बुधवार, 8 सितंबर 2021

विनय त्रिपाठी जी के दो लोरी गीत प्रस्तुति : वागर्थ ब्लॉग


विनय त्रिपाठी जी
के दो लोरी नवगीत

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राजा मुन्ना, आजा मुन्ना 
मीठी निदिया सो जा रे
परियों के सपनों में सुंदर
मेरे प्यारे खो जा रे

ताजी-ताजी खीर बनी है
कुड्डन-कुड्डन तूँ खा ले
अठवाई संग धरी पंजीरी
थोड़ा बड़ा सा मुँह बा ले

मेरी गोदी आजा बेटा!
घाव हृदय के धो जा रे
किलकारी मनहारी से प्रिय!
बीज कला का बो जा रे



बुँदेली लोरी (प्रभाती) शब्दार्थ सहित-
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उठ बेटा! भई भोर
चिरेरू टेर रए
उठ बेटा! नई भोर
कि तारे हेर रए

ध्रुव जी कै रए
उठ जा बेटा!
तोए देखवे अब लौ ठैरे
देख जुँदइया!
सोऊ टेरै
आसमान में डारें डेरे

नौनी फुलवारी के फुलवा
तोरे देखे सें फूलत हैं
उन फूलन-डारन पै भौंरा
तोरे जगवे सें झूलत हैं

देख पुरबिया कैसी बै रई
आज लगे
हर दिन सें नई- नई

बछिया कुंदके हाँ ललचत है
बुला-बुला तोए बमकत है

उठ बेटा! भोर गई
चिरेरू टेर रए
उठ बेटा! भोर नई
कि तारे हेर रए

- विनय त्रिपाठी,३०/०८/२०२१

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प्रयुक्त बुंदेली शब्दों के अर्थ-
चिरेरू-पक्षी, टेरना-बुलाना, हेरना-देखना, ध्रुव-ध्रव तारा, कै- कह, तोए-तुझे, अब लौ-अभी तक, ठैरे-रुके, जुँदइया-चंद्रमा, सोऊ-वह भी, डारें डेरे-उपस्थित हैं, नौनी-सुंदर, फुलवा-पुष्प, तोरे-तुम्हारे, जगवे-जागने, पुरबिया-पूर्व से चलने वाली पवन, बै रई-चल रही, कुंदके हाँ-उछलने के लिए, बमकत है-कूँदती है।

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