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मंगलवार, 30 जून 2026

संस्मरण आलेख

आज हिंदी के जन कवि नागार्जुन का जन्मदिन है. ( ज्येष्ठ पूर्णिमा ) उनकी स्मृति में यह आलेख प्रस्तुत है 

 जनकवि नागार्जुन का आभामण्डल 
   स्वप्निल श्रीवास्तव 

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 हिन्दी में राष्ट्रकवि भी  हुए है लेकिन नागार्जुन की ख्याति जनकवि के रूप में बनी रही | उन्हें किसी संस्था –प्रतिष्ठान ने इस पद से उन्हें विभूषित नही किया था | जनता के कवि का ताज जनता ने उन्हें पहनाया था |  हिन्दी में जो  भी राष्ट्रकवि हुये है वे सत्ता के करीब थे | इस श्रेणी में मैथिली शरण गुप्त और रामधारी सिंह का नाम लिया जाता है | इन दोनों कवियों के काव्य विवेक पर किसी तरह संदेह नही है , उन्होंने हिन्दी कविता में अपूर्व योगदान दिया | कौन मैथिली शरण गुप्त की कृति साकेत और भरत भारती को भूल सकता है ? दिनकर ने ओजपूर्ण कवितायें लिखी है ,उनकी कविताओं को सम्मान के साथ याद किया जाता है | दिनकर राष्ट्रवादी कवि थे ,उनकी प्रमुख पुस्तक ,कुरुक्षेत्र ,रश्मिरथी और उर्वशी थी ,इसके अतिरिक्त उन्होंने गद्य में संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक लिखी है | वे मूलत : वीर रस के कवि थे | इन दोनों कवियों के काव्य भूमि सांस्कृतिक थी  ,इसलिये वे देश में बहुत लोकप्रिय हुये | वे बड़े पदों पर आसीन रहे , उन्हें सरकार ने पद्मभूषण से विभूषित किया |उन्हें जीवन में किसी तरह के अभाव का सामना नही करना पड़ा | इन दोनों राष्ट्रकवियों की कविता में जीवन और समाज के तत्व थे लेकिन वे व्यवस्था के आलोचक नही थे |

 नागार्जुन की प्रकृति ठीक इससे उलट थी.जीवन भर उन्होंने सत्ता का विरोध किया |  उनको  जो हासिल होना चाहिए ,उससे भी वे वंचित रहे था वह भी नही मिला | उन्हें हिन्दी में नही मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ पर साहित्य अकादमी मिला | उनके समकालीन शमशेर और त्रिलोचन ,केदारनाथ अग्रवाल को इस सम्मान से नवाजा गया था , लेकिन जनता ने उन्हें जनकवि की उपाधि से अलंकृत किया और अपने समय के कवियों से ज्यादा लोकप्रिय हुये | उनकी कविताएं जनता कि जुबान पर हैं | जन कवि के लिये जिस यातना का वरण करना पड़ता है ,वह उन्होंने जीवन भर किया ,अभाव का जीवन जीते हुये अपने कवि कर्म के प्रति समर्पित रहे | वे जनता के बीच रहे और उनकी भाषा में लिखते रहे | उन्होंने जो कुछ लिखा और कहा , वह निडर होकर कहा | वे खुद कहते हैं –
  जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊ 
  जनकवि हूँ साफ कहूँगा क्या हकलाऊ 
  उनके काव्य लोक से गुजर जाइये उसमें किसी तरह की हकलाहट नही मिलेगी ,सब कुछ उन्होंने साफ गोई के साथ लिखा है और अपने स्टैंड पर कायम रहे | जो भी सता आयी उसकी आलोचना की , वे उनके व्यंग – बाण के निशाने पर रहे |     

   वे कैसे वैद्य नाथ मिश्र से यात्री और यात्री से नागार्जुन बने | इसकी कथा रोचक होने के साथ दारुण है | नागार्जुन 11 जून 1911 को पैदा हुये , उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माँ का नाम उमादेवी था | उनके जन्म के पहले तीन भाई असमय काल –कवलित हो चुके थे |  यह परिवार के लिये चिंताजनक स्थिति थी |उनके लिये वैद्यनाथ धाम ( देवघर ) में उनके लिये मनौती मानी गयी और उनका जन्म हुआ ,उनके बचपन का नाम ठक्कन था | उनका पैतृक  गाँव तरैनी था उस समय के दरभंगा जनपद का भाग था लेकिन जन्मस्थान सतलखा था जो उनका ननिहाल था | यहाँ यह याद किया जाना चाहिये कि राहुल जी का जन्म उनके पैतृक गाव कनैला में नही उनके ननिहाल पंदहा आजमगढ़ मे हुआ था | उन दिनों यह परंपरा थी कि संतान का जन्म ननिहाल में हो | कभी कभी साम्यता अचरज में डाल देती है | ये  दोनों लेखक बौद्ध धर्म के समर्थक थे अत: कालांतर में अपना मूल नाम त्याग कर क्रमश : राहुल और नागार्जुन हुये  | राजकुमार गौतम का जन्म उनके ननिहाल देवदह मे होना था लेकिन उनका जनस्थान लुम्बिनी बना |  क्या पता था कि आगे चलकर ये दोनों कवि बौद्ध धर्म के पथिक बनेगे | मनुष्य अपने जन्म के बाद जगह जगह भटकता है , कोई रोजी की खोज में कोई अपनी महत्वाकांक्षाओ की पूर्ति के लिए अनेकों युगत करता है |

 नागार्जुन का जीवन आसान नही था , उनके पिता उत्तराधिकार में तीन कट्ठा जमीन छोड़ कर गये थे | इस  विरासत से जीवन नही चल सकता था इसलियें  उन्हें अपने जीवन यापन के लिये संघर्ष करना पड़ा | यहीं संघर्ष उनकी मूल पूंजी थी ,जिससे उनकी रचनात्मकता  को शब्द मिल रहे थे | अगर वे सम्पन्न परिवार में पैदा हुये होते तो उनके जीवन की दिशा अलग होती तब संभवत : वे बड़े कवि नही बन पाते | उन्हें संस्कृत विद्यालय में संस्कृत की प्रारम्भिक शिक्षा मिली लेकिन उनके जीवन में बदलाव तब आया जब वे लंका पहुंचे और वहाँ बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और बौद्ध धर्म को स्वीकार किया | उनका नामकरण संस्कार हुआ और उन्हें नागार्जुन नाम दिया गया | इसके पूर्व में भी नागार्जुन हुये हैं जो बौद्ध दर्शन के दार्शनिक थे ,उन्होंने शून्यवाद की स्थापना की | जिसका मुख्य आशय यह था कि कोई भी बस्तु स्वतंत्र नही होती ,उसका निर्धारण वस्तुओं के आपसी संबंधों से  होता है ,उन्होनें मध्यमार्ग पर बल दिया | 

  यात्री नाम से नागार्जुन नाम की यात्रा तक उनकी जीवन यात्रा विभिन्न पड़ावों से होकर गयी | इस तरह हिन्दी कविता में नागार्जुन का नाम स्थापित हो गया | नागार्जुन का लेखन केवल लिखने तक सीमित नही था ,उसके कई आयाम थे | उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था , वे किसान आंदोलन में शामिल हुये | उन्हें जेल की सजा मिली | जीवन की इन घटनाओं नें उनके लेखन को सजग और समृद्ध किया | इस तरह वे क्रांतिधर्मी कवि के रूप में ख्यात हुये | वे निरंतर जन आंदोलनों में भाग लेते रहे और जनता के साथ जुड़े रहे |  आजादी के बाद बहुत से लेखकों ने सत्ता के पास अपनी जगह बना ली थी लेकिन वे सत्ता के विरुद्ध रहे ,उन्हे इसका खामियाजा उठाना पड़ा था | उनका परिवार क्षत –विक्षत होता गया ,उन्होनें परिवार की परिवार की प्रवाह नही की | वे घुमंतू कवि बने रहे ,उन्होंने राहुल के साथ तिब्बत की यात्रा की और देश के सुदूर क्षेत्रों में विचरण करते रहे | उनका सतत जनता से जुड़े रहे | उनका रहन –सहन मामूली था , वे देखने में जनता के प्रतिनिधि लगते थे | अपने जीवन के अंतिम दिनों तक उनकी यह भूमिका बनी रही | आपात कल में जे पी आंदोलन में उनकी भागीदारी थी , वे बिहार के चौराहों और नुक्कड़ों पर कविता पाठ करते रहे | लेकिन जब उन्हें लगा कि यह सचमुच का जन आंदोलन नही है तो वे उससे अलग हो गये | वे अपने शर्तों और प्रतिबद्धता के साथ अपने लेखन कर्म का निर्वाह किया |

     ***
 लंबे संघर्ष के बाद आजादी मिली लेकिन आजादी के पहले धर्म के आधार पर देश का विभाजन हुआ ,हिंदुस्तान का एक हिस्सा पाकिस्तान बना | इस त्रासदी की तस्वीरे इतिहास और साहित्य में दर्ज हैं ,इस प्रकरण को बहुत दुख से साथ किया जाता रहा | हिन्दू मुसलमान को केंद्र में रख कर राजनीति की जाती रही ,इससे देश का काफी नुकसान हुआ | आज यह राजनीति काफी मुखर हो गयी है ,इस मुद्दे से देश के मुख्य मुद्दे बहस से बाहर होते रहे | 15 अगस्त 1947 देश की आजादी की तारीख थी | 26 जनवरी 1950 को देश का सविधान बना | यह अद्भुत संविधान था जिसमें हर नागरिक को बराबर का दर्जा दिया गया , उसमें धर्म के आधार पर कोई विभेद नही किया गया था | इसमें धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की गयी थी ,जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे , वे राजनेता के साथ प्रख्यात लेखक थे , उन्होंने भारत की खोज , विश्व इतिहास की झलक , पुत्री के नाम पिता का पत्र जैसी मशहूर किताबें लिखी | नेहरू ने देश में अनेक संस्थाएं और उद्योगों की स्थापना की थी ,इसके लिये उन्हें श्रेय दिया जाता रहा है | देश के विकास को लेकर उनकी गांधी जी से मतभेद थे | गांधी चाहते थे कि देश में कुटीर उद्योगों का भी विकास हो ताकि शहर और गाँव की साथ – साथ उन्नति हो सके | इसी बीच गांधी की हत्या कर दी गयी ,30 जनवरी 1948 इतिहास की रक्तरंजित तिथि थी | यह हत्या चरमवादी हिन्दू ने की थी |

  जैसे देश में सत्ता की स्थापना हुई ,देश के अनेक लेखकों और कवियों को इस सत्ता का सान्निध्य मिला लेकिन नागार्जुन सत्ता के दूसरी तरफ थे , उन्होंने अपनी कविता में सत्ता की आलोचना की < वे आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के विरुद्ध रहे और जब देश आजाद हुआ तो व्यवस्था के खिलाफ रहे | उनके इस रूप को देखना हो ,उनका कविता संग्रह –खिचड़ी विप्लव देखा हमने को पढा जा सकता है | नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के शासन काल में उन्होंने उनके विरुद्ध कविताएं लिखी | उनकी यह कविता देखे –
  आओ रानी कम ढोएगे पालकी 
 यही हुई है राय जवाहर लाल की 
रफ़ू करेगे फटे –पुराने जाल की 
यही हुई है राय जवाहर लाल की 
आओ रानी हम ढोएगे पालकी | 

  यह कविता उस समय लिखी गयी थी  जब इंग्लैंड की महारानी क्वीन एलिजाबेथ का हिंदुस्तान में आगमन हुआ था | धीरे - धीरे उनकी कविताओं का स्वर तल्ख होता गया  | उन्होंने देश के राजनीतिक हाल पर कविताएं लिखी है | जैसा हम जानते है कि आजादी के बाद देश की राजनीति बदलने लगी ,संवित सरकारों की शुरुवात हो गयी थी | राजनेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए दल बदलने लगे थे ,देश के प्रति उनकी निष्ठा संदिग्ध होने लगी थी  | राजनेताओं ने आजादी की जंग में जो मूल्य अर्जित किये थे , वे टूट रहे थे | गांधी का दर्शन अप्रसंगिक हो रहा था , 1969  में लिखी उनकी कविता का अंश देखे –

 बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर गांधी के 
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के |
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के 
दानी निकले ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के |
जल थल गगन विहारी निकले तीनों बंदर बापू के 
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के |
< सेठों के हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के 
 युग के प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के |

  यह लंबी कविता है जिसमें उन्होंने राजनीति के बदलाव की आलोचना की थी | समय के साथ जिस तरह से राजनीति की संस्कृति बदल रही थी ,उसे इस कविता में स्पष्ट दिखाई देता है | जैसे जैसे आजादी का पहिया बढ् रहा था ,उसके नीचे मूल्य रौदे जा रहे थे | नागार्जुन ने नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के कार्यकाल के राजनीतिक कदाचार का वर्णन उनकी कविता में मिलते हैं | आगे चल कर  चुनाव में टिकट बटवारे का खेल भी बदल गया था ,जो वास्तव में हकदार थे उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था | राजनीति में ऐसे लोग सम्मिलित हो रहे थे जिनका देश के प्रति कोई निष्ठा नही थी | राजनीति उनके लिये राष्ट्र की सेवा नही ,एक व्यवसाय बन रहा था | टिकट के बटवारे की प्राथमिकता बदल रही थी | यह स्थिति इंदिरा काल में ज्यादा मुखर रूप में सामने थी | उनकी कविता आये दिन बाहर के – में इस दृश्य को देखा जा सकता है –
 श्वेत श्याम रतनार अँखियाँ निहार के 
सिंडकेटी प्रभुओं की पद धूर झार के |
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के 
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के |
आये दिन बहार के !

  इस कविता को पढ़कर पाठक  जान सकते है कि यह कविता इंदिरा गांधी के शासन काल में लिखी गयी थी –जब कांग्रेस का इंडीकेट और सिंडीकेट में विभाजन हुआ था | नागार्जुन  प्रचलित लोक –रूप में कविताएं  लिख रहे थे ताकि वह पाठकों तक आसानी से पहुँच सके | नागार्जुन हिन्दी के अकेले कवि हैं जिन्होंने राजनीति को कविता का विषय बनाया है | अगर कोई नेहरू और इंदिरा गांधी के समय के राजनीतिक घटनाओं का विवरण चाहता हो तो नागार्जुन की कविताएं जरूर पढ़नी चाहिए | यह हिम्मत हिन्दी के कम  कवियों के पास है , लोग इस तरह की कविताओं लिखने से बचते है | नागार्जुन के बाद इस तरह की कविताएं लिखने की रवायत खत्म हो गयी है । कोई लिखने का खतरा नही उठाता  लेखक बच बच लिखते है ,मुझे धूमिल की कविता पटकथा के अंश याद आ गयी  उन्होंने लिखा है –
  एक पूंजी वादी दिमाग है / जो परिवर्तन तो चाहता है / मगर आहिस्ता – आहिस्ता / कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बची रहे / कुछ इस तरह की काँख भी ढँकी रहे  / और विरोध में उठे हुये हाथ की / मुट्ठी भी तनी रहे |
   यहाँ दाग देहलवी  के  शेर को याद करे जिसकी पंक्ति है ,खूब पर्दा है चिलमन से लगे बैठे हैं / साफ छुपते भी नही सामने आते भी नही | 
   नागार्जुन की कविता में कोई परदेदारी नही थी | उन्होंने आपातकाल के विरोध में कविताएं लिखी और इंदिरा गांधी को केंद्र में रखकर उन्होंने लिखा –
  क्या हुआ आपको ? /
 क्या हुआ आपको ? 
  सत्ता की मस्ती में 
 भूल गयी बाप को ?
इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको ?
बेटे को तार दिया बोर दिया बाप को 

   इस तरह उनके संग्रह  में अनेक कविताएं सहज मिल जाएगी | इस कविता के साथ मेरी भी स्मृति जुड़ी हुई है | वे कहने पर कविताएं नही  सुनाते थे , यह सब उनके मूड पर निर्भर करता था | हापुड़ प्रवास में उनके साथ हम लोग घूमने गये तो एक चौराहे पर रुक कर अपनी यह कविता नाच नाच कर सुनाने लगे | थोड़ी देर में उनके आसपास भीड़ इकट्ठा हो गयी | यह था उनकी कविता का प्रभाव , वह कहते थे कि कवियों को छंद  कविताएं जरूर लिखनी चाहिये | मुझे भी लगा कि जिस समाज में छंदहीन  कविताएं स्वीकृत नही है अत : कवि को छंद की ओर लौटना चाहिये | छटे –सातवे दशक में कवियों के गीत बहुत लोकप्रिय थे , वे कवि सम्मेलनों के मंचों पर खूब सुने जाते थे | उस समय बच्चन , शिवमंगल सिंह सुमन ,शंभु नाथ सिंह प्रमुख  कवि थे , वे मंचों पर नही हिन्दी की मुख्यधारा में भी शामिल थे | अब यह समीकरण टूट गया था ,साहित्य और कवि मंच अलग हो गया है | मंच व्यवसायिक हो गये है ,उनके भीतर से कवित्व गायब हो चुका है नागार्जुन की कविता कवियों के लिये पाठशाला है | उनके यहाँ कविता के अनेक रूप हैं |

  उदाहरण के लिये उनकी लंबी कविता नेवला है , यह कविता उन्होंने जेल में लिखी थी | नेवले का नाम मोतिया था ,इस कविता में उसके कौतुक का वर्णन करते हैं | दो भुने हुए भुटठे , नीम की दो टहनियाँ या सूअर , कटहल कविता का विषय हो सकती है | ऐसा तभी संभव होता है जब कवि अनुभव सम्पन्न हो | नागार्जुन घुमंतू कवि थे देश के विभिन्न इलाकों में घूमते रहते थे | जीवन की छोटी – छोटी घटनाओं पर उनकी नजर होती थी | नागार्जुन अभिजात के कवि नही थे , वे जनता और संघर्षरत मजदूरों के कवि थे | उनके पास उनके चित्रण के लिये समर्थ भाषा थी | उनकी कविता खुरदुरे  पैर और घिन नही आती है ? घिन तो नही आती ? कविता की इन पंक्तियों को पढे –
  पूरी स्पीड में है ट्राम / खाती है दचके पर दचका /सटता है बदन से बदन /पसीने  से लथपथ 
  छूती है निगाहों को /कत्थई दांतों की मोती मुस्कान /बेतरतीब मूँछों की थिरकन / सच सच बतलाओं 
  घिन तो नही आती ? जी तो नही चिढ़ता 
   यह कविता भद्र जनों पर व्यंग की कविता है | यह पंक्ति – घिन तो नही आती / जी तो नही चिढ़ता ,उपेक्षितों के प्रति उनकी उनकी प्रतिबद्धता को दिखाती है | उनकी आँख उन दृश्यों पर जाती है जो कवियों की दृष्टि से छूट जाती है | यहाँ उनकी लंबी कविता – हरिजन गाथा की चर्चा कर ली जाए जो उनकी जरूरी कविता है | बिहार के बेल्छी कांड में कई हरिजनों की हत्या हुई थी , यह कविता इस दुर्घटना पर आधारित है | कुछ पंक्तियाँ –
  ऐसा तो कभी नही हुआ था कि / एक नही , दो नहीं / तीन नहीं / तेरह के तेरह अभागे –
 अकिंचन मनुपुत्र / जिंदा झोक दिये गये हो / प्रचंड अग्नि के बिकरल लपटों में 
 साधन सम्पन्न ऊंची जातिवाले / सौ सौ मनपुत्रों द्वारा | 
   देश की आजादी के बाद  दलितों के साथ बहुत से अत्याचार हुये है , इसे शमन करने के बजाय उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है | इन दिनों यह प्रवृति बहुत तेज हो गयी है | किसी घटना को धर्म और जाति के आधार पर देखा जाता है ,उसे स्वतंत्र रूप से नही देखा जाता है | यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दलितों को जगह दी और उन्हें कथा –वस्तु बनाया | नागार्जुन की कविता की दुनिया में इस रूप को देख सकते हैं 
  नागार्जुन क्रातिकारी चेतना के कवि है ,उनकी यह अभिव्यक्ति उनकी कविताओं में देखी जा सकती है | क्रांति उनके लिये वायवी नही है , वे उसमें शामिल भी होते हैं  | जैसा पूर्व में बताया गया है कि वे स्वतंत्रता संग्राम में नही , जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में भी सम्मिलित हुये थे | जहां भी अनाचार होता है ,उसके विरुद्ध वे आवाज उठाते है | उनकी कविता भोजपुर  में उनकी आवाज को देखे –
  यही धुआँ मैं ढूंढ रहा था / यही आग मैं खोज रहा था /यही गंध थी मुझे चाहिये 
  बारूदी छर्रों की खुशबू ! / ठहरो ठहरो इन नथनों में भर लूँ / बारूदी छर्रों की खुशबू |  
    क्रांतिकारी कवि के भीतर भी कोमल भाव होते है , उनके भीतर प्रेम उपस्थित  रहता है | वे घर से हमेशा दूर रहे लेकिन घर उनके साथ चलता था < इस संबंध में उनकी दो कविताओं का संदर्भ दिया जा सकता है –पहली कविता का नाम है – सिंदूर तिलकित भाल ,इस कविता की कुछ मार्मिक पंक्तियाँ देखे -
  घोर निर्जन में परिस्थिति में दिया है डाल ! /याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल 
  कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिये नही समाज / कौन है वह एक जिसको नही पड़ता एक दूसरे से काज / 
 ,, तभी तो याद आती हो प्राण 
   हो गया हूँ मैं नही पाषाण | 
    क्या इस कविता को कवि की आत्मस्वीकृति मानी जाय ? देश और साहित्य की सेवा करते हुये जीवन में बहुत सी जगहें छूट जाती हैं इसे समाज नही जान पाता | इस बिडम्बना का सबसे पहले परिवार शिकार होता है | कठोर पहाड़ों से प्रपात झरते हैं | उनकी दूसरी कविता है कालिदास –
 कालिदास ,सच - सच बतलाना ! / इंदुमती के मृत्यु शोक से / अज रोया था या तुम रोये थे ?
 कालिदास , सच –सच बतलाना ,,,/ अमल –धवल गिरि के शिखरों पर / प्रियवर ,तुम कब सोये थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे ? कालिदास , सच – सच बतलाना ? 
  इस कविता को पढ़ते हुये लगता है कि नागार्जुन कालिदास की वेदना के साथ है | किसी अन्य पर कविताएँ लिखते हुए कवि स्वयं : को भी अभिव्यक्त करता है | कालिदास बादल को माध्यम बना कर अपनी दारुण प्रेम कथा को याद करते हैं | कवि के लिये प्रकृति में  तमाम उपदान हैं जिसका प्रयोग कवि अपनी कविता में करता है ,उसकी आभा हर जगह हर बस्तु में मौजूद है | यही कवि के अनुभव की व्यापकता है | उन्होंने अपने कवि मित्रों पर कविता लिखी है लेकिन राजकमल चौधरी पर लिखी उनकी कविता –अच्छा किया ,उठ गये हो दुष्ट , लंबी कविता है | यह कविता राजकमल के जीवन चरित्र को बताती है , वे मूल रूप से अराजक चरित्र के थे | उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं | उनका पुकारने का नाम फूल बाबू था |इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं –
  लेकिन तुम तो बीच में ही / दगा दे गये हो दुष्ट ! / अच्छा किया ,उठ गये हो दुष्ट ! 
  खूब रहा ,, ! / पा गये हो छुटकारा भवसागर के थपेड़ों से ! अपन तो भाई थेथर हैं 
 निर्लज्ज , बेहया , कठजीव / मरेगे नही जल्दी | 

  नागार्जुन की भाषा का क्षेत्र विस्तृत है , उनकी मूल भूमि मिथिला है | इसके अलावा वे संस्कृत और बांग्ला के भी जानकर है | उनकी भाषा कें अनेक भाषा के शब्द आते हैं | वह जनता की भाषा में लिखते है | उन्हें पढ़ते हुये कबीर की याद आती है ,कबीर की भाषा को खिचड़ी भाषा कहा जाता है | नामवर सिंह नें उन्हें आधुनिक कबीर कहा था | हजारी प्रसाद दिवेदी  ने कबीर को नये रूप में प्रस्तुत किया था ,उनका कथन है कि नागार्जुन भाषा के डिक्टेटर थे , वे जैसा चाहते थे भाषा से कहलवा देते थे “
  कहा जाए कि नागार्जुन ने  भाषा को सिद्ध कर लिया था | उनकी भाषा में व्यंग था , वे किसी को माफ नही करते थे | उन्हें पढ़ते हुये मुझे अक्सर हरिशंकर परसाई की याद आती है | जिस तरह परसाई जी अपने आप पर व्यंग करते थे ,उसी तरह नागार्जुन भी खुद पर व्यंग बाण चलाते थे | उनके निशाने पर सत्ता और सत्ताधीश अक्सर आते रहते थे | उनकी विचारधारा स्पष्ट थी , वे जनता के पक्षधर थे | कभी कभी लगता है कि उनकी कविता मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध की कविताओं का तर्जुमा है | मुक्तिबोध ने  जनता का पक्ष चुना था लेकिन वे जनता में लोकप्रिय कवि नही थे | नागार्जुन की कविता को जनता में स्वीकृति मिल चुकी है  |इसका मूल कारण यह है कि वे सतत जनता के बीच रहते थे ,उन्ही की भाषा में कविता लिखते हैं  | किसी कवि का महत्व इस बात में है कि वह वर्तमान समय में कितना प्रसंगिक है , इसी बात को ध्यान में रखकर उसका  मूल्यांकन होता है | इस पंक्ति में वे कबीर ,निराला ,मुक्तिबोध के साथ शामिल हैं |  उन्हें इसलिये याद किया जाता है कि उनके पास सत्ता के विरुद्ध लिखने का साहस था , वह आज के समय में किसी कवि के पास नही है | 

  नागार्जुन के जीवन का कथानक उपन्यास की तरह है ,उसमें कई मोड़ ,रहस्य रोमांच ,पल पल संघर्ष है | एक बार मैनें उनके बड़े बेटे शोभाकांत जी से कहा कि आपको गर्व होना चाहिये कि नागार्जुन जैसे बड़े कवि के बेटे है | इस बात के जबाब में उन्होंने कहा कि पूरे परिवार ने इसकी कीमत चुकायी है | मुझे याद आया कि बड़े लोगों के बेटों को जीवन में बहुत यंत्रणाएं सहनी पड़ती हैं | मुझे विश्व प्रसिद्ध लेखक हेमिग्वे के बेटे ग्रेगरी हेमिग्वे की अपने पिता पर लिखी किताब पापा की याद आ गयी जिसमें हेमिग्वे के जीवन के संघर्ष ,मानसिक उद्वेलन और परिवार के क्षत –विक्षत होने की कथा है | 
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