गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कवि देवव्रत जोशी जी के व्यक्तित्व पर आशीष दशोत्तर जी का एक आलेख प्रस्तुति : समूह वागर्थ

स्मरणःडाॅ.देवव्रत जोशी
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 एक अच्छी कविता लिखकर रूखसत होने की ज़िद
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 आशीष दशोत्तर

              ‘जीवन के दुःख-दर्द हमारे बीच ही हैं और खुशियां भी हमारे करीब। ज़रूरत इन्हें देखने और महसूस करने की है। सड़क पर चलते हुए जब किसी आदिवासी के फटे पैर दिखते हैं तो भीतर का कवि जाग जाता है। उस पीड़ा को वही समझ सकता है जो उस आदिवासी के प्रति संवेदनाएं रखता हो।‘ इन संवेदनाओं को अपने सक्रिय जीवन में कई बार अभिव्यक्त करते रहे हिन्दी और मालवी के कवि, डाॅ. देवव्रत जोशी अब हमारे बीच नहीं हैं मगर वे ताउम्र आम जनता की पीड़ा, दुःख-दर्द से, कलम और देह से उसी तरह जुड़े रहे जिस तरह कोई शाख पेड़ से जुड़ी रहती है। पाॅच दशक तक निरंतर लिखते हुए देवव्रत जी ने साहित्य के कई उतार-चढ़ाव  देखे। वे छंदबद्ध रचना छंदमुक्त दौर के सर्जक/साक्षी रहे। उन्होंने गीत-नवगीत और नई कविताएँ लिखी। उनकी कलम जब भी चली नई परिपाटी को गढ़ती चली गई। 

            लिखना और सिर्फ लिखते रहना ही किसी रचनाकार की सफलता का मापदंड नहीं होता । अपितु वह लिखते हुए अपनीे रचनाओं और कर्म के माध्यम से पाठकों तक कब और कितना पहुंच सका, यह उसकी सार्थकता होती है। देवव्रत जी इस मायने में सदैव सचेत रचनाकार रहे। उनकी रचनाएं पचास के दशक से लगातार प्रकाशित होती रही। देश की शायद ही कोई साहित्यिक पत्रिका या समाचार पत्र रहा हो जिसमें देवव्रत जी को स्थान न दिया गया हो। उनकी गद्य और पद्य की पुस्तकें साहित्य क्षेत्र में चर्चा और समीक्षा के दौर से गुज़री। वे उत्तर आधुनिक दृष्टि सम्पन्न देहाती, लोक के चहेते कवि थे। ‘गद्यशिल्पी दिनकर‘ उनके गद्य साहित्य की महत्वपूर्ण कृति है तो ‘छगन बा दमामि और अन्य कविताएं‘ उनका चर्चित काव्य संग्रह। देश और विदेश की कई भाषाओं में देवव्रत जी की रचनाओं का अनुवाद हुआ। प्रसार भारती ने उन पर एक वृत्तचित्र का निर्माण भी किया। मगर यह सब न होता तो भी देवव्रत जी,देवव्रत जोशी ही रहते। उनसे मिलने वाले उनके व्यक्तित्व का अहसास सदैव करते रहते।

            एक रचनाकार होने के साथ वे संवदेनशील इंसान भी थे। उनकी रचनाओं में उनका अपना गाॅंव रावटी और वहाॅं के आदिवासी अनायास ही आते रहे। अपनी पोती, अपनी बहन से बतियाते हुए वे भावुक हो जाते। वे हिन्दी के पारिवारिक कवि थे। सूर के पदों में उन्हें संसार की तमाम सुंदरताएं नज़र आती , तो आबिदा परवीन के कंठ से कबीर के पद सुनते हुए ने धार-धार रोते दिखाई देते। उनके लिए अफगानिस्तान की औरतों का दर्द सैलाना झाबुआ की किसी आदिवासी महिला से कम नहीं था। वे अपनी दृष्टि से अमेरिकी ज्यादतियों को उसी तरह खारिज करतेे जिस तरह अपने आस-पास की विसंगतियों को। देवव्रत जी की मिलनसारिता भी अलग ही थी।मुझे याद नहीं वे कभी किसी से अपरिचित की तरह मिले होें। कोई रिक्शा वाला हो या फल विक्रेता उनके लिए अपना ही होता। उससे कभी न कभी वे मिल चुके होते हैं। गली में क्रिकेट खेलते बच्चों से वे आत्मीयता से बतियाते । शोर-शराबा करते बच्चों को एक अभिभावक की तरह अधिकारपूर्वक डाॅटते भी। देवव्रत जी केे इन गुणों की चर्चा इसलिए ज़रूरी लगती है कि वे जो लिखते , वैसा ही दिखते रहे और ठीक उसी तरह जीवन भी जीते रहे। एक लापरवाह फक्कड़ जीवन। रेदास,कबीर, सूर उनकी कविताओं में पूर्वजों की तरह आते । एक सार्थक कविता लिखने की ज़िद और उसके बाद दुनिया से रूख्सत होने की बात कहना हर किसी के बूते में नहीं हैं, मगर यह ज़िद उनकी अंतिम सांस तक रही।

            कविता महज विचारों की अभिव्यक्ति नहीं , बल्कि वह मानवीय मूल्यों की रक्षा का एक उपक्रम भी है। कविता की रचना कवि समय के जीवन की आंतरिक मनोदशाओं, प्रवृत्तियों और चेष्टाओं के साथ सम्बन्धों से उत्पन्न संस्कृति और नई मूल्य व्यवस्था से होती है।यदि रचनाकार अपने पूरे जीवन को खंगाले, अपने अनुभवों के समंदर में गोते लगाए तभी वह मोती के समान रचनाओं को सामने ला सकता है। उसे अपने सामीप्य को पहचानने और चैकन्न रहकर अपने पास से गुजरते पलों को पकड़ने का श्रम करना पड़ता है। देवव्रत जोशी की रचनाओं पढ़कर इन विचारों को दृढ़ता मिलती है। आम जीवन से लगभग अनुपस्थित होते जा रहे ‘लोक’ को देवव्रत जोशी ने न केवल स्थापित किया , बल्कि इसे बहुत हद तक साबित भी किया।

                एक ऐसे समय में हम जी रहे है जब जीवन से सजीव शब्द गायब होते जा रहे है, और मानवीय संवेदनाओं का स्रोत लगभग सूख सा गया है। अपने आप तक सीमित रहने वाले इस समय में यदि कोई अपने गांव, हाट बाजार, कुँए या किसी ढोल वादक अथवा नट की बात करे तो लगता है अब भी रचनाओं के साथ परम्परागत मूल्यों के झरने बह सकते है बशर्ते रचनाकर इस तरह की ईमानदार कोशिश करे। देवव्रत जी की कई रचनाओं में मां की फटकार और पिता के प्यार की हदों को पार करती बच्ची का जिक्र आया। वे अपनी पोती को केन्द्र में रखकर कई रचनाओं में घर में प्रवेश करते बाजार, भूमण्डलीकरण की चिंताओं को बड़ी शिद्दत के साथ पेश करते रहे।

अपने वामन पगो से तीन लोक नापती/चपल बच्ची नाच रही है,

सपनों में अपनी-अपनी अस्मिता के सूर्य दमकाती

अंधेरे कोनों-गलियारों को रोशनी से भरती,

नष्ट करती सब कुछ पुराना/और नया भी जो नष्ट करने लायक है।

            देवव्रत जी की कविताओं की ख़ासियत उनका अपनी मिट्टी से जुड़ा होना। वे रावटी, धार, झाबुआ, सैलाना, जावरा का जिक्र जिस अधिकार से किया उससे लगता  कि ये स्थान, इनके घर-बाजार, यहां रहने वाले लोग, उनके विचार और संस्कार कवि के हृदय में बसे रहे।

‘‘ फिलहाल साफ-साफ दिखाई दे रहा/सुबह-सवेरे स्कूल जाती

झुकी कमर वाली/मेरी ओस-भीगी पोतियाँ,

नुकीले सींग उठाये बाजार के साँड़/निकट ही नामली-जावरा में

देह बेचती मेरी मजबूर जवान बेटियाँ/और धुंधली निगाह से कूड़ा बीनती

औरतें बिलकुल मेरी माँ-जैसी।’’

            वे अपने छोटे से गांव को शहर में तब्दील होते देखकर दुखी भी होते। कबीर और रेदास का जिक्र वे बार-बार अपनी कविता में करते और खुद को उनका वंशज भी मानते।  यह देवव्रत जी की साफगाई रही कि वे अंधे कवि, जुझारू जुलाहे और विद्रोहिणी रानी की लय अपनी लय मिलाते हुए बदलती व्यवस्थाओं का उसी शैली में प्रतिकार करते रहे, जिस तरह कभी पूर्वज कवियों ने किया था। कवि बदलती परिस्थितियों पर नज़र रखता है, मगर वह इसे ही अंतिम सत्य नहीं मानता है। कवि को मालूम है कि सत्य वह नहीं है जो दिखाया जा रहा है बल्कि सत्य तो वह जिसे हम देख नहीं पा रहे हैं।

अस्मिताएं विदेशी जहाजों में आ-जा रही है/माहौल बेशक खौफ़ज़दा है

और ज़िन्दगियां हताश और निढाल/लेकिन थोड़ा रूको और देखो,

कि ज़मीन में दबी जड़/यानी तुम्हारी अपनी जिजीविषा

डरी-सिहरी ज़रूर है/लेकिन अब भी पूरी चैकन्न्ाी .........।’’

            एक सुंदर और सभ्य दुनिया हर रचनाकार की चाह होती है। वह चाहता है कि दुनिया में कोई वंचित, शोषित न रहे। हर तरफ खुशहाली हो। देवव्रत जोशी भी ऐसी ही दुनिया चाहते थे मगर उनकी ज़िद रही एक अच्छी कविता लिखकर रूख्सत होने की।

‘‘ अपनी पहली और आखिर ख्वाहिश/ज़िद की हद तक

कि एक अच्छी कविता लिखकर/रूख्सत हुआ जाए

उस कविता को सहेजकर रखें लोग/कवि को विस्मृत करते हुए।’’

 

            आज रचनाकार पर नगरीकरण और औद्योगिकीकरण के इतने दबाव बढ़ गए है कि वह अपने देशज अनुभवों और चिंतन से कटता जा रहा है। साधारण जन अब उसकी पहंुच के भीतर नहीं रहा है, उससे उसकी दूरी बढ़ती जा रही है। देवव्रत जी इसे झुठलाते रहे। वे नगरीय संस्कृति के दृश्यों को देहाती बिम्बों के सहारे सहजता से उभारते। वे इतना करने के बाद भी यह कहने से नहीं चूकते -

रही अनलिखी मन की भाषा/रही अनकही जन की गाथा,

धरम जात के धुनी लोग सब/गुनी और अवगुनी लोग सब,

खोल रहे हैं अपना खाता

            यह उनकी ईमानदारी रही कि वे अपने हर उस पल की सत्यता के साथ उजागर करते रहे जो उसका भोगा हुआ था। भंवरसिंह नट, छगन बा दमामी और ऐसे कितने ही चरित्र हैं जो उनकी जिन्दगी से जुड़े थे। इन चरित्रों को जिस शिद्दत से उन्होंने अभिव्यक्त किया , उससे यह समझा जा सकता है कि उन्होंने अपना जीवन इन नायकों के साथ ही गुज़ारा।

            देवव्रत जी ने एक समय देश के तमाम सफल मंचों पर उन्होंने कविता पाठ किया।उपलब्धियों की बातें वे नहीं करते वरन् सदैव कुछ नया करने का सोचते।नए रचनाकारों को उंगली पकड़कर राह दिखाना उनकी आदत में शुमार था।  उनके भीतर का कवि अपनी आँखों मे ऐसे उजले संसार की कल्पना करता रहा जहाॅं दुःख-दर्द, पीडा के पहाड़ न हों। जहाॅं स्वार्थ की सड़क पर निर्बाध गति से दौड़ते रिश्ते नाते भी न दिखाई दे। वे जीवन को एक संत की नज़र से देखते , जहाॅं आपसी विश्वास, भाईचारा हो और भेदभाव न हो। संस्कारों में मिले संतत्व के गुणों का परिमार्जन कर वे स्वयं भी अपनी दृष्टि संत सी रखते और यह सब उनकी रचनाओं में भी परिलक्षित होता। उन्होंने अपनी रचनाओं में जीवन के दुःख दर्द और मुश्किलें अभिव्यक्त की वहीं यह विश्वास भी व्यक्त किया कि सभी समस्याओं का समाधान मौजूद है। आवश्यकता एक कोशिश की है।

वे कहते रहे - ‘‘ बर्फ की तरह जमीं है/चेतना पर जड़ता की पर्त/ कहीं कोई सूर्य नहीं/ जो इसे पिघलाए और गंगा बनाए ............यह एक काम/ है मुश्किल लेकिन असम्भव नहीं।’’

         उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी देवव्रत जी पूरी शिद्दत के साथ सांसों से डटकर मुकाबला करते रहे। उनका जाना हिन्दी साहित्य के लिए यकीनन एक क्षति है।              

-12/2,कोमल नगर, बरवड़ रोड , रतलाम- 457001

संक्षिप्त परिचय
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नाम -  आशीष दशोत्तर
जन्म - 05 अक्टूबर 1972 को रतलाम में 
शिक्षा -  1. एम.एस-सी. (भौतिक शास्त्र)
 2. एम.ए. (हिन्दी)
 3. एल-एल.बी.
 4. बी.एड
 5. बी.जे.एम.सी.
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    
सम्प्रति - आठ वर्षो तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।
संपर्क -  12/2,कोमल नगर,बरबड़ रोड
 रतलाम (म.प्र.) 457001

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