मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

राम कुमार कृषक जी के नवगीत प्रस्तुति : वागर्थ समूह



वागर्थ में आज 
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भाग (एक)
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लब्ध प्रतिष्ठ कवि रामकुमार कृषक जी के नवगीत
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                               समूह वागर्थ रामकुमार कृषक जी का आभार व्यक्त करता है,उन्होंने हमारे एक छोटे से निवेदन पर वागर्थ के सुधी पाठकों को नवगीत विषयक बेहतरीन सामग्री सहर्ष उपलब्ध करा दी है।हम प्राप्त और उनकी फेसबुक वॉल से साभार ली गई पूरी सामग्री का उपयोग दो भागों में उपयोग कर रहे हैं।
 जल्द ही दूसरे भाग की लिंक यहाँ दी जा रही है।

चित्र सहयोग
अनिल जनविजय जी
Anil Janvijay 
प्रस्तुति
मनोज जैन 
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1. 
फिर समूचा 
एक दिन बीता , 
रह गया आधा अधूरा 
आदमी रीता ! 

रोटियां - रुजगार 
भागमभाग
झिड़कियां झौं - झौं 
कई खटराग , 
हर समय हर पल 
लहू पीता ! 

बंद कमरों में 
खुला आकाश 
वाह , क्या जीदारियत 
शाबाश , 
बहस का मैदान 
तो जीता ! 

कारखाने - खेत औ ' 
फुटपाथ 
हाथ सबके साथ 
कितने हाथ , 
कह रही कुछ 
और भी गीता ! 

2.
एक रजैया बीवी - बच्चे 
एक रजैया मैं , 
खटते हुए ज़िंदगी बोली 
हो गया हुलिया टैं ! 

जब से आया शहर 
गांव को बड़े - बड़े अफसोस 
मां - बहनें परिवार घेर - घर 
लगते सौ - सौ कोस , 

सड़कों पर चढ़ पगडंडी की 
बोल न पाया जै ! 

बनकर बाबू बुझे 
न जाने कहां गई वो आग 
कूद - कबड्डी गिल्ली - बल्ला 
कजली - होली - फाग , 

आल्हा - ऊदल भूले 
भूली रामायन बरवै ! 

पढ़ना - लिखना निखद 
निखद या पढ़े - लिखों का सोच 
गांव शहर आकर हो जाता 
क्योंकर इतना पोच , 

राई के परबत - से लगते 
छोटे - छोटे भै ! 

3.
एक रात इतनी रातों में 
दीपावली हुई , 
कोई चाल स्यात 
अंधियारे की यह चली हुई ! 

किसने पूरी - गंध परोसी 
रोटी खिजलाई 
डिब्बाबंद कुनैन 
मिठाई लेकर घर आई , 

और संग बेमतलब बासी 
बातें तली हुई ! 

किनके फटे कलेजे रातों 
आंखें निकल उड़ीं 
गोदरेज - गोदामों किनकी 
खुशियां बंद पड़ीं , 

जिनकी लछमी उनकी मैया 
कैसे भली हुई ! 

कैसे बिजली - बलब जले 
सुलगी संझा - बाती 
ये कैसी बारूद 
पटाखे बनकर भरमाती , 

किनके उजियालों की खातिर 
बस्ती जली हुई ! 

4. 
शब्द - शब्द है सोच 
सोचने पर प्रतिबंध नहीं , 
तुम्हें छोड़ सोचें 
कोई ऐसा अनुबंध नहीं ! 

अनुबंधित जो रहे तुम्हीं से 
पीढ़ी - दर पीढ़ी 
सदा तुम्हारे लिए उन्हीं की 
रीढ़ रही सीढ़ी , 

पांव - पीठ का निभ पाएगा 
अब संबंध नहीं ! 

दूर - दूर तक अक्षर - अक्षर 
इनका बल - बूता 
फिर भी इन ज्वालामुखियों का 
अंतस अनकूता, 

खींच फेफड़े सकें 
आज की कविता गंध नहीं ! 

5.
भूख - भय - उपभोग 
वृत्तियां रग - रोग ! 

लोग आदम
लोग आदमखोर 
एक नद्दी 
अनबंधे दो छोर , 
पी गया सदियां हज़ारों 
काल 
सिंधु ही हर हाल 
मालामाल 
लब्धियां किस जोग , 

भूख - भय - उपभोग 
वृत्तियां रग - रोग ! 

6. 
एक चिथड़ा सुख *
हमारे पास भी होता , 
भला फिर क्या नहीं होता ! 

भोर होती
और हम उसको पहनते 
घूमते -  तनते 
बटन दो टांककर 
दफ्तर पहुंचते 
यार लोगों पर जमाते रौब 
अपना जौब मामूली सही ,  
होता ! 

सांझ होती
और हम उसको उठाते 
झाड़ते खुद को 
किसी से लिफ्ट पा 
घर - घाट लगते 
केक के संग भूख जाते चाट
अगला ठाठ कम होता भले 
होता ! 

रात होती 
और हम उसको बिछाते 
ओढ़ते - उड़ते 
मगर फिर चौंककर 
जगते - सहमते 
चोर तो कोई नहीं है पास 
यह अहसास त्रासद ही सही 
होता ! 

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* निर्मल वर्मा का एक उपन्यास ।

7.
धरती की छाती पर 
अंधकार कल भी था 
आज भी घना , 
भीत भोर 
उजियारा मौन अनमना ! 

क्षितिजों से 
जितने भी सूर्य उगे 
क्षितिजों पर भस्म हो गए 
सिर्फ एक अंजुरी - भर 
रस्म बो गए ,

सेतुबंध तैरा जो 
टूट कब बना ! 

उज्ज्वलतम 
जितने भी पृष्ठ खुले 
स्याही इतिहास बन गई 
एकाधिक मिथ्या 
सायास जन गई , 

नंग - मूढ़ आदम ने 
ज्ञान क्या चुना ! 

8. 
राजपथ पर नाचते - गाते हैं लोग 
और वह भी पुलिस - पहरे में ! 

इंडियाई गेट - कर्जन रोड 
कैनेट प्लेस
रास्ते पर सोचिए तो 
इन परेडों के 
कहीं जनपथ नहीं है , 
रक्तरंजित इस व्यवस्था में पसीना 
पर व्यवस्थापक कोई 
लथपथ नहीं है ; 

कुर्सियां खुश हैं बहुत 
उलझा है देश 
देशभक्ति के ककहरे में ! 

दूरमारक टैंक - बेधी तोप 
औ' राडार 
बैरकों से बस्तियों तक 
गश्त पर निकले 
रिहर्सल कर रहे हैं , 
झांकियां तो हर तरफ खुशहालियों की 
झांकिए तो लोग भूखों 
मर रहे हैं ; 

राज्य गण का 
खींचकर गण की ही खाल 
तंत्र खुद सजता सुनहरे में ! 

9. 
बरस रहा मौसम सम पर है , 
कैसे इसे जिएं हम पर है ! 

कुछ यादें जो हरी - भरी थीं 
अब भी मह-मह महक रही हैं 
सपनों की चिड़ियाएं बेशक 
दूर देश जा चहक रही हैं , 

सारा जग उनका हमदम है । 

माना दुख ही बरस रहे हैं 
आंगन से लेकर बस्ती तक 
फिर भी हम-तुम चले बराबर
अपनी क्यों दिन की पस्ती तक 

आगत भी अपने दम पर है । 

10. 
दुख से नाता जोड़ रे साधो 
दुख से नाता जोड़ ! 

यों भी अपना सुख बेमाने 
उनके सुख के ही कुछ माने 
दुखिया लाख-करोड़ रे साधो 
दुखिया लाख - करोड़ ! 

सबके हाथ हाथ हों सबके 
कहते हुए बुढ़ाए कब के 
निज से निज की होड़ रे
साधो
निज की निज से होड़ ! 

सुख की आशा घोर निराशा 
जीते जी हो गए तमाशा 
जुड़ा गए सब जोड़ रे साधो 
जुड़ा गए सब जोड़ ! 

संभव है अच्छे दिन आएं 
बुरे दिनों के दिन लद जाएं 
यों ही मत रण छोड़ रे साधो 
यों ही मत रण छोड़ ! 

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परिचय
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रामकुमार कृषक जन्म : 1 अक्तूबर 1943, अमरोहा (मुरादाबाद) जनपद के गाँ मुलड़िया में। 1961 से दिल्ली में पत्रकारिता  और अध्यापन। 1969 में पहला कविता-संग्रह ’बापू’। फिर 1972 में ज्योति। सुर्खियों के स्याह चेहरे (1977), नीम की पत्तियाँ (1981), फिर वही आकाश (1991), आदमी के नाम पर मज़हब नहीं (1992), मैं हूँ हिन्दुस्तान (1998), लौट आएँगी आँखें (2002), अपजस अपने नाम (2002)। इनके अतिरिक्त एक कहानी-संग्रह ’नमक की डलियाँ (1998)।
प्रकाशवीर शास्त्री स्मृति पुरस्कार (1983), बाल साहित्य पुरस्कार (1991), सारस्वत सम्मन (1997), साहित्यिक कृति सम्मान (2003), कबीर सम्मान (2014)
सम्पर्क
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सम्पादक- अलाव
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