मंगलवार, 22 जून 2021

वरेण्य कवि वीरेन्द्र आस्तिक जी के नवगीत प्रस्तुति वागर्थ : संपादक मण्डल

~ ।।वागर्थ ।।~

         प्रस्तुत करता है नवगीत विधा के सशक्त हस्ताक्षर साहित्य भूषण वीरेन्द्र आस्तिक जी के नवगीत 
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    स्वभाव से जिज्ञासु व मिलनसार वीरेन्द्र आस्तिक जी का जन्म कानपुर (उ.प्र.) के गाँव रूरवाहार में १५ जुलाई १९४७ को हुआ । 
   आपके नवगीतों में सामंतशाही व्यवस्था का प्रतिरोध , समय बोध , सामयिक सन्दर्भ व वंचितवर्ग की पीड़ाओं की संलग्नता है । सहज कहन लिए नवगीतों का कथ्य  पूरी तटस्थता व चेतना के साथ  पाठक को प्रभावित करता है । आपके नवगीतों में वर्तमान परिवेश के हर पहलू की सार्थक व समर्थ अभिव्यक्ति हुई है  चाहे राजनीतिक विद्रूपता हो,  व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत हो या  आम जनमानस की आर्थिक व  सामाजिक विषमताएँ व पीड़ाएँ , प्रत्येक विषय पर आपकी क़लम समान रूप से चली है ।
    आप मानते हैं कि  " नवगीत मूलत: ऋग्वेद से विरासत में मिले गीत की आधारशिला पर ही खड़ा हुआ है और इसीलिये आज गीत अपनी यात्रा में कई पड़ावों को पार कर नवगीत के रूप में समकालीन लोक-जीवन की संवेदना, संस्कृति एवं सरोकारों को मुखरित कर रहा है । "
      उपरोक्त  कथन के निकष पर देखें तो उनके नवगीतों में लोक जीवन की संवेदना व जन सरोकारों की संलग्नता प्रबलता के साथ उपस्थित है , जिसमें आम आदमी की दुरूह स्थितियों पर बेबाक बात हुई है इतना ही नहीं वर्तमान समय में पूँजीवाद के विकराल विस्तार पर वह वाज़िब चिंता व्यक्त करते हैं ..

धरे कनस्तर , थलियाँ डिब्बे 
भाग रही हैं ठिलियाँ 
ये सरकार निकम्मी -
चीखें 
सिर पर लदीं पुटरियाँ ...

ठिलियाँ पुटरियाँ जैसे लोक में रचे -पचे शब्द पलक झपकते कथ्य के दृश्य से पाठक को सीधा जोड़ते हैं ।

सामयिक परिस्थितियों के सच को उजागर करते उनके नवगीत इस हताश समय में आशा का संचार भी करते हैं ../ 
' फिलहाल गाएँ ' व ' रोज तमाशा ' नवगीत इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं ..

 एक छलिया मोहिनी के 
भेष में कब तक छले गा
जीत सच की है बहुत नजदीक
फिर उत्सव मने गा 

गुम हुए इस आदमी को 
कुछ हँसाए 
गुदगुदाएँ । ......(फिलहाल गाएँ )

// लघु जन हों या हों 
भारी भरकम पद वाले
संघर्ष सभी का
जीवन को ही मथ डाले 

घोर तिमिर में भी कोई 
सूरज की भाषा जीता है ......( रोज तमाशा )

पीढ़ी दर पीढ़ी पूँजीवाद का विस्तार व उसका स्तुतिगान कविमन को उद्वेलित करता है और वह समय के जरिए इस व्यवस्था में बदलाव का आह्वान कहिए या अनुरोध करते हैं

दासता करते कुबेरों की थका 
मैं समय हूँ 
अब बदल डालो मुझे ...( मैं समय हूँ )

जहाँ एक तरफ वह नक्सल - बाड़ी जैसे विषय पर बेबाकी से लिखते हुए प्रश्न करते हैं कि ..

जोतना हमें था हल , लेकिन
बन्दूक थमा दी क्यों 
थी भूख रोटियों की हमको
गोलियाँ खिला दी क्यों ....(नक्सल बाड़ी )

 वहीं दूसरी तरफ बड़ा ही विहंगम दृश्य उपस्थित करते हैं ...

पारदर्शी मेघ उस पर 
रजत रंगों की जरी..... (याद है संवाद )

     आप सिर्फ़ नवगीत सृजन भर तक ही नहीं सीमित हैं , आपके कुशल सम्पादन में धार पर हम (१९९८) , धार पर हम -दो (२०१०) व नवगीत समीक्षा के नये आयाम (२०१९) पुस्तकों पर किया गया काम नवगीत के इतिहास व विकास में अंकित है इसके अतिरिक्त  समीक्षाएँ , आलेख व  भूमिका आदि पर आप निरन्तर क्रियाशील रहते हैं । 
         स्वभाव से बेहद सहज , सरल व विनम्र व्यक्तित्व को वागर्थ अपनी समस्त आत्मीय शुभकामनाओं सहित उत्तम स्वास्थ्य की कामना प्रेषित करता है ।

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(१)

साहित्यिकता
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पाँड़े लन्दन गए
गाँव की
साहित्यिकता चली गई

जाति-धर्म में, बँटे गाँव में
बँटने को तैयार न थे
मानवता का खोल ओढ़ कर
रहने को तैयार न थे

भिन्न समाजों के भीतर की
पुण्य एकता चली गई

पाँड़े-पुत्र और वह सविता
प्रेम-पाश में एक हुये
एवमस्तु के मण्डप नीचे
पाँडे़ ने आशीष दिए

मंत्रों की जगह पढ़ी वह
धूमिल की कविता चली गई

(२)

बस्ती में भगदड़
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बुलडोजर आया है
बस्ती में भगदड़ है

धरे कनस्तर,थलियाँ,डिब्बे
भाग रहीं हैं ठिलियाँ
ये सरकार निकम्मी-
चीखें
सिर पर लदी पुटरियाँ

गालों पर आँसू है
लोहे का थप्पड़ है

गटक डायनासोर गया है
जीवन भर की पूँजी
मलबे में ही दबा रह गया
मुन्नी का  गुड्डा भी

बिलख रही है जैसे
अलग हो गया धड़ है

बुझे चरागों की बस्ती
है गोदी में अन्धा कल
उधर निगम के नक्शे में
है पाँच सितारा होटल

इसी धरा पर बरगद की
पुस्तैनी जड़ है

(३)
         
टप-टप आँसू गिरते
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लीलाएं नीची
ऊँचे-ऊँचे सिंहासन की
जेलों में सम्मानित होती
कथा अपावन की

हत्या के अभियोगी
भेस गेरुवे हँसते
संस्कृति की आँखों से
टप-टप आँसू गिरते

क्रास,तोड़ते मिलते हैं
हदें कुँवारेपन की

संसद के जंगल में
आखेट दागियों के
वजनी ताज
सिकुड़ते माथ
महाबलियों के

वोटर-पैकेज,मोदक-से
है दवा विमोचन की

बाँट लिया है मुकुटों ने
'सर्व धर्म समभाव'
पाँवों को पता नहीं है
रिसते कितने घाव

अजब तुड़ाई है अब
अखण्डता' के आँगन की

     
(४)

नक्सल-बाड़ी
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बस माँग हमारी थी
अपना हो
जर-ज़मीन का छोटा टुकड़ा

उस ज़मीन के टुकड़े पर कुछ
सपनों को जगा सकें
आलू, गोभी कुछ मटर-चना
हम भी तो उगा सकें

थी माँग हमारी, देख सकें
हम अपने ही
श्रम का मुखड़ा

हाथों में अपने बच्चों के
भी हो हँसिया-खुरपी
उन  कोमल-कोमल गालों पर
हो खुशियों की पप्पी

दरकार कलश की कभी न थी
बस चाहा जल से भरा घड़ा

जोतना हमें था हल,लेकिन
बन्दूक थमा दी क्यों
थी भूख रोटियों की हमको
गोलियां खिला दी क्यों

जो नक्सल-बाड़ी सपना था
वह सपना भी
क्यों कर उजड़ा

(५)

याद है संवाद
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याद है संवाद वो
और भीड़ों में बिताया दिन

पारदर्शी मेघ उस पर
रजत रंगों की जरी
ओढ़ पूनम खिलखिलाई
आँख से खुशबू भरी

याद है बरसात वो
और नीड़ों में बिताया दिन

दूर घूमे चैन पाने
ठौर सूने थे चुने
खण्हरों में कोकिलों ने
गीत अपने ही सुने

याद है एकान्त वो
और मीड़ों में बिताया दिन

प्राण पर मंज़िल टिकाए
पाँव हाथों में लिये
फूल,तितली के समर्पित
भाव ने रस-कण पिये

याद है सौगात वो
और चीड़ों में बिताया दिन

(६)

 माँ
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जीवन भर
माँ
तुझको गाया

तेरी कृपा फली तो जाना
आखर की महिमा
रुप तिहारे उसमें अनगिन
देख रहा हूँ माँ

मुझको तनहा
कभी न छोड़ा
साथ तिहारी थी छाया

विपद समय में
तू ही बनती
है मेरी ताकत
झूठों के आगे
कड़ुवा सच
कहने की हिम्मत

मेरी आँखें, ज्योति तिहारी
थी तो मैं भटक न पाया

तेरी सृष्टि कि जिसमें तू ही
रचना की रचना
मेरी गीत-सृष्टि में
घटती
तेरी ही घटना

हे माँ
तू ही शब्द एक वो
जग जिसकी सुन्दर काया

(७)

फिलहाल गाएँ
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वक्त कितना है जटिल
कैसे बताएँ
दिख रहे बदलाव को
फिलहाल गाएँ

शब्द को कीचड़ बना
यूँ वाक् युद्धों ने उछाला
खुद हुए बदशक्ल,
लोगों को
भरम से पड़ा पाला

पूर्वजों का आइना
उनको अभी भी
क्या दिखाएँ

बात सुख की कम करें
दुख की सुनें-
अपना बना लें
चुन लिया इस भीड़ ने
जो प्यार
उसको आजमा लें

जीत की दुल्हन का
घूँघट
जरा आहिस्ता उठाएँ

एक छलिया मोहनी के
भेष में कब तक छले गा
जीत सच की है बहुत नजदीक
फिर उत्सव मने गा

गुम हुए इस आदमी को
कुछ हँसाएँ
गुदगुदाएँ
      
(८)

 रोज तमाशा
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मानुष हार नहीं माने
वह जय की आशा जीता है

लघु जन हों या हों 
भारी भरकम पद वाले
संघर्ष सभी का
जीवन को ही मथ डाले

घोर तिमिर में भी कोई
सूरज की भाषा जीता है

किसी दीन को देखो,जैसे
कोई दिगम्बर
जिए खुलापन
हर मौसम का
गुस्सा पीकर

प्रकृति-पुरुष है या औघड़
क्षण-क्षण दुर्वासा जीता है

आओ,गौर करें हम 
उन जिम्मेदारों पर
रोज उगलते
संवेदनहीन विचारों पर 

एक सदन दो आँसू रोकर
रोज तमाशा जीता है
  
(९)

शुष्क पत्तों की तरह
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शुष्क पत्तों की तरह
हर शब्द भागा जा रहा
और मुझमें एक अंतर्द्वंद्व
चलता जा रहा

शब्द ढोते अर्थ मुर्दा
हो गए अनुकूल
यंत्रवत् सब हो गए हैं
भावना को भूल

सच अकेला वक्त के
विपरीत चलता जा रहा

इक टके का स्वप्न देकर
छीन ली है जान
छीन कर संघर्ष,
जन' की छीन ली पहचान

कौन-सी यह क्रांति
हरियल पात झरता जा रहा

उत्सवों में हो विमोचित
रो रहा इतिहास
और कबिरा देख,सुन कर
कह रहा-बकवास

रोष में अपनी लुकाठी को
पटकता जा रहा
         
(१०)

 मैं समय हूँ
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दासता करते कुबेरों की थका
मैं समय हूँ
अब बदल डालो मुझे

वक्ष पर मैं काल पुरुषों की 
कथा टंकित किए
शीश कितने ही युगों ने
सृष्टि के खण्डित किए

मेरे आसन पर जमा क्यों झूठ है
इस प्रथा से
ऐ सच उबारो मुझे

आज भी सामंतियों की
मैं गुलामी कर रहा
छीन 'जन' की रोटियां
उनकी तिजोरी भर रहा

साथ सबलों का दिया
तो क्या किया
अश्व-वल्गा की तरह थामो मुझे

हाथ तेरे हों हथौड़े
शक्ति हो भरपूर फिर
मन-वचन से संगठित
हो देश का मजदूर फिर

वक्त यह जंजीर-सा है,
तोड़ दो
माल गोदामों से निकालो मुझे

अब कहाँ वह आदमी
जिसका उबलता जोश था
देखकर अन्याय, उत्पीड़न
असह  आक्रोश था

वक्त का पर्याय गाँधी है अगर
क्यों न गाँधी ही बना डालो मुझे
            
(११)

गीत-वृक्ष ये
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खून, पसीने से सींचा था
गीत-वृक्ष ये बड़े हुए

जड़ें जमा ली थी, 
आँधी में-
छन्दों ने इतिहास रचा
क्रूर समय के
प्रति विरोध में
जन-जन का संत्रास रचा

जटिल प्रश्न के
सहज-सहज-से
उत्तर लेकर खड़े हुए
गीत-वृक्ष ये बड़े हुए

इन्हें हाशिया करने वाले
खुद जनता से दूर रहे
शब्दों में ये नून-तेल-वे
काजू और खजूर रहे

बहस कक्ष में
अड़ी हुई--थे
गान सड़क पर बढ़े हुए

- वीरेन्द्र आस्तिक 

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परिचय

नाम    -  वीरेन्द्र आस्तिक
जन्म   - 15 जुलाई 1947
शिक्षा   - एम.ए.(हिन्दी)

पूर्व सेवाएं   1964से 1974:भारतीय
                  वायु सेना(टेकनिकल)
                   1975से2007:दूर संचार
                            विभाग (टेकनिकल)

प्रकाशन   वीरेन्द्र आस्तिक के गीत(1981)
               परछाईं के पाँव    (1982)
               आनन्द! तेरी हार है(1987)
               आकाश तो जीने नहीं देता(2002)
               तारीखों के हस्ताक्षर  (1992)
               दिन क्या बुरे थे।       (2012)
               गीत अपने ही सुनें      (2017)

प्रमुख संपादन : धार पर हम      (1998)
                    : धार पर हम -दो (2010)

आलोचना    : नवगीत: समीक्षा के नये 
                      आयाम  (2019)

अब तक 50से अधिक समीक्षाएं,लगभग
दो दर्जन आलेख,एक दर्जन से अधिक भूमिकाएं।
दो दर्जन से अधिक समवेत संकलनों में
नवगीत(प्रतिनिधि कवि के रूप में)

एवं
1980से काव्यपाठ का प्रसारण(आकाश वाणी

एवं दूरदर्शन,लखनऊ) तथा बहुत से गीत-नवगीत आल इंडिया रेडियो और दूर दर्शन द्वारा क्रय किए गए।

1999से 6 वर्ष के लिए 'धार पर हम(1998)
का पाठ्यक्रम में निर्धारण(एम. ए.(हिन्दी)

पार्ट द्वितीय:बड़ौदा वि.वि. :गुजरात)
2017से गीत:हम ज़मीन पर रहते हैं; बी.ए.,
बी.काम के पाठ्यक्रम से निर्धारित(संत जोसेफ
इंस्टीट्यूशंस(बंगलौर),कृति का नाम'पद्य सुरभि

(संपा. डा. टी रवीन्द्रन)

2008-9 से अनेक लघु शोध,शोध प्रबन्धों एवं
आधार ग्रन्थों में उल्लेख

सम्मान   : उ.प्र. हिन्दी संस्थान, लखनऊ, द्वारा
             : साहित्य भूषण

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