रहे हैं। विघटन की ऐसी आंधी जिसमें छानी छप्पर उड़ते जा रहे ओैर हम मूक  दर्षक बने चौपट होती फसल से मृत्यु संवाद कर रहे हैं। इस शून्य वैवष्य बोध को कैसे जीवन सृजन से जोड़े, वक्त की चौखट पर दम तोड़ती ये अंकुषविहीन सरसराहटें निरंतर पसरती जा रही है, कैसे उन्हें धूप गीत बनाए। ‘मदारी शहर‘ के व्यथा बिंब पूरी तरह तोड़ने वाले हैं- 
क.  ‘‘नई फसल की आंखो में है/बालीवुड की चाल/नहीं सुनाता
 बोध कथाएं/विक्रम ओर बेताल/टूट रहे है रिष्ते - नाते/
 यहां धूप से छांव के ............।‘‘
ख. ‘‘सब कुछ बदला यहां गांव में/यह नारा सरकारी है/
 पहले था गर्दन पर फंदा/अब गर्दन पर आरी है.......।‘‘

राम रूप में रावण आचरण/यही तो है छालों को नमक से धोना / यही वजह है - उपर शब्द चढ़ाकर सबने/भीतर से कड़वाहट बांटी/जिससे जितनी बनी जनम भर/उतनी बढ़-चढ़कर जड़ काटी...। अविष्वास बिंब कितने घातक हैं..... 
‘‘ तुम्हारे हाथ में सरकार/सौंपी थी समझ अपना/
मुझे डर है न थम जाए/कहीं गणतंत्र का पहिया........

त्वचा के भीतर रेंगते ये ताप तप्त बिंब रक्त उबाल को बंधक बनाने का प्रयास करते हैं लेकिन दुनिया वहीं तक नहीं है जहां तक दिखती है। उसका विस्तार हमारे भीतर तक है। वह मारे मनकी कई तहां में उतरती है और अपना एक अलग रूप ग्रहण कर लेती है। दरअसल यह भीतरी दुनिया बाहरी दुनिया का ही एक प्रतिरूप होती है, कुछ-कुछ फोटोकॉपी की तरह। लेकिन यहां जीवन की चाबी मनके हाथ में रहती है। हमारे भीतर जो कुछ घटता है, वह दरअसल वास्तविक जिंदगी का एक रीप्ले होता है। जो बाहर घटता है, वह फिर से अंदर आकार लेता है। हो सकता है, असल जिंदगी में एक पात्र हों, वह भी यहां उसी रूप में मौजूद हों, लेकिन उनकी भूमिका उलट-पुलट जाती है। संभव है, बाहरी दुनिया से कोई व्यक्ति हार कर लौटे, लेकिन अपने मन की दुनिया में जब उस घटना की पुनर्प्रस्तुति होगी, तो वह जरूर जीत आए।‘‘ यह भीतरी दुनिया एक तरह से हमारा नेपथ्य है। नेपथ्य की तैयारी मंच पर काम आती है। काल्पनिक जीवन में सपनों को पूरा करते हुए एकदिन हम वास्तविक संसार में भी कामयाब हो जाते हैं। यह अंदर की दुनिया हमें बाहर की दुनिया में जीने और जीतने का हौसला देती है संजय कुंदन : नव भारत टाइम्स, 1 सित0 2008 । जीवन की उलटवासी है। यह कबीर सत्य है। इसकी अन्तर्लिपि में उगना और उसे सृजनधर्म बनाना हमें संघर्षों की ठोस भूमि पर खड़ा करता है। मनोज जैन ‘मधुर‘ के गीतों का मूल वक्तव्य यही है। 
भूमंडलीकरण के विनाषक दौर ने.............आत्मीय रिष्तों से काटकर घर और जीवन को तिरस्कृत कर दिया है जिसका परिणाम भौतिक दास्ता के रूप में हमारे सामने है। भौतिक दासता के इस अमानुषिक भूमंडलीकृत भौतिक गीत ने हमें सिरे से बेसुरा बना दिया है। विचार दर्षन, संवेदन, त्याग, सर्म्पण, सहनषीलता धैर्य, करूणा सभी दृष्टियों से हम पंगु हो गए हैं । घर के स्मृतिबिंब भी तभी कचोटते है जब घर नहीं होता या घर, घर जैसा नहीं होता। अज्ञेय इस घर की तलाष में ताउम्र भटकते रहे - 
‘‘घर/है कहां जिनकी हम बात करते है।/घर की बातें/सब की
 अपनी हैं/घर की बातें/कोई किसी से नहीं करता/जिनकी बातें
 होती हैं/वे घर नहीं होते।‘‘

घर सभ्यता का मधुरतम फल है, इसी से सभ्यता का माप होता है। घर हर कदम पर सिखलाता है कि कितनी सावधानी की जरूरत है। घरका अस्तित्व एक निरंतर आष्चर्य है और यही जीवन की उधेड़ बुन है। घर सभी चाहते है घर चाहे दुखद ही क्यों न हो उसकी स्मृतियां मधुर होती है। घर, विष्व का एक लघु संस्करण ही होते है, जां अलग-अलग स्वभाव तथा विभिन्न प्रकृति के लोग एक स्नेह के तंतु से बंधे रहते हैं। यही स्नहे भाव उन्हें एकता के सूत्र में बांधे रखता है। स्नेह भावना ही हमें एक दूसरे से जोड़ती है। यही हमें उदार बनाती है। कहा गया है -
 ‘‘अयं निज‘ परोवेति गणनालप्पुचेतसाम।
 उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।‘‘
इस श्लोक में पूरी धरती को एक कुटुम्ब परिवार, घर के रूप में परिकल्पित किया गया है लेकिन त्रासदी देखिए संयुक्त परिवार, कुटुम्ब बिखरते जा रहे है।, कहना चाहिए बिखर चुके हैं। भारत-पाकिस्तार की तरह बंटते हम भावनात्मक, रिक्तता, अवसाद, असुरक्षा, अविष्वास को कू्रर और मूक बनकर झेल रहे है। तेरे-मेरे की इस विभीषक अहंमन्नयता ने संयुक्त परिवारों की नींव को दीमक जांक बना दिया है। एकल परिवार की रीढ़ भी तोड़ दी है। सांप के जहरील दांतों के समान हमारी कामनाओं और महत्वकांक्षाओं ने घरों को मकानों में तब्दील कर दिया है। मकान क्या इन्हें सांप की बांबी कहना अधिक युक्तियुक्त है।
घर परिवारों में माता पिता, दादा-दादी का अर्थहीन होजाना अथवा उन्हें पिछले दरवाजे की सांकल बना देना जीवन-सरगम का लचक जाना है। घर का टूटना गीत की दिव्यता का नई कविता बन जाना है। जीवन छांदसिक थिरकन का भूमंडलीकृत अभिषाप बन जाना है, रचना सृजन का संगीत विहीन हो जाना है। पुरूषार्थी प्राणों का देह बन जाता है। जीवित सांस्कृतिक अनुष्ठानों की श्यामलयों पर बाजारवादी भौतिक वर्चस्व के कारण घर का मकान बन जाना है। कैसा सुनामी यथाथ्र है। घर के मकान बन जाने की यह ‘छक्का पीड़ा‘ वस्तुतः आत्मा पर ऐसे गहरे व्रण है जो सूखते हैं, न इन नपुंसक उधड़नो को सीया जा सकता है। हम सब छक्के बन गए है।, न आदमी न औरत, बीच के कैसा दर्दनाक जीवन। स्वयं पर हंसे या रोएं। नामर्द होरी सरीखी दैन्यता। खुल व्रणों की यह अष्लील लीला दीमक की ताह खोखला ही नहीं करती जोंक की तरह खून भी चूसती है। यह शरीर पर नहीं आत्मा पर प्रहार है। जख्मी आत्मा मन पर बिछा यह ऐसा नमक बारूद है जो तेजाब की तरह सभी कोमल तंतुओं को झुलसाता जाता है। इन झुलसन मरोढ़ों में उलझ कर पूरा घर किष्तों में आत्महत्या करता हे। यह मनुष्यत्व ही हीं ईष्वर का भी अपमान है। काल इनका सत्यापन कर रहा है और हम बहती नदी में सड़े हए थिर पोखर बनते जा रहे हैं । हमारा यह आचारा व्यवहार आज के वेष्यायी नेताओं से भी गया गुजरा है। स्वयं ही अपने को दफनाने के लिए हम सभी छोटी-छोटी जीवित कब्रगाह बनते जा रहे है। काल नियति के इस घोर अभिषाप के कारण हम अपने अग्नि संस्कार की ओर बढ़ रहे हैं। दीवारों की दरारें हमारे माथे से होकर दिल तक पहुंच गयी हैं। भौतिकता की यह खाई पता नहीं हमें किए कंए, खाई, नील घाटियों में दफन करेगी। पंख-कटे पक्षी की तरह हम फड़फड़ा रहे हैं, बिन पानी की मछली से तड़प रहे हैं और अजगर काल की जिह्वा हमें निगलने को लपलपा रही है। यह अजगरी कोबरा बिंब बड़े अनिष्टकारी और विषकारक हैं -
क. ‘‘कुछ दिन पहले ही बदला है/घर मकान/घर की बुनियादों को दादा/
साधे रहते थे/हर मौसम में सबकी हिम्मत/बांधे रहते थे/मिलती रहीं सफलताएं
इस इम्तिहान में/वैमनस्य के ढूंढे सबके/मन में फूट पड़े/ बंटवारे के लिए सभी गिद्धो से टूट पड़े/धीरे-धीरे बदल रही है/छत मचान में......
मोती चुगने वाली दादी/तिनके चुनती है/हुक्म चलाने वाली कैसे/ताने सुनती है
लगा टकटकी देखा करती/आसमान में/नफरत चिन्ता चुभन निरंतर/बढ़ती
जाती है/षंका अमर बेल सी उपर/चढ़ती जाती है/युग भी कम पड़ता है/घर के समाधान में .................
ख. ‘‘एक एक अन्तर्पट पर/उभरे बिम्ब अतीत के/
 मां की पीर पिता की चिन्ता/उभरी जस की तस............।‘‘
काल भांड इतना कूड है, कि जीवन विदुषक बना अपने आप पर ही हंस रहा है और हम ‘छक्के‘ बने तालियां पीट रहे हैं। जीवन के इन प्रक्षिप्त अंषों की गीतों का अन्तरंग वही बना सकता है जो ‘स्वेद कणों से घर की जड़ों को सींचता वक्त की चाबुक से रोज रोज खाल खिंचवा कर भी धैर्य नहीं छोड़ता। क्या राम कहानी है ‘पीड़ाओं के गट्ठरों के नीचे दबकर भी सांसे सरगम बनकर उन्हें गाती है, चाहे ऐसे में पिंजरे के तार तोड़कर बाबूजी घर दुनिया छोड़कर चले जाए। बाबू जी तो गए, मां क्या करे ? वसीयत यह गीत कितना मर्मान्तक है, मन-मन की पोर-पोर सुलगने के इतंजार में ज्वालामुखी बन जाती है। पता नहीं लावा कब बाहर आ जाए। ऐसे में आत्मा का सुनहरा गरूड़ इतना भारी हो जाता है कि उसका बोझ उठाना भी दूभर है। प्रार्थना, कामना की उउ़ान भी दम तोड़ देती है और असह बोझ आत्मा को क्षण-क्षण कीलित कर घायल करता रहता है। यही है दर्द को पोसना, प्रतीक्षित काल-नियति के आधीन रहकर पीड़ा को युवा करना, वेदना का अग्नि सिंचन करना और उसे प्राणों की सेज पर बिठाकर नववधू की तरह श्रृंगार करना, फिर भी काया का पिंजरा नहीं टूटता और प्राण-पंछी उसमें पड़ा कराहता-सिसकता रहता है। स्वयं के लिए फांसी की याचना पर भी काल को दया नहीं आती। कितनी दुर्दान्त और भयानक है मृत्यु की प्रतीक्षा, तिल-जिल घिसन-छिलन। कितना विभीषक है यह नग्न यथार्थ। जीवन का यह त्रासदायक दृष्टिकूट वैवष्यबोध अबूझ है। वाह रे काल पुरूख ! कैसी कर्म विष लीला ! नागिन-षतरंज के काल मोहरे शह ये मात के खेल में पल भर भी प्रतीक्षा नहीं काते, और यहां विकट यमराज-प्रतीक्षा। काल-यातना का यह ऋण तो चुकाना ही होगा। कर्म-यात्रा के मुक्ति मंत्र और सूत्र रहस्यमय न हो तो हम काल-दूत को बंधक बना ले। इसीलिए काल परिभाषेय होकर भी अपरिभाषेय है, अपरिभाषेय होकर भी परिभाषेय। कराहता-सिसकता यह गीत बिंब आत्मा के संपूर्ण रक्त को निचोढ़ लेता है -
 ‘‘चले गए बाबूजी
 घर में
 छुनिया भर का
 दर्द छोड़कर
 शूल सरीखी, नज़र बहू की
 बोली लगती नदी लहू की
 बेटा नाजुक हाल देखकर
 चल देता, दृष्टि मोड़ कर
 ताने सुनती, कैसे-कैसे
 अम्मा षिलाखण्ड हो जैसे
 लिए गोद में कुंठा बैठी
 अपने दोनों हाथ जोड़कर

 गहन उदासी अम्मा ओढ़े
 शायद ही अब चुप्पी तोड़े
 चिड़िया-सी उड़ जाना चाहे
 तन पिंजरे का तार तोड़कर।‘‘

प्रारब्ध सर्वोपरि है लेकिन प्रयत्न किए जा सकते हैं। रांघेय राघव के रिपोतार्ज ‘अदम्य जीवन‘ की तरह समय-सदी की इन चुनौतियों को स्वीकारना जीवट-जिजीविषा है। नियति-कर्म खुषी से करें या दुख निमज्जित होकर करने तो होंगे। फिर गिरकर क्यों न उठे। मनुष्य का निसक्त धर्म भी यही है। चलने का नाम ही जीवन है। जीवन की यही उपनिषद् कथा है। गीतकार निर्भीक भाव से इस उपनिषद् कथा को बांचता है- ‘चरैवेति-चरैवेति‘ -
 ‘‘ चलो अभी तुम छैनी लेकर
 सीधा पर्वत काटो
 पारे का मुट्ठी में लेकर
 दो हिस्सों में बांटो
 इसी जन्म में लाख मर्तबा
 हमको मरना है ...............।
हर विचार और भाव जन्म लेने से पहले पकता है। इस पकन और अनुभव-अभिप्रायों को पअने भीतर उसी तरह जगह देनी चाहिए जैसे मां अपने गर्भ में षिषु को देती है। मनोज जैन ‘मधुर‘ ने गीतों को मां-गर्भ की तरह पकाया है और जन्म दिया है। इनके ज्ञान ओैर अनुभव की गीत जमीन अभी से बहुत ठोस और प्रसव धर्मा है। जिस तरह विषाल वृक्ष की जड़ें जमीन में बहुत गहरी धंसी होती हैं और उसका रसतंत्र बाहर हरिया शाखाओं-पत्रों में छलकता है इसी प्रकार इनके वृक्ष संग्रह ‘एक बूंद हम‘ का गीत-ऐष्वर्य हमारे सामने है लेकिन अभी इनके आत्ममंत्र सागर-मंथन की प्रतीक्षा में संधानरत हैं। आखिर नन्हा मोती अपने से कई गुणा बड़े आकारवाली सीप से ही पैदा होता है। 

 जीवन में ऐसे अनेक ऋण होते हैं जो कभी भी नहीं उतारे जा सकते। गीतकार जीवन को एक बहती हुई नदी मानता है। नदी का मुहाना हमारी जिंदगी का भूतकाल और उसका सागर में मिलना भविष्य है ओैर जिस नदी की धारा को हम सामने देख रहे हैं, वही वर्तमान है। पलकें आंखों पर कभी भारी नहीं होती, फिर मां-बाप दादी-दादा से हम कैसे उऋण हो सकते हैं। एक आत्मा का आगमन नारी को नारी से नारायणी बना देता है। महर्षि वेदव्यास कहते है। ‘‘माता के रहते मनुष्य को कभी चिंता नहीं होती, बुढ़ापा उसे अपनी ओर नहीं खींचता। जो अपनी मां को पुकारता हुआ घर में प्रवेष करता है वह निर्धन होता हुआ भी मानो अन्नपूर्णा के पास चला आता है।‘‘ माता पिता, दादी दादा की सेवा दायित्व है, उपकार नहीं। सेवा हमेष हृदय से होती है, संसाधनों से नहीं। जीवन की वर्णमाला का प्रणव अक्षर यदि मां है तो पिता जीवन महाकाव्य का अंगी छंद रस का छना हुआ विवर्तन है संतान। परिवार में पिता की स्थिति बड़ी विचित्र होती है- सबका पालक भी और सबका शत्रु भी। एक कहावत है जब कोई पिता बेटे को कुछ देता है तो दोनों हंसते है। जब कोई बेटा पिता को कुछ देता है तो, दोनों की आंखो से आंसू ढलकते है। पिता पाषाण-संगीत है और मां इस संगीता का रसषास्त्र। मां ऐसी सुलगती चेतना है, ऐसा अग्नि-समुद्र जिसका लांघने की कोषिष में हर नदी उसमें समा जाती है। माता-पिता जीवन के बीज-वट हैं और पितामह और दादी मां जीवन की भाव-यात्रा का लय कोण। काल-यथार्थ अपनी जगह है, माता-पिता, पितामह-दादी मां का शाष्वत सत्य अपनी जगह । जीवन के सभी सूत्र योग गीत बनकर हमारी आचरण-लय के संस्कार-संस्कारित आधार-आधेय बने, गीत-नाद का यही पाणिनी व्याकरण है। 
 काया से हमारे बीच न होने के बावजूद हमारे बुजुर्ग चलते-फिरते ऐसे अक्षर आसीस हैं जो अमर्त्य मंत्र की तरह हमारे मस्तक को क्षण-क्षण तिलकित करते हैं। रिष्तों के बीच मंत्रों की आदि विरासत को संभालते-संभालते बेषक ये पिछले दरवाजे की सांकल बन जाए लेकिन हमारी छंद-देह और प्राण रन्ध्रें में जो गीत झरन होती है, नाद चक्र के भीतर जिनती भी लय-तरंगे हमें बिना डोर के बंधन में बांधती है उनका गंगोत्री स्त्रोत यहीं हे। गीत से जुड़ा कोई भी उद्गम, कर्म इन्हीं का आदि वैभव है जिससे किसी भी रूप में कभी भी उऋण नहीं हुआ जा सकता। इसीलिए महादेव की तरह जीवन भी चलता-फिरता अक्षत महागीत है, जो नयी काया में रूपांतरित होकर सदैव गतिषील रहता है। सदानीय नदी बनकर सदा से बहता रहता है, पहले भी, आज भी। जीवन के इस प्रणाम गीत में ‘ओम्‘ की शक्ति है जो अन्ततः हमारी शाष्वत गति है, जन्म में भी मरण में भी। 
 मैंने प्रारंभ में मूल्यांकन कसौटी के लिए ‘षिरोमूला‘, ‘पादमूला‘ और ‘चक्षुर्मूला‘ दृष्टियों की बात की थी। मूल्यांकन की इस त्रिक्-त्रियामी दृष्टि का हर रूप मनोज जैन ‘मधुर‘ में मौजूद हे लेकिन इनके अधिकांष गीत ‘चक्षुर्मूला‘ दृष्टि के अधिक निकट हैं। बकौल आचार्य महाप्रज्ञ ‘सामंजस्य बहुत कठिन कला है‘ और इस कला-कसौटी पर मनोज जैन ‘मधुर‘ के आज में जितनी कसावट और संतुलन है, वह उन्हें अन्य गीतकारों से अलग पंक्ति में खड़ा करती है। अपने इस कला-विवेक को यदि ये इसी प्रकार तराषते-साधते रहे तो मुझ कोई आष्चर्य नहीं होगा मनोज जैन ‘मधुर‘ गीत के वर्तमान परिदृष्य में कबीर भूमिका में एक ये इतिहास अध्याय का सृजन करें। सृजन से बड़ा सम्मान दुनिया में दूसरा नहीं है। बनार्डषॉ को हर कदम पर स्मरण रखें, उनका कथन है- ‘कामयाबी का रहस्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोग आपके विरोध में हों। यहां सकार विरोध की बात है नकार की नहीं। ठीक-गलत आपके कला-विवेक पर निर्भर करता है। दुनिया में सबसे अधिक गतिषील विचार है। गीत-कबीर बनने के लिए प्रतिपक्ष का होना बहुत जरूरी है। प्रतिपक्ष लेखक के भाग्य में बदा होता है। वैचारित परिपक्वता और विकास की यह रचनात्मक अनिवार्यता है। विचार-भेद षिखर के लिए नीवं कर कार्य करते है।, मन-भेद नहीं होने चाहिए। सकार लेखन की यह सबसे बड़ी और उच्च कसौटी है। त्रिवेणी त्रिधार त्रिक् दृष्टि की इस सरस्वती भूमिका में पूरी सृष्टि छंदित है। गतिषील वैचारिक वैभिन्नय शक्ति बननी चाहिए, वैमनस्य नहीं। यही साहित्य की आदि पीठ है। पत्थर उसी पर पड़ते हैं जिस पेड़ पर फल लगे हों और सफल मनुष्य वही है जो अपने उपर फेंकी गई ईंटों से एक सुदृढ़ नींव डाल देता है। इत्यलम्।

डॉ सुरेष गौतम
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