बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

महेश अनघ जी के नवगीत और टीप


माटी अपने तिरस्कार का बदला तो लेगी:
महेश अनघ जी के  दो गीतों के बहाने गीति परिदृश्य पर एक चर्चा

   लेख: मनोज जैन 
106,विट्ठल नगर गुफा मंदिर रोड़ लालघाटी भोपाल 462030सादर
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सुनहरी यादों की उलझी हुई कड़ियों को जब एक-एक कर सुलझाने बैठा तो मुझे सबसे पहले साप्ताहिक पत्र प्रेस मैंन याद आया।परवर्ती पीढ़ी की तरह मैंने धर्मयुग के स्वर्णकाल को नहीं देखा,पर प्रेसमेन के उत्थान,पतन और चरम का साक्षी रहने का अवसर मेरे हिस्से में जरूर आया है। ख्यात साहित्यकार मयंक श्रीवास्तव जी के दामाद और मेरे युवा मित्र तत्कालीन साहित्य समीर के संपादक श्री समीर श्रीवास्तव जी के सम्पादन में प्रेसमेन जैसे साहित्यिक पत्र-ने ,यदि लघु पत्र-पत्रिकाओं की सदस्य संख्या की वितरण या पहुँच की बात करें तो,लोकप्रियता के अपने ही बनाये सभी पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर ,ख्याति के नये कीर्तिमान स्थापित किये थे।साहित्यसाधकों विशेष तौर से छंदानुरागियो के मध्य यह पत्र धर्म युग की तरह ना सही पर उसी तर्ज पर समादृत, स्वीकृत और चर्चित जरूर हुआ।
सम्भवतः महेश अनघ जी के गीतों को प्रेस मैन के किसी अंक में पहली बार पढ़ा और तबसे उनकी कथन भंगिमा का सबसे बड़ा फैन हो गया।
नवगीत के सबसे बड़े आचार्य पं.देवेंद्र शर्मा इन्द्र स्वयं अनघ जी के गीतों के मुरीद थे अनघ जी की नवगीत कृति 'झनन झकास' पढ़ कर जो अभिमत उन्होंने दिया था वह गौर करने लायक है इंद्र जी कहते है कि-
"भाषा और संस्कृति की जैसी मौलिक और प्रामाणिक सुगंध अनघ जी के गीतों में है, वह हम सबके लिए विस्मयकारी ही नहीं ,ईर्ष्ऐर्य भी है ।भाषा की ऐसी बेसलीका सादगी और वक्रतापूर्ण अभिव्यंजना मुझे उनके अतिरिक्त महाकवि सूर में ही मिल सकी।ऐसे गीत तभी लिखे जा सकते हैं,जब उसका भाव वहन करने के लिए गीतकार के पास पानीदार तीर चढ़ी भाषा के शब्द और मुहावरे हों।तभी गीत, कविता की कविता बन पाता है। जीवन के लिए अपेक्षित ज्ञान को ,समाप्त करके एक गहरी और संश्लिष्ट अभिव्यक्ति देने पर ही ऐसे गीत सिरजे जाते हैं।"
निःसन्देह जब इन्द्र जी उनकी तुलना महाकवि सूर से करते हैं तो यह मानने में संकोच कैसा। 
अनघ जी के गीत  जमीन से जुडे रहकर बड़े फलक पर जाकर बात करते हैं।
साहित्यिक परिदृश्य में  हिंदी कविता में नवगीत के मंगल तिलक है। उनके गीतों में सांस्कृतिक परिवेश है, जनधर्मिता है,पृथ्वी और पर्यावरणीय को सुमंगलकारी बनाने की दृष्टि है, युगबोध की चिंताएं हैं ,सामाजिक सरोकार हैं,बाबजूद इसके अनघ जी ने अपने आप को किसी खास वाद से नहीं जोड़ा जो विषय उनके कवि के संज्ञान में आया उसे पूरी तरह जिया और फिर लिखा।
यही कारण है कि समवेत स्वरों में चाहे गीतकार हों या समालोचक उनके कृतित्व को मुक्त कंठ से सराहते हैं
इसी क्रम में यहाँ एक और महत्वपूर्ण नवगीत समालोचक आदरणीय वीरेंद्र आस्तिक जी के कथन को जोड़ना समीचीन होगा 
अनघ जी के गीतों को पढ़कर उनका यह कथन उनके प्रस्तुत नवगीतों को समझने में महती भूमिका का निर्वाह करेगा। 
"शब्दों में झंकार भी है और झनकार की आभा भी। झनक, टनक और भनक की विविधा से उदभूत रचना संग्रह  लवणीय,शहदीय बोली भाषा का ऐसा संग्रह मेरी दृष्टि में अभी तक नहीं आया था। आंचलिक वस्तु संपदा केंद्रित गीत सबसे ऊपर है। यहां तक युगबोध और उसकी दग्धता का प्रश्न है, इन रचनाओं से उस तरह के मानव स्तर की अपेक्षा करना भी सही नहीं होगा, पर हां यह में भविष्य का एक सांस्कृतिक वितान अवश्य है।आज संस्कृति की अवधारणा भी द्वंदात्मक हो गयी है।अतः  संस्कृति के माने तो अतीत का ठहराव तो नहीं हो सकता पर यह जरूरी है कि आंचलिकता के यं प्रभाव को कम करती है ।स्मृतियों में लौटने से मन हल्का होता है और वह ऊर्जा से भर उठता है।"
                लॉक डाउन के चलते हाल ही में फेसबुक पेजों पर कविता के सन्दर्भ में अलग अलग कुछ विमर्श सुनने का अवसर मिला।जिनमें एक दो विमर्श तो नवगीत पर ही केंद्रित थे मुझे जानकर आश्चर्य हुआ कि उन सन्दर्भो में अनघ जी जैसे प्रथम पांक्तेय नवगीतकार का कहीं कोई उल्लेख नहीं।
 सवाल उठता है कि क्या हमारा नैतिक दायित्व नहीं कि हम एक पूरा सत्र उनकी रचनाओं पर केंद्रित करें उन्हें सिर्फ नाम भर से ना जाने बल्कि उनके लिखे हुए को आत्मसात करें!
एक प्रश्न और उन सामंती नवगीतकारों से जो वर्षो से अपनी जगह वाएँ और दाएँ समान रूप से बनाएं हुए है कि आपने कितने विश्व विद्यालयीन छात्रों को महेश अनघ पर शोध करने के लिए प्रेरित किया? या आपने उनके साहित्य पर या संग्रहों पर कितनी चर्चा की ?
जुगाड़ से तो गधे भी अपने आप पर डॉक्टरेट दिलवाकर धन्य हो जाते हैं पर प्रश्नचिन्हों का घेरा उनका पीछा नहीं छोड़ता!
प्रस्तुत हैं मेरे प्रियगीतकार/ नवगीतकार के दो गीत जिन्हें मैंने उनके दो चर्चित संग्रहों से लिया है। गीतों में क्रमशः  पर्यावरण संकट से उपजे विनाशकारी प्रभाव और दूसरे गीत में गीत के चरित्र को अक्षरशः जी लेने को आतुर कवि मन के आस्वादों को गहरे तक  महसूस  किया जा सकता है ।
पहला गीत ' फिर मांडी रांगोली' से जो मुझे उनकी धर्मपत्नी डॉ प्रमिला श्रीवास्तव जी ने 28.6.18 को और दूसरा' कनबतियाँ 'से जो 6.4.2011को प्राप्त हुआ था।
मैंने अपने पाठकीय धर्म निर्वहन में जिन दो टिप्पणीकारों कीर्तिशेष पं. देवेंद्रशर्मा इन्द्र जी और वीरेंद्र आस्तिक जी के नाम का सहारा लिया उनका भी आभार
 
(एक)

कैसा असगुन गीत 
पेड़ पर लिखा कुल्हाड़ी ने 
पंछी रोने लगे ,
और क्या कर लेते 

युग कहता है वनस्थली में 
शक्तिपीठ होगा 
पत्रं पुष्पम नहीं 
यहां पर कंक्रीट होगा 

खुद से ही भयभीत 
ध्वंस की आशंकाओं में 
लाल बटन पर अपनी अंगुली धरले लेते

विष गंधा का लेप चढ़ाए 
बैठे अंगों में 
परछाई के डर से रहने 
लगे सुरंगों में 

कारा से है प्रीत 
नगर की हदबंदी कर दी 
जितना था उतना बाहों में भर लेते 

पुरवा इंद्रधनुष बादल को 
पाया किस्से में 
जोड़ घटा कर यूरेनियम 
हमारे हिस्से में 

खोज रहे मनमीत रक्त के रेखा चित्रों में 
गति के नाम धुएं के
बीच बिचर लेते 

दबी हुई है सांस मशीनों में 
क्या बोलेगी 
माटी अपने तिरस्कार का 
बदला तो लेगी 

सृष्टा  के विपरीत मरण का वरण कर  रहे हम
क्या कर लेते 
जो अवतार उतर लेते

(दो)

मैं कहता कुछ नहीं गीत में 
सिर्फ इशारे करता हूँ

ये कविताएँ
संविधान तो नहीं शरीयत नहीं 
नई उमर की 
पितृ संपदा नहीं वसीयत नहीं 
मैं ही इन्हें लाड़ करता हूँ 
मैं ही मारा करता हूँ 

 ऐसे रहती कविता 
रक्त शिराओं में, सिर में 
बेटी घर में धान खेत में 
दीपक मंदिर में 
इन्हें गाय गौरी गणेश की 
तरह पुकारा करता हूँ

भीतर बाहर के अनर्थ की 
नागिन बलखाती 
मौसम कलम थमाता
भलमनसाहत लिखवाती
संवेदन पर परपीड़ा के 
बिंब उतारा करता हूँ

समाधान तो नहीं 
मगर जीने की कोशिश है 
हरी-भरी उम्मीदें हैं 
लय भी है वंदिश है
खारे जल से मैं खुशियों के 
पाँव पखारा करता हूँ

महेश अनघ

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