गाँव गली घर शहर देश में ,
अलख जगाता हूँ।
मैं अपने नगमों में जग की ,
पीर सुनाता हूँ।
मेरे मन में पाप नहीं है
किंचित भी संताप नहीं है
वेशक ढंग पुराना मेरा
किंतु किसी की छाप नहीं है
मैं स्वारथ में नहीं किसी को
बाप बनाता हूँ।
मैं अपने नगमों में जग की
पीर सुनाता हूँ।
रखता महज ईश से आशा।
नहीं आज तक मिली निराशा।
काव्य द्रोहियों को लग सकती,
कुछ कड़वी सी मेरी भाषा।।
कड़वी दवा पिलाकर जड़ से
रोग मिटाता हूँ ।
मैं अपने नगमों में जग की
पीर सुनाता हूँ।
नहीं लोभ में, मैं बिकता हूँ।
जो दिखता है वह लिखता हूँ।
सच कहने के कारण कुछ को,
खलनायक सा में दिखता हूँ। ।
शब्दों के द्वारा तानों के ,
तीर चलाता हूँ।
मैं अपने नगमों में जग की
पीर सुनाता हूँ।।
प्रेम सभी से मैं करता हूँ।
सदभावों के घट भरता हूँ ।
बेशक काल खड़ा हो सम्मुख,
बस ईश्वर से मैं डरता हूँ। ।
श्रम से संग तोड़कर अपनी
राह बनाता हूँ।
मैं अपने नगमों में जग की
पीर सुनाता हूँ।।
दो
हम जगत पहचानने को चल दिये।
पर स्वंय को आज तक ना पढ़ सके।।
दादुरों को आज बगुले खल रहे ।
दृग पलक पर भाव ओछे पल रहे।
द्वेष की जलती मशालों से स्वंय,
व्यर्थ में ही बाँस जैसे जल रहे।।
पड़ गई आदत हमे बैशाखिंयों की
हम स्वंय के पाँव से ना बढ़ सके।
खो चुके इंसानियत हम ताव में।
दानवों को मात दें दुर्भाव में।
मर्म ना समझे कभी हम प्रीति का,
ढोर से बदतर हुये वर्ताव में ।।
दर्प में बातें करें हम व्योम की
भूधरों पर आज तक ना चढ़ सके।
आज जग में झूठ सबको भा रहा।
देखकर सिर सत्य का चकरा रहा ।
आलिमों के भाग में रोटी नहीं,
जाहिलों का दल मिठाई खा रहा।।
किस तरह से हम जगत के गुरु बने,
जब प्रगति के संग हम ना गढ़ सके।
गीत गजलें सब लतीफा हो गये।
अब धतूरे भी शरीफा हो गये ।
जब सियासत लाभ का सौदा दिखी,
चोर जितने थे खलीफा हो गये।।
सत्य पर हावी दिखी तब झूठ के
हम तमाचे गाल पर ना जड़ सके।
कैलाश गुप्ता (सु मन)
मुरैना मध्य प्रदेश
9826819117
दोनों गीत पोस्ट किए जा सकते हैं
जवाब देंहटाएंअच्छे गीत हैं। बढ़िया।
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