वागर्थ प्रस्तुत करता है नवगीत के प्रयोगधर्मी नवगीत कवि पंकज परिमल जी के दस नवगीत
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पंकज परिमल जी न सिर्फ नवगीत के बल्कि नवगीत से इतर अन्य विधाओं के भी अधिकारी विद्वान हैं। पंकज जी को लेकर मेरा मानना अब भी यह है कि उन्हें अपनी अनन्त ऊर्जा को बजाय सभी विधाओं में बिखराने के किसी एक विधा में फोकस कर देना चाहिए, ताकि उस विधा विशेष में उनका मूल्यांकन हो सके। पंकज जी चोटी के ललित निबन्धकार भी हैं। भाषा पर जबरदस्त अधिकार तो इनका है ही ।इन दिनों आप तमाम सनातनी छन्दों की साधना में आकंठ डूबे हुए हैं। और उन पुरातन छन्दों में नवगीत की अपरिमित सम्भावनाएं खोज रहे हैं, जिन्हें स्थापित नवगीतकार गैर जरूरी मानते हैं। नवगीत को लेकर आपका यह नवाचार आपको अन्य नवगीतकारों से अलग श्रेणी में लाकर खड़ा करता है। प्रस्तुत नवगीतों में, प्रयोग के स्तर पर नवगीत में नवाचार की आपकी जिद को खुलकर देखा जा सकता है।
चाक्षुष बिम्ब उकेरता आपका नवगीत 'लड़की मेट्रो में' नवगीत साधक की नवगीत साधना का उच्चतम प्रतिदर्श है।
सन्दर्भित नवगीत का रचाव नवगीत साधकों के लिए नया और कुछ अलग हटकर रचने की प्रेरणा देता है
द्रष्टव्य है उनके चयनित नवगीत
लड़की मेट्रो में
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लड़के के काँधे सिर धरकर
मगन हुई खुद में
वह लड़की उत्फुल्लमना
बैठी है मेट्रो में
मौली का धागा भी थोड़ा
असमंजस में है
अपने सूतों में उलझी
अँगुली के बस में है
अंगुल पूँछे
कौन भला है
किसके चंगुल में
इक-इक सिरा 'लीड' का है
दोनों के कानों में
दोनों खोए कब से
किन-किन
सुर-लय-तानों में
निर्विकार हो
जगह ढूँढ़ते रहे
वृद्ध चश्मे
रहे बेखबर
आस-पास की
प्रतिक्रियाओं से
मुक्त हंसी है विरत
शील की ज्यों भाषाओं से
खुले कि ज्यों
लापरवाही से
जूतों के तस्मे
दांत बड़े हैं तो क्या
उसकी हंसी सुहासिन है
हँसना ही उसकी भाषा है
यों मितभाषिन है
अपना आज
भला क्यों खो दें
वे कल के छल में
आज आपका जन्मदिन है। वागर्थ परिवार आपको इस अवसर पर बधाइयाँ प्रेषित करता है।
प्रस्तुति
वागर्थ
सम्पादक मण्डल
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1
देख लेना ध्यान से।।
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आपके रफ-नोट्स में
शायद कहीं हों
देख लेना ध्यान से
पन्ने पलटकर
खास सूची में न हों
संभव बहुत है
पर कहीं भी हों नहीं
यह तो असंभव
बच न पाया रूप
प्रांजल और तत्सम
शेष अब भी किंतु
प्राकृत और तद्भव
हम प्रतीक्षा
एक युग तक भी करेंगे
देख लेना
रोज़ के झगड़े सुलटकर
चंद्रमा थे
बिंदु-भर शायद बचे हों
हैं हलंतों से रहित
अर्धाक्षरों में
हम मिलेंगे
सिर्फ़ काली सूचियों में
खोजिएगा मत
किन्हीं स्वर्णाक्षरों में
बिखर जाएँगे
खुले पन्नों सरीखे
पोथियाँ अपनी
उठाएँ मत झपटकर
नृत्य के आमोद-मंडप में
न ढूँढें
बैंच पर हम
रुग्णशाला की टिके हैं
काँच के शोकेस में तो
सज न पाए
हाट में फुटपाथ वाली ही
बिके हैं
हाथ-मुँह धोने निमित
जलपात्र-से हैं
देखिए तो
नित्यकर्मों से निपटकर
मीन सारी ले गया वो
जाल भरकर
निष्प्रयोजन
सीप-घोंघों-से बचे हम
रोशनी की रेख तक
छूकर न गुज़री
दृष्टि का दुश्मन बने जो
घोर हम तम
शीश शायद
रूसियों-से ही जमे हों
देखिएगा चाँद को
अपनी घुरटकर
अन्न तो क्या,
क्षुद्र अन्नों में न शामिल
काट भी हमको
गईं घसियारिनें कब
पददलित-से भी
अगर होते कहीं हम
राज्यकामी लोग फिर
पुचकारते सब
हाड़-गोड़ों की
न हो जाए कहीं जय
देखिए इन फिसलनों में
मत रपटकर
2
पूड़ी-खीर जिमाकर भेजा पंडिज्जी
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पूड़ी-खीर जिमाकर भेजा
पंडिज्जी,
पितरों का परसाद दीजियो
थोड़ा-सा।
अदरक रचा हुआ,सँग मूली का लच्छा,
कसा-रचा, जो भूख बढ़ाए, पंडिज्जी!
पूड़ी,कद्दू, आलू-अरवी, व्यंजन बहु,
खाएँ मन-भर,जो चित भाए, पंडिज्जी!!
पितरों के निमित्त
ध्याया तुमको हमने
पूरा करियो आज काज यो
थोड़ा-सा।।
पितर गए परलोक, लोक में तुम्हीं पितर,
है कर्तव्य तुम्हारा करना अवबोधन।
पितर गए तुम पर यह धर जिम्मेदारी,
धरम-करम से,नीति-रीति से डिगे न मन।।
भले-बुरे की
शिक्षा कुछ देते रहियो,
हम पर यह उपकार कीजियो
थोड़ा-सा।।
पंडिज्जी! सीधा गठियाओ जितना भी,
जो उल्टा हम चलें,बरज हमको देना।
हमें ग्रहों का डर दिखलाना मत खोटे,
हमें सिखाना इन सबसे पंगा लेना।।
पंडिज्जी!
ज़्यादा मत उम्मीदें बाँधो,
बस,भावों की धार भीजियो,
थोड़ा-सा।।
3
।।करना बंधु! रिफॉर्म।।
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जब-जब भी मन में लहराईं
थोड़ी खुशियाँ 'वार्म'
'टेक इंसुलिन' बजता है
मोबाइल का ऐलार्म
बीमारी रखती खुशियों का
कर सब डाटा फीड
'इन्फॉर्मेशन' के चैप्टर सब
कौन कर सका रीड
'तेरे मुँह में घी-शक्कर' का
करो न अब उल्लेख
जीवन-पद्धतियों को थोड़ा
करना बंधु! रिफॉर्म
गनपति बप्पा रहे मोदकों के
भारी शौकीन
कौन खिलाता उनको कड़ुआ
तीता या नमकीन
अब 'जम्बूफल चारुभक्षणं'
करना है अनिवार्य
वे भी सहमत हैं जी इससे
'मीठा करता हार्म'
मीठा बोलो तो मिठलट्टू
चींटे चाटें रोज़
जैसे नेताजी को चाटें
चेले-चाँटे रोज़
'रफ-एन-टफ' इस्टाइल वाली
मन ने लादी जीन्स
होठों पर मीठी मुस्कानें
लगतीं यूनिफॉर्म
लैब-टैस्ट बो जाते घर में
सन्नाटे के बीज
प्रेस्क्रिप्शन सब व्यर्थ हो गए
बन गंडे-ताबीज
बुरी खबर की मन को आदत
डाल रहा अखबार
अच्छी खबर सूँघ ली हमने
जैसे क्लोरोफार्म
4
राजपुत्रों को सिखाएँ वह
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राजपुत्रों को सिखाएँ वह
राज करने के बनें काबिल
तीन हों जो एक रुपए की
अब अठन्नी,तो करेंगे क्या
विश्व के बाज़ार में रुपया
नित गिरा, भूखों मरेंगे क्या
खोट अपने भूलकर जो सब
ताड़ करते दूसरों के तिल
अब बनें चाणक्य, सिखलाएँ
नीति के विश्लेषणों को नव
ज्ञान के जिस यज्ञ में होतीं
स्वाह निधि नौ,जिस तरह तिल-यव
उत्तरीयों में विजय के जो
बेच आएँ हाट में ही दिल
सांख्यिकी के पाठ पढ़-पढ़कर
आँकड़ों के मंत्र से खेलें
चित्त की बेचैनियाँ कम हों
एसियों की ठंड़कें झेलें
चाबने क्यों वे चने दुख के
दाढ़ क्या, हर आँत जाए हिल
कोचिंगे प्रतियोगिताओं के
हेतु जो तैयार करती हैं
वे युवाओं की किशोरों की
ज़िंदगी दुश्वार करती हैं
जीतना कब अर्थ है जय का
वो जयी, जो हो बड़ा कातिल
5
।।करती कई खसम।।
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राजनीति री, राजनीति री
तेरे बुरे करम
सुबह-सुबह की हाँजी-हाँजी
शाम हुई ना जी
देखे नए चलित्तर जनता
बन उल्लू-पाजी
एक खसम से पेट न भरता
करती कई खसम
लुकाछिपी का खेल खेलते
ज्यों चूहा-बिल्ली
एक पाँव भोपाल थापती
एक पाँव दिल्ली
शीशे से भी पहले टूटे
तेरे रचे भरम
पंचसितारा होटल में कर
नज़रबंद प्यादे
दिए समर्थन के क्या लेकिन
ठोस रहे वादे
दासी-रानी सभी भोगतीं
सुविधायुक्त हरम
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पर मन उड़ता है
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हुईं उड़ानें बन्द हवाई
पर मन उड़ता है
व्हाट्सएप पर दूर बसे
परिजन से जुड़ता है
चुग्गा-पानी ठीक मिल रहा
दुख-,तकलीफ नही
इससे अच्छा था बेटा हम
रहते साथ यहीं
और नहीं अब लिक्खा जाता
कागज़ मुड़ता है
कुछ सपनों ने पंख उगाए
गए विदेशों तक
एक दिवस तो उड़ते-उड़ते
वे भी जाते तक
जानबूझकर यों अपनों से
कौन बिछुड़ता है
रोज़-रोज़ की नई प्रगतियाँ
बढ़तीं दुविधाएँ
कहने को हैं परदेसों में
ज़्यादा सुविधाएँ
रोज़ प्रतीक्षा में ही सारा
रक्त निचुड़ता है
चैट-वीडियो कॉलिंग दिन-दिन
या ग्रुप कॉन्फ्रेंसिंग
दूर-दूर होकर भी लगता
बैठे हैं ढिंग-ढिंग
एक फोन में अब सारा
भूगोल सिकुड़ता है
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लड़की मेट्रो में
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लड़के के काँधे सिर धरकर
मगन हुई खुद में
वह लड़की उत्फुल्लमना
बैठी है मेट्रो में
मौली का धागा भी थोड़ा
असमंजस में है
अपने सूतों में उलझी
अँगुली के बस में है
अंगुल पूँछे
कौन भला है
किसके चंगुल में
इक-इक सिरा 'लीड' का है
दोनों के कानों में
दोनों खोए कब से
किन-किन
सुर-लय-तानों में
निर्विकार हो
जगह ढूँढ़ते रहे
वृद्ध चश्मे
रहे बेखबर
आस-पास की
प्रतिक्रियाओं से
मुक्त हंसी है विरत
शील की ज्यों भाषाओं से
खुले कि ज्यों
लापरवाही से
जूतों के तस्मे
दांत बड़े हैं तो क्या
उसकी हंसी सुहासिन है
हँसना ही उसकी भाषा है
यों मितभाषिन है
अपना आज
भला क्यों खो दें
वे कल के छल में
8
।। मोबाइल ऐपों का युग है।।
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एप्लीकेशन
गया भाड़ में
मोबाइल ऐपों का युग है।
मोबाइल स्क्रॉल कर रहे
बचपन की हर बात सयानी।
बैंकों के हर लेन देन की
एप रख रहे हैं निगरानी।।
फीचर विविध
देह पर लादे
एंड्रॉइड फोनों का युग है।।
आप भूल जाएँ
तो भूलें
गूगल सभी याद रखता है।
ज्ञानवृक्ष की सब शाखों पर
एक समान हाथ रखता है।।
चिट्ठी-पतरी
चलन पुराने
यह प्रिय! ईमेलों का युग है।।
मैसेंजर मैसेज भेजता
जिनकी कुछ भी चाह नहीं है।
कौन कॉल मिसकॉल भेजता
इसकीं भी परवाह नहीं है।।
कोई लाइक
ज़रा भेज दे,
तो यह आभारों का युग है।
9
।। अरे पार्टनर!।।
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अरे पार्टनर!
जिसकी-तिसकी
करता क्यों तू
बटरिंग अक्सर।
अरे पार्टनर!!
अपनी सारी ऊर्जा क्यों तू
करता अब व्यय उनकी खातिर।
बाहर से वे नित मुसकाकर
तेरी सब बातें पूछेंगे।
या गालों तक अश्रु बहाकर
लोक दिखव्वे को रो देंगे।।
अपने मन के भेद न देंगे,
हैं चालाक, चतुर, अति शातिर।।
छप्पर-फाड़ वचन तो देंगे,
कभी भाग बिल्ली के टूटा
क्या तूने देखा है छींका,
टूटेगा क्या उनका छप्पर?
अरे पार्टनर!!
सबकी सुन पर भीतर कुछ गुन
कहे-सुने से रहकर निःस्पृह।
बस बातों के ही हल्ले हैं
कहने में क्या घिसीं जुबानें।
मधुर वचन ये रसगुल्ले हैं
जो खाएँ बस वे ही जानें।।
सभी घोषणापत्रों की तू
बक्से में रख लगा बड़ी तह।।
प्रतिक्रिया क्यों करता अपनी,
कह लेने दे, जो कहता वह,
उसकी बातों के नश्तर सह।
क्यूँ थकता हाँजी-हाँजी कर,
अरे पार्टनर!!
तेरे हाथ फैसला लिखना,
उसके हाथ दिया क्यों कागज?
दे मत उसके हाथ छापकर
अपने अभिमत का अंगूठा।
लिख अपना सौ-टंच फैसला,
तेरा यह अधिकार अनूठा।।
क्यों बनता वादी-प्रतिवादी
कम-से-कम तू ही इस क्षण जज।
क्या महसूस करेगा दुख वह
जिसने तुझको कभी न पूछा।
तुझको हर क्षण रखता छूँछा।
जिसकी मूँछ मलाई से तर।
अरे पार्टनर!!
10
।।घर बनाकर रहे।।
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पेड़ की फुनगियों तक चढ़े।
पेड़ में घर बनाकर रहे।।
रह गया साथ में तन भले।
दृश्य ये पर न मन में भरे।।
गूढ़ थी बंधुवर चिंतना।
चिंतना में भरे द्वंद्व सब।
द्वंद्व ही अब लिए आ गया,
फिर रहा शोक-संतृप्त मन।।
हर तरफ उत्सवी भाव हैं।
मन व्यथा बंधु! किससे कहे।।
वक़्त की नापकर नब्ज़ अब,
गीत ने मौन धारण किया।
सीढ़ियाँ आज हैं कल नहीं,
सीढ़ियों का भरोसा छुटा।।
त्याग दें बंधु! संबंध सब,
अब किसे फिर लगाना गले।।
हम तलक धूप आती रही
भाग्य में कम रही रौशनी।
ढूँढ़ती दृष्टि अट्टालिका,
हाथ आई मगर झोंपड़ी।।
कीजिए कुछ नया, बैठते,
हाथ पर हाथ भी क्यों धरे।।
पंकज परिमल
पंकज परिमल
___________
*पंकज परिमल* *(पंकज अग्रवाल)*
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जन्म तिथि 25 मई, 1964, मुजफ्फरनगर
पिता का नाम श्री प्रतिपाल स्वरूप अग्रवाल
सम्प्रति उत्तर प्रदेश सरकार में आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी के रूप में सन् 1992 से कार्यरत
*पता*प्रभारी चिकित्साधिकारी, राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय, पटेल नगर, मुजफ्फरनगर, 251001
*स्थायी पता* ए-129,एम. आई. जी.-1 / ग्राउंड फ्लोर, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन--2, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद,--201005
मोबाइल : 9810838832
ईमेल :
parimal.pankaj64@gmail.com
*कविता /रचना संग्रह*
*गीत-नवगीत संग्रह*: 1 उत्तम पुरुष का गीत, 2 गन्धमादन का प्रवासी मन 3 करो कुछ जेब भी हल्की, 4 दुख ने घर बदला है 5 नदी की स्लेट पर
ललित निबन्ध संग्रह 6 रस की मुक्ति, 7 उद्विग्न मन की लोकयात्रा
भूमिकाएँ, समीक्षाएँ, व्यक्ति केंद्रित संस्मरणात्मक आलेख 8 नवता का शब्दोत्सव,
प्रेम कविताएँ
9 केवल तुमको
घनाक्षरियाँ
10 कुछ सायास, कुछ अनायास,
*मुक्तक-संग्रह* 11घास की उँगलियाँ
*उपलब्धियाँ*
1कोई उल्लेखनीय सम्मान या पुरस्कार नहीं, 2 विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में ललित निबंध, समीक्षात्मक आलेख, संस्मरण, नई कविताएँ, नवगीत, ग़ज़लें, गीतिकाएँ, क्षणिकाएँ, छन्द व रेखांकन प्रकाशित, 3 आकाशवाणी, नजीबाबाद से काव्य पाठ 4 श्री योगेन्द्रदत्त शर्मा द्वारा संपादित वृहत् नवगीत-संग्रह--'गीत सिंदूरी, गंध कपूरी' में नवगीत शामिल 5 अर्धवार्षिक पत्रिका ' *बाबूजी का भारतमित्र'* के देवेंद्र शर्मा 'इंद्र' विशेषांक का अतिथि-संपादन 6 अनियतकालीन पत्रिका *'मराल'* व *'निहितार्थ'* पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन
*कार्य जारी*
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