शुक्रवार, 25 जून 2021

नवगीत चर्चा में रमेश गौतम प्रस्तुति : वागर्थ

अपने समय की शिनाख्त करते नवगीतकार रमेश गौतम 
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 इस समय को क्या हुआ
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टिप्पणी
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मनोज जैन

                              यूँ ,तो मैंने प्रख्यात साहित्यकार आदरणीय रमेश गौतम जी को अनेक संकलनों में पढ़ा है।पर यहाँ मे उन सब पर चर्चा ना करते हुये,उन्हें श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन के प्रमुख कवियों में से एक कवि के रूप में प्रस्तुत करना चाहूँगा कथन के विस्तार के लिये यदि मुझे अपनी ओर से एक और वाक्य जोड़ना हो तो मैं यह बात  दावे से कहना चाहूँगा कि सुकवि  रमेश गौतम जी हिंदी नवगीत की प्रथम पँक्ति के अग्रणी कवि हैं,और रहेंगे।
             गौतम जी मूल रूप से शुद्ध व्यंजना के कवि हैं अपनी बात संकेतों में कहते हैं। सांकेतिकता भी नवगीत का एक गुण हैं ।उनके संकेत गहन और तीर की तरह पैने होते हैं।आज के अधिसंख्य कवि अखबारी भाषा में कुछ भी ऊल -जलूल लिख कर,नया कीर्तिमान स्थापित करने की होड़ में प्राण प्रण से जुटे हुये हैं।
        इसमें भी कोई हर्ज नहीं आप अखबारी भाषा में ही रचें पर समय निकाल कर  गौतम जी जैसे मानक कवि को भी पढ़ें, इनका एक एक गीत पूरे का पूरा महाकाव्य है।इस समय मेरे हाथ में "इस हवा को क्या हुआ" नवगीत संग्रह है ।207 पृष्ठीय इस शानदार नवगीत संग्रह में, कवि ने 80 गीतों (इन्हें गीत ना कहकर नवगीत ही कहना श्रेयस्कर है)को जरूरी स्थान दिया है।संग्रह के सारे गीत सामाजिक राजनीतिक और व्यवस्थागत विद्रूपताओं के इर्द गिर्द घूमते हैं।
       दादा माहेश्वर तिवारी जी Maheshwar Tiwariजी की शानदार और जरूरी भूमिका गीतों के अर्थ खोलने में उपयोगी भूमिका का निर्वहन करती है।पूरे संग्रह को आपको कम से दो से तीन बार मनोयोग से पढ़ना ही होगा तब जाकर आप कवि के भाव-लोक की सैर कवि के साथ कर सकेंगे।
                  यही कारण है कि गौतम जी जैसे हिंदी के प्रमुख कवियों की उपस्थिति के कारण ही श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन अपने समय की श्रेष्ठ कृतियों में शुमार की गई।जिसका उद्धरण और सन्दर्भ आज भी दिया जाता है।आदरणीय गौतम जी ने अपने आत्मकथ्य में एक बात बड़े विनम्र भाव से कही  है कि "मैं स्वयं को बड़ा गीत कवि या नवगीतकार नहीं मानता और न हूँ,बस समाज के सुख-दुख के बीच अपनी रचनात्मक भूमिका का निर्वहन भर करता हूँ।जीवन के वास्तविक धरातल को छिटककर आकाशगामी होना कभी नहीं भाया।आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में जहां तक और छल प्रपंच बिखरा पड़ा है। जीवन का अर्थ तलाशना सबसे दुष्कर कार्य किंतु रचनाकार इस तलाश में मुंह नहीं मोड़ सकता मैं मानता हूं जीवन जगत के तमाम अंतर्विरोधों, विसंगतियों के बीच भी रचनाकार की सार्थक प्रतिक्रिया किसी परिवर्तन की आशा जगाती है ।शब्द की सामर्थ्य और तेजस्विता कभी कम नहीं होती नवगीत में यह सामर्थ्य और तेजस्विता विद्यमान है। मेरे गीतों में मेरी अनुभूतियों का अस्तित्व है।अतः और अधिक कुछ ना कहकर समर्थन अब गीतकार और गीत समीक्षक दिनेश सिंह की समीक्षा दृष्टि का उल्लेख करना चाहूंगा कि हर रचना एक प्रयास है अपनी विधा का आखिरी सत्य नहीं"
                    कवि के इस कथन के आलोक में कवि की ईमानदार रचना धर्मिता को देखा जा सकता है।
                 यहाँ गौतम जी के दो चयनित गीत पाठकों के लिये प्रस्तुत हैं।उनके पहले गीत में सूखे पेड़ के प्रतीक और मेघ के बिम्ब में व्यवस्था के असमान वितरण से समाज  में व्याप्त असमानता  के साथ,शोषक,शोषण और शोषित वर्ग के दृश्य सहज ही हमारी आँखों के समक्ष उपस्थित हो जाते हैं।
          दूसरे गीत में कवि देवत्व की अपेक्षा मनुजत्व को महत्व देता है।
बेहतरीन नवगीतों के लिए कृतिकार को बहुत बधाइयाँ!!

प्रस्तुत हैं Ramesh Gautam जी के दो बहुत प्यारे नवगीत 
प्रस्तुति
मनोज जैन
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एक
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गुलमोहर के रंग वाले दिन 
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गुलमोहर 
के रंग वाले दिन 
कहाँ से ढूँढ लाएँ 

डूबता आकाश बाँधे
पत्थरों को पाँव में 
आ गए जब से शिकारी 
बुलबुलों के गाँव में

नीड़ के पंछी 
उड़ानों के लिए 
किस ओर जाएँ

बावली-सी खोजती-फिरतीं 
दिशाएँ शाम को 
लोग कितना भूल बैठे हैं
सुबह के नाम को 

मन्दिरों के द्वार पर 
ठिठकी
खड़ीं हैं अर्चनाएँ 

एक सूखा पेड़ 
अब तक 
हाथ जोड़े ही खड़ा 

मेघ फिर भी 
सिन्धु के घर की 
दिशा मेंचल पड़ा 

देखती ही रह गईं 
बस धूप में 
झुलसी हवाएँ
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दो
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यहाँ मत देवता होना
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व्यर्थ है रोना 
यहाँ मत 
देवता होना 

कुछ नहीं 
पाषाणधर्मी रूप पाओगे 
युद्ध में फिर दानवों से 
हार जाओगे 
देवता होना 
स्वयं 
अस्तित्व का खोना 

देह के हर व्याकरण में 
दोष निकलेंगे 
कपट- क्षण के क्या कभी 
संदर्भ बदलेंगे 
पाप है ढ़ोना 
किसी का 
शिला बन सोना 

देवता जीवन मरण से 
कब हुए परिचित 
बस भुजाओं में किए 
अमृत कलश संचित 
कल्पतरु बोना 
सुरक्षित ढूँढना कोना

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